IGNOU FREE BPAG-171 आपदा प्रबंधन Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BPAG-171आपदा प्रबंधन Solved Guess Paper 2025

प्रश्न 1: आपदा की परिभाषा दीजिए तथा आपदाओं के प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिए।

आपदा वह घटना होती है जो अचानक या धीरे-धीरे घटित होकर किसी समाज, समुदाय या क्षेत्र के सामान्य जीवन को गंभीर रूप से बाधित कर देती है तथा व्यापक स्तर पर जन-धन, संपत्ति, पर्यावरण और आर्थिक संसाधनों की क्षति पहुँचाती है। जब किसी प्राकृतिक या मानवीय घटना से उत्पन्न हानि प्रभावित समुदाय की सहन और सामना करने की क्षमता से बाहर हो जाती है, तब वह आपदा का रूप ले लेती है। इस प्रकार आपदा केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि वह प्राकृतिक खतरे (Hazard), मानवीय संवेदनशीलता (Vulnerability) और अपर्याप्त तैयारी का संयुक्त परिणाम होती है। आपदाओं को मुख्य रूप से प्राकृतिक आपदाएँ और मानव-निर्मित आपदाएँ दो वर्गों में बाँटा जाता है। प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप, बाढ़, सूखा, चक्रवात, सुनामी, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, बादल फटना और वनाग्नि आदि शामिल हैं। भूकंप पृथ्वी की सतह में अचानक हलचल से होता है, जिससे भवन, सड़कें और अन्य संरचनाएँ नष्ट हो जाती हैं। बाढ़ अत्यधिक वर्षा या बाँध टूटने से आती है और खेती, जनजीवन तथा संचार व्यवस्था को भारी क्षति पहुँचाती है। सूखा धीमी गति से आने वाली आपदा है, जो लंबे समय तक वर्षा न होने से उत्पन्न होती है और इससे खाद्य संकट, बेरोजगारी तथा पलायन बढ़ता है। चक्रवात समुद्री तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही लाते हैं। मानव-निर्मित आपदाओं में औद्योगिक दुर्घटनाएँ, रासायनिक गैस रिसाव, परमाणु दुर्घटनाएँ, आगजनी, युद्ध, आतंकवाद, दंगे, भगदड़ और परिवहन दुर्घटनाएँ शामिल हैं। भोपाल गैस त्रासदी इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अतिरिक्त जैविक आपदाएँ जैसे महामारी और संक्रामक रोग—कोविड-19, हैजा, प्लेग आदि—भी समाज, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था को गहराई से प्रभावित करती हैं। आपदाओं को त्वरित उत्पन्न होने वाली आपदाओं (जैसे भूकंप, चक्रवात) और धीमी गति से उत्पन्न होने वाली आपदाओं (जैसे सूखा, जलवायु परिवर्तन) के रूप में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। आज के समय में जनसंख्या वृद्धि, अनियोजित नगरीकरण, औद्योगीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ रही हैं, जिससे आपदा प्रबंधन का महत्व और भी अधिक हो गया है।

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प्रश्न 2: आपदा प्रबंधन की अवधारणा स्पष्ट कीजिए तथा इसके प्रमुख चरणों का वर्णन कीजिए।

आपदा प्रबंधन एक संगठित, योजनाबद्ध और सतत प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत आपदाओं की रोकथाम, उनके प्रभाव को कम करना, आपदा के समय प्रभावी प्रतिक्रिया देना तथा उसके बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण करना शामिल होता है। आपदा प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य जन-धन की हानि को न्यूनतम करना, प्रभावित लोगों को शीघ्र सहायता प्रदान करना और सामान्य जीवन को पुनः स्थापित करना होता है। आधुनिक समय में आपदा प्रबंधन को केवल राहत कार्यों तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे एक व्यापक जोखिम न्यूनीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। आपदा प्रबंधन के चार प्रमुख चरण माने जाते हैं—निवारण (Mitigation), पूर्व तैयारी (Preparedness), प्रतिक्रिया (Response) और पुनर्प्राप्ति या पुनर्वास (Recovery)। निवारण वह चरण है जिसमें आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए पूर्व उपाय किए जाते हैं, जैसे भूकंपरोधी भवन निर्माण, बाढ़ से बचाव के लिए तटबंध, जल निकासी व्यवस्था, भवन निर्माण नियम, वनों का संरक्षण और जन-जागरूकता कार्यक्रम। यह सबसे महत्वपूर्ण और किफायती चरण माना जाता है। पूर्व तैयारी वह अवस्था है जिसमें आपदा आने से पहले लोगों और संस्थानों को तैयार किया जाता है। इसमें आपदा प्रबंधन योजनाएँ बनाना, मॉक ड्रिल कराना, खोज एवं बचाव दलों को प्रशिक्षण देना, संचार व्यवस्था सुदृढ़ करना और आवश्यक सामग्री का भंडारण करना शामिल है। प्रतिक्रिया वह चरण है जब आपदा घटित हो चुकी होती है और तत्काल जीवन रक्षक कार्य किए जाते हैं, जैसे खोज-बचाव, घायलों को अस्पताल पहुँचाना, भोजन-मजल, अस्थायी आश्रय और सुरक्षा व्यवस्था। पुनर्प्राप्ति या पुनर्वास वह दीर्घकालिक चरण है जिसमें प्रभावित क्षेत्र का पुनर्निर्माण किया जाता है, जैसे घरों, सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और आजीविका का पुनर्स्थापन। इसमें मानसिक आघात से उबरने के उपाय और सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्स्थापना भी शामिल होती है। आधुनिक दृष्टिकोण “बिल्ड बैक बेटर” पर भी ज़ोर देता है, अर्थात पुनर्निर्माण इस प्रकार किया जाए कि भविष्य में आपदाओं से कम क्षति हो। इस प्रकार आपदा प्रबंधन एक चक्रीय और सतत प्रक्रिया है, जो समाज को अधिक सुरक्षित और सक्षम बनