IGNOU FREE BSKS-185 संस्कृत छन्द और संगीत Solved Guess Paper 2025
Q1. छन्दशास्त्र का स्वरूप, महत्व और भारतीय काव्य-परंपरा में उसका स्थान वर्णन कीजिए।
छन्दशास्त्र काव्य का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसे काव्य का “शारीर-रचना शास्त्र” भी कहा जाता है। छन्द वह नियमबद्ध संरचना है जिसके आधार पर कविता की लय, गति और ताल निर्धारित होती है। संस्कृत साहित्य में छन्द को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है, क्योंकि छन्द ही काव्य को सौन्दर्य, माधुर्य और संगीतात्मकता प्रदान करता है।
छन्दशास्त्र के अनुसार कविता मात्र विचारों का संग्रह नहीं बल्कि ध्वनि-सौंदर्य का अनुशासित रूप है। वर्णों की मात्रा, गति, गुरु–लघु, यति, ताल — इन सभी का संयोग छन्द कहलाता है। छन्दशास्त्र साहित्य को न केवल सौंदर्य प्रदान करता है, बल्कि उसे स्मरणीय, प्रभावशाली और श्रवण-सुखद बनाता है।
भारतीय काव्य-परंपरा में छन्द का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वेदों के ऋचाओं में विविध छन्दों का अत्यंत सुंदर प्रयोग मिलता है—गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, जगती आदि का उल्लेख वेदों में है। यह सिद्ध करता है कि छन्द का विकास वैदिक काल से ही प्रारंभ हो गया था।
छन्दशास्त्र का महत्व तीन कारणों से अत्यधिक है—
(1) संगीतात्मक सौन्दर्य: छन्द काव्य को ताल और माधुर्य देता है।
(2) स्मरण-सहजता: छन्दबद्ध रचनाएँ स्मरण में आसानी से रहती हैं।
(3) शास्त्रीय अनुशासन: काव्य-रचना में छन्द की व्यवस्था साहित्य की परंपरा और गरिमा को बनाए रखती है।
आचार्य पिंगल द्वारा रचित छन्द:शास्त्र इस विषय का प्रथम और प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। इसके अलावा हेमचन्द्र, काशीनाथ, केदारभट्ट आदि विद्वानों ने भी छन्द साहित्य पर महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे हैं।
इस प्रकार छन्दशास्त्र भारतीय काव्य की आत्मा है। इसके बिना कविता संगीतहीन और भावहीन प्रतीत होती है। इसलिए छन्द काव्य की संरचना, सौन्दर्य और संगीत में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
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Q2. भारतीय संगीत के स्वरूप और उसके मूल तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
भारतीय संगीत का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि साधना, भावाभिव्यक्ति और आध्यात्मिक अनुभव का मार्ग भी है। भारतीय संगीत मुख्यतः दो परंपराओं में विकसित हुआ—हिंदुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत। दोनों की जड़ें वैदिक सामगान में मिलती हैं।
संगीत के तीन मुख्य तत्त्व होते हैं—स्वर, लय और ताल।
स्वर संगीत का जीवन है। भारतीय संगीत में सात स्वरों—सा, रे, ग, म, प, ध, नि—का प्रयोग होता है। ये स्वर विभिन्न रागों का निर्माण करते हैं।
लय वह समय-नियमन है जो संगीत को गति देता है।
ताल लय का पैटर्न है। दादरा, केहरवा, तीनताल आदि प्रमुख तालयें हैं।
भारतीय संगीत का विशेष महत्व यह है कि इसमें राग प्रणाली विकसित हुई। प्रत्येक राग अपनी विशिष्ट भावना, समय और वातावरण से संबंधित होता है, जैसे राग भीमपलासी सांझ की करुणा को व्यक्त करता है।
भारतीय संगीत में गान-पद्धति भी महत्वपूर्ण है—खयाल, ध्रुपद, धमार, ठुमरी आदि शैलियाँ संगीत की विविधता को दर्शाती हैं। इसके अतिरिक्त वाद्य संगीत, नृत्य-संगीत और लोक-संगीत भी भारतीय परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं।
संगीत का उद्देश्य केवल सौन्दर्य-भावना उत्पन्न करना नहीं बल्कि मन को शुद्ध और शांत बनाना है। संगीत को ‘नाद-ब्रह्म’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि नाद (ध्वनि) ही दिव्यता का रूप है।
इस प्रकार भारतीय संगीत अद्भुत लय, वैज्ञानिक पद्धति और गहन आध्यात्मिक भाव का संगम है।
Q3. संस्कृत छन्दों के प्रमुख वर्गों और उनके आधार पर वर्गीकरण का वर्णन कीजिए।
संस्कृत छन्दों का वर्गीकरण मुख्यतः दो आधारों पर किया जाता है—(1) वर्णिक छन्द, (2) मात्रिक छन्द।
