IGNOU FREE BPCS-186 तनाव प्रबंधन Solved Guess Paper 2025
⭐ प्रश्न 1: तनाव क्या है? इसके प्रकारों और विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
तनाव वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति बाहरी या आंतरिक मांगों के कारण मानसिक एवं शारीरिक दबाव महसूस करता है। यह प्रतिक्रिया शरीर की “फाइट ऑर फ्लाइट” प्रणाली से जुड़ी होती है, जिसमें एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन सक्रिय होकर व्यक्ति को चुनौती का सामना करने के लिए तैयार करते हैं। तनाव हमेशा नकारात्मक नहीं होता; कभी-कभी यह प्रेरणा भी देता है। लेकिन जब तनाव अधिक, लगातार या अनियंत्रित हो जाए, तब यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बन जाता है।
तनाव के प्रकारों में सबसे पहले अल्पकालिक तनाव (Acute Stress) आता है, जो अचानक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों जैसे परीक्षा, इंटरव्यू या अप्रत्याशित घटनाओं के कारण होता है। यह क्षणिक होता है और सामान्य माना जाता है। दूसरा प्रकार है आवर्ती अल्पकालिक तनाव (Episodic Acute Stress), जिसमें व्यक्ति बार-बार तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करता है। ऐसे लोग अक्सर जल्दी में रहते हैं, अपेक्षाएँ अधिक रखते हैं और छोटी-छोटी बातों पर तनाव का अनुभव करते हैं। तीसरा और सबसे गंभीर प्रकार है दीर्घकालिक तनाव (Chronic Stress), जो लंबे समय तक बना रहता है और परिवारिक विवाद, आर्थिक कठिनाइयाँ, बेरोज़गारी या बीमारी जैसी स्थितियों का परिणाम होता है। यह मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं जैसे अवसाद, चिंता विकार, अनिद्रा और शारीरिक बीमारियों का कारण बन सकता है।
तनाव की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता यह है कि तनाव व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है। किसी एक स्थिति को एक व्यक्ति तनावपूर्ण मान सकता है, जबकि दूसरा व्यक्ति उसी स्थिति को सामान्य समझ सकता है। दूसरी विशेषता यह है कि तनाव का प्रभाव मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर दिखाई देता है। तीसरी विशेषता नियंत्रण के अनुभव से जुड़ी है; जब व्यक्ति महसूस करता है कि स्थिति उसकी क्षमता से अधिक है, तो तनाव बढ़ जाता है। चौथी विशेषता है अनुकूलन क्षमता, जिसके अनुसार यदि व्यक्ति तनाव को संभालने की रणनीतियाँ सीख ले, तो वह अधिक सशक्त बन सकता है।
निष्कर्षतः, तनाव जीवन का एक सामान्य हिस्सा है, किंतु इसके प्रकारों और विशेषताओं को समझकर व्यक्ति इसे प्रभावी रूप से नियंत्रित कर सकता है। समय पर पहचान और उपयुक्त प्रबंधन जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं।
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⭐ प्रश्न 2: तनाव के प्रमुख जैविक और मनोवैज्ञानिक कारणों की व्याख्या कीजिए।
तनाव के कारण दो आधारों पर समझे जा सकते हैं—जैविक (Biological) और मनोवैज्ञानिक (Psychological)। जैविक स्तर पर तनाव शरीर की तंत्रिका प्रणाली, हार्मोनल गतिविधि और आनुवांशिक प्रवृत्तियों से प्रभावित होता है। तनावपूर्ण परिस्थितियों में सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय होकर हार्मोन जारी करता है, जिससे हृदयगति बढ़ती है, रक्तचाप में वृद्धि होती है और मानसिक सतर्कता बढ़ जाती है। जिन व्यक्तियों की आनुवांशिक संरचना में चिंता, उच्च उत्तेजना या संवेदनशीलता अधिक होती है, वे तनाव का अनुभव अधिक करते हैं। इसके अतिरिक्त, नींद की कमी, पोषण की कमी, थायरॉइड असंतुलन और पुरानी बीमारियाँ भी तनाव बढ़ाती हैं।
