IGNOU FREE BSKS-186 अभिनय और पटकथा लेखन Solved Guess Paper 2025
Q1. अभिनय क्या है? अभिनय की कला के प्रमुख तत्त्वों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
अभिनय वह कला है जिसके माध्यम से कलाकार किसी चरित्र, भावना, परिस्थिति और कथा को अपने शरीर, चेहरे, आवाज़ और भावों द्वारा जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। अभिनय मात्र संवाद बोलना नहीं होता, बल्कि यह पूरी व्यक्तित्व अभिव्यक्ति की प्रक्रिया है, जिसमें शरीर, मन और भाव—तीनों सक्रिय होते हैं।
अभिनय के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं—
1. भाव (Emotion):
अभिनेता को विभिन्न भाव जैसे रति, हास्य, क्रोध, करुणा, वीभत्स, भय, शांत आदि को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त करना होता है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में ‘रस’ को अभिनय का सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है—अभिनेता के भावों से ही दर्शक में रस उत्पन्न होता है।
2. अंगिक अभिनय (Body Expression):
शरीर, मुद्रा, चाल, हाव-भाव, हाथों की गति—ये सब अभिनय का महत्वपूर्ण भाग हैं। एक अभिनेता को अपने शरीर को नियंत्रित करके चरित्र के अनुरूप भाषा देना होती है।
3. वाचिक अभिनय (Voice & Dialogue Delivery):
संवाद बोलने की शैली, उच्चारण, स्वर का उतार-चढ़ाव, रुकावट, गति—ये सब वाचिक अभिनय के अंतर्गत आते हैं। अच्छे अभिनेता अपनी आवाज़ से ही वातावरण और भाव पैदा कर लेते हैं।
4. सात्विक अभिनय (Inner Expression):
सात्विक अभिनय आंतरिक भावों की अभिव्यक्ति है—आँसू, रोमांच, कंप, मुर्छा आदि। यह तभी संभव है जब अभिनेता चरित्र की भावना को आत्मसात कर लेता है।
5. चरित्र-निर्माण (Characterization):
अभिनेता को अपने चरित्र का अध्ययन करना पड़ता है—उसकी पृष्ठभूमि, स्वभाव, विचार, लक्ष्य, संबंध आदि। गहरी समझ के बिना सशक्त अभिनय संभव नहीं।
6. कल्पनाशीलता (Imagination):
अभिनेता को परिस्थितियों की कल्पना करके चरित्र को संवेदनशील बनाना होता है। कल्पनाशीलता अभिनय में गहराई लाती है।
7. अनुशासन और अभ्यास:
अभिनय निरंतर अभ्यास और आत्म-निरीक्षण माँगता है। दर्पण-अभ्यास, संवाद-अभ्यास, शारीरिक व्यायाम अत्यंत आवश्यक हैं।
इस प्रकार अभिनय एक व्यापक और गहन कला है, जिसमें कलाकार अपने अंदर मौजूद रचनात्मक शक्ति को चरित्र के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचाता है। यह आत्म-अभिव्यक्ति का सर्वोच्च रूप माना जाता है।
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Q2. नाट्यशास्त्र के अनुसार अभिनय के चार भेद – अंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक का वर्णन कीजिए।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में अभिनय को चार मुख्य भागों में विभाजित किया गया है—अंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक। ये चारों अभिनय के मूल स्तंभ हैं।
1. अंगिक अभिनय (Physical Acting):
यह शरीर द्वारा किया जाने वाला अभिनय है। इसमें आँखें, भौंहें, हाथ, चाल, मुद्रा, सिर की गति आदि शामिल हैं। अभिनेता को अपने अंगों पर पूर्ण नियंत्रण रखना होता है, ताकि वह चरित्र की भावनाओं को सही रूप में दर्शा सके। जैसे—वीर चरित्र में उन्नत गर्दन, मजबूत चाल; करुणा में धीमी गति।
