IGNOU FREE BSOG-173 विकास पुनर्चिंतन Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BSOG-173 विकास पुनर्चिंतन Solved Guess Paper 2025

प्रश्न 1: विकास क्या है? विकास की बदलती अवधारणा की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

विकास एक ऐसी अवधारणा है जिसका अर्थ समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। प्रारंभिक दौर में विकास को केवल आर्थिक वृद्धि से जोड़ा जाता था और इसे राष्ट्रीय आय, औद्योगीकरण, उत्पादन तथा तकनीकी प्रगति के माध्यम से मापा जाता था। यह माना जाता था कि जितना अधिक उत्पादन और औद्योगिक विस्तार होगा, समाज उतना ही अधिक विकसित होगा। स्वतंत्रता के बाद भारत जैसे देशों ने भी भारी उद्योगों, बाँधों और आधारभूत संरचनाओं पर आधारित विकास मॉडल अपनाया। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि केवल आर्थिक वृद्धि से गरीबी, बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक अन्याय जैसी समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं। कई देशों में तेज़ आर्थिक विकास के बावजूद बड़ी आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रही। इसके बाद विकास की अवधारणा का विस्तार हुआ और इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय जैसे तत्व शामिल किए गए। विकास को अब केवल “आय बढ़ाने” की प्रक्रिया नहीं, बल्कि “जीवन की गुणवत्ता सुधारने” की प्रक्रिया के रूप में देखा जाने लगा। इसके साथ ही पर्यावरणीय संकटों ने विकास की अवधारणा को और गहराई दी। अंधाधुंध औद्योगीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता के विनाश जैसी समस्याओं को जन्म दिया। इससे “सतत विकास” की अवधारणा सामने आई, जिसमें वर्तमान की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा पर बल दिया गया। आधुनिक समय में विकास को एक भागीदारीपूर्ण प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाता है, जहाँ स्थानीय समुदायों की भूमिका, लोकतांत्रिक निर्णय और जनसहभागिता को महत्व दिया जाता है। कुछ विद्वानों ने विकास को एक पश्चिमी विचारधारा बताया है, जो गैर-पश्चिमी समाजों पर थोपी गई है और उनकी स्थानीय संस्कृतियों व ज्ञान को कमजोर करती है। इस प्रकार आज विकास को एक बहुआयामी प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक समानता, मानव अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक गरिमा अनिवार्य मानी जाती है।

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प्रश्न 2: विकास के प्रमुख सिद्धांतों की विवेचना कीजिए।

विकास के विभिन्न सिद्धांत समाज के परिवर्तन और प्रगति को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझाते हैं। सबसे प्रारंभिक और प्रभावशाली सिद्धांत आधुनिकीकरण सिद्धांत है, जो यह मानता है कि सभी समाज एक ही विकास-पथ से गुजरते हैं और पारंपरिक समाज धीरे-धीरे आधुनिक समाज में बदल जाते हैं। इसमें औद्योगीकरण, नगरीकरण, शिक्षा और तकनीकी प्रगति को विकास का आधार माना गया। लेकिन यह सिद्धांत औपनिवेशिक शोषण, सांस्कृतिक विविधता और सत्ता असमानता की अनदेखी करता है। इसके विरोध में निर्भरता सिद्धांत सामने आया, जिसने यह तर्क दिया कि विकासशील देशों की गरीबी का कारण उनका पिछड़ापन नहीं, बल्कि विकसित देशों द्वारा किया गया शोषण है। इस सिद्धांत के अनुसार पूँजीवादी दुनिया में “केन्द्र” और “परिधि” के बीच स्थायी असमानता बनी रहती है। इसके बाद विश्व-प्रणाली सिद्धांत आया, जिसने पूरे विश्व को एक ही पूँजीवादी व्यवस्था के रूप में देखा और विकास एवं अविकास को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया। आगे चलकर मानव विकास सिद्धांत ने विकास की दिशा ही बदल दी, जिसमें आय के स्थान पर स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वतंत्रता, समानता और जीवन की गुणवत्ता को विकास का आधार बनाया गया। इसके साथ ही उत्तर-विकास (Post-Development) दृष्टिकोण ने विकास की पूरी अवधारणा पर ही सवाल उठाया और कहा कि विकास एक पश्चिमी परियोजना है, जो स्थानीय समाजों को निर्भर, असमान और उपभोक्तावादी बनाती है। हाल के समय में अधिकार-आधारित और भागीदारीपूर्ण विकास के सिद्धांत भी उभरे हैं, जिनमें विकास को सामाजिक न्याय और जनसहभागिता से जोड़ा गया है। इस प्रकार विकास के सिद्धांतों का विकास आर्थिक केन्द्रीकरण से लेकर मानव-केंद्रित और वैकल्पिक सोच तक की यात्रा को दर्शाता है।

