IGNOU FREE BSKS-187 पातंजल योगसूत्र Solved Guess Paper 2025
Q1. पातंजल योगसूत्र का स्वरूप और उसकी संरचना का वर्णन कीजिए।
पातंजल योगसूत्र भारतीय दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसे योग-दर्शन का आधारभूत शास्त्र माना जाता है। आचार्य पतंजलि ने योगसूत्रों को अत्यंत संक्षिप्त, सूत्रात्मक और वैज्ञानिक शैली में प्रस्तुत किया। योगसूत्र कुल 195 सूत्रों का संग्रह है, जिसे चार पादों में विभाजित किया गया है—
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समाधि पाद
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साधना पाद
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विभूति पाद
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कैवल्य पाद
समाधि पाद में योग का स्वरूप, चित्त की प्रकृति और समाधि के प्रकार बताए गए हैं। पतंजलि बताते हैं कि मन की वृत्तियों का निरोध ही योग है—“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”। इस अध्याय में समाधि के दो रूप—सविचार, निर्विचार तथा सवितर्क, निर्वितर्क आदि का वर्णन मिलता है।
साधना पाद में योग के व्यावहारिक पक्ष यानी अष्टांग योग का विस्तृत वर्णन है—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यह अध्याय साधक को जीवन में नैतिक अनुशासन, शारीरिक स्थिरता और मानसिक शुद्धि का मार्ग सिखाता है।
विभूति पाद में योगाभ्यास से प्राप्त होने वाली सिद्धियों का वर्णन है। ध्यान, धारणा और समाधि के संयोग को ‘संयम’ कहा गया है। संयम के अभ्यास से ज्ञान-विज्ञान, स्मरण-शक्ति और असाधारण मानसिक क्षमताएँ प्राप्त होती हैं। परंतु पतंजलि सिद्धियों को अंत लक्ष्य नहीं, साधना में बाधक बताते हैं।
कैवल्य पाद में मोक्ष या कैवल्य की स्थिति का वर्णन है। कैवल्य का अर्थ है—पुरुष का प्रकृति से पूर्णतः भिन्न होकर स्वतंत्र हो जाना। यह अध्याय बताता है कि जब चित्त शुद्ध होकर अपनी वृत्तियों को समाप्त कर लेता है तब साधक अपने वास्तविक रूप ‘पुरुष’ को प्राप्त करता है।
पातंजल योगसूत्र का महत्व इसलिए अत्यधिक है क्योंकि यह अध्यात्म, मनोविज्ञान और दर्शन का अद्भुत संगम है। यह केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन-प्रबंधन का वैज्ञानिक मार्गदर्शक भी है।
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Q2. ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ इस सूत्र का अर्थ और महत्व स्पष्ट कीजिए।
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” योगसूत्र का सबसे प्रसिद्ध और मूलभूत सूत्र है। इसमें योग की परिभाषा अत्यंत संक्षिप्त परंतु व्यापक रूप में दी गई है।
‘चित्त’ का अर्थ है—मन, अहंकार और बुद्धि का समग्र रूप।
‘वृत्ति’ का अर्थ है—मन के उठने वाले विचार, भावनाएँ, कल्पनाएँ और प्रतिक्रियाएँ।
‘निरोध’ का अर्थ है—वृत्तियों का शांत हो जाना।
अर्थात जब मन का प्रवाह थम जाता है और वह स्थिर हो जाता है, उसी अवस्था का नाम योग है। यह सूत्र बताता है कि योग कोई शारीरिक क्रिया मात्र नहीं, बल्कि मानसिक नियंत्रण और शुद्धि की प्रक्रिया है।
इस सूत्र के महत्व को चार बिंदुओं में समझा जा सकता है—
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योग की वैज्ञानिक परिभाषा:
इसमें योग को धर्म, जाति, कर्म से परे एक मानसिक स्थिति के रूप में बताया गया है। यह मनोविज्ञान की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। -
वृत्तियों का कारण और प्रभाव:
मन भटकता है तो दुःख, तनाव, भ्रम, क्रोध और मोह उत्पन्न होते हैं। जब वृत्तियाँ नियंत्रित हो जाती हैं, तब शांति, आनंद और ज्ञान प्राप्त होता है। -
ध्यान का आधार:
ध्यान का उद्देश्य भी यही है कि मन भटकने से रुककर केंद्रित हो जाए। अतः यह सूत्र पूरा ध्यान-प्रक्रिया का आधार है। -
आध्यात्मिक उन्नति:
वृत्तियों के शांत होने पर साधक अपने सच्चे स्वरूप—पुरुष—का अनुभव करता है। यही मोक्ष का मार्ग है।
इस प्रकार यह सूत्र योग-दर्शन की आत्मा है और साधना के हर चरण में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
Q3. अष्टांग योग के आठ अंगों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
पतंजलि ने साधना पाद में व्यावहारिक योग का जो मार्ग बताया है, उसे अष्टांग योग कहा जाता है। यह मन, शरीर और आत्मा के संपूर्ण विकास का मार्ग है। इसके आठ अंग निम्न प्रकार हैं—