2. वाचिक अभिनय (Verbal Acting):
संवाद का उच्चारण, स्वर-लय, ठहराव, गति और आवाज़ की गुणवत्ता वाचिक अभिनय के तत्व हैं। आवाज़ ही अभिनेता की आत्मा मानी जाती है। संवाद बोलते समय भाव और परिस्थिति के अनुसार स्वर बदलना आवश्यक है। उदाहरण: गुस्से में तेज-उच्च स्वर, प्रेम में मधुर स्वर, भय में कांपता हुआ स्वर।
3. आहार्य अभिनय (Costume & Make-up):
यह बाहरी साज-सज्जा का अभिनय है। पोशाक, आभूषण, श्रृंगार, रंग-रोगन, मुखौटा, वेशभूषा—all आहार्य अभिनय का हिस्सा हैं। किसी रानी, साधु, योद्धा, देवता या दैत्य का चरित्र उनके बाहरी रूप से ही पहचाना जाता है, इसलिए आहार्य अभिनय चरित्र पहचान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
4. सात्विक अभिनय (Emotional / Psychological Acting):
सात्विक अभिनय सबसे कठिन माना जाता है। इसमें आंतरिक भावों की अभिव्यक्ति होती है—आँसू, रोमांच, स्तब्धता, कंप, मुर्छा आदि। यह बिना सचमुच उन भावों को महसूस किए संभव नहीं। सात्विक अभिनय वही कर सकता है जो मन से चरित्र को धारण कर ले।
चारों मिलकर अभिनय को पूर्ण रूप देते हैं। अंगिक बिना वाचिक अधूरा है, आहार्य बिना सात्विक प्रभावहीन। इसलिए एक उत्कृष्ट अभिनेता इन चारों का संतुलित उपयोग करता है।
Q3. पटकथा (Script / Screenplay) क्या है? एक अच्छी पटकथा के गुणों का वर्णन कीजिए।
पटकथा, जिसे स्क्रिप्ट या स्क्रीनप्ले कहा जाता है, किसी नाटक, फिल्म, धारावाहिक या नाट्य-प्रदर्शन की संपूर्ण योजना होती है। इसमें संवाद, दृश्य-वर्णन, पात्र, स्थान, समय, क्रिया, कैमरा-निर्देश (फिल्म में) सभी लिखित रूप में दर्ज रहते हैं। पटकथा ही किसी दृश्य-माध्यम का आधार, ढाँचा और दिशा प्रदान करती है।
एक अच्छी पटकथा में निम्नलिखित गुण होने चाहिए—
1. सशक्त कथा (Strong Storyline):
कहानी स्पष्ट, तार्किक, रोचक और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली होनी चाहिए। कहानी में शुरुआत, मध्य और अंत—तीनों सुसंगत होने चाहिए।
2. जीवंत पात्र (Characterization):
पात्र वास्तविक, गहरे और यादगार हों। हर पात्र का उद्देश्य, व्यक्तित्व, सोच और व्यवहार पटकथा में स्पष्ट हो।
3. प्रभावी संवाद (Effective Dialogue):
संवाद स्वाभाविक, संक्षिप्त और चरित्रानुकूल होने चाहिए। संवाद कहानी आगे बढ़ाएँ और पात्रों की भावनाएँ दर्शाएँ। अनावश्यक संवाद पटकथा को कमजोर करते हैं।
4. दृश्य-योजना (Scene Construction):
हर दृश्य का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। दृश्य ऐसे हों कि दर्शक बिना बोले भी स्थिति समझ सके। दृश्य-परिवर्तन सहज हो।
5. गति और लय (Pace & Rhythm):
कहानी की गति संतुलित रहनी चाहिए। न कहीं बहुत धीमी, न कहीं अत्यधिक तेज। रोमांचक दृश्य और शांत दृश्य संतुलन बनाए रखें।
6. संघर्ष और समाधान (Conflict & Resolution):
कहानी में संघर्ष आवश्यक है; संघर्ष ही कहानी को आगे बढ़ाता है। अंत में समाधान संतोषजनक और सार्थक हो।
7. दृश्यात्मकता (Visual Writing):
पटकथा का लेखन “दिखाने” पर आधारित होता है न कि “बताने” पर। उदाहरण: “रवि दुखी है” के बजाय “रवि की आँखों में आँसू भर आए” लिखना अधिक प्रभावी है।
