IGNOU FREE BPYG-172 धर्म दर्शन Solved Guess Paper With 2025
प्रश्न 1: धर्म-दर्शन (Philosophy of Religion) का अर्थ, स्वरूप और क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
धर्म-दर्शन दर्शन की वह शाखा है, जो धर्म से संबंधित मूलभूत अवधारणाओं, विश्वासों, अनुभवों और सिद्धांतों की तर्कसंगत, आलोचनात्मक और दार्शनिक समीक्षा करती है। जहाँ धर्म आस्था, श्रद्धा और परंपरा पर आधारित होता है, वहीं धर्म-दर्शन तर्क, विवेक और विश्लेषण के माध्यम से धार्मिक विश्वासों को समझने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य किसी विशेष धर्म का प्रचार करना नहीं, बल्कि धर्म के दार्शनिक आधारों की खोज करना है। धर्म-दर्शन का मुख्य विषय ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, पाप-पुण्य, चमत्कार, प्रार्थना, जीवन और मृत्यु जैसे गहन दार्शनिक प्रश्न होते हैं। धर्म-दर्शन का स्वरूप आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक है। यह किसी भी धार्मिक मान्यता को अंधविश्वास के रूप में स्वीकार नहीं करता, बल्कि उसके पीछे के तर्कों की जाँच करता है। यह तुलनात्मक भी है, क्योंकि इसमें विभिन्न धर्मों की अवधारणाओं का निष्पक्ष अध्ययन किया जाता है। यह मानव जीवन के अस्तित्वगत प्रश्नों—जैसे दुख, स्वतंत्रता, नैतिकता और जीवन के उद्देश्य—से भी गहराई से जुड़ा होता है। धर्म-दर्शन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें ईश्वर के अस्तित्व से जुड़े तर्क, ईश्वर के गुणों की समीक्षा, बुराई की समस्या, धार्मिक अनुभवों की सत्यता, आत्मा की अमरता, चमत्कार, रहस्योद्घाटन, धार्मिक भाषा, विज्ञान और धर्म का संबंध, तथा धार्मिक बहुलता जैसे विषय सम्मिलित हैं। आधुनिक युग में जब विज्ञान, नास्तिकता, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक विविधता एक साथ विद्यमान हैं, तब धर्म-दर्शन संवाद, सहिष्णुता और बौद्धिक संतुलन स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह न तो अंधभक्ति को बढ़ाता है और न ही अंधनास्तिकता को, बल्कि धर्म को विवेकपूर्ण दृष्टि से समझने का मार्ग प्रस्तुत करता है। इस प्रकार धर्म-दर्शन आस्था और तर्क के बीच सेतु का कार्य करता है।
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प्रश्न 2: ईश्वर के अस्तित्व की पुष्टि करने वाले प्रमुख दार्शनिक तर्कों की विवेचना कीजिए।
ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न धर्म-दर्शन का केंद्रीय विषय रहा है। दार्शनिकों ने ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए कई तर्क प्रस्तुत किए हैं। इनमें प्रमुख हैं—ऑन्टोलॉजिकल तर्क, कॉस्मोलॉजिकल तर्क, टेलीओलॉजिकल तर्क, नैतिक तर्क और धार्मिक अनुभव का तर्क। ऑन्टोलॉजिकल तर्क सेंट ऐन्सल्म द्वारा दिया गया, जिसके अनुसार ईश्वर वह सर्वोच्च सत्ता है, जिससे बड़ा कुछ सोचा नहीं जा सकता। यदि ईश्वर केवल मन में ही अस्तित्व रखता हो, तो वास्तविक अस्तित्व वाला कोई उससे बड़ा हो सकता है, जो असंभव है, अतः ईश्वर का वास्तविक अस्तित्व आवश्यक है। कॉस्मोलॉजिकल तर्क कारण-कार्य सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार संसार की हर वस्तु का कोई न कोई कारण है और कारणों की श्रृंखला अनंत नहीं हो सकती, इसलिए एक प्रथम कारण अवश्य होना चाहिए, वही ईश्वर है। टेलीओलॉजिकल या डिज़ाइन तर्क संसार में दिखाई देने वाले क्रम, सुंदरता और