वर्णिक छन्द उन छन्दों को कहते हैं जिनकी रचना वर्णों (अक्षरों) की संख्या के आधार पर होती है। प्रत्येक पंक्ति में निर्दिष्ट संख्या में वर्ण होते हैं। इसमें गुरु–लघु का महत्व विशेष है। उदाहरण—शार्दूलविक्रीडित, वसंततिलका, मंडाक्रान्ता आदि वर्णिक छन्द हैं।
मात्रिक छन्द मात्राओं के आधार पर रचित होते हैं। एक लघु वर्ण = 1 मात्रा और एक गुरु वर्ण = 2 मात्राएँ माना जाता है। मात्रिक छन्द की विशेषता यह है कि इसमें मात्राओं की संख्या निश्चित होती है, न कि वर्णों की।
उदाहरण—आर्या, गीति, उद्गीति आदि।
इसके अतिरिक्त समवृत्त, अर्द्धवृत्त और विषमवृत्त का वर्गीकरण भी है।
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समवृत्त: चारों पंक्तियों में समान वर्ण-विन्यास।
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अर्द्धवृत्त: दो-दो पंक्तियाँ समान।
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विषमवृत्त: चारों पंक्तियाँ अलग-अलग संरचना वाली।
कुछ पारिभाषिक शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं—
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गुरु: दीर्घ स्वर या व्यंजन-समाप्त वर्ण
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लघु: ह्रस्व स्वर वाले वर्ण
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यति: छन्द के भीतर ठहराव
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गण: तीन वर्णों के समूह को गण कहते हैं, जैसे—य, र, त, भ, ज, स, म, न।
इस प्रकार संस्कृत छन्दों की संरचना अत्यंत वैज्ञानिक और लयपूर्ण होती है, जो काव्य को अत्यंत आकर्षक बनाती है।
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Q4. संस्कृत छन्दशास्त्र में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों का महत्व स्पष्ट कीजिए।
संस्कृत छन्दशास्त्र में अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग होता है, जो छन्द की संरचना को समझने के लिए अनिवार्य हैं। ये शब्द छन्द-विचार का वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण शब्द हैं—गुरु और लघु। गुरु और लघु की पहचान के बिना छन्द बनाया ही नहीं जा सकता। गुरु वर्ण 2 मात्रा और लघु 1 मात्रा का होता है। कविता में लय इन्हीं पर आधारित होती है।
गण (Gaṇas) तीन वर्णों का समूह है। पिंगल छन्दशास्त्र में 8 गण बताए गए हैं—य, र, त, भ, ज, स, म, न। यह गण-कवियों को छन्द की पहचान और रचना में मदद करते हैं।
पाद (Line) छन्द की एक पंक्ति है। चार पादों से श्लोक बनता है।
यति (Pause) रचना में विराम देने का स्थान है, जो काव्य की सुंदरता और अर्थ को स्पष्ट करता है।
मात्रा छन्द का मूल गणनात्मक आधार है, विशेषकर मात्रिक छन्दों में।
वृत्त, समवृत्त, विषमवृत्त—ये छन्द संरचना की विधियाँ हैं। इनके बिना यह निर्धारित नहीं हो सकता कि कविता किस ढंग से रची गई है।
इन पारिभाषिक शब्दों का महत्व इसलिए है कि वे छन्द को वैज्ञानिक, व्यवस्थित और परिभाषित बनाते हैं। इन शब्दों की समझ के बिना छन्द लिखना संभव नहीं।
Q5. वैदिक छन्दों के प्रकारों और उनके उपयोग का वर्णन कीजिए।
वैदिक साहित्य में छन्दों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वेद मंत्र विशेष छन्दों में रचे गए हैं। छन्दों की यह रचना ऋषियों द्वारा निर्धारित ध्वनि-विज्ञान और लय के अनुरूप है।
वैदिक छन्द मुख्यतः निम्न प्रकार के हैं—
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गायत्री छन्द: 24 वर्णों का। तीन पाद, प्रत्येक में 8 वर्ण। अत्यंत पवित्र माना जाता है।
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अनुष्टुप् छन्द: 32 वर्णों का। चार पाद, प्रत्येक 8 वर्णों के।
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त्रिष्टुप् छन्द: 44 वर्णों का।
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जगती छन्द: 48 वर्णों का।
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पंक्ति छन्द: 40 वर्णों का।