8. भावनात्मक प्रभाव:
अच्छी पटकथा दर्शकों में भाव-जागरण करती है—हास्य, करुणा, रोमांच, डर, प्रेम आदि।
इन सभी गुणों वाली पटकथा ही सफल फिल्म या नाटक की रीढ़ बनती है। पटकथा ही वह नींव है जिस पर पूरा प्रदर्शन खड़ा होता है।
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Q4. पटकथा लेखन की प्रक्रिया चरणबद्ध रूप से समझाइए।
पटकथा लेखन एक रचनात्मक और तकनीकी प्रक्रिया है, जिसे कई चरणों में पूरा किया जाता है। प्रत्येक चरण कहानी को अधिक सुसंगत और प्रभावी बनाता है।
1. विषय चयन (Choosing the Theme):
सबसे पहले लेखक कहानी का विषय तय करता है—सामाजिक, रोमांचक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक, हास्य आदि। विषय ही पटकथा की आत्मा है।
2. कथा-संरचना (Story Development):
लेखक कहानी की रूपरेखा तैयार करता है—मुख्य घटना, संघर्ष, पात्र, चरम बिंदु और अंत। इसे “स्टोरी आउटलाइन” कहा जाता है।
3. पात्र-निर्माण (Character Development):
हर चरित्र का नाम, व्यक्तित्व, उद्देश्य, पृष्ठभूमि, स्वभाव आदि तय किए जाते हैं। पात्र जितने वास्तविक होंगे, पटकथा उतनी प्रभावी बनेगी।
4. सीन ब्रेकडाउन (Scene Breakdown):
कहानी को कई दृश्यों में बाँटा जाता है। हर दृश्य कब, कहाँ, कौन और क्यों—इस आधार पर लिखा जाता है।
5. संवाद लेखन (Writing the Dialogue):
पात्रों की भाषा, भाव, व्यक्तित्व और परिस्थिति के अनुसार संवाद लिखे जाते हैं। संवाद कहानी को आगे बढ़ाते हैं।
6. दृश्य-वर्णन (Scene Description):
लेखक जगह, प्रकाश, क्रिया, वातावरण और पात्रों की गतिविधियों का वर्णन करता है। यह निर्देशक को सटीक मार्गदर्शन देता है।
7. पटकथा मसौदा (First Draft):
सभी दृश्यों और संवादों को जोड़कर पहला मसौदा तैयार किया जाता है।
8. संशोधन (Rewriting):
पहले मसौदे में सुधार किया जाता है—अनावश्यक दृश्य हटाए जाते हैं, संवाद बदले जाते हैं, गति सुधारी जाती है।
9. अंतिम पटकथा (Final Draft):
संशोधित एवं संतुलित स्क्रिप्ट को अंतिम रूप दिया जाता है।
यह प्रक्रिया दिखाती है कि पटकथा लेखन केवल कहानी नहीं, बल्कि तकनीक, संरचना और रचनात्मकता का पूरा विज्ञान है।
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Q5. एक सफल अभिनेता के गुणों का वर्णन कीजिए।
एक सफल अभिनेता केवल संवाद बोलने वाला कलाकार नहीं होता, बल्कि वह एक संवेदनशील, अनुशासित और गहन अभिव्यक्ति वाला व्यक्ति होता है। अभिनय एक संपूर्ण कला है, जिसमें भाव, शरीर, आवाज़, मन और कल्पना—सभी का पूर्ण संतुलन आवश्यक है।
सबसे पहला गुण है भाव-संवेदनशीलता। अभिनेता को भावों को गहराई से महसूस करना होता है, तभी वह दर्शकों तक उस भावना को पहुँचा सकता है। भरतमुनि के अनुसार, रस उत्पत्ति तभी होती है जब अभिनेता भावों को मन से जीता है।
दूसरा गुण है अवलोकन-शक्ति (Observation)। सफल अभिनेता समाज, लोगों, परिस्थितियों और व्यवहार को बेहद ध्यान से देखता है। वह किसी चरित्र के बोलने, चलने, सोचने और प्रतिक्रिया देने के तरीके को समझता है और उसे मंच या कैमरे के सामने जीवंत कर देता है।
