IGNOU FREE BSKG-171 भारतीय सौन्दर्यशास्त्र Solved Guess Paper 2025
Q1. सौन्दर्यशास्त्र का स्वरूप और उसके अंगों का विस्तृत विवेचन कीजिए।
सौन्दर्यशास्त्र (Aesthetics) वह शास्त्र है जिसमें सौन्दर्य, कला, भावना, अभिव्यक्ति और कलात्मक अनुभूति का अध्ययन किया जाता है। यह केवल सुंदरता की परिभाषा तक सीमित नहीं बल्कि यह समझने का प्रयास करता है कि किसी कलाकृति से मनुष्य को आनंद क्यों प्राप्त होता है, सौन्दर्य का अनुभव कैसे उत्पन्न होता है और कला मनुष्य के जीवन को कैसे प्रभावित करती है। भारतीय सौन्दर्यशास्त्र पश्चिमी सौन्दर्यशास्त्र से अलग, अधिक भावनात्मक, आध्यात्मिक और अनुभूति-प्रधान माना जाता है। इसका मुख्य आधार अनुभूति और रस है। सौन्दर्यशास्त्र के प्रमुख अंगों में रचना, रूप, वस्तु, अनुभूति, रस, और ध्वनि शामिल हैं। रचना कला की संरचना है, जिसमें शब्द, ध्वनि, रंग, आकार आदि का संयोजन होता है। रूप वह बाहरी स्वरूप है जो इंद्रियों को आकर्षित करता है। वस्तु वह विषय है जिसका चित्रण किया जाता है—जैसे प्रकृति, मानव जीवन, प्रेम, युद्ध या आध्यात्मिकता। अनुभूति सौन्दर्यशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, क्योंकि कला का उद्देश्य मन में आनंद, शांति या भावनात्मक उत्तेजना उत्पन्न करना है। रस सौन्दर्य अनुभव की चरम स्थिति है, जिसमें दर्शक अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर उठकर कलात्मक भाव में डूब जाता है। भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में ध्वनि, प्रतीक और सुझाव को भी अत्यंत महत्व दिया गया है। भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का उद्देश्य कला को केवल भौतिक आनंद नहीं बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और मनोवैज्ञानिक संतुलन का साधन मानता है।
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Q2. रस सिद्धांत और उसकी प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
रस सिद्धांत भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का आधार है, जिसे भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में प्रस्तुत किया और बाद में आचार्यों जैसे आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त आदि ने विकसित किया। रस वह आनंद है जो कला के माध्यम से उत्पन्न होता है—यह सामान्य भावनाओं से भिन्न, उच्च कोटि का अलौकिक अनुभव है। भरत के अनुसार, रस “स्थायी भाव”, “विभाव”, “अनुभाव” और “संचारी भाव” के संयोग से उत्पन्न होता है। स्थायी भाव मानव के भीतर स्थाई रूप से मौजूद भाव हैं जैसे प्रेम, हास्य, करुणा, वीरता, क्रोध आदि। विभाव वे कारण हैं जो भावों को उत्पन्न करते हैं—आलंबन (व्यक्ति/वस्तु) और उद्दीपन (परिस्थिति/वातावरण)। अनुभाव वह बाहरी अभिव्यक्ति है जिसमें भाव प्रकट होते हैं—जैसे हँसी, आँसू, मुखमुद्रा, शारीरिक हावभाव। संचारी भाव क्षणिक भाव हैं जो स्थायी भाव को उभरने में सहायता करते हैं। रस की प्रक्रिया में दर्शक (रसिक) की भूमिका महत्वपूर्ण है। रस तभी उत्पन्न होता है जब दर्शक मननशील, संवेदनशील और निष्काम भाव से कला का आस्वादन करे। रस के प्रकार नौ माने गए हैं—शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त। रस सिद्धांत कला को मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक अनुभव बनाता है, जिससे दर्शक और रचना के बीच गहरा संबंध स्थापित होता है।