मनोवैज्ञानिक कारणों में सबसे बड़ा कारण है अत्यधिक अपेक्षाएँ—चाहे वह स्वयं से हों या दूसरों से। आधुनिक समय में प्रतिस्पर्धा, करियर का दबाव, परिवार की जिम्मेदारियाँ और सामाजिक तुलना मानसिक तनाव को बढ़ाते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण कारण है नकारात्मक सोच और आत्म-संदेह। जो व्यक्ति समस्याओं को बड़ा और संसाधनों को छोटा मानता है, वह अधिक तनाव अनुभव करता है। तीसरा कारण है भावनात्मक असंतुलन, जिसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता और छोटी बात पर भी परेशान हो जाता है।
संबंधों से जुड़े कारण जैसे वैवाहिक तनाव, पारिवारिक विवाद, मित्रों के साथ गलतफहमी और सामाजिक अलगाव भी मानसिक तनाव के मुख्य कारण हैं। इसके अलावा, नौकरी की असुरक्षा, समय की कमी, आर्थिक दवाब और असंतुष्टिपूर्ण कार्य वातावरण भी तनाव को बढ़ाते हैं। जीवन की प्रमुख घटनाएँ जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु, बीमारी, दुर्घटना, स्थान परिवर्तन या तलाक भी गहरा मनोवैज्ञानिक तनाव उत्पन्न करते हैं।
बाहरी वातावरण भी तनाव के कारणों में शामिल है—जैसे शोर, भीड़, प्रदूषण, गर्मी, और असुरक्षित सामाजिक परिस्थितियाँ। तकनीकी परिवर्तनों के साथ तालमेल बैठाने का दबाव भी आज लोगों में तनाव पैदा कर रहा है।
निष्कर्षतः, तनाव एक बहुआयामी समस्या है जो जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। इन कारणों को समझकर ही तनाव प्रबंधन के प्रभावी उपाय अपनाए जा सकते हैं।
⭐ प्रश्न 3: तनाव के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को समझाइए।
तनाव शरीर की कई प्रणालियों को प्रभावित करता है। जब व्यक्ति तनाव का अनुभव करता है, तो शरीर में “फाइट ऑर फ्लाइट” प्रणाली सक्रिय हो जाती है। इससे एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन बढ़ जाते हैं, जो प्रारंभिक रूप से शरीर की रक्षा करने में मदद करते हैं, लेकिन लंबे समय तक बढ़े रहने पर नुकसान पहुंचाते हैं। सबसे पहले, तनाव हृदय प्रणाली को प्रभावित करता है। लगातार तनाव उच्च रक्तचाप, अनियमित हृदयगति और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ा देता है।
तनाव पाचन तंत्र को भी प्रभावित करता है। तनाव के दौरान पेट में एसिड का स्राव बढ़ जाता है, जिससे गैस, बदहजमी और अल्सर की समस्या हो सकती है। तनाव आंतों की गति को भी प्रभावित करता है, जिससे कब्ज या दस्त हो सकते हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली भी तनाव से कमजोर पड़ती है। लंबे समय तक बढ़े कॉर्टिसोल स्तर से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे व्यक्ति संक्रमणों और बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
तनाव का प्रभाव तंत्रिका तंत्र पर भी गहरा होता है। लगातार तनाव से व्यक्ति थकान, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और माइग्रेन का अनुभव करता है। मांसपेशियों में तनाव बढ़ जाता है, जिससे गर्दन, कंधे और पीठ में दर्द होता है। लंबे समय तक तनाव रहने पर मांसपेशीय कमजोरी भी हो सकती है।
तनाव का एक अन्य प्रभाव हार्मोनल संतुलन पर पड़ता है। महिलाओं में मासिक धर्म अनियमित हो सकता है, जबकि पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर घट सकता है। वजन बढ़ना या घटना भी तनाव का परिणाम है।
सारांशतः, तनाव शरीर की सभी प्रमुख प्रणालियों पर प्रभाव डालता है। यदि तनाव को समय रहते नियंत्रित न किया जाए, तो यह दीर्घकालिक बीमारियों का कारण बन सकता है।
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⭐ प्रश्न 4: तनाव के मनोवैज्ञानिक प्रभावों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
तनाव का मनोवैज्ञानिक प्रभाव व्यक्ति के विचारों, भावनाओं, व्यवहार और संज्ञानात्मक क्षमताओं पर गहरा असर डालता है। जब व्यक्ति लगातार तनाव का अनुभव करता है, तो उसकी सोच नकारात्मक होने लगती है। वह छोटी-छोटी समस्याओं को बड़ा मानने लगता है, जिससे चिंता और भय बढ़ जाता है। तनाव व्यक्ति की एकाग्रता क्षमता को कम कर देता है, जिससे निर्णय क्षमता प्रभावित होती है और कार्यक्षमता में गिरावट आती है। इससे व्यक्ति लगातार भ्रमित, विचलित और अनिश्चित महसूस करता है।
भावनात्मक स्तर पर तनाव कई प्रभाव उत्पन्न करता है। व्यक्ति में चिड़चिड़ापन, क्रोध, उदासी और निराशा बढ़ने लगती है। लंबे समय तक तनाव रहने पर भावनाएँ अस्थिर हो जाती हैं और व्यक्ति को मामूली घटनाओं पर भी अत्यधिक प्रतिक्रिया करने की आदत पड़ सकती है। इससे रिश्तों में तनाव पैदा होता है और व्यक्ति सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ने लगता है। तनाव के कारण आत्मविश्वास में कमी आती है और व्यक्ति स्वयं को अयोग्य या असफल महसूस करने लगता है।
व्यवहारिक प्रभावों में नींद की कमी, भूख में परिवर्तन, नशे की प्रवृत्ति और काम टालना शामिल हैं। कई लोग तनाव कम करने के लिए सिगरेट, शराब या दवाओं का सहारा लेते हैं, जो आगे चलकर लत में बदल सकता है। तनावग्रस्त व्यक्ति कभी-कभी अत्यधिक खाना खाने लगता है, जबकि कुछ लोगों की भूख बिल्कुल खत्म हो जाती है। नींद की कमी भी तनाव का एक सामान्य लक्षण है, जो आगे मानसिक थकावट और चिड़चिड़ापन बढ़ा देती है।
संज्ञानात्मक प्रभावों में भूलने की आदत, नकारात्मक विचारों का दोहराव, निर्णय लेने में कठिनाई और रचनात्मकता का कम होना शामिल है। लगातार तनाव मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस क्षेत्र को प्रभावित करता है, जो स्मृति और सीखने की क्षमता से जुड़ा होता है। इस कारण व्यक्ति सरल बात भी याद नहीं रख पाता और अध्ययन या काम में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता।
लंबे समय तक तनाव रहने से व्यक्ति अवसाद (Depression), चिंता विकार (Anxiety Disorder), पैनिक अटैक, ओसीडी और PTSD जैसी मानसिक समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है।
सारांशतः, तनाव केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है, जो व्यक्ति के संपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसलिए, समय पर तनाव की पहचान और प्रबंधन आवश्यक है।
⭐ प्रश्न 5: तनाव का मूल्यांकन (Stress Appraisal) क्या है? लज़ारस और फॉकमैन के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
तनाव का मूल्यांकन (Stress Appraisal) उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें व्यक्ति किसी स्थिति को अपने दृष्टिकोण और क्षमताओं के आधार पर समझने और व्याख्या करने का प्रयास करता है। यह मूल्यांकन तय करता है कि व्यक्ति किसी घटना को तनावपूर्ण मानेगा या नहीं। लज़ारस और फॉकमैन ने तनाव को एक Transactional Model के रूप में समझाया। उनके अनुसार तनाव व्यक्ति और वातावरण के बीच निरंतर पारस्परिक क्रिया से उत्पन्न होता है।
इस सिद्धांत के अनुसार तनाव मूल्यांकन दो मुख्य चरणों में होता है:
1. प्राथमिक मूल्यांकन (Primary Appraisal)
इस चरण में व्यक्ति यह निर्धारित करता है कि स्थिति उसकी भलाई के लिए क्या अर्थ रखती है। वह इस घटना को तीन रूपों में देख सकता है –
-
अहानिकर (Benign) – स्थिति सुरक्षित है और कोई खतरा नहीं है।
-
चुनौतीपूर्ण (Challenging) – स्थिति विकास का अवसर प्रदान करती है।
-
हानिकारक/खतरनाक (Threatening) – स्थिति नुकसान पहुंचा सकती है।
यदि व्यक्ति स्थिति को खतरा मानता है, तो तनाव उत्पन्न होता है।
2. द्वितीयक मूल्यांकन (Secondary Appraisal)
इस चरण में व्यक्ति अपनी क्षमताओं, संसाधनों और नियंत्रण का मूल्यांकन करता है। वह स्वयं से पूछता है:
– क्या मैं इससे निपट सकता हूँ?
– क्या मेरे पास पर्याप्त संसाधन हैं?
– क्या मैं मदद प्राप्त कर सकता हूँ?
यदि व्यक्ति को लगता है कि उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, तो तनाव बढ़ जाता है।
पुनर्मूल्यांकन (Reappraisal)
स्थिति बदलने पर व्यक्ति पुनः मूल्यांकन करता है। उदाहरण के लिए, यदि उसे सहायता मिल जाती है या ज्ञान बढ़ जाता है, तो तनाव कम हो सकता है।
लज़ारस और फॉकमैन के अनुसार तनाव केवल बाहरी घटना नहीं है बल्कि व्यक्ति की व्याख्या पर निर्भर करता है। दो लोग एक ही स्थिति में हों, तो जरूरी नहीं कि दोनों तनाव का अनुभव करें। यह मॉडल यह भी बताता है कि सोचने के तरीके और दृष्टिकोण बदलने से तनाव कम किया जा सकता है।
निष्कर्षतः, तनाव मूल्यांकन एक मानसिक प्रक्रिया है जो निर्धारित करती है कि व्यक्ति घटना को कैसे समझता है और उस पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।
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⭐ प्रश्न 6: तनाव प्रबंधन क्या है? इसके प्रमुख सिद्धांतों की व्याख्या कीजिए।
तनाव प्रबंधन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति तनाव के कारणों की पहचान करता है, उन्हें नियंत्रित करता है और स्वस्थ मानसिक तथा शारीरिक संतुलन बनाए रखता है। तनाव प्रबंधन का उद्देश्य तनाव को पूरी तरह समाप्त करना नहीं बल्कि उसे स्वस्थ तरीके से संभालना है। यह तकनीकों, सोच में बदलाव और जीवनशैली सुधार का संयुक्त प्रयास है।
तनाव प्रबंधन का पहला सिद्धांत है जागरूकता (Awareness)। व्यक्ति को यह पहचानना आवश्यक है कि उसे तनाव किन कारणों से हो रहा है और इसके क्या लक्षण हैं। दूसरा सिद्धांत है स्वीकृति (Acceptance)। कई बार व्यक्ति तनाव से इनकार करता है, जिससे समस्या बढ़ जाती है। तनाव को स्वीकार करना उपचार की पहली सीढ़ी है।
तीसरा सिद्धांत है कॉग्निटिव पुनर्गठन (Cognitive Restructuring)। यह सोचने के तरीके को बदलने पर आधारित है। नकारात्मक विचार तनाव बढ़ाते हैं, इसलिए सकारात्मक और यथार्थवादी सोच अपनाना आवश्यक है। चौथा सिद्धांत है भावनात्मक नियंत्रण (Emotional Regulation), जिसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं को संतुलित करना सीखता है।
पाँचवाँ सिद्धांत है समस्या समाधान कौशल (Problem-Solving Skills)। यदि व्यक्ति समस्याओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर समाधान खोजता है, तो तनाव स्वतः कम हो जाता है। छठा सिद्धांत है शारीरिक विश्राम तकनीकें, जैसे योग, ध्यान, गहरी श्वसन, व्यायाम और मांसपेशी शिथिलीकरण।
सातवाँ सिद्धांत है समय प्रबंधन, क्योंकि समय का दबाव तनाव का मुख्य कारण है। प्राथमिकता तय करना, समय की योजना बनाना और समय पर कार्य पूरा करना तनाव कम करता है। आठवाँ सिद्धांत है सामाजिक समर्थन (Social Support)। परिवार, मित्रों और सहकर्मियों का सहयोग व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है।
निष्कर्षतः, तनाव प्रबंधन एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जो व्यक्ति के व्यवहार, सोच, भावनाओं और जीवनशैली को संतुलित करने में मदद करती है।
⭐ प्रश्न 7: कॉपिंग रणनीतियाँ क्या हैं? समस्या-केन्द्रित एवं भावना-केन्द्रित कॉपिंग की तुलना कीजिए।
कॉपिंग रणनीतियाँ वे प्रयास हैं जो व्यक्ति तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने के लिए करता है। ये रणनीतियाँ व्यक्ति को मानसिक और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं।
दो प्रमुख प्रकार:
1. समस्या-केन्द्रित कॉपिंग (Problem-Focused Coping)
यह रणनीति सीधे समस्या पर काम करती है। इसमें व्यक्ति स्थिति को बदलने या हल करने का प्रयास करता है।
उदाहरण:
– समय सारणी बनाना
– जानकारी एकत्र करना
– विशेषज्ञ से मदद लेना
– समाधान की योजना बनाना
यह उन परिस्थितियों में प्रभावी है जहाँ समस्या व्यक्ति के नियंत्रण में हो।
2. भावना-केन्द्रित कॉपिंग (Emotion-Focused Coping)
यह रणनीति समस्या को नहीं बल्कि उससे उत्पन्न भावनाओं को नियंत्रित करने पर ध्यान देती है।
उदाहरण:
– ध्यान और योग
– किसी से बात करना
– भावनाओं को व्यक्त करना
– सकारात्मक सोच
यह तब उपयोगी है जब समस्या तुरंत हल नहीं हो सकती।
अंतर:
| समस्या-केन्द्रित | भावना-केन्द्रित |
|---|---|
| समस्या बदलने पर ध्यान | भावनाएँ बदलने पर ध्यान |
| तार्किक/व्यवहारिक रणनीति | भावनात्मक रणनीति |
| नियंत्रण वाली परिस्थितियों में प्रभावी | अनियंत्रणीय परिस्थितियों में प्रभावी |
दोनों रणनीतियों का संतुलित उपयोग तनाव कम करने में सहायक होता है।
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⭐ प्रश्न 8: तनाव प्रबंधन में योग, ध्यान और श्वसन तकनीकों की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
योग, ध्यान और श्वसन तकनीकें तनाव प्रबंधन की सबसे प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध विधियाँ हैं। तनाव का मूल कारण मन और शरीर का असंतुलन है, और ये तीनों तकनीकें मिलकर इस संतुलन को पुनः स्थापित करती हैं। योग में आसन, प्राणायाम और ध्यान का संयोजन होता है, जो शरीर को शिथिल करता है, मांसपेशियों को आराम देता है और मस्तिष्क की गतिविधि को शांत करता है। योग के नियमित अभ्यास से तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर कम होता है, रक्तचाप संतुलित रहता है और मानसिक शांति बढ़ती है।
ध्यान (Meditation) का मुख्य उद्देश्य मन को वर्तमान में केंद्रित करना है। जब व्यक्ति लगातार भविष्य और अतीत की चिंताओं में फंसा रहता है, तो तनाव बढ़ता है। ध्यान मन के विचारों को धीमा करता है, भावनाओं को स्थिर करता है और मस्तिष्क की गतिविधि को नियंत्रित करता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि ध्यान मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को सक्रिय करता है, जो तार्किक निर्णय, भावनात्मक नियंत्रण और एकाग्रता के लिए जिम्मेदार है। इससे मानसिक स्थिरता बढ़ती है और तनाव कम होता है।
श्वसन तकनीकें (Breathing Techniques) तनाव कम करने का सबसे त्वरित और प्रभावी तरीका हैं। गहरी साँसें लेने से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, हृदय की गति नियंत्रित होती है और मांसपेशियों का तनाव कम होता है। “अनुलोम-विलोम”, “भ्रामरी”, और “4-7-8 ब्रिदिंग” जैसी तकनीकें मन को तुरंत शांत करती हैं। ये तकनीकें पैरासिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करती हैं, जो शरीर को शिथिल करने का कार्य करता है।
योग, ध्यान और श्वसन तकनीकों का संयुक्त प्रभाव तनाव प्रबंधन में अत्यंत लाभकारी है। ये न केवल तनाव कम करते हैं बल्कि व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाते हैं। इनके नियमित अभ्यास से नींद में सुधार, आत्मविश्वास में वृद्धि, धैर्य में बढ़ोतरी और सकारात्मक सोच विकसित होती है।
निष्कर्षतः, योग, ध्यान और श्वसन तकनीकें सरल, सुलभ और बिना किसी दुष्प्रभाव के तनाव प्रबंधन में सहायक हैं। आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार में ये तकनीकें मानसिक शांति का सबसे प्रभावी साधन साबित होती हैं।
⭐ प्रश्न 9: समय प्रबंधन (Time Management) तनाव कम करने में कैसे सहायक है? विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
समय प्रबंधन तनाव कम करने का सबसे प्रभावी साधन माना जाता है। अधिकांश तनाव इस बात से उत्पन्न होता है कि व्यक्ति के पास कार्य अधिक हैं और समय कम। जब व्यक्ति अपने समय का सुव्यवस्थित उपयोग सीख लेता है, तो न केवल उसका तनाव कम होता है बल्कि उसकी कार्यक्षमता भी बढ़ जाती है। समय प्रबंधन का मूल सिद्धांत प्राथमिकता तय करना है। जब व्यक्ति जानता है कि कौन-सा कार्य पहले करना है और कौन-सा बाद में, तब मानसिक दबाव स्वतः कम हो जाता है।
समय प्रबंधन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है योजनाबद्धता (Planning)। जब कार्यों की सूची और एक स्पष्ट समय-सारणी बनती है, तो व्यक्ति को यह समझने में आसानी होती है कि उसे क्या करना है और कब तक करना है। इससे अव्यवस्था कम होती है, और तनाव के स्तर में कमी आती है। इसके विपरीत, बिना योजना के कार्य तनाव उत्पन्न करते हैं क्योंकि व्यक्ति हमेशा जल्दी में और भ्रमित रहता है।
तीसरा प्रमुख घटक है कार्य को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित करना। बड़े कार्य अक्सर तनाव का मुख्य कारण होते हैं। लेकिन जब इन्हें छोटे हिस्सों में बाँटा जाता है, तो वे आसान हो जाते हैं और व्यक्ति को उपलब्धि की भावना मिलती है। इससे प्रेरणा बढ़ती है और तनाव कम होता है।
समय प्रबंधन में “ना कहना” भी एक महत्वपूर्ण कौशल है। कई लोग दूसरों की अपेक्षाओं के कारण अनावश्यक कार्य स्वीकार कर लेते हैं, जिससे उनका तनाव बढ़ता है। आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी सीमाएँ समझे और अनावश्यक कार्यों से बचे।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है आराम और विराम। निरंतर काम करते रहना तनाव को बढ़ाता है। समय प्रबंधन में छोटे-छोटे ब्रेक शामिल करने से मन और शरीर दोनों को आराम मिलता है और उत्पादकता बढ़ती है। पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और मनोरंजन भी तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
निष्कर्षतः, समय प्रबंधन केवल कार्य को समय पर पूरा करने का साधन नहीं है बल्कि मानसिक शांति और संतुलन बनाए रखने का एक शक्तिशाली तरीका है। यह तनाव को कम करता है, नियंत्रण की भावना बढ़ाता है और जीवन को अधिक सरल और सुव्यवस्थित बनाता है।
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⭐ प्रश्न 10: कार्यस्थल तनाव (Workplace Stress) के कारण एवं प्रबंधन के उपायों पर चर्चा कीजिए।
कार्यस्थल तनाव आज के समय की एक प्रमुख समस्या है, जिसका प्रभाव कर्मचारियों की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ता है। कार्यस्थल तनाव के कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख है अत्यधिक कार्यभार। जब कर्मचारियों से उनकी क्षमता से अधिक काम करवाया जाता है या समयसीमा बहुत कम होती है, तो तनाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। दूसरा कारण है नियंत्रण की कमी—जब कर्मचारी को निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता या उसे अपने कार्य पर पर्याप्त नियंत्रण महसूस नहीं होता।
कार्यस्थल का वातावरण भी तनाव बढ़ाता है। नकारात्मक वातावरण, असहयोगी सहकर्मी, खराब संचार, असुरक्षित कार्यस्थल और प्रबंधन का अनुचित व्यवहार तनाव को बढ़ाते हैं। इसके अलावा, नौकरी की असुरक्षा, कम वेतन, पदोन्नति में देरी और अपेक्षाओं का दबाव भी प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
कार्यस्थल तनाव को प्रबंधित करने के कई उपाय हैं। सबसे पहले, संगठन को कार्यभार का संतुलन बनाए रखना चाहिए। कर्मचारियों की क्षमताओं के अनुसार काम बाँटने से तनाव कम होता है। दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है स्पष्ट संचार—जब भूमिकाएँ, जिम्मेदारियाँ और अपेक्षाएँ साफ हों, तो भ्रम कम होता है और तनाव भी घटता है। तीसरा उपाय है कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराना, जिससे वे अपने काम को कुशलता से कर सकें।
व्यक्तिगत स्तर पर, कर्मचारी समय प्रबंधन, प्राथमिकता तय करना, विश्राम तकनीकें और सकारात्मक सोच अपनाकर तनाव कम कर सकते हैं। नियमित व्यायाम, ध्यान और ब्रिदिंग एक्सरसाइज कार्यस्थल तनाव कम करने में अत्यंत सहायक हैं। सहकर्मियों और परिवार का सामाजिक समर्थन भी तनाव कम करता है।
निष्कर्षतः, कार्यस्थल तनाव एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन उचित प्रबंधन और स्वस्थ कार्य संस्कृति के माध्यम से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
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