तीसरा गुण है शारीरिक नियंत्रण (Body Control)। अभिनेता का शरीर उसका साधन है। उसे मुद्राएँ, चाल, हाव-भाव, चेहरे की अभिव्यक्ति पर नियंत्रण होना चाहिए। एक छोटी-सी भौंह उठने से भी भाव बदल सकता है।
चौथा गुण है वाचिक कौशल (Voice Skill)। सफल अभिनेता अपनी आवाज़ को भावानुसार बदल सकता है—कभी गंभीर, कभी तीव्र, कभी धीमी, कभी मधुर। स्वर-लय, उच्चारण, ठहराव और संवाद-अभिनय उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
पाँचवा गुण है कल्पनाशीलता (Imagination)। अभिनेता कई बार ऐसी स्थितियों का अभिनय करता है जिन्हें उसने वास्तविक जीवन में अनुभव नहीं किया। ऐसे समय में कल्पना ही उसे सहारा देती है।
छठा गुण है अनुशासन और अभ्यास (Discipline & Practice)। अभिनेता को लगातार अभ्यास करना चाहिए—संवाद का अभ्यास, शारीरिक व्यायाम, दर्पण-अभ्यास, आवाज़ का रियाज़ आदि।
सातवाँ गुण है चरित्र में ढलने की क्षमता (Flexibility)। एक अभिनेता विभिन्न प्रकार के पात्र निभाता है—हास्य, करुण, खलनायक, नायक, वृद्ध, युवा आदि। हर अंदाज़ के लिए उसे अपने व्यक्तित्व को बदलने की क्षमता होनी चाहिए।
अंत में, एक सफल अभिनेता टीमवर्क, धैर्य और सीखने की जिज्ञासा रखता है। कुल मिलाकर, अभिनय आत्म-अनुशासन, रचनात्मकता और भावनात्मक गहराई की कला है।
Q6. स्टेज अभिनय और कैमरा अभिनय में अंतर स्पष्ट कीजिए।
स्टेज अभिनय (मंच अभिनय) और कैमरा अभिनय (फिल्म/टीवी अभिनय) दोनों अभिनय की महत्वपूर्ण विधाएँ हैं, लेकिन तकनीक, रूप और प्रस्तुति के स्तर पर दोनों में काफी अंतर है।
सबसे बड़ा अंतर दर्शक दूरी का है। स्टेज पर अभिनेता दर्शकों से दूर होता है, इसलिए उसे अपनी आवाज़ तेज रखनी होती है और चेहरे व शरीर के भाव बड़े और स्पष्ट करने होते हैं। जबकि कैमरा अभिनय में कैमरा अभिनेता के बहुत करीब होता है, इसलिए हल्की-सी आँख की हलचल भी भाव व्यक्त कर देती है। इसलिए कैमरा अभिनय में सूक्ष्मता (subtlety) ज़रूरी है।
दूसरा अंतर आवाज का है। मंच पर आवाज़ प्रोजेक्शन जरूरी है – बिना माइक के सभी दर्शकों तक आवाज़ पहुँचनी चाहिए। फिल्म में माइक मौजूद होता है, इसलिए आवाज़ सामान्य, स्वाभाविक और नियंत्रित रखी जाती है।
तीसरा अंतर प्रस्तुति शैली का है। स्टेज अभिनय अधिक नाटकीय और ऊर्जावान होता है। जबकि कैमरा अभिनय प्राकृतिक और वास्तविक जीवन के निकट। फिल्म अभिनय में अधिक नैसर्गिकता चाहिए।
चौथा अंतर समय और क्रम का है। स्टेज पर कहानी शुरुआत से अंत तक क्रम में प्रस्तुत होती है। अभिनेता पूरे नाटक में निरंतर उपस्थित रहता है। कैमरा अभिनय में दृश्य टुकड़ों में शूट होते हैं, अभिनेता को हर बार उसी भाव में लौटना होता है, चाहे दृश्य पहले हो या बाद में।
पाँचवा अंतर स्पेस (Space) का है। मंच पर बड़ी जगह होती है—अभिनेता स्वतंत्र रूप से चलता है। फिल्म में स्थान सीमित होता है; कैमरा फ्रेम में फिट होना होता है।
छठा अंतर तकनीकी पक्षों का है। फिल्म में कैमरा एंगल, लाइट, क्लोज-अप, साउंड आदि के अनुसार अभिनय बदलता है। मंच पर अभिनेता को प्रकाश व दृश्य के साथ तालमेल बिठाना होता है, पर तकनीकी हस्तक्षेप कम होता है।
सार रूप में—
-
स्टेज अभिनय = ऊर्जावान, बड़ा, प्रोजेक्टेड
-
कैमरा अभिनय = सूक्ष्म, प्राकृतिक, नियंत्रित
