IGNOU FREE BSKAE-181 भारतीय ज्ञान परम्परा Solved Guess Paper 2025
Q1. वेदों का स्वरूप, महत्व एवं भारतीय ज्ञान परम्परा में उनका स्थान स्पष्ट कीजिए।
वेद भारतीय ज्ञान परम्परा का सर्वश्रेष्ठ एवं प्राचीनतम ग्रंथ-समूह है। “वेद” शब्द का अर्थ “ज्ञान” है, और इन्हें “अनादि—अपौरुषेय” माना गया है, अर्थात इनकी रचना किसी मानव द्वारा नहीं कही जाती बल्कि इन्हें दिव्य ज्ञान माना जाता है। चार वेद—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—भारतीय संस्कृति, दर्शन, समाज और आध्यात्मिकता की मूलधारा को स्थापित करते हैं।
ऋग्वेद मुख्यतः मंत्रों का संग्रह है जिसमें देवताओं की स्तुतियाँ, प्रकृति के रहस्य और जीवनमूल्यों का वर्णन है। यजुर्वेद यज्ञ की विधि-व्यवस्था, कर्मकाण्ड और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा है। सामवेद संगीत और मंत्र-स्वरों का आधार है, जबकि अथर्ववेद में स्वास्थ्य, औषधि, समाज, राजनीति और लोकजीवन का विस्तृत विवरण मिलता है।
वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं; ये विज्ञान, दर्शन, नैतिकता, चिकित्सा, राजनीति, समाज-व्यवस्था, गणित, भाषाशास्त्र और खगोल—सभी विषयों का आधार प्रस्तुत करते हैं।
भारतीय ज्ञान परम्परा में वेदों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि वे सत्य, धर्म, ऋतु, यज्ञ, सदाचार, सहयोग और विश्व-बंधुत्व की भावना को स्थापित करते हैं।
वेद “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना पर आधारित हैं, जो मानव मात्र के कल्याण का संदेश देती है।
इस प्रकार वेद भारतीय सभ्यता का आधार, ज्ञान का स्रोत और जीवन-दर्शन का मार्गदर्शक हैं।
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Q2. वेदांगों का स्वरूप, उद्देश्य एवं महत्व वर्णन कीजिए।
वेदांग वे सह-ग्रंथ हैं जिनका उद्देश्य वेदों को समझने, पढ़ने और उनका सही प्रयोग करने में सहायता देना है। वेदांग छह माने गए हैं—
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शिक्षा (उच्चारण-विज्ञान)
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कल्प (कर्मकाण्ड एवं विधि)
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व्याकरण (भाषा का शास्त्र)
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निर्वाण (शब्दार्थ एवं व्युत्पत्ति)
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ज्योतिष (काल-गणना एवं खगोल)
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छन्द (कवित्व संरचना)
शिक्षा वेद-मंत्रों के सही उच्चारण, स्वर, मात्रा और बल पर आधारित है। कल्प सूत्र यज्ञ-विधि, सामाजिक नियमों और जीवन के कर्मकाण्डों का आधार देते हैं। व्याकरण भाषा को शुद्ध और व्यवस्थित बनाता है; पाणिनि का व्याकरण विश्व का सबसे उन्नत भाषा-विज्ञान माना जाता है।
निर्वाणशास्त्र शब्दों की व्युत्पत्ति, अर्थ और प्रयोग को स्पष्ट करता है जिससे वेदों के गहरे अर्थ समझ में आते हैं।
ज्योतिष वेदिक काल में समय निर्धारण, ग्रह-नक्षत्रों की गति, ऋतुओं के परिवर्तन और यज्ञों के मुहूर्त निर्धारित करने हेतु महत्वपूर्ण था।
छन्दशास्त्र वैदिक मंत्रों की संरचना, लय और सौन्दर्य को सुनिश्चित करता है।
वेदांग वेदों की अध्ययन-प्रणाली का वैज्ञानिक आधार हैं। इनके बिना वेदों का सही अर्थ, उच्चारण, व्याकरण और अनुष्ठानिक उपयोग संभव नहीं।
अतः वेदांग भारतीय ज्ञान परम्परा में वेदों के संरक्षक एवं व्याख्याता के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
Q3. प्राचीन भारत की राजनैतिक व्यवस्था और उसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
प्राचीन भारत की राजनीति ‘धर्म’, ‘नैतिकता’ और ‘लोकहित’ पर आधारित थी। यहाँ शासन का उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना नहीं था, बल्कि प्रजा के कल्याण को सर्वोच्च माना जाता था। राजतंत्र, गणतंत्र और महासंघ—तीनों प्रकार की व्यवस्थाएँ प्राचीन भारत में पाई जाती थीं।