उद्देश्य पर आधारित है। जैसे घड़ी से घड़ीसाज का बोध होता है, वैसे ही इस सुव्यवस्थित सृष्टि से किसी बुद्धिमान रचयिता का अस्तित्व सिद्ध किया जाता है। नैतिक तर्क के अनुसार मानव के भीतर नैतिक नियमों और कर्तव्य-बोध की उपस्थिति किसी सर्वोच्च नैतिक विधानकर्ता के अस्तित्व की ओर संकेत करती है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं। धार्मिक अनुभव के तर्क के अनुसार संतों, ऋषियों और साधकों को प्राप्त ईश्वरीय अनुभूतियाँ ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण मानी जाती हैं। यद्यपि इन सभी तर्कों की आलोचनाएँ भी की गई हैं और कोई भी तर्क पूर्णतः निर्विवाद नहीं है, फिर भी ये तर्क ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास को दार्शनिक आधार प्रदान करते हैं।
प्रश्न 3: ईश्वर के अस्तित्व के संदर्भ में बुराई की समस्या (Problem of Evil) की विवेचना कीजिए।
बुराई की समस्या ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध सबसे गंभीर दार्शनिक चुनौती मानी जाती है। यह प्रश्न उठाती है कि यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वदयालु है, तो संसार में इतना अधिक दुख, पीड़ा और अन्याय क्यों है? यदि ईश्वर बुराई को रोक सकता है, पर रोकता नहीं, तो वह दयालु नहीं है; यदि वह रोकना चाहता है पर रोक नहीं सकता, तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। बुराई दो प्रकार की होती है—प्राकृतिक बुराई और नैतिक बुराई। प्राकृतिक बुराई में भूकंप, बाढ़, महामारी और प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं, जबकि नैतिक बुराई मनुष्यों के कर्मों से उत्पन्न होती है, जैसे हिंसा, युद्ध, भ्रष्टाचार और अन्याय। इस समस्या के समाधान के लिए मुक्त इच्छा सिद्धांत प्रस्तुत किया गया, जिसके अनुसार ईश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा दी है और बुराई का कारण मनुष्य द्वारा इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग है। आत्म-विकास सिद्धांत (Soul-Making Theory) के अनुसार दुख और पीड़ा मानव के नैतिक और आत्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं। कुछ दार्शनिक यह भी मानते हैं कि ईश्वर की योजनाएँ मानव की सीमित बुद्धि से परे हैं, इसलिए हम बुराई के वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझ सकते। नास्तिक दार्शनिकों का तर्क है कि संसार में व्याप्त व्यापक और निरर्थक पीड़ा ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध मजबूत प्रमाण है। इस प्रकार बुराई की समस्या आज भी धर्म-दर्शन की सबसे जटिल और विवादास्पद समस्या बनी हुई है।
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प्रश्न 4: धार्मिक बहुलता (Religious Pluralism) का अर्थ और दार्शनिक महत्व स्पष्ट कीजिए।
धार्मिक बहुलता वह दृष्टिकोण है, जो यह स्वीकार करता है कि संसार में अनेक धर्म विद्यमान हैं और कोई भी एक धर्म सत्य या मोक्ष पर पूर्ण एकाधिकार नहीं रखता। यह धार्मिक विविधता को एक समस्या नहीं, बल्कि एक सकारात्मक वास्तविकता के रूप में देखता है। धार्मिक बहुलता का अर्थ है विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान, सहिष्णुता और संवाद की भावना। दार्शनिक जॉन हिक के अनुसार सभी प्रमुख धर्म एक ही परम सत्य की विभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ हैं। जैसे एक ही पर्वत की चोटी तक पहुँचने