दोनों ही कला रूप महत्वपूर्ण हैं, पर दोनों की तकनीकें अलग होती हैं। एक सफल अभिनेता दोनों में दक्ष होता है।
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Q7. पटकथा में संवाद लेखन (Dialogue Writing) की विशेषताएँ और महत्व पर प्रकाश डालिए।
संवाद लेखन पटकथा का सबसे अहम हिस्सा है। संवाद ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं, पात्रों की सोच को व्यक्त करते हैं और दर्शकों के लिए भावनात्मक जुड़ाव उत्पन्न करते हैं। एक प्रभावी संवाद कहानी को जीवंत और रोचक बना देता है।
संवाद लेखन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. स्वाभाविकता (Naturalness):
संवाद वही होने चाहिए जैसा वास्तविक जीवन में लोग बोलते हैं। बनावटी या पुस्तकनुमा भाषा दर्शकों को दूर कर देती है।
2. चरित्रानुकूलता (Character Suitability):
हर पात्र अपनी पृष्ठभूमि, शिक्षा, उम्र और स्वभाव के अनुसार बोलता है। जैसे गाँव का पात्र शहर वाले की तरह नहीं बोलेगा।
3. संक्षिप्तता (Brevity):
संवाद लंबे न हों। छोटी-सी पंक्ति कई बार गहरा प्रभाव डालती है।
4. भाव अभिव्यक्ति (Emotion):
संवादों में भावना झलकनी चाहिए—क्रोध, प्रेम, हास्य, भय, आदि। संवाद जितना भावपूर्ण होगा, दृश्य उतना प्रभावी बनेगा।
5. उपपाठ (Subtext):
कई बार पात्र कुछ और कहता है, पर उसके पीछे कुछ और भाव होता है। इसे subtext कहते हैं और यह संवाद को गहराई देता है।
6. कहानी को आगे बढ़ाना:
संवाद कभी भी बिना उद्देश्य के नहीं होते। हर संवाद कहानी, चरित्र या भाव को आगे ले जाना चाहिए।
7. टकराव (Conflict):
अच्छे संवाद टकराव से बनते हैं—दो पात्रों की असहमति, बहस या भावनात्मक उतार-चढ़ाव संवाद को जीवंत बनाता है।
संवाद लेखन का महत्व इस बात में है कि दर्शक कहानी को शब्दों के माध्यम से समझते, महसूस करते हैं। जो संवाद दिल को छू लेते हैं, वही कहानी को यादगार बनाते हैं।
Q8. पटकथा में दृश्य (Scene) संरचना के सिद्धांत लिखिए।
दृश्य (Scene) पटकथा की मूल इकाई है। हर दृश्य कहानी को आगे बढ़ाने, पात्रों को विकसित करने या भावनात्मक स्थिति दिखाने के लिए लिखा जाता है। प्रभावी दृश्य-रचना के निम्न सिद्धांत हैं—
1. उद्देश्य (Purpose):
हर दृश्य का एक स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए—क्या यह संघर्ष दिखा रहा है? चरित्र की समस्या? कोई नया खुलासा? यदि उद्देश्य नहीं, तो दृश्य अनावश्यक है।
2. तीन चरण (Beginning–Middle–End):
दृश्य शुरुआत में स्थिति स्थापित करता है, मध्य में क्रिया चलती है और अंत में परिणाम या परिवर्तन दिखता है।
3. संघर्ष (Conflict):
कोई भी दृश्य संघर्ष के बिना नीरस हो जाता है। संघर्ष कहानी की गति बढ़ाता है।
4. स्थान और वातावरण (Setting):
दृश्य को कहाँ स्थापित किया गया है—घर, सड़क, दफ्तर, रात, दिन—इन सबका भावनात्मक प्रभाव पड़ता है।
5. चरित्र की क्रिया (Action):
अच्छा दृश्य हमेशा दिखाता है, केवल बताता नहीं। उदाहरण: “वह दुखी था” की जगह “वह चुपचाप खिड़की की ओर देखता रहा” अधिक प्रभावी है।
6. संवाद और मौन:
दृश्य में संवाद तभी होने चाहिए जब आवश्यक हों। कई बार मौन भी संवाद से अधिक प्रभावी होता है।
7. दृश्य की गति (Pacing):