राजा को ‘प्रजा-पालक’ माना गया है, और उसकी शक्तियाँ धर्म और नैतिकता द्वारा सीमित थीं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मनुस्मृति और महाभारत के शांतिपर्व में राजधर्म का विस्तृत वर्णन मिलता है।
राजा के साथ एक मंत्रिपरिषद होती थी जिसमें पंडित, योद्धा, अर्थशास्त्री, ज्योतिषी और अनुभवी व्यक्तियों को शामिल किया जाता था। निर्णय सामूहिक हित के आधार पर लिए जाते थे।
गणतांत्रिक व्यवस्थाएँ—जैसे लिच्छवी, शाक्य और मल्ल—प्राचीन भारत में लोकतांत्रिक परंपरा का आधार थीं। इनमें सभा, समिति और गणपरिषद जैसे संस्थान पाए जाते थे।
विधि व्यवस्था भी अत्यंत विकसित थी। ‘धर्म’ के नियम समाज में अनुशासन, कर्तव्य और न्याय की स्थापना करते थे।
न्यायालय, दंड प्रणाली, भूमि-अधिकार, कर-प्रणाली—सब सुव्यवस्थित थे।
इस प्रकार प्राचीन भारत की राजनीति समन्वय, नैतिकता, न्याय और जनकल्याण पर आधारित वैज्ञानिक एवं संतुलित प्रणाली थी।
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Q4. भारतीय विधिक परम्परा की प्रमुख विशेषताएँ समझाइए।
भारतीय विधिक परम्परा विश्व की सबसे प्राचीन और मानवीय विधि-व्यवस्थाओं में से एक है। इसकी विशेषता यह है कि यह कानून को केवल दंड का साधन नहीं मानती बल्कि सामाजिक संतुलन, नैतिकता और धर्म का मार्ग मानती है।
इस परम्परा के कुछ प्रमुख आधार हैं—
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धर्म – समाज में आचरण, कर्तव्य और नैतिकता का आधार।
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न्याय – निष्पक्षता, समता और करुणा पर आधारित दंड-विधान।
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व्यवस्था – सामाजिक संबंधों, परिवार, विवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति और दंड की स्पष्ट व्यवस्था।
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सहिष्णुता – बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज के लिए लचीली विधि प्रणाली।
मनुस्मृति, अर्थशास्त्र, याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथों में कानून, प्रशासन, दंड-नियम और सामाजिक आचार स्पष्ट रूप से दर्शाए गए हैं।
भारतीय विधिक व्यवस्था केवल अपराध को दंडित करने पर नहीं बल्कि सुधरने, सामंजस्य स्थापित करने और समाज में संतुलन बनाने पर बल देती है।
इसका दंड-विधान प्रायश्चित, समाधान, क्षमा और पुनर्वास पर आधारित था।
आधुनिक भारतीय कानून ने भी कई परम्पराओं—जैसे पंचायत, स्थानीय स्वशासन, मध्यस्थता—को आज तक बनाए रखा है।
इस प्रकार भारतीय विधिक परम्परा न्यायप्रिय, मानवतावादी और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित रही है।
Q5. भारतीय परिवार संस्था की विशेषताएँ और महत्व बताइए।
भारतीय परिवार संस्था विश्व की सबसे मजबूत और स्थायी सामाजिक संरचनाओं में से एक मानी जाती है। भारतीय परिवार सामूहिकता, स्नेह, सह-अस्तित्व और साझा जिम्मेदारी पर आधारित है।
परिवार दो प्रकार के होते हैं—संयुक्त परिवार और एकल परिवार। संयुक्त परिवार में तीन से अधिक पीढ़ियाँ साथ रहती हैं, जबकि एकल परिवार में माता-पिता और बच्चे शामिल होते हैं।
भारतीय परिवार की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
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एकता और सहयोग
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सामूहिक निर्णय प्रणाली
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सांस्कृतिक परम्पराओं का संरक्षण
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आर्थिक सुरक्षा
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सामाजिक शिक्षण का केंद्र
परिवार बच्चों को सामाजिक मूल्यों—धर्म, नैतिकता, प्रेम, त्याग, कर्तव्य—की शिक्षा देता है। यह बुजुर्गों को सम्मान और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करता है।