के कई रास्ते हो सकते हैं, वैसे ही मोक्ष या परम सत्य तक पहुँचने के भी कई धार्मिक मार्ग हो सकते हैं। धार्मिक बहुलता धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और हिंसा के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण दार्शनिक आधार प्रदान करती है। यह अंतर-धार्मिक संवाद, शांति और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देती है। यह लोकतंत्र, मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के मूल्यों को भी सुदृढ़ करती है। हालांकि इसकी आलोचना भी होती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि धार्मिक बहुलता धर्मों के वास्तविक सिद्धांतगत मतभेदों की अनदेखी करती है और धार्मिक सापेक्षवाद को बढ़ावा देती है। फिर भी आज के बहुधार्मिक और वैश्वीकृत समाज में धार्मिक बहुलता का दार्शनिक महत्व अत्यंत व्यापक है।
प्रश्न 5: धर्म और विज्ञान के बीच संघर्ष तथा सामंजस्य की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
धर्म और विज्ञान का संबंध इतिहास में कभी संघर्षपूर्ण और कभी सामंजस्यपूर्ण रहा है। विज्ञान अनुभव, प्रयोग और तर्क पर आधारित है, जबकि धर्म आस्था और आध्यात्मिक अनुभव पर आधारित है। संघर्ष का प्रमुख कारण यह है कि कई बार धार्मिक धारणाएँ वैज्ञानिक तथ्यों से टकरा जाती हैं, जैसे पृथ्वी के केंद्र में होने का विश्वास या सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े धार्मिक वर्णन। गैलीलियो और कोपरनिकस के सिद्धांतों ने धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी। डार्विन के विकासवाद ने सृष्टि की धार्मिक व्याख्या को प्रभावित किया। इससे धर्म और विज्ञान के बीच संघर्ष उत्पन्न हुआ। परंतु अनेक दार्शनिकों का मानना है कि धर्म और विज्ञान के क्षेत्र अलग-अलग हैं। विज्ञान “कैसे” का उत्तर देता है, जबकि धर्म “क्यों” का। विज्ञान भौतिक नियमों की व्याख्या करता है, जबकि धर्म जीवन के अर्थ, नैतिकता और उद्देश्य पर प्रकाश डालता है। आइंस्टीन के अनुसार विज्ञान बिना धर्म के अपंग है और धर्म बिना विज्ञान के अंधा। आधुनिक युग में ब्रह्मांड विज्ञान, चेतना अध्ययन और जैव-नैतिकता जैसे क्षेत्र धर्म और विज्ञान के बीच संवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। इस प्रकार धर्म और विज्ञान में पूर्ण विरोध नहीं, बल्कि सामंजस्य की भी पर्याप्त संभावनाएँ हैं।
प्रश्न 6: ईश्वर के अस्तित्व के संदर्भ में ऑन्टोलॉजिकल (Ontological) तर्क की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
ऑन्टोलॉजिकल तर्क ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने वाला एक विशुद्ध दार्शनिक और तार्किक तर्क है, जिसे ग्यारहवीं शताब्दी में सेंट ऐन्सल्म ने प्रस्तुत किया। यह तर्क अनुभव या प्रकृति पर आधारित न होकर केवल ईश्वर की संकल्पना पर आधारित है। ऐन्सल्म के अनुसार ईश्वर वह सत्ता है, “जिससे बड़ा कुछ भी सोचा नहीं जा सकता।” यह धारणा ईश्वर का सबसे महान और परिपूर्ण स्वरूप प्रस्तुत करती है। यदि हम मान लें कि ईश्वर केवल हमारे मन में ही अस्तित्व रखता है और वास्तविकता में नहीं, तो हम उससे भी बड़ा एक ऐसा ईश्वर सोच सकते हैं जो मन और वास्तविकता दोनों में अस्तित्व रखता हो। इससे मूल परिभाषा का विरोध हो जाता है, इसलिए निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर का वास्तविक अस्तित्व अनिवार्य है।
