IGNOU FREE BPCG-172 युवा, जेंडर एवं पहचान Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BPCG-172 युवा, जेंडर एवं पहचान Solved Guess Paper 2025

Q1. युवावस्था (Youth) की अवधारणा, उसकी विशेषताएँ तथा आधुनिक समाज में उसकी प्रासंगिकता पर विस्तृत चर्चा कीजिए।

युवावस्था बचपन और वयस्कता के बीच का संक्रमणकाल है, जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और संज्ञानात्मक रूप से तेजी से विकसित होता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 15 से 24 वर्ष की आयु को युवावस्था कहा गया है, लेकिन भारत जैसे देशों में शिक्षा, आर्थिक परिस्थितियों और सामाजिक संरचनाओं के कारण युवावस्था 30 वर्ष तक भी मानी जाती है। युवावस्था ऊर्जा, जिज्ञासा, नवोन्मेष, स्वतंत्रता की इच्छा और सामाजिक जागरूकता का काल है।

युवाओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं—तेज़ भावनात्मक परिवर्तन, पहचान की खोज, जोखिम लेने की प्रवृत्ति, नए अनुभवों की चाह, आदर्शवाद, और स्वतंत्रता की लालसा। इस समय युवा अपने भविष्य, करियर, संबंधों और सामाजिक भूमिकाओं के प्रति गंभीर हो जाते हैं। वे मूल्य प्रणाली, सामाजिक मानदंडों और परिवार द्वारा दी गई सीख पर प्रश्न उठाते हैं और अपनी पहचान बनाने की प्रक्रिया से गुजरते हैं।

आधुनिक समाज में युवाओं की भूमिका बहुत बढ़ गई है। दुनिया भर में युवा आबादी बड़ी संख्या में है और भारत जैसे देश में यह संख्या जनसांख्यिकीय लाभ (Demographic Dividend) का अवसर प्रदान करती है। युवा तकनीक, शिक्षा, खेल, कला, उद्यमिता, और सामाजिक परिवर्तन के मुख्य वाहक हैं। वे सामाजिक आंदोलनों—जैसे पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता, मानवाधिकार—में अग्रणी भूमिका निभाते हैं।

डिजिटल युग में युवाओं की भागीदारी व्यापक हो गई है। इंटरनेट, मोबाइल, और सोशल मीडिया के माध्यम से युवा वैश्विक मुद्दों से जुड़े रहते हैं। लेकिन साथ ही वे कई चुनौतियों का सामना भी करते हैं—मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ, तनाव, बेरोजगारी, करियर दबाव, सूचनाओं का अतिरेक, साइबर बुलिंग और अवास्तविक सोशल मीडिया तुलना।

युवाओं की सोच और निर्णय सामाजिक दिशा निर्धारित करते हैं। इसलिए शिक्षा, मार्गदर्शन, रोजगार अवसरों, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना किसी भी समाज की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

इस प्रकार, युवावस्था न केवल व्यक्तिगत विकास बल्कि राष्ट्र और समाज के भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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Q2. एरिक्सन के सिद्धांत के संदर्भ में युवाओं में पहचान निर्माण (Identity Formation) की प्रक्रिया का विश्लेषण कीजिए।

पहचान निर्माण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से युवा यह समझते हैं कि वे कौन हैं, क्या मूल्य रखते हैं, और जीवन में किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। एरिक एरिक्सन का मनोसामाजिक विकास सिद्धांत युवावस्था के लिए “Identity vs Role Confusion” को सबसे महत्वपूर्ण चरण मानता है। इस चरण में युवा विभिन्न भूमिकाओं, विचारों और अनुभवों का अन्वेषण करते हैं तथा अपने भविष्य की दिशा तय करने का प्रयास करते हैं।

एरिक्सन कहते हैं कि पहचान निर्माण दो मुख्य प्रक्रियाओं से बनता है—अन्वेषण (Exploration) और प्रतिबद्धता (Commitment)। युवा करियर विकल्प, मूल्य, धार्मिक विचार, संबंधों और व्यक्तिगत रुचियों का परीक्षण करते हैं। यदि उन्हें इन पहलुओं में स्पष्टता मिल जाती है, तो वे मजबूत पहचान विकसित करते हैं। लेकिन यदि भ्रम, दबाव या असमंजस बना रहे, तो भूमिका-विभ्रम (Role Confusion) उत्पन्न होता है।