संयुक्त परिवार आर्थिक दृष्टि से भी उपयोगी है क्योंकि संसाधन साझा होते हैं और जिम्मेदारियाँ विभाजित होती हैं।
आधुनिक समय में परिवार में कुछ परिवर्तन अवश्य आए हैं, परंतु भारतीय संस्कृति में परिवार आज भी सामाजिक स्थिरता का मुख्य स्तंभ है।
Q6. वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप, उद्देश्य और परिवर्तन की प्रक्रिया समझाइए।
प्राचीन भारत में वर्ण-व्यवस्था समाज को व्यवस्थित करने की एक सामाजिक प्रणाली थी। वेदों में वर्णों का आधार क्षमता, गुण और कर्म बताया गया है। चार वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—समाज में विभिन्न कर्तव्यों का निर्वाह करते थे।
शुरुआत में वर्ण व्यवस्था लचीली और योग्यता पर आधारित थी। कोई भी व्यक्ति अपने कर्म और गुण के आधार पर वर्ण परिवर्तन कर सकता था।
इसका उद्देश्य समाज में श्रम-विभाजन, व्यवस्था, दक्षता और समन्वय स्थापित करना था।
किन्तु समय के साथ यह वर्ण जन्म पर आधारित हो गया और कठोर सामाजिक रूप ले लिया। इससे सामाजिक असमानता बढ़ी।
सामाजिक सुधारकों—महात्मा गांधी, बुद्ध, कबीर, बसवन्ना—ने वर्ण व्यवस्था की कठोरता का विरोध किया और समानता का संदेश दिया।
आधुनिक भारत में संविधान ने वर्ण और जाति पर आधारित भेदभाव को समाप्त कर दिया है।
इस प्रकार वर्ण व्यवस्था ने भारतीय समाज को कई प्रकार से प्रभावित किया, परंतु समय के साथ इसमें बड़े परिवर्तन आते रहे।
Q7. बौद्ध साहित्य का स्वरूप, प्रमुख ग्रंथ एवं ज्ञान परम्परा का वर्णन कीजिए।
बौद्ध साहित्य अत्यंत विस्तृत, गहन और दार्शनिक है। यह तीन ग्रंथ-समूहों में विभक्त है—त्रिपिटक:
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विनय पिटक – अनुशासन, नियम, संघ-व्यवस्था
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सूत्र पिटक – बुद्ध के उपदेश
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अभिधम्म पिटक – दार्शनिक विचार, मनोविज्ञान और ज्ञान-मीमांसा
बौद्ध साहित्य की भाषा पालि है, क्योंकि बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की भाषा में दिए।
ज्ञान परम्परा का मूल आधार “प्रज्ञा (ज्ञान), करुणा (दया) और शील (नीति)” है।
बुद्ध का ज्ञान अनुभव, अवलोकन, तर्क और करुणा पर आधारित है। चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अनित्य, अनात्म—ये सिद्धांत बौद्ध दर्शन के आधार हैं।
बौद्ध साहित्य में समाज, राजनीति, नैतिकता, मनोविज्ञान और मानव व्यवहार का गहन विश्लेषण मिलता है।
यह ज्ञान की एक वैज्ञानिक, तर्कपूर्ण और मानवतावादी परम्परा प्रस्तुत करता है।
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Q8. बुद्ध के ‘चार आर्य सत्य’ और ‘अष्टांगिक मार्ग’ की ज्ञान-परम्परा पर टिप्पणी कीजिए।
चार आर्य सत्य बौद्ध दर्शन की नींव हैं—
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दुःख – जीवन में दुःख है।
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समुदय – दुःख का कारण तृष्णा है।
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निरोध – तृष्णा समाप्त हो सकती है।
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मार्ग – दुःख-निरोध का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है।
अष्टांगिक मार्ग—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि—मानव जीवन को नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करता है।
बौद्ध ज्ञान परम्परा अनुभव और अभ्यास पर आधारित है, न कि केवल विश्वास पर।
यह मानव को अहिंसा, करुणा, शांति, आत्मसंयम और आत्मबोध की दिशा में ले जाता है।
अष्टांगिक मार्ग व्यक्ति को मानसिक शुद्धि, व्यवहारिक सत्यनिष्ठा और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।
इस प्रकार बौद्ध साहित्य मानवता के लिए ज्ञान, शील और करुणा की अद्वितीय परम्परा प्रस्तुत करता है।
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