इस तर्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अनुभवजन्य प्रमाण पर निर्भर नहीं करता, बल्कि केवल तर्क के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास करता है। इसके कारण यह अत्यंत बौद्धिक और मौलिक माना जाता है। लेकिन इस तर्क की कड़ी आलोचनाएँ भी हुई हैं। ऐन्सल्म के समकालीन गॉनिलो ने इसका खंडन करते हुए “सर्वोत्तम द्वीप” का उदाहरण दिया। उसने कहा कि यदि हम एक परिपूर्ण द्वीप की कल्पना कर लें और कहें कि केवल कल्पना में नहीं बल्कि वास्तविकता में भी उसका अस्तित्व होना चाहिए, तो यह तर्क हास्यास्पद हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि केवल परिभाषा के आधार पर किसी वस्तु का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता।
दार्शनिक इमैनुएल कांट ने इस तर्क की सबसे प्रभावशाली आलोचना की। कांट के अनुसार “अस्तित्व” कोई गुण (predicate) नहीं है। किसी वस्तु की संकल्पना में अस्तित्व जोड़ देने से उसकी प्रकृति में कोई वृद्धि नहीं होती। इसलिए केवल यह कह देने से कि ईश्वर एक परिपूर्ण सत्ता है और परिपूर्णता में अस्तित्व भी शामिल है, ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो जाता।
आधुनिक समय में कुछ दार्शनिकों ने मॉडल लॉजिक के आधार पर इस तर्क को फिर से प्रस्तुत किया है और कहा है कि यदि ईश्वर का अस्तित्व संभव है, तो उसका अस्तित्व आवश्यक भी है। फिर भी यह तर्क आज भी अत्यंत विवादास्पद बना हुआ है। निष्कर्षतः ऑन्टोलॉजिकल तर्क गहन दार्शनिक महत्व रखता है, लेकिन इसे ईश्वर के अस्तित्व का पूर्ण और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना जा सकता।
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प्रश्न 7: कॉस्मोलॉजिकल (Cosmological) तर्क की व्याख्या एवं मूल्यांकन कीजिए।
कॉस्मोलॉजिकल तर्क ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने का एक प्रमुख दार्शनिक तर्क है, जो कारण-कार्य (cause-effect) के सिद्धांत पर आधारित है। इस तर्क का मुख्य विचार यह है कि इस संसार में हर वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न होती है। कारणों की यह श्रृंखला अनंत नहीं हो सकती, इसलिए अंततः एक ऐसे प्रथम कारण का होना आवश्यक है, जो स्वयं किसी अन्य कारण से उत्पन्न न हुआ हो। यही प्रथम कारण ईश्वर है।
इस तर्क को विशेष रूप से अरस्तु और थॉमस एक्विनास ने विकसित किया। एक्विनास ने अपने “पंच मार्ग” (Five Ways) में गति, कारण, अनिवार्यता और आकस्मिकता के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया। आकस्मिकता के तर्क के अनुसार संसार की अधिकांश वस्तुएँ संयोगवश अस्तित्व में हैं—वे हो भी सकती थीं और नहीं भी। यदि सब कुछ आकस्मिक ही होता, तो किसी समय कुछ भी अस्तित्व में नहीं होता। लेकिन चूँकि कुछ न कुछ हमेशा अस्तित्व में रहा है, इसलिए एक ऐसी सत्ता का होना आवश्यक है, जिसका अस्तित्व अनिवार्य हो—और वही ईश्वर है।
इस तर्क की सबसे बड़ी शक्ति इसका सामान्य बौद्धिक आधार है, क्योंकि हम अपने अनुभव में देखते हैं कि हर कार्य का कोई कारण होता है। आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान, विशेष रूप से बिग-बैंग सिद्धांत, भी यह संकेत देता है कि ब्रह्मांड का एक प्रारंभ बिंदु था, जिससे कॉस्मोलॉजिकल तर्क को नया बल मिला है।