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बृहती, उष्णिकाम्, आदि भी वैदिक छन्द हैं।
इनका उपयोग मंत्रापाठ, यज्ञ, स्तोत्र और आध्यात्मिक अनुष्ठानों में होता है। प्रत्येक छन्द की ध्वनि-लय अलग होती है और वह विशेष भाव उत्पन्न करती है। वैदिक छन्द केवल साहित्य नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना का भी माध्यम हैं।
Q6. वैदिक मंत्रों की गान-पद्धति का वर्णन कीजिए।
वैदिक मंत्रों की गान-पद्धति अत्यंत विशिष्ट और शास्त्रीय है। इसे सामगान तथा स्वर-चतुश्रुति पद्धति के आधार पर समझा जाता है।
वैदिक गायन में तीन स्वर होते हैं—उदात्त, अनुदात्त और स्वरित।
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उदात्त — ऊँचे स्वर में
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अनुदात्त — धीमे स्वर में
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स्वरित — मध्यम स्वर में
उच्चारण के साथ स्वरचिह्नों का पालन करना आवश्यक है; क्योंकि स्वर के बदलाव से मंत्र का अर्थ बदल सकता है।
सामवेद में मंत्रों का गान-रूप मिलता है। इनकी लयबद्ध गान-पद्धति आध्यात्मिक वातावरण बनाती है। साम-गान में स्वर-क्रम विशेष होता है, जो संगीत का आधार बन गया।
यही पद्धतियाँ भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़ें भी मानी जाती हैं। वैदिक मंत्रों के गान में शुद्ध उच्चारण, लय और भाव—तीनों का समन्वय अनिवार्य है।
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Q7. लौकिक (Classical) संस्कृत छन्दों का स्वरूप और उनके उपयोग का वर्णन कीजिए।
लौकिक संस्कृत छन्द वे हैं जिनका उपयोग महाकाव्य, नाटकों, काव्य-रचनाओं और गीतों में होता है। इन छन्दों में सौंदर्य, लय, ताल और भाव का अत्यंत सुंदर संयोजन देखने को मिलता है।
प्रमुख लौकिक छन्द हैं—
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शार्दूलविक्रीडित
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मंदाक्रान्ता
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वसंततिलका
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शिखरिणी
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टोड़क
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अनुष्टुप् (श्लोक)
लौकिक छन्दों का उपयोग विशेष भाव व्यक्त करने के लिए किया जाता है। जैसे—
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मंदाक्रान्ता प्रेम और वियोग के लिए
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शार्दूलविक्रीडित वीर-रस और गौरव के लिए
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वसंततिलका मधुरता और शृंगार के लिए
इनमें वर्णों और मात्राओं का अत्यंत सटीक संयोजन होता है। काव्य में भावानुकूलता के लिए कवि विशेष छन्द चुनते हैं।
Q8. लौकिक छन्दों की गान-पद्धति का वर्णन कीजिए।
लौकिक छन्दों में गान-पद्धति संबंधित छन्द की लय और ताल पर आधारित होती है। चूँकि संस्कृत काव्य मुख्यतः गाथा शैली में गाया जाता था, इसलिए छन्दों की ध्वनि-संगति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी।
प्रत्येक छन्द की तारात्मक लय होती है। जैसे—
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वसंततिलका में लय हल्की और मधुर होती है।
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मंदाक्रान्ता में लय धीमी और भावपूर्ण।
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शार्दूलविक्रीडित में गर्वपूर्ण और ऊर्जावान लय-गति।
गान-पद्धति में वर्ण-लघु-गुरु का संतुलन, यति, ताल-क्रम और स्वर-उतार-चढ़ाव निर्धारित होते हैं। नाटकों में छन्द वाले संवाद इसी पद्धति से गाए जाते थे।
इस प्रकार लौकिक छन्द संगीत-मय काव्य के रूप में विकसित हुए।
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Q9. वैदिक तथा लौकिक छन्दों में मुख्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
वैदिक और लौकिक दोनों प्रकार के छन्द संस्कृत साहित्य की अद्वितीय धरोहर हैं, किंतु इन दोनों की संरचना, उद्देश्य, भाषा-शैली और उपयोग अलग-अलग हैं। दोनों के बीच मुख्य अंतर निम्नानुसार है—