प्रश्न 3: भारत में विकासात्मक शासनकाल की प्रकृति और विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।

भारत में विकासात्मक शासनकाल की प्रकृति समय के साथ बदलती रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने राज्य-नेतृत्व वाला विकास मॉडल अपनाया, जिसमें सरकार ने योजनाबद्ध ढंग से आर्थिक विकास को दिशा दी। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषि, उद्योग, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढाँचे के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार किया गया और भारी उद्योगों, इस्पात संयंत्रों, बाँधों और वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना की गई। इस मॉडल का उद्देश्य आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय और संतुलित विकास था। भूमि सुधार, आरक्षण नीति और कल्याणकारी योजनाएँ इसी शासनकाल की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेकिन 1990 के बाद भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाई गई, जिससे निजीकरण, वैश्वीकरण और बाजार-आधारित विकास को बढ़ावा मिला। इसके परिणामस्वरूप आईटी, सेवा क्षेत्र, निर्माण और वित्तीय क्षेत्र में तेज़ विकास हुआ, लेकिन इसके साथ असमानता, बेरोजगारी और क्षेत्रीय विषमता भी बढ़ी। हाल के वर्षों में सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं और अधिकार-आधारित नीतियों को भी महत्व दिया है, जैसे भोजन का अधिकार, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य बीमा और आवास योजनाएँ। इस प्रकार भारत का विकासात्मक शासनकाल एक मिश्रित स्वरूप प्रस्तुत करता है, जिसमें राज्य, बाजार और कल्याण तीनों की भूमिका दिखाई देती है, लेकिन इसके भीतर गंभीर अंतर्विरोध भी मौजूद हैं।

प्रश्न 4: विकास कार्यान्वयन (प्रैक्सिस) से जुड़े प्रमुख मुद्दों और चुनौतियों की विवेचना कीजिए।

विकास कार्यान्वयन से आशय यह है कि विकास की योजनाएँ और नीतियाँ वास्तव में ज़मीन पर कैसे लागू होती हैं। व्यवहार में विकास का कार्यान्वयन अनेक चुनौतियों और समस्याओं से घिरा रहता है। सबसे बड़ी समस्या योजनाओं और वास्तविकता के बीच की खाई है। कागज़ों पर बनी योजनाएँ अक्सर भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, प्रशासनिक अक्षमता और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पातीं। जनसहभागिता की कमी भी एक गंभीर समस्या है, क्योंकि अधिकांश योजनाएँ ऊपर से नीचे के ढाँचे में बनाई जाती हैं और स्थानीय लोगों की जरूरतों, अनुभवों और सुझावों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। बड़े विकास प्रोजेक्ट्स जैसे बाँध, सड़क, खनन और औद्योगिक क्षेत्र विस्थापन की समस्या को जन्म देते हैं, जिससे आदिवासी, किसान और गरीब वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। महिलाओं की स्थिति भी विकास प्रैक्सिस में कमजोर बनी रहती है, क्योंकि निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सीमित होती है और उनका कार्यभार बढ़ जाता है। पर्यावरण विनाश, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन भी विकास कार्यान्वयन की बड़ी चुनौतियाँ हैं। इस प्रकार विकास प्रैक्सिस में आर्थिक लक्ष्य और सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी के बीच गंभीर टकराव देखने को मिलता है।

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प्रश्न 5: सतत विकास की अवधारणा की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

सतत विकास की अवधारणा उस विकास मॉडल के रूप में सामने आई है, जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के संसाधनों से समझौता नहीं करता। इसका मूल उद्देश्य आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है। सतत विकास इस बात पर ज़ोर देता है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग सीमित और जिम्मेदारी के साथ किया जाए। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, जल संरक्षण, वन संरक्षण, जैव विविधता और प्रदूषण नियंत्रण को विशेष महत्व दिया जाता है। सामाजिक दृष्टि से सतत विकास समानता, गरीबी उन्मूलन और न्याय की बात करता है। लेकिन इस अवधारणा की आलोचना भी की जाती है। कई आलोचक कहते हैं कि सतत विकास केवल एक नारा बनकर रह गया है, जबकि बड़ी कंपनियाँ “ग्रीन वॉशिंग” के जरिए पर्यावरण के नाम पर मुनाफा कमाती हैं। गरीब समुदायों को संरक्षण की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है, जबकि बड़े उद्योग संसाधनों का अत्यधिक दोहन जारी रखते हैं। विकासशील देशों के सामने यह चुनौती भी है कि वे गरीबी कम करें या पर्यावरण बचाएँ—दोनों के बीच संतुलन बनाना अत्यंत कठिन हो जाता है। इस प्रकार सतत विकास एक आवश्यक अवधारणा होने के बावजूद व्यवहार में कई विरोधाभासों और सीमाओं से घिरी हुई है।