लेकिन इस तर्क की आलोचनाएँ भी हुई हैं। डेविड ह्यूम ने कहा कि केवल इस आधार पर कि संसार की हर वस्तु का कारण होता है, यह आवश्यक नहीं कि पूरे संसार का भी कोई कारण हो। यह भी कहा गया कि कारणों की श्रृंखला अनंत हो सकती है, इसमें कोई तार्किक विरोधाभास नहीं है। एक और आपत्ति यह है कि यदि हर चीज़ का कारण होता है, तो ईश्वर का कारण क्या है? इसके उत्तर में आस्तिक कहते हैं कि ईश्वर स्वयं एक अनिवार्य सत्ता है, जिसे कारण की आवश्यकता नहीं।
निष्कर्षतः कॉस्मोलॉजिकल तर्क एक सशक्त दार्शनिक तर्क है, जो ईश्वर को प्रथम कारण के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन यह भी ईश्वर के व्यक्तिगत, सर्वगुणसंपन्न स्वरूप को पूरी तरह सिद्ध नहीं कर पाता।
प्रश्न 8: टेलीओलॉजिकल (Teleological/Design) तर्क की व्याख्या एवं आधुनिक प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
टेलीओलॉजिकल तर्क या डिज़ाइन तर्क ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने वाला वह तर्क है, जो सृष्टि में पाए जाने वाले क्रम, संतुलन, सुंदरता और उद्देश्य पर आधारित है। इस तर्क को विशेष रूप से विलियम पेली ने घड़ी और घड़ीसाज़ के उदाहरण के माध्यम से प्रसिद्ध किया। पेली के अनुसार यदि हमें सड़क पर एक घड़ी मिलती है, तो हम स्वाभाविक रूप से मान लेते हैं कि इसे किसी घड़ीसाज़ ने बनाया होगा, क्योंकि इसमें उद्देश्यपूर्ण संरचना और व्यवस्था होती है। इसी प्रकार यह सृष्टि भी अत्यंत जटिल, सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण है, अतः इसके पीछे किसी बुद्धिमान रचयिता का होना आवश्यक है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं।
आधुनिक समय में यह तर्क ब्रह्मांड की “फाइन-ट्यूनिंग” (Fine-Tuning) पर आधारित रूप में सामने आता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड के भौतिक स्थिरांक इतने संतुलित हैं कि उनमें थोड़ा सा भी परिवर्तन जीवन के अस्तित्व को असंभव बना सकता है। यह संतुलन किसी विशेष उद्देश्य की ओर संकेत करता है, जिसे आस्तिक ईश्वर का कार्य मानते हैं।
इस तर्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रत्यक्ष अनुभव और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है, इसलिए यह साधारण बुद्धि को भी सरलता से प्रभावित करता है। लेकिन इस पर भी गंभीर आपत्तियाँ की गई हैं। चार्ल्स डार्विन के विकासवाद सिद्धांत ने यह दिखाया कि जीवों की जटिल संरचना प्राकृतिक चयन और विकास की प्रक्रिया से भी उत्पन्न हो सकती है, इसके लिए किसी ईश्वरीय रचयिता की अनिवार्यता नहीं है।
डेविड ह्यूम ने यह भी कहा कि संसार एक मशीन की बजाय एक जीव की तरह है, इसलिए इसकी तुलना घड़ी से करना उचित नहीं। उसने यह भी तर्क दिया कि यदि डिज़ाइन स्वीकार भी कर लिया जाए, तो इससे केवल किसी सीमित रचनाकार का संकेत मिलता है, न कि सर्वशक्तिमान ईश्वर का।
निष्कर्षतः टेलीओलॉजिकल तर्क आज भी धार्मिक विश्वास को बौद्धिक आधार प्रदान करता है, लेकिन वैज्ञानिक व्याख्याओं के कारण इसकी दार्शनिक शक्ति कुछ हद तक सीमित हो गई है।
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प्रश्न 9: धार्मिक अनन्यवाद (Exclusivism), समावेशनवाद (Inclusivism) और बहुलवाद (Pluralism) का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
धार्मिक विविधता की समस्या को समझने के लिए धर्म-दर्शन में तीन प्रमुख दृष्टिकोण माने जाते हैं—धार्मिक अनन्यवाद, समावेशनवाद और बहुलवाद। ये तीनों दृष्टिकोण इस बात पर विचार करते हैं कि विभिन्न धर्मों का सत्य और मोक्ष से क्या संबंध है।