सबसे पहला अंतर काल तथा उद्देश्य का है। वैदिक छन्द अत्यंत प्राचीन हैं और इनका प्रयोग यज्ञ, अनुष्ठान, स्तोत्र-पाठ तथा आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था। लौकिक छन्द अपेक्षाकृत नवीन हैं और इनका उपयोग काव्य-रचना, महाकाव्य, नाटक, गीत एवं अलंकारिक प्रयोग के लिए किया जाता है।
दूसरा अंतर भाषा-शैली का है। वैदिक छन्द वैदिक संस्कृत में रचे गए हैं, जिसमें अनेक प्राचीन शब्द, विशेष उच्चारण, स्वर-चिह्न तथा अनुदात्त-उदात्त-स्वरित का प्रयोग मिलता है। वहीं लौकिक छन्द क्लासिकल संस्कृत में लिखे जाते हैं, जिसकी भाषा अधिक परिष्कृत, व्याकरणिक रूप से स्थिर और सहज है।
तीसरा अंतर संरचना-तत्त्वों का है। वैदिक छन्दों में वर्ण-संख्या अधिक लचीली होती है, तथा कभी-कभी अपूर्व छन्द-विन्यास भी मिल जाता है। गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, जगती जैसे छन्दों की लय वैदिक उच्चारण पर आधारित होती है। लौकिक छन्दों में वर्ण व मात्रा की गणना अत्यंत सटीक है। यहाँ गुरु-लघु, गण, यति और पाद विभाजन निश्चित एवं वैज्ञानिक होता है।
चौथा अंतर गान-पद्धति का है। वैदिक छन्दों में मंत्रों का गायन उदात्त-अनुदात्त-स्वरित नियमों के अनुसार किया जाता है। सामवेद में विशिष्ट सामगान पद्धति है। लौकिक छन्दों में गान-पद्धति भाव और रस के अनुरूप होती है। उदाहरणार्थ—मंदाक्रान्ता में करुणा और शृंगार की लय, शार्दूलविक्रीडित में वीर-रस की ऊर्जस्विता, वसंततिलका में मधुरता।
पाँचवा अंतर उपयोग में है। वैदिक छन्द धार्मिक-आध्यात्मिक विधि में प्रयुक्त होते हैं, जबकि लौकिक छन्द साहित्यिक सौन्दर्य, रचनात्मकता और संगीतात्मकता हेतु प्रयुक्त होते हैं। कालिदास, भारवि, माघ आदि महाकवियों ने लौकिक छन्दों में उत्कृष्ट कृतियाँ रचीं।
इस प्रकार वैदिक छन्द आध्यात्मिक परंपरा का आधार हैं, जबकि लौकिक छन्द काव्य-रस और साहित्यिक सौन्दर्य के वाहक हैं। दोनों मिलकर संस्कृत साहित्य को पूर्णता प्रदान करते हैं।
Q10. लौकिक संस्कृत छन्दों में ‘मंदाक्रान्ता’ और ‘शार्दूलविक्रीडित’ छन्दों की विशेषताओं तथा गान-पद्धति का वर्णन कीजिए।
लौकिक संस्कृत छन्दों में मंदाक्रान्ता और शार्दूलविक्रीडित विशेष रूप से प्रतिष्ठित छन्द हैं। दोनों छन्द अपनी-अपनी संरचना, लय, गति और भाव-प्रकटन के कारण अत्यंत प्रिय माने जाते हैं।
मंदाक्रान्ता छन्द मुख्यतः शृंगार, वियोग और करुणा की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। कालिदास का प्रसिद्ध मेघदूत इसी छन्द में रचा गया है। इस छन्द की संरचना ऐसी है कि इसकी लय धीमी, प्रवाही और भावपूर्ण प्रतीत होती है—मानो ‘मंद गति से चलती हुई नारी’ की चाल। इसकी पंक्ति अपेक्षाकृत लंबी होती है, जिसमें लघु-गुरु मात्राओं का अत्यंत संतुलित संयोजन होता है।
गान-पद्धति में इस छन्द का उच्चारण धीमी गति, मधुर लय और भावपूर्ण स्वर के साथ किया जाता है। इसमें उतार-चढ़ाव सौम्य होते हैं, जिससे श्रोता के भीतर कोमल भावनाएँ जागृत होती हैं।
शार्दूलविक्रीडित छन्द का उपयोग वीर, महाकाव्यात्मक तथा गौरवपूर्ण प्रसंगों में होता है। यह छन्द भारी, शक्तिशाली और ऊर्जावान लय वाला है—मानो सिंह (शार्दूल) की विक्रमी चाल। इसमें 19 मात्राओं का 4 पाद वाला विन्यास होता है। इसकी संरचना सम और सशक्त अनुभव देती है, जिससे कवि का भाव दृढ़ता से प्रकट होता है।
गान-पद्धति में इस छन्द का गायन ऊँचे, भव्य और दृढ़ स्वरों के साथ किया जाता है। स्वर-गति तेज और उत्साहपूर्ण होती है। यह छन्द शौर्य-रस, उत्साह और ओज का संचार करता है।
दोनों छन्द अलग-अलग भावभूमियों के प्रतिनिधि हैं—
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मंदाक्रान्ता = कोमलता, वियोग, सौंदर्य
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शार्दूलविक्रीडित = ओज, वीरता, ऊर्जा
इस प्रकार दोनों छन्द संस्कृत काव्य में विविध भावों को अभिव्यक्त करने में अत्यंत उपयोगी और प्रभावशाली हैं।
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