इस प्रक्रिया में परिवार का योगदान गहरा होता है। सहयोगी और संवेदनशील परिवार युवाओं को प्रश्न पूछने, निर्णय लेने और अपने विचार व्यक्त करने का अवसर देते हैं। कठोर या नियंत्रित परिवार पहचान निर्माण को बाधित कर सकते हैं।

साथी समूह (Peers) भी पहचान निर्माण का केंद्र होते हैं। युवाओं को दोस्तों से अनुमोदन (validation) और आत्मविश्वास मिलता है। उनकी रुचियाँ, भाषा, पोशाक, शौक, संगीत पसंद—सब साथियों द्वारा प्रभावित हो सकते हैं।

स्कूल, शिक्षक और शिक्षा प्रणाली युवाओं को नेतृत्व, कौशल विकास, सामाजिक समझ और आत्म-अभिव्यक्ति का अवसर देती है। सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ भी पहचान की दिशा तय करने में सहायक होती हैं।

सोशल मीडिया आधुनिक पहचान निर्माण को नया रूप देता है। युवा ऑनलाइन आदर्शों से प्रभावित होते हैं और अक्सर अपनी पहचान डिजिटल छवि के अनुरूप बनाते हैं। हालाँकि यह प्रेरणादायक भी हो सकता है, लेकिन तुलना और अवास्तविक मानकों से भ्रम भी पैदा हो सकता है।

सफल पहचान निर्माण युवाओं में आत्मविश्वास, निर्णय क्षमता, भावनात्मक स्थिरता और सामाजिक अनुकूलन क्षमता बढ़ाता है। अधूरी पहचान जीवन में अस्थिरता, गलत निर्णय और आत्म-संदेह बढ़ाती है।

इस प्रकार, एरिक्सन का सिद्धांत युवावस्था को पहचान निर्माण का निर्णायक चरण मानता है, जहाँ व्यक्तिगत अनुभव और सामाजिक प्रभाव मिलकर स्वयं की मजबूत पहचान का निर्माण करते हैं।

Q3. समझाइए कि लैंगिकता (Gender) पहचान को कैसे प्रभावित करती है। लैंगिक समाजीकरण, लैंगिक रूढ़ियाँ और उनका युवाओं पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।

लैंगिकता (Gender) केवल जैविक अंतर नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक अपेक्षाओं का समूह है। यह तय करती है कि समाज पुरुषों और महिलाओं से कैसे व्यवहार की अपेक्षा करता है, और यही अपेक्षाएँ पहचान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

लैंगिक समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति जन्म से ही सीखता है कि पुरुषों या महिलाओं की “भूमिकाएँ” क्या हैं। परिवार पहला संस्थान है जहाँ बच्चों को खिलौने, रंग, कपड़े, भाषा और व्यवहार के माध्यम से लैंगिक भूमिकाएँ सिखाई जाती हैं। उदाहरण—लड़कों के लिए खिलौना कार, लड़कियों के लिए गुड़िया।

विद्यालय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षक अनजाने में लड़कों को खेल और विज्ञान में प्रोत्साहित करते हैं, जबकि लड़कियों को कला, नृत्य या “नरम” गतिविधियों की ओर निर्देशित करते हैं।

मीडिया लैंगिक रूढ़ियों को और मजबूत करता है। धारावाहिकों, विज्ञापनों, फिल्मों में पुरुषों को अक्सर निर्णय लेने वाला, शक्तिशाली और साहसी दिखाया जाता है, जबकि महिलाओं को सुंदर, संवेदनशील और घरेलू दिखाया जाता है। सोशल मीडिया आज के युवाओं में सौंदर्य मानकों और आकर्षकता की अवास्तविक छवि बनाता है।

लैंगिक रूढ़ियाँ (Gender Stereotypes) युवाओं पर कई नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।

  • लड़कों को भावनाएँ व्यक्त करने की अनुमति नहीं दी जाती, जिससे तनाव और आक्रामकता बढ़ती है।

  • लड़कियों को “कमज़ोर” या “कैरियर से कम जुड़ी” समझा जाता है।

  • LGBTQ+ युवाओं को भेदभाव, हिंसा और अवसाद का सामना करना पड़ता है।

  • करियर विकल्प सीमित हो जाते हैं—लड़कियाँ STEM से, लड़के कला/फैशन से दूर रहते हैं।

लैंगिकता युवाओं की पहचान को इस तरह आकार देती है कि वे समाज की अपेक्षित भूमिका निभाने लगते हैं, भले ही वह उनकी वास्तविक इच्छा न हो।

जब समाज लैंगिकता को एक निश्चित ढाँचे में बाँधता है तो युवा तनाव, भ्रम और आत्म-संदेह का शिकार हो जाते हैं। लेकिन यदि समाज समावेशी, संवेदनशील और समान अवसर प्रदान करता है, तो युवा अपनी वास्तविक पहचान को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकते हैं।

अतः लैंगिकता पहचान निर्माण का प्रमुख घटक है, और समानता पर आधारित समाज युवाओं को स्वस्थ, स्वतंत्र और संतुलित पहचान प्रदान कर सकता है।

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Q4. युवाओं, लैंगिकता और पहचान से संबंधित प्रमुख चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा कीजिए।

आधुनिक युवाओं को पहचान निर्माण, लैंगिक भूमिकाओं, सामाजिक अपेक्षाओं और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी चुनौती पहचान भ्रम (Identity Confusion) है। तेजी से बदलते सामाजिक वातावरण, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, करियर असुरक्षा और पारिवारिक दबाव के कारण युवा स्वयं को समझने में कठिनाई अनुभव करते हैं।

लैंगिक असमानता भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। लड़कियों को शिक्षा, सुरक्षा, करियर और स्वतंत्रता में बाधाएँ झेलनी पड़ती हैं। वहीं लड़कों पर “मर्दानगी” का दबाव होता है—उन्हें रोने, भावनाएँ साझा करने या कोमलता दिखाने से रोका जाता है।

LGBTQ+ युवाओं की समस्याएँ और भी गंभीर हैं। उन्हें परिवार, स्कूल और समाज में कई बार अस्वीकृति, उपहास और हिंसा का सामना करना पड़ता है। इससे भावनात्मक अस्थिरता, अवसाद और आत्महत्या का जोखिम बढ़ता है।

मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ जैसे चिंता, अवसाद, तनाव, अकेलापन और आत्म-संदेह आज युवाओं में तेजी से बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया तुलना, फेक लाइफस्टाइल, साइबर बुलिंग और डिजिटल लत इस समस्या को और बढ़ाते हैं।

सामाजिक दबाव (Peer Pressure) युवाओं को कई बार नशा, जोखिमपूर्ण संबंध, गलत आदतें और व्यसनों की ओर धकेल देता है।

करियर और रोजगार असुरक्षा भी बड़ी समस्या है। प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी और पढ़ाई/कौशल के असंगति के कारण युवा निराशा महसूस करते हैं।

लैंगिक आधारित हिंसा, उत्पीड़न, बॉडी शेमिंग, और ऑनलाइन ट्रोलिंग युवाओं की सुरक्षा और आत्म-सम्मान को प्रभावित करती हैं।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए परिवार, विद्यालय, समाज, सरकार और मीडिया को मिलकर काम करना चाहिए—

  • मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ

  • जेंडर-सेंसिटिव शिक्षा

  • अवसरों में समानता

  • सुरक्षित डिजिटल स्पेस

  • परामर्श और मार्गदर्शन

  • युवा नेतृत्व मंच

इस प्रकार, युवाओं, लैंगिकता और पहचान की चुनौतियाँ बहुआयामी हैं जिन्हें संवेदनशीलता, जागरूकता और समर्थन से हल किया जा सकता है।

Q5. परिवार, साथियों (Peers) और मीडिया का युवाओं की पहचान (Youth Identity) निर्माण में क्या भूमिका है?

युवा पहचान निर्माण में परिवार, साथियों और मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले परिवार पहचान का पहला आधार है। बच्चे जन्म से लेकर किशोरावस्था तक परिवार से मूल्य, आदर्श, भाषा, व्यवहार, और सामाजिक नियम सीखते हैं। माता-पिता की पालन-पोषण शैली पहचान निर्माण को गहराई से प्रभावित करती है। लोकतांत्रिक और सहयोगी परिवार युवाओं को स्वतंत्र निर्णय लेने, अपनी रुचियों को खोजने और आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायता करते हैं। इसके विपरीत, कठोर या दमनकारी परिवारों में पले युवा अक्सर भय, भ्रम और विद्रोह से गुजरते हैं। परिवार करियर चुनने, लैंगिक भूमिकाओं, रिश्तों और सामाजिक सोच पर भी गहरा प्रभाव डालता है।