धार्मिक अनन्यवाद का मानना है कि केवल एक ही धर्म सत्य है और उसी के माध्यम से मोक्ष या उद्धार संभव है। अन्य सभी धर्म या तो मिथ्या हैं या अधूरे। यह दृष्टिकोण गहरे विश्वास और दृढ़ आस्था को बढ़ाता है, लेकिन इसके कारण असहिष्णुता, कट्टरता और धार्मिक संघर्ष भी उत्पन्न होते हैं।
धार्मिक समावेशनवाद यह मानता है कि एक धर्म सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण सत्य है, परंतु अन्य धर्मों में भी कुछ न कुछ सत्यांश पाया जाता है। इस दृष्टिकोण में यह माना जाता है कि अन्य धर्मों के अनुयायी भी अप्रत्यक्ष रूप से उसी सर्वोच्च सत्य तक पहुँच सकते हैं, जिसे मुख्य धर्म प्रदान करता है। यह दृष्टिकोण अपेक्षाकृत उदार है, पर फिर भी श्रेष्ठता की भावना बनाए रखता है।
धार्मिक बहुलवाद का मत है कि कोई भी धर्म अकेला संपूर्ण सत्य का अधिकारी नहीं है। सभी धर्म एक ही परम सत्ता की विभिन्न सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अभिव्यक्तियाँ हैं। जॉन हिक के अनुसार सभी प्रमुख धर्म मोक्ष या परम सत्य तक पहुँचने के समान रूप से वैध मार्ग हैं। यह दृष्टिकोण सहिष्णुता, संवाद और शांति को बढ़ावा देता है।
इन तीनों दृष्टिकोणों में अनन्यवाद कठोर, समावेशनवाद मध्यम और बहुलवाद सबसे उदार माना जाता है। निष्कर्षतः आधुनिक बहुधार्मिक समाज में धार्मिक बहुलवाद को सबसे उपयुक्त और शांतिपूर्ण दृष्टिकोण माना जाता है।
प्रश्न 10: आधुनिक विश्व में धार्मिक बहुलवाद (Religious Pluralism) के दार्शनिक महत्व की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
आधुनिक वैश्वीकृत समाज में धार्मिक बहुलवाद का दार्शनिक महत्व अत्यंत बढ़ गया है। आज विभिन्न धर्मों के अनुयायी एक-दूसरे के निकट रह रहे हैं, जिससे धार्मिक सह-अस्तित्व की समस्या और भी गंभीर हो गई है। धार्मिक बहुलवाद यह स्वीकार करता है कि विभिन्न धर्म एक ही परम सत्य की ओर जाने वाले अलग-अलग मार्ग हैं। यह दृष्टिकोण जॉन हिक जैसे दार्शनिकों द्वारा विकसित किया गया, जिन्होंने कहा कि सभी प्रमुख धर्म सांस्कृतिक रूप से भिन्न-भिन्न तरीकों से उसी एक परम वास्तविकता का अनुभव करते हैं।
धार्मिक बहुलवाद का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह धार्मिक सहिष्णुता, संवाद और शांति को बढ़ावा देता है। यह धार्मिक संघर्षों, आतंकवाद और कट्टरता के विरुद्ध एक बौद्धिक आधार प्रदान करता है। यह लोकतंत्र, मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के मूल्यों को भी सुदृढ़ करता है।
लेकिन धार्मिक बहुलवाद की आलोचना भी होती है। कुछ लोग मानते हैं कि यह धार्मिक विश्वास की गहराई और विशिष्टता को कमजोर करता है। कुछ दार्शनिक यह भी कहते हैं कि बहुलवाद धर्मों के बीच वास्तविक सिद्धांतगत विरोधों की अनदेखी करता है और सबको समान मानकर एक प्रकार का सापेक्षवाद (Relativism) उत्पन्न करता है।
इन आलोचनाओं के बावजूद आज के बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक विश्व में धार्मिक बहुलवाद की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। यह न केवल दार्शनिक दृष्टि से, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक है। निष्कर्षतः धार्मिक बहुलवाद आधुनिक विश्व में शांति, सहिष्णुता और सहअस्तित्व की सबसे मजबूत दार्शनिक नींव है।
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