Q3. भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के प्रमुख सौन्दर्य तत्वों का वर्णन कीजिए।
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के सौन्दर्य तत्व कला की सुंदरता, अनुभूति और भाव के तत्त्वों को स्पष्ट करते हैं। इनमें प्रमुख तत्व हैं—ध्वनि, अलंकार, गुण, रीति, वक्रोक्ति, स्वभाव, और औचित्य। ध्वनि सिद्धांत, जो आनंदवर्धन द्वारा प्रतिपादित है, सुझाव की शक्ति पर आधारित है। कवि जो सीधे न कहकर संकेत के माध्यम से भाव उत्पन्न करता है वह ध्वनि है—यह कविता का आत्मतत्व माना जाता है। अलंकार कविता की शोभा बढ़ाने वाले आभूषण हैं, जैसे उत्प्रेक्षा, उपमा, रूपक आदि। परंतु भारतीय आचार्यों ने स्पष्ट किया कि अलंकार स्वयं सौन्दर्य नहीं, सौन्दर्य का साधन है। गुण भाषा की विशेषताएँ हैं जैसे मधुरता, प्रसाद, ओज आदि। ये कविता को गहराई, सरलता और प्रभाव देते हैं। रीति कविता की संरचना और शैली है। वामन के अनुसार रीति ही काव्य की आत्मा है। वक्रोक्ति का सिद्धांत अभिनव अभिव्यक्ति की विशेषता बताता है—कविता तभी सुंदर है जब उसमें कहने का ढंग अनोखा हो। औचित्य का अर्थ है उचित संयोजन—विषय और भाषा का सामंजस्य, पात्र और भावों का संतुलन। भारतीय सौन्दर्यशास्त्र इन तत्वों के माध्यम से कला को केवल बाहरी सुंदरता नहीं, बल्कि भावात्मक और आध्यात्मिक सौन्दर्य की ओर ले जाता है।
Q4. भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के प्रमुख विचारकों और उनके योगदान का वर्णन कीजिए।
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के विकास में अनेक विचारकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के माध्यम से रस सिद्धांत, अभिनय, नाट्य संरचना और सौन्दर्य अनुभव की प्रक्रिया को वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत किया। उनके रस सिद्धांत को आगे आनंदवर्धन ने विस्तार दिया, जिनका ध्वन्यालोक भारतीय काव्यशास्त्र का मील का पत्थर है। उन्होंने ध्वनि को काव्य की आत्मा माना और सुझाव शक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया। अभिनवगुप्त ने रस सिद्धांत की दार्शनिक व्याख्या की और बताया कि रस अनुभव एक आध्यात्मिक एवं सार्वभौमिक अनुभूति है जिसमें व्यक्ति सीमाओं से ऊपर उठ जाता है। भामह और दंडी ने अलंकार सिद्धांत को विकसित किया, जहाँ काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों का विस्तृत वर्गीकरण मिलता है। वामन ने रीति को काव्य की आत्मा बताया और शैली को सर्वोपरि माना। क्षेमेन्द्र ने औचित्य और काव्य-दोष-गुणों को विस्तार से समझाया। इन विचारकों ने कला, सौन्दर्य और रचना के विभिन्न पहलुओं को परिभाषित करते हुए भारतीय सौन्दर्यशास्त्र को गहराई, व्यापकता और विशिष्टता प्रदान की। उनके सिद्धांत आज भी साहित्य, नाटक, कविता और कला के मूलाधार बने हुए हैं।