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यम — सामाजिक अनुशासन। पाँच यम—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
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नियम — व्यक्तिगत अनुशासन। पाँच नियम—शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान।
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आसन — शारीरिक स्थिरता और आराम की अवस्था।
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प्राणायाम — श्वास-नियंत्रण, जिससे मन भी नियंत्रित होता है।
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प्रत्याहार — इंद्रियों का बाहरी विषयों से हटकर भीतर की ओर मुड़ना।
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धारणा — एकाग्रता, मन को एक बिंदु पर स्थिर करना।
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ध्यान — निरंतर एकाग्र प्रवाह।
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समाधि — साधक का वस्तु में पूर्ण विलय।
अष्टांग योग जीवन के नैतिक, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी पहलुओं को संतुलित करने का वैज्ञानिक मार्ग है। यही कारण है कि यह आज भी योग का मूल आधार माना जाता है।
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Q4. समाधि के प्रकारों का विवेचन कीजिए।
पतंजलि समाधि दो मुख्य प्रकारों में बताते हैं—
(1) सविकल्प / सप्रज्ञ समाधि
इसमें मन एकाग्र तो होता है, पर वस्तु का ज्ञान बना रहता है। इसके चार प्रकार—
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सवितर्क
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निर्वितर्क
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सविचार
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निर्विचार
सप्रज्ञ समाधि ज्ञान और विवेक पर आधारित अवस्था है।
(2) निर्बीज समाधि
यह सर्वोच्च अवस्था है जिसमें मन का संपूर्ण निरोध हो जाता है। कोई वृत्ति शेष नहीं रहती। साधक अपने वास्तविक स्वरूप—पुरुष—का अनुभव करता है।
समाधि का लक्ष्य मानसिक विक्षेपों का अंत और आत्मज्ञान की प्राप्ति है।
Q5. चित्त की वृत्तियाँ और उनके निरोध के उपायों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
पतंजलि योगसूत्र में चित्त को मन, बुद्धि और अहंकार का संयुक्त रूप बताया गया है। चित्त में निरंतर उठने वाले विचार, भाव, कल्पनाएँ और प्रतिक्रियाएँ वृत्तियाँ कहलाती हैं। चित्त की पाँच प्रमुख वृत्तियाँ हैं—
- प्रमाण — प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम से प्राप्त ज्ञान
- विपर्यय — गलत या भ्रमपूर्ण ज्ञान
- विकल्प — कल्पना, जो वास्तविक वस्तु के बिना भी कही जाती है
- निद्रा — गहरी नींद की अवस्था
- स्मृति — मन में संचित पूर्व अनुभवों का पुनर्जागरण
यही वृत्तियाँ मन को चंचल, अस्थिर और अशांत करती हैं। योग का उद्देश्य इन वृत्तियों का निरोध करना है ताकि मन स्थिर होकर अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर सके।
चित्तवृत्ति–निरोध के उपाय
पतंजलि दो मुख्य उपाय बताते हैं—
(1) अभ्यास (Practice)
अभ्यास का अर्थ निरंतर साधना है। यह नियमित, दृढ़ और दीर्घकालिक होना चाहिए। अभ्यास में मुख्यतः ये क्रियाएँ आती हैं—
- ध्यान
- धारणा
- प्राणायाम
- आसन
- मन का बार-बार एक स्थान पर केंद्रित करना
अभ्यास से मन की चंचलता घटती है और एकाग्रता बढ़ती है।
(2) वैराग्य (Detachment)
वैराग्य का अर्थ है — विषय–वासनाओं, इच्छाओं, आसक्तियों से मन का हट जाना। जब मन बाहरी सुखों में नहीं उलझता, तब वह शांत होता है। वैराग्य दो प्रकार का है—
- अपर वैराग्य — सामान्य विषयों से अनासक्ति
- पर वैराग्य — सूक्ष्म तत्वों और गुणों से भी अनासक्ति
इन दोनों उपायों से चित्त की वृत्तियाँ शांत होने लगती हैं।
अन्य सहायक उपाय:
- मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा का अभ्यास
- प्राणायाम द्वारा श्वास और मन का नियंत्रण
- इंद्रियों को संयमित रखना
- सकारात्मक विचार
इस प्रकार चित्त की वृत्तियों का निरोध योग का प्रथम और मुख्य उद्देश्य है। मन के शांत होने पर ही साधक समाधि और कैवल्य प्राप्त कर सकता है।
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Q6. पाँच क्लेशों (Avidyā, Asmitā, Rāga, Dveṣa, Abhiniveśa) का वर्णन और उनके निवारण के उपाय समझाइए।
पतंजलि ने मन को अशुद्ध करने वाले कारणों को क्लेश कहा है। ये पाँच हैं—