प्रश्न 6: वैश्वीकरण और विकास के संबंध की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

वैश्वीकरण का अर्थ है विश्व की अर्थव्यवस्थाओं, तकनीक, संस्कृति और बाजारों का परस्पर जुड़ाव, जिसने विकास की दिशा और स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया है। 1990 के दशक के बाद भारत सहित अनेक विकासशील देशों ने उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीति अपनाई, जिसका उद्देश्य विदेशी पूँजी, तकनीक और बाजार के माध्यम से तेज़ आर्थिक विकास प्राप्त करना था। इसके परिणामस्वरूप सूचना प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र, दूरसंचार, वित्त और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्रों में तेज़ वृद्धि हुई, रोजगार के नए अवसर बने और उपभोक्ताओं को अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हुईं। लेकिन साथ ही वैश्वीकरण ने गंभीर असमानताओं को भी जन्म दिया। छोटे किसान, कुटीर उद्योग, असंगठित क्षेत्र के मजदूर और स्थानीय उत्पादक वैश्विक प्रतियोगिता में टिक नहीं पाए और उनकी आजीविका पर संकट आ गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया, जिससे पर्यावरण प्रदूषण, जल संकट और विस्थापन की समस्या बढ़ी। सांस्कृतिक रूप से भी वैश्वीकरण ने उपभोक्तावाद और पश्चिमी जीवन-शैली को बढ़ावा दिया, जिससे स्थानीय संस्कृतियाँ और पारंपरिक ज्ञान कमजोर हुआ। राजनीतिक स्तर पर भी राष्ट्र-राज्यों की स्वायत्तता कमजोर हुई और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं एवं कॉरपोरेट शक्तियों का प्रभाव बढ़ा। इस प्रकार वैश्वीकरण ने एक ओर आर्थिक अवसर पैदा किए, तो दूसरी ओर उसने असमानता, असुरक्षा और पर्यावरण संकट को भी गहरा किया। इसलिए यह कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण के अंतर्गत विकास का स्वरूप असंतुलित और बहिष्करणकारी रहा है, जिसे अधिक न्यायपूर्ण और मानव-केंद्रित बनाने की आवश्यकता है।

प्रश्न 7: भारत में विकास में राज्य की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।

भारत में विकास की दिशा तय करने में राज्य ने स्वतंत्रता के बाद से ही केंद्रीय भूमिका निभाई है। प्रारंभिक वर्षों में भारत ने राज्य-नेतृत्व वाला विकास मॉडल अपनाया, जिसमें सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक विकास को दिशा दी। सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार किया गया और भारी उद्योगों, बाँधों, बिजली परियोजनाओं, इस्पात कारखानों, वैज्ञानिक संस्थानों और शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य आत्मनिर्भरता, औद्योगीकरण और सामाजिक न्याय था। साथ ही भूमि सुधार, आरक्षण नीति और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीब और वंचित वर्गों के उत्थान का प्रयास किया गया। 1990 के बाद उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद राज्य की भूमिका में परिवर्तन आया। अब राज्य प्रत्यक्ष उत्पादनकर्ता बनने के बजाय बाजार को संचालित करने वाला नियामक बन गया। निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया। इसके बावजूद राज्य की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसने खाद्य सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य बीमा, आवास और शिक्षा जैसी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीबों की सुरक्षा का प्रयास जारी रखा। हालाँकि भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता, राजनीतिक हस्तक्षेप और क्षेत्रीय असमानताओं के कारण राज्य की भूमिका की प्रभावशीलता पर कई सवाल उठते हैं। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत जैसे विशाल और विविध देश में विकास को दिशा देने, न्याय सुनिश्चित करने और कमजोर वर्गों की रक्षा करने में राज्य की भूमिका अपरिहार्य बनी हुई है।

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प्रश्न 8: लिंग (जेंडर) और विकास के बीच संबंध का विश्लेषण कीजिए।