कुछ दृश्य तेज होते हैं (एक्शन), कुछ धीमे (भावनात्मक)। पटकथा में दोनों का संतुलन आवश्यक है।
8. समाप्ति में परिवर्तन:
हर दृश्य के अंत में कुछ बदलना चाहिए—नई जानकारी, नया मोड़, नया भाव।
अच्छी दृश्य संरचना मिलकर पूरी कहानी को रोचक, सुगठित और प्रभावशाली बनाती है।
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Q9. पटकथा लेखन में चरित्र-निर्माण (Character Development) का महत्व स्पष्ट कीजिए।
चरित्र पटकथा की आत्मा होते हैं। बिना मजबूत पात्रों के कहानी जीवित नहीं होती। चरित्र-निर्माण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा लेखक पात्रों की पृष्ठभूमि, व्यक्तित्व, भावनाएँ, इच्छाएँ और संघर्ष निर्धारित करता है।
पहला महत्व – विश्वसनीयता
चरित्र जितना वास्तविक लगेगा, दर्शक उतना जुड़ाव महसूस करेंगे। वास्तविकता के बिना पात्र कृत्रिम लगते हैं।
दूसरा – कहानी को दिशा देना
हर पात्र कहानी को आगे बढ़ाता है। मुख्य पात्र की इच्छाएँ ही कहानी की धुरी होती हैं—उसे क्या चाहिए? उसे क्या रोक रहा है?
तीसरा – संघर्ष (Conflict) उत्पन्न करना
कहानी का संघर्ष पात्रों के स्वभाव, निर्णयों और व्यवहार से उत्पन्न होता है। यदि चरित्र गहरे और स्पष्ट हों, तो संघर्ष स्वभाविक बनता है।
चौथा – भावनात्मक जुड़ाव
दर्शक किसी पात्र से प्यार, नफरत, सहानुभूति या भय महसूस करते हैं। यह तभी होता है जब पात्र अच्छी तरह निर्मित हों।
चरित्र निर्माण के तत्व:
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पृष्ठभूमि (Background)
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लक्ष्य और इच्छाएँ (Goals)
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कमज़ोरियाँ और ताकतें
-
व्यक्तित्व गुण
-
संबंध (Relationships)
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परिवर्तन (Character Arc)
पात्रों का विकास कहानी के विकास जितना ही आवश्यक है। मजबूत पात्र पटकथा को यादगार बना देते हैं।
Q10. पटकथा लेखन में कल्पनाशीलता और रचनात्मकता की भूमिका समझाइए।
पटकथा लेखन केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है; यह कल्पनाशीलता और रचनात्मकता की कला है। कहानी तभी प्रभावशाली बनती है जब लेखक अपनी कल्पना को स्वाभाविक और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करे।
कल्पनाशीलता का अर्थ है—ऐसे दृश्य, स्थितियाँ और पात्र बनाना जो दर्शकों को नए अनुभव दें। लेखक वास्तविक जीवन से प्रेरणा लेकर भी नए कथानक और क्षण रच सकता है।
रचनात्मकता लेखक की वह क्षमता है जिससे वह सामान्य घटना को भी असाधारण और रोचक बना देता है। वही मोड़, वही संघर्ष, वही भाव—सभी पटकथा में नए अंदाज़ से प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
कल्पनाशीलता कहानी में गहराई लाती है, जबकि रचनात्मकता उसकी प्रस्तुति को जीवंत बनाती है।
उदाहरण:
एक साधारण दृश्य—”लड़का बस पकड़ने दौड़ रहा है”—इसे कल्पना और रचनात्मकता के साथ कई तरीकों से रोचक बनाया जा सकता है।
इन दोनों के बिना पटकथा सपाट, उबाऊ और सामान्य बन जाती है। इसलिए कल्पना और रचनात्मकता पटकथा की सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं।
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