1. अविद्या (अज्ञान)
अविद्या मूल क्लेश है। जब व्यक्ति नश्वर वस्तु को शाश्वत, दुख को सुख, अशुभ को शुभ समझता है, तब अविद्या उत्पन्न होती है। अविद्या सभी क्लेशों की जड़ है।
2. अस्मिता (अहंभाव)
जब मन ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव प्रबल कर लेता है, तब अस्मिता उत्पन्न होती है। व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है।
3. राग (आसक्ति)
सुखद अनुभवों से लगाव होना राग है। यही आसक्ति मन को बाँधती है।
4. द्वेष (घृणा)
दुखद अनुभवों से उत्पन्न प्रतिकूल भावना द्वेष कहलाती है। यह मन में नकारात्मकता पैदा करता है।
5. अभिनिवेश (मृत्यु का भय)
जीवन से चिपके रहने की प्रवृत्ति और मृत्यु का भय अभिनिवेश है। पतंजलि कहते हैं कि यह ज्ञानियों में भी पाया जाता है।
क्लेश-निवारण के उपाय
(1) विवेक–ख्याति
साधक जब यह समझ लेता है कि आत्मा और प्रकृति अलग हैं, तब क्लेश नष्ट होने लगते हैं।
(2) अष्टांग योग का अभ्यास
यम–नियम से मन शुद्ध होता है।
आसन–प्राणायाम से मन स्थिर होता है।
धारणा–ध्यान से क्लेश कमजोर पड़ते हैं।
(3) वैराग्य और अभ्यास
इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग क्लेशों के नाश का मुख्य मार्ग है।
(4) समाधि
समाधि की अवस्था में क्लेश पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं।
क्लेश मानसिक अशांति के कारण हैं, और उनका निवारण ही आत्मज्ञान का मार्ग है।
Q7. विभूति पाद में वर्णित सिद्धियों का वर्णन कीजिए तथा पतंजलि ने उन्हें बाधा क्यों कहा है?
विभूति पाद में पतंजलि ने योगाभ्यास से प्राप्त होने वाली असाधारण शक्तियों (सिद्धियों) का वर्णन किया है। ये शक्तियाँ धारणा, ध्यान और समाधि के संयम से उत्पन्न होती हैं।
मुख्य सिद्धियाँ
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मनःपरायणता — दूसरों के विचार जानना
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अतीत–भविष्य का ज्ञान
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लघिमा, महिमा जैसी अद्भुत शक्ति
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दूरी पर वस्तुओं का ज्ञान
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अदृश्य होने की क्षमता
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स्मरण–शक्ति का विस्तार
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इंद्रियों पर नियंत्रण
ये सिद्धियाँ मन की शक्ति के विकास का परिणाम हैं।
पतंजलि ने इन्हें बाधा क्यों कहा?
1. साधक का मार्ग भटकता है
सिद्धियाँ आकर्षक होती हैं। साधक उनमें उलझकर अंतिम लक्ष्य ‘कैवल्य’ को भूल सकता है।
2. अहंकार बढ़ता है
सिद्धियाँ अहंभाव को बढ़ाती हैं, जिससे साधक पतन की ओर जा सकता है।
3. समय और ऊर्जा का व्यय
साधक अपना समय सिद्धियाँ दिखाने में नष्ट करता है, साधना में नहीं।
4. आध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है
सिद्धियाँ साधना के मार्ग में अवरोध बन जाती हैं।
इसी कारण पतंजलि कहते हैं कि सिद्धियों को सम्मान के योग्य नहीं, बल्कि त्यागने योग्य माना चाहिए।
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Q8. कैवल्य पाद में वर्णित कैवल्य (मोक्ष) की अवस्था का वर्णन कीजिए।
कैवल्य योगसूत्र का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य है। कैवल्य का अर्थ है—पुरुष की प्रकृति से पूर्ण स्वतंत्रता। जब मन की सभी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, तब वह कैवल्य प्राप्त करता है।
कैवल्य की मुख्य विशेषताएँ
1. पुरुष–प्रकृति का विवेक-ज्ञान
साधक को स्पष्ट हो जाता है कि वह शरीर, मन, बुद्धि नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना है।
2. कर्म–बंधन का अंत
भूत, भविष्य और वर्तमान कर्मों का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
3. क्लेशों का पूर्ण नाश
अविद्या, अस्मिता, राग–द्वेष, अभिनिवेश नष्ट हो जाते हैं।
4. चित्त का पूर्ण विशुद्धिकरण
चित्त अब किसी भी विकार से दूषित नहीं होता। वह दर्पण की भाँति निर्मल हो जाता है।
5. आत्मस्वरूप की अनुभूति
साधक को यह अनुभव होता है कि आत्मा कभी जन्म–मरण के बंधन में नहीं बंधी। वह सदा मुक्त है।
पतंजलि कहते हैं कि कैवल्य कोई स्थान नहीं, बल्कि अंतर्मन की स्थिति है—पूर्ण शांति, पूर्ण स्वतंत्रता और पूर्ण आनंद की अवस्था।
यही योग का अंतिम लक्ष्य है।
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