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Q5. भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में ‘ध्वनि सिद्धांत’ का महत्व और अनुप्रयोग समझाइए।
ध्वनि सिद्धांत भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी सिद्धांत माना जाता है। इसका प्रतिपादन मुख्यतः आनंदवर्धन ने अपनी प्रसिद्ध कृति ध्वन्यालोक में किया। ध्वनि का अर्थ है—सुझाव, अर्थात किसी भाव, विचार या अर्थ का सीधा न कहा जाकर संकेत के माध्यम से प्रकट होना। आनंदवर्धन के अनुसार कविता की वास्तविक आत्मा माँस, शब्द या अलंकार नहीं, बल्कि सुझाव में है, क्योंकि वही पाठक के भीतर गहन अनुभूति उत्पन्न करता है। उन्होंने ध्वनि को तीन रूपों में विभाजित किया—वस्तु-ध्वनि, अलंकार-ध्वनि और रस-ध्वनि। इनमें रस-ध्वनि को सर्वोच्च माना गया, क्योंकि उसमें समूची कविता को रसात्मक आनंदमय करने की क्षमता होती है।
ध्वनि सिद्धांत यह स्थापित करता है कि कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मनोविज्ञान और अनुभूति का विज्ञान है। प्रत्यक्ष अर्थ (अभिधा) और रूपक अथवा लक्षणा (लक्षणार्थ) से परे जो तीसरी परत खुलती है, वही ध्वनि है। ध्वनि कविता में अनंत संभावनाएँ उत्पन्न करती है। वह पाठक की कल्पना को सक्रिय करती है और अर्थ के सूक्ष्म स्तर तक पहुँचाती है।
ध्वनि सिद्धांत का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर भाव और अनुभूति को प्राथमिकता देता है। आनंदवर्धन के अनुसार, कविता की वास्तविक शक्ति उसके अनकहे में है। जब कवि किसी दृश्य का संकेत देता है, तो पाठक स्वयं उस अनुभव को पूर्ण करता है, जिससे सौन्दर्य अनुभव अधिक गहन हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, “रात शांत है” कहना एक सीधी सूचना है, लेकिन “चाँदनी में नदी जैसे ठहर गई हो” कहना ध्वन्यात्मक है—यह मन में शांति, सौंदर्य, स्थिरता और रहस्य का अनुभव जगाता है।
ध्वनि सिद्धांत का अनुप्रयोग केवल कविता में ही नहीं, बल्कि नाटक, कथा, चित्रकला और संगीत तक फैला है। भारतीय कला में सूक्ष्म संकेत, प्रतीक और रूपकों की परंपरा इसी सिद्धांत पर आधारित है। आधुनिक साहित्य आलोचना में भी ध्वनि सिद्धांत का स्थान महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पाठ की गहराई तक पहुँचकर उसके भीतर छिपे संदेश को उजागर करता है।
अतः ध्वनि सिद्धांत भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की आत्मा है, जो साहित्य को स्थायी, उत्कृष्ट और भावानुभूति से परिपूर्ण बनाता है।
Q6. विशिष्ट भाव (स्थायी भाव) और रसानुभूति में उनकी भूमिका समझाइए।
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में स्थायी भाव रस-निर्माण की प्रक्रिया का केंद्रीय तत्व है। भरतमुनि के अनुसार, स्थायी भाव मनुष्य के भीतर पहले से विद्यमान, गहरे और स्थायी मानसिक भाव हैं, जो सामान्य परिस्थितियों में सुप्त रहते हैं, लेकिन कला-संयोग में जीवंत होकर रस के रूप में विकसित होते हैं। स्थायी भाव कुल आठ या नौ माने गए हैं—रतिभाव (प्रेम), हास (हँसी), शोक (दुःख), क्रोध (रौद्र), उत्साह (वीर), भय (त्रास), जुगुप्सा (बीभत्स), विस्मय (अद्भुत), और बाद में शांत रस हेतु निर्वेद।
रस-अनुभूति की प्रक्रिया में विभाव, अनुभाव और संचारी भाव स्थायी भाव को उद्दीप्त करते हैं। विभाव (कारण) और अनुभाव (अभिव्यक्ति) स्थायी भाव को सक्रिय बनाते हैं, जबकि संचारी भाव उसे पल्लवित करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी काव्य में प्रेम का स्थायी भाव है, तो नायक–नायिका (आलंबन) और चाँदनी रात, पुष्प आदि (उद्दीपन) विभाव बनेंगे। मुस्कान, नेत्र-संचार, लज्जा आदि अनुभाव इस भाव को प्रकट करेंगे, और रोमांच, अधीरता, संकोच आदि संचारी भाव इसे समृद्ध करेंगे। इन सभी तत्वों के समन्वय से प्रेम-रस (शृंगार रस) की अनुभूति होती है।
स्थायी भाव ही रस का बीज है। यदि स्थायी भाव न हों तो विभाव–अनुभाव का समन्वय बेअर्थ हो जाए। स्थायी भाव दर्शक में अंतर्निहित होते हैं; कलाकार उनका उद्दीपन करता है। इसलिए रस की अनुभूति “सहृदय” दर्शक में ही संभव है—जो संवेदनशील, मननशील और मुक्त चित्त से कला का आस्वादन कर सके।
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में स्थायी भाव/रस का संबंध मनोविज्ञान से गहरा है, क्योंकि वे मानवीय अनुभूति की मूल इकाइयाँ हैं। इनके माध्यम से कला दर्शक को उसके स्वयं के गहरे भावों से जोड़ती है। स्थायी भावों की सार्वभौमिकता कला को “सार्वभौमिक आनंद” का स्रोत बनाती है—व्यक्ति अपनी निजी पहचान भूलकर रस का आस्वादन करता है।
अतः निष्कर्षतः स्थायी भाव रस की धुरी हैं। वे ही कला को आत्मा देते हैं, दर्शक के भीतर भाव-जागरण करते हैं और साधारण अनुभव को आध्यात्मिक ऊँचाई तक ले जाते हैं।
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Q7. भारतीय काव्यशास्त्र में ‘वक्रोक्ति सिद्धांत’ का महत्व स्पष्ट कीजिए।
वक्रोक्ति सिद्धांत का प्रतिपादन कुन्तक ने किया और इसे भारतीय काव्यशास्त्र का अत्यंत मौलिक सिद्धांत माना जाता है। वक्रोक्ति का अर्थ है—“वक्र रूप से कही गई बात”, अर्थात अप्रत्यक्ष, नवीन, विशिष्ट और कलात्मक अभिव्यक्ति। कुन्तक के अनुसार कविता का सौंदर्य सीधे शब्दों में नहीं, बल्कि कहने के ढंग में निहित होता है। वक्रोक्ति का मूल सिद्धांत है कि कविता की शोभा “अभिव्यक्ति की विशिष्टता” में है—कैसे कहा गया है, यह अधिक महत्वपूर्ण है, क्या कहा है उससे भी अधिक।
कुन्तक ने वक्रोक्ति को छह स्तरों पर समझाया—वर्णवक्रता, पदवक्रता, वाक्यवक्रता, प्रसंगवक्रता, प्रकरणवक्रता और समस्तवक्रता। इन स्तरों के माध्यम से वे बताते हैं कि भाषा का हर आयाम—शब्द, वाक्य, संदर्भ, कथानक—कविता में सौन्दर्य उत्पन्न करता है यदि उसमें विशिष्टता और नवाचार हो। साधारण भाषा से हटकर चमत्कृत या नवीन ढंग से कही गई बात ही वक्रोक्ति कहलाती है।
उदाहरण के तौर पर, “सूर्य उगा” कहना सामान्य वाक्य है, परंतु “सूर्य ने सुनहरे पर्दे को खींचकर दिन को जगाया” कहना वक्रोक्ति है—इसमें कल्पना, नव्यता, और प्रभाव का सुंदर मेल है। कुन्तक का मानना है कि कविता में अलंकार, भाव, अर्थ और शैली तभी सुन्दर बनते हैं जब उनमें वक्रोक्ति का तत्व उपस्थित हो। इसलिए उन्होंने वक्रोक्ति को काव्य-आत्मा माना।