लिंग और विकास के बीच संबंध अत्यंत गहरा और महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब उसमें स्त्री और पुरुष दोनों को समान अवसर, अधिकार और सम्मान प्राप्त हो। प्रारंभिक विकास मॉडल लिंग के प्रति उदासीन थे और महिलाओं के श्रम, विशेषकर घरेलू और देखभाल कार्य, को अदृश्य बना दिया गया। विकास योजनाओं में महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में देखा गया, न कि निर्णयकर्ता के रूप में। इसके परिणामस्वरूप विकास की प्रक्रिया में महिलाओं की स्थिति कमजोर बनी रही। महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, भूमि, संपत्ति, स्वास्थ्य और राजनीतिक भागीदारी में असमानता का सामना करना पड़ा। कई विकास परियोजनाओं ने महिलाओं का कार्यभार तो बढ़ा दिया, लेकिन संसाधनों पर उनका नियंत्रण नहीं बढ़ा। विस्थापन की स्थिति में महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, क्योंकि वे न केवल आजीविका खोती हैं बल्कि सामाजिक सुरक्षा भी टूट जाती है। इन समस्याओं के समाधान के लिए “महिला और विकास”, “लिंग और विकास” तथा “लिंग मुख्यधारा” जैसे नए दृष्टिकोण सामने आए, जिनका उद्देश्य महिलाओं को विकास की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना है। भारत में स्वयं सहायता समूह, पंचायती राज में महिलाओं के लिए आरक्षण, शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं ने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई है, लेकिन पितृसत्ता, हिंसा, वेतन असमानता और अवैतनिक श्रम जैसी समस्याएँ अब भी गंभीर बनी हुई हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि लिंग न्याय के बिना विकास अधूरा और असंतुलित रहता है।

प्रश्न 9: विकास में विस्थापन और पुनर्वास की समस्या की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

विस्थापन और पुनर्वास विकास की सबसे गंभीर और पीड़ादायक समस्याओं में से एक है। बड़े-बड़े बाँधों, खनन परियोजनाओं, औद्योगिक क्षेत्रों, राजमार्गों और शहरी विस्तार के नाम पर लाखों किसानों, आदिवासियों और गरीबों को उनकी भूमि से बेदखल किया गया है। विस्थापन केवल भौतिक स्थानांतरण नहीं होता, बल्कि यह आजीविका, सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक पहचान और मानसिक सुरक्षा के टूटने की प्रक्रिया भी होती है। आदिवासी समुदायों के लिए भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, इतिहास और जीवन का आधार होती है। जब वे विस्थापित होते हैं तो वे शहरी झुग्गियों, असंगठित श्रम बाजार और असुरक्षित जीवन की ओर धकेल दिए जाते हैं। पुनर्वास की व्यवस्था अक्सर कागज़ों तक ही सीमित रह जाती है। मुआवज़ा अपर्याप्त होता है, रोजगार की गारंटी नहीं मिलती और सामाजिक पुनर्स्थापन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती। नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे कई आंदोलनों ने विकास के नाम पर होने वाले इस अन्याय को उजागर किया और मानव गरिमा पर आधारित विकास की माँग उठाई। इस प्रकार विस्थापन विकास की उस अंधेरी सच्चाई को दर्शाता है, जहाँ कुछ लोगों की समृद्धि दूसरों के विनाश पर टिकी होती है।

प्रश्न 10: विकास के वैकल्पिक दृष्टिकोणों की विवेचना कीजिए।

विकास के वैकल्पिक दृष्टिकोण पारंपरिक आर्थिक विकास मॉडल की विफलताओं, असमानताओं और पर्यावरणीय विनाश के विरोध में सामने आए हैं। पारंपरिक विकास जहाँ केवल औद्योगीकरण, उपभोग और लाभ पर आधारित है, वहीं वैकल्पिक दृष्टिकोण मानव कल्याण, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण पर बल देते हैं। मानव-केंद्रित विकास का उद्देश्य आय के स्थान पर शिक्षा, स्वास्थ्य, गरिमा और स्वतंत्रता को विकास का आधार बनाना है। भागीदारीपूर्ण विकास में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भूमिका पर ज़ोर दिया जाता है ताकि लोग स्वयं अपने विकास की दिशा तय कर सकें। सतत विकास पर्यावरणीय संतुलन और पीढ़ीगत न्याय को महत्व देता है। गांधीवादी विकास विचार आत्मनिर्भरता, ग्राम-स्वराज, नैतिकता, श्रम की गरिमा और सीमित उपभोग पर आधारित है। उत्तर-विकास दृष्टिकोण तो विकास की पूरी अवधारणा पर ही प्रश्नचिह्न लगाता है और कहता है कि पश्चिमी विकास मॉडल ने स्थानीय समाजों को निर्भर, असमान और उपभोक्तावादी बना दिया है। इसके स्थान पर वह स्थानीय ज्ञान, सामुदायिक अर्थव्यवस्था और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित जीवन को महत्व देता है। भारत में सहकारी आंदोलन, जैविक खेती, स्वयं सहायता समूह, विकेन्द्रीकरण और ग्राम-आधारित उद्योग वैकल्पिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माने जाते हैं। इस प्रकार वैकल्पिक दृष्टिकोण विकास को अधिक न्यायपूर्ण, टिकाऊ और मानवीय बनाने का प्रयास करते हैं।

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