साथी समूह (Peers) किशोरावस्था का सबसे प्रभावशाली सामाजिक कारक बन जाता है। इस उम्र में दोस्तों की स्वीकृति, संबद्धता और पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। युवा अक्सर साथियों की पसंद, फैशन, भाषा, संगीत, व्यवहार, और निर्णयों से प्रभावित होते हैं। सकारात्मक साथी समूह आत्मविश्वास, सहयोग और भावनात्मक समर्थन प्रदान करता है, जबकि नकारात्मक समूह जोखिमपूर्ण व्यवहार—नशा, उद्दंडता, हिंसा, ऑनलाइन लत—को बढ़ा सकता है। कई बार युवा अपनी पहचान में बदलाव कर केवल मित्र-समूह में फिट होने की कोशिश करते हैं, जिससे आंतरिक संघर्ष उत्पन्न होता है।

मीडिया और सोशल मीडिया आज पहचान निर्माण में सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। फिल्में, टीवी, विज्ञापन, और खासकर इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक, और टिकटॉक युवाओं को दुनिया भर की जीवनशैली, फैशन, सफलता के मॉडल, और सौंदर्य मानकों से अवगत कराते हैं। सोशल मीडिया स्व-अभिव्यक्ति का मंच तो देता है, लेकिन तुलना, आत्म-संदेह, और अवास्तविक अपेक्षाएँ भी उत्पन्न करता है। युवा अक्सर अपनी ऑनलाइन पहचान वास्तविक पहचान से भिन्न बनाते हैं, जिससे पहचान का द्वंद्व पैदा होता है।

इन तीनों का सम्मिलित प्रभाव कभी-कभी सामंजस्यपूर्ण होता है, तो कभी टकरावपूर्ण। जब परिवार का मूल्य और मीडिया/साथियों के संदेश एक-दूसरे से टकराते हैं, तो युवा भ्रम, तनाव और निर्णय-समस्या का सामना करते हैं।

इस प्रकार, परिवार, साथियों और मीडिया मिलकर युवाओं की पहचान का निर्माण करते हैं और उनकी सोच, आकांक्षाओं तथा व्यवहार को दिशा देते हैं।

Q6. लैंगिक पहचान (Gender Identity) क्या है? LGBTQ+ युवाओं के अनुभवों और चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।

लैंगिक पहचान वह आंतरिक अनुभूति है कि व्यक्ति स्वयं को पुरुष, महिला, दोनों, न कोई, या लैंगिक-विविधता वाले रूप में महसूस करता है। यह जैविक लिंग से अलग होती है क्योंकि यह सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक अनुभवों पर आधारित होती है। LGBTQ+ (Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, Queer) युवाओं के लिए यह विषय और भी जटिल हो जाता है क्योंकि समाज में लैंगिक विविधता को अक्सर स्वीकार नहीं किया जाता।

LGBTQ+ युवाओं को सबसे पहले परिवार में अस्वीकृति का सामना करना पड़ सकता है। कई परिवार पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं में विश्वास रखते हैं और बच्चों की लैंगिक विविधता को “गलत” समझते हैं। इससे युवा अकेलापन, अवसाद और भावनात्मक तनाव का अनुभव करते हैं।

स्कूल और कॉलेज भी अक्सर सुरक्षित नहीं होते। वहाँ बुलिंग, चिढ़ाना, उपहास, और शारीरिक/मानसिक उत्पीड़न जैसी चुनौतियाँ आम हैं। शिक्षक भी कई बार संवेदनशील नहीं होते, जिससे LGBTQ+ छात्र अलग-थलग महसूस करते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ इस समुदाय में अधिक पाई जाती हैं—चिंता, अवसाद, आत्म-संदेह, और आत्महत्या का खतरा। यह उनकी लैंगिक पहचान के कारण नहीं, बल्कि समाज द्वारा दी गई अस्वीकृति और दमन के कारण होता है।

सकारात्मक पक्ष यह है कि अब LGBTQ+ युवाओं के लिए काउंसलिंग सेवाएँ, सपोर्ट ग्रुप, ऑनलाइन समुदाय, कानूनों में सुधार (जैसे भारत में नालसा जजमेंट), और सामाजिक जागरूकता बढ़ रही है। जेंडर-न्यूट्रल बाथरूम, समावेशी शिक्षा, और संवेदनशील शिक्षकों की उपस्थिति LGBTQ+ युवाओं के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।

लैंगिक पहचान हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। सुरक्षित, स्वीकार्य और सहायक वातावरण LGBTQ+ युवाओं के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक है।

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Q7. शिक्षा युवाओं की आकांक्षाएँ, पहचान और लैंगिक भूमिकाओं को कैसे आकार देती है?

शिक्षा युवाओं की पहचान, करियर आकांक्षाओं और लैंगिक भूमिकाओं के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आकांक्षाओं के संदर्भ में शिक्षा युवाओं को नए विषयों, कौशलों और करियर अवसरों से परिचित कराती है। स्कूल के अनुभव, शिक्षक का समर्थन, और उपलब्ध संसाधन युवाओं को अपने लक्ष्य निर्धारित करने, प्रतिभा पहचानने और आत्मविश्वास विकसित करने में सहायता करते हैं।

पहचान निर्माण में शिक्षा युवाओं को सोचने, विश्लेषण करने और अपने अनुभवों को समझने की क्षमता देती है। विद्यालय में खेल, कला, वाद-विवाद, नेतृत्व भूमिकाएँ और सामाजिक सेवा गतिविधियाँ युवाओं को स्वयं की क्षमता पहचानने का अवसर देती हैं। कॉलेज के स्तर पर सामाजिक विविधता का अनुभव और स्वतंत्र जीवन युवाओं की पहचान को और विस्तृत करता है।

लैंगिक भूमिकाएँ भी शिक्षा द्वारा प्रभावित होती हैं। पारंपरिक रूप से स्कूलों में लड़कों को विज्ञान और खेल में अधिक प्रोत्साहित किया जाता था, जबकि लड़कियों को कला, गृहविज्ञान और “नरम” विषयों की ओर निर्देशित किया जाता था। हालाँकि आज समय बदल रहा है। लैंगिक-संवेदी शिक्षा लड़कियों को STEM (Science, Technology, Engineering, Mathematics) में आगे बढ़ने और लड़कों को भावनात्मक अभिव्यक्ति तथा गैर-परंपरागत भूमिकाएँ अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

शिक्षक लैंगिक समानता के अत्यंत महत्वपूर्ण एजेंट होते हैं। वे कक्षा में बराबर अवसर देकर, छात्र–छात्राओं को समान रूप से प्रोत्साहित करके और लैंगिक टिप्पणियों को रोककर युवाओं में समानता की भावना विकसित करते हैं।

इस प्रकार, शिक्षा युवाओं की पहचान, स्वतंत्रता, आकांक्षा और लैंगिक बराबरी को बढ़ावा देने में केंद्रीय भूमिका निभाती है।

Q8. डिजिटल युग में युवाओं द्वारा झेली जाने वाली मनोवैज्ञानिक चुनौतियों पर चर्चा कीजिए (सोशल मीडिया, साइबर बुलिंग, लत, तुलना)।

डिजिटल युग ने जहां युवा पीढ़ी को नई संभावनाएँ, ज्ञान और संपर्क दिए हैं, वहीं कई मनोवैज्ञानिक चुनौतियाँ भी प्रस्तुत की हैं।

सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और टिकटॉक ने पहचान निर्माण को प्रभावित किया है। युवा लगातार दूसरों की तुलना में खुद को कम आँकने लगते हैं। “परफेक्ट लाइफ” की डिजिटल छवि देखकर हीनभावना, चिंता और आत्म-संदेह बढ़ता है।

साइबर बुलिंग आज के युग की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। ऑनलाइन गाली, धमकी, मीम्स, बदनामी, या फर्जी अकाउंट बनाकर परेशान करना—ये सब युवाओं को मानसिक तनाव, शर्मिंदगी और अवसाद में धकेल देते हैं। साइबर बुलिंग 24×7 होती है और बड़े दर्शक समूह तक तुरंत पहुँच जाती है, जिससे पीड़ित पर भारी भावनात्मक दबाव पड़ता है।

डिजिटल लत एक नया मानसिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। वीडियो गेम, सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग, और ओटीटी प्लेटफॉर्म की लत से नींद कम हो जाती है, पढ़ाई प्रभावित होती है, और ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है। कई युवा ‘लाइक्स’ और ‘नोटिफिकेशन’ के माध्यम से डोपामाइन-आधारित आनंद लेते हैं, जिससे धीरे-धीरे आदत बन जाती है।

सोशल मीडिया FOMO (Fear of Missing Out) को बढ़ाता है, जिसमें युवा महसूस करते हैं कि वे जीवन में दूसरों से पीछे हैं। इससे तनाव, चिंता और अवसाद बढ़ता है।

इसके अलावा ऑनलाइन गोपनीयता खतरे, पहचान चोरी, और हानिकारक वेबसाइटों तक पहुँच भी जोखिम बढ़ाते हैं।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए डिजिटल साक्षरता, स्वस्थ स्क्रीन-टाइम सीमाएँ, परामर्श सेवाएँ, और परिवार/स्कूल का सहयोग आवश्यक है।

Q9. इंटरसेक्शनैलिटी (Intersectionality) क्या है? युवाओं की पहचान को समझने में इसकी क्या भूमिका है?

इंटरसेक्शनैलिटी यह समझने का ढांचा है कि किसी व्यक्ति की पहचान कई सामाजिक पहलुओं—जैसे जाति, वर्ग, धर्म, लिंग, लैंगिकता, विकलांगता, भाषा—से मिलकर बनती है, और ये सभी मिलकर उसके अनुभवों को प्रभावित करते हैं। यह अवधारणा किम्बर्ले क्रेंशॉ द्वारा प्रस्तुत की गई थी।

युवाओं की पहचान को समझने में इंटरसेक्शनैलिटी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, एक दलित लड़की, एक मुस्लिम युवक, एक विकलांग युवा, या LGBTQ+ पहचान वाला छात्र—सभी सामाजिक रूप से अलग-अलग प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हैं।

लिंग और जाति का मेल (अर्थात दलित महिलाएँ) दोहरी असमानता पैदा करता है। आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के युवा शिक्षा, स्वास्थ्य और करियर के अवसरों से वंचित रह सकते हैं। धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले युवाओं को भेदभाव और पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है।

इंटरसेक्शनैलिटी हमें बताता है कि भेदभाव कभी एक-आयामी नहीं होता, बल्कि कई पहचानें मिलकर भेदभाव को जटिल बनाती हैं। यह दृष्टिकोण नीति-निर्माताओं, शिक्षकों और समाज को युवाओं की विविध आवश्यकताओं को समझने और अधिक संवेदनशील तथा न्यायपूर्ण रणनीतियाँ बनाने में मदद करता है।

इस प्रकार, इंटरसेक्शनैलिटी युवाओं की वास्तविकताओं को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन है।

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Q10. युवाओं को सशक्त बनाने और लैंगिक समानता बढ़ाने के लिए क्या रणनीतियाँ अपनाई जानी चाहिए?

युवाओं को सशक्त बनाना और लैंगिक समानता बढ़ाना किसी भी समाज के विकास और न्याय के लिए आवश्यक है। शिक्षा empowerment का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा युवाओं को कौशल, सोचने की क्षमता, आत्मविश्वास और बेहतर करियर अवसर देती है। साथ ही, कौशल-विकास कार्यक्रम—डिजिटल कौशल, भाषा कौशल, उद्यमिता—युवाओं को रोजगार के लिए सक्षम बनाते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी आवश्यक है। काउंसलिंग सेंटर, मेंटरशिप प्रोग्राम और तनाव प्रबंधन कार्यशालाएँ युवाओं को भावनात्मक रूप से सशक्त बनाती हैं।

लैंगिक समानता के लिए समाज को पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को चुनौती देनी होगी। लड़कियों की शिक्षा, सुरक्षा और करियर अवसरों का विस्तार किया जाना चाहिए। लड़कों को भावनात्मक अभिव्यक्ति, संवेदना और समानता सिखाई जानी चाहिए।

विद्यालयों में जेंडर-सेंसिटिव शिक्षा, लैंगिक-न्यायपूर्ण पाठ्यक्रम और सुरक्षित वातावरण आवश्यक हैं। कार्यस्थलों पर समान वेतन, मातृत्व–पितृत्व अवकाश, और यौन उत्पीड़न के खिलाफ कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए।

समुदाय स्तर पर, जागरूकता अभियान, महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, युवा नेतृत्व मंच, और LGBTQ+ समूह सामाजिक बदलाव को गति देते हैं। मीडिया भी संतुलित और सकारात्मक लैंगिक चित्रण द्वारा सामाजिक सोच को बदल सकता है।

इस प्रकार, युवाओं का सशक्तिकरण और लैंगिक समानता मिलकर एक सुरक्षित, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज का निर्माण करते हैं।

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