वक्रोक्ति सिद्धांत का महत्व यह है कि यह कवि-कल्पना और शैलीगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च स्थान देता है। ध्वनि सिद्धांत जहाँ सुझाव पर बल देता है, वहीं वक्रोक्ति अभिव्यक्ति की कलात्मकता को केंद्र में रखता है। वक्रोक्ति किसी भी साधारण विषय को कलात्मक और अनूठा बना सकती है, क्योंकि सौन्दर्य कला की प्रस्तुति में है, वस्तु में ही नहीं।
आधुनिक साहित्य में भी यह सिद्धांत महत्त्वपूर्ण है—कविता, कहानी, उपन्यास, फिल्म और विज्ञापन—सभी में अभिव्यक्ति की विशिष्टता ही प्रभाव उत्पन्न करती है। इस प्रकार, वक्रोक्ति सिद्धांत भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में रचनात्मकता, कल्पनाशीलता और कलात्मक प्रस्तुतिकरण का आधार स्तंभ है।
Q8. औचित्य सिद्धांत को उदाहरण सहित समझाइए।
औचित्य सिद्धांत का विस्तृत प्रतिपादन क्षेमेन्द्र ने किया। औचित्य का अर्थ है—“उचित होना”, अर्थात किसी भी काव्य या कला में विषय, भाषा, पात्र, वर्णन, शैली और भाव का सामंजस्यपूर्ण, सुसंगत और उपयुक्त होना ही औचित्य है। औचित्य साहित्य में संतुलन और मर्यादा का सिद्धांत है।
क्षेमेन्द्र के अनुसार काव्य में तीन प्रकार के औचित्य हैं—वस्तु-औचित्य, अभिव्यक्ति-औचित्य, और प्रसंग-औचित्य। वस्तु-औचित्य का अर्थ है कि विषय और पात्र का स्वभाव के अनुकूल चित्रण होना चाहिए। जैसे, एक त्यागी तपस्वी के मुख से भोग-विलास का वर्णन असंगत होगा। अभिव्यक्ति-औचित्य में भाषा, शब्द-चयन और शैली विषय के अनुरूप होनी चाहिए—करुण रस का वर्णन कोमलता माँगता है, वीर रस ओजस्विता। प्रसंग-औचित्य का तात्पर्य कथा-क्रम, घटनाओं और संवादों का उपयुक्त संयोजन है।
औचित्य सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह साहित्यिक सौन्दर्य को प्राकृतिक और सहज बनाता है। बिना औचित्य के रस उत्पन्न नहीं हो सकता। उदाहरण स्वरूप, यदि हास्य रस में अति-भद्दा या अशालीन वर्णन कर दिया जाए, तो रस की अपेक्षा घृणा उत्पन्न हो सकती है—यह औचित्य का अभाव है।
औचित्य कला को मर्यादा, संतुलन और शालीनता प्रदान करता है। यह कवि को सावधान करता है कि वह भाषा, भाव और चित्रण में अतिरेक न करे। आधुनिक साहित्य में भी औचित्य महत्वपूर्ण है—चरित्र निर्माण, कथानक निर्माण, फिल्म निर्देशन, संवाद-लेखन, सबमें औचित्य सौन्दर्य और प्रभावशीलता का आधार माना जाता है।
अतः औचित्य सिद्धांत साहित्य की गुणवत्ता का संरक्षक है—यह कला को न सिर्फ सुंदर बल्कि उपयुक्त, सार्थक और प्रभावी बनाता है।
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Q9. भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में ‘शांत रस’ का महत्व विस्तारपूर्वक समझाइए।
शांत रस भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का सर्वोच्च रस माना जाता है। इसे प्रथम बार अभिनवगुप्त ने पूर्णतः स्थापित किया। शांत रस का स्थायी भाव है निर्वेद—अर्थात संसार से वैराग्य, शांति और आत्मबोध। भारतीय परंपरा में जहाँ अन्य रस मानवीय भावों पर आधारित हैं, वहीं शांत रस आध्यात्मिक उन्नति और आत्मिक शांति का अनुभव कराता है।
शांत रस की विशेषता यह है कि यह मनुष्य को बाहरी विक्षेपों से दूर कर आत्मा की ओर ले जाता है। यह केवल नकारात्मक भाव नहीं है, बल्कि गहन संतुलन, आत्म-नियंत्रण और मानसिक स्थिरता की स्थिति है। भारतीय साहित्य—महाभारत, गीता, योगसूत्र, उपनिषद—सबमें शांत रस की प्रभावशाली उपस्थिति मिलती है।
शांत रस दर्शक को मानवीय दुःख, संघर्ष और मोह से ऊपर उठाकर विश्रांति की अनुभूति देता है। यह रसानुभूति को आध्यात्मिक स्तर तक ले जाता है। करुण, रौद्र, वीर आदि रस अंततः शांत रस में विलीन होते हैं—यह समस्त रसों का चरम है।
उदाहरण के तौर पर, रामायण में राम का वनगमन, महाभारत में भीष्म का उपदेश, बुद्ध का ज्ञान—सबमें शांत रस की झलक मिलती है। शांत रस किसी कलाकृति को गहराई, दर्शन और स्थायित्व प्रदान करता है।
अभिनवगुप्त के अनुसार, रस-अनुभूति दर्शक को लौकिक पहचान से भुलाकर सार्वभौमिक अनुभूति में ले जाती है—यह मुक्ति का अनुभव है। शांत रस इस मुक्ति-अनुभूति का सबसे ऊँचा रूप है।
अतः शांत रस भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का दार्शनिक शिखर है।
Q10. भारतीय और पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र की तुलनात्मक विशेषताएँ लिखिए।
भारतीय और पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र दोनों कला और सुंदरता का अध्ययन करते हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण, उद्देश्य और दार्शनिक आधार में मूलभूत अंतर है। पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र मुख्यतः तर्क, रूप, संरचना, और बौद्धिक विश्लेषण पर आधारित है। प्लेटो, अरस्तू से लेकर आधुनिक आलोचकों तक, सौन्दर्य को वस्तुनिष्ठ, दृश्य और औपचारिक गुणों से मापा गया है। दूसरी ओर, भारतीय सौन्दर्यशास्त्र भाव, अनुभूति, आध्यात्मिकता और रस पर आधारित है—यह कला को आनंद का नहीं बल्कि आनंदानुभूति (Rasanubhuti) का माध्यम मानता है।
पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र में कला का उद्देश्य सौन्दर्य की वस्तुनिष्ठ पहचान है, जबकि भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में रसोत्पत्ति—मन के भीतर भावनात्मक अनुभूति—केन्द्र में है। पाश्चात्य सिद्धांत चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला आदि की रूप-सौंदर्यता पर केंद्रित हैं, जबकि भारतीय काव्यशास्त्र भाव, रस, ध्वनि और अनुभूति के स्तर पर कला को देखता है।
पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र अक्सर रचनाकार और कृति के संबंध पर बल देता है, जबकि भारतीय सिद्धांत रसिक यानी दर्शक के अनुभव को श्रेष्ठ मानता है। पाश्चात्य कला में यथार्थवाद, वैयक्तिक सृजन, संरचनात्मक सौन्दर्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, जबकि भारतीय कला संकेत, प्रतीकवाद, आध्यात्मिकता और मनोवैज्ञानिक भाव-उद्दीपन को अधिक महत्व देती है।
ध्वनि, वक्रोक्ति, रस, औचित्य जैसे सिद्धांत पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र में नहीं मिलते—ये भारतीय परंपरा की विशिष्ट देन हैं।
अतः कहा जा सकता है कि पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र बौद्धिक है, जबकि भारतीय सौन्दर्यशास्त्र अनुभूतिमूलक और आध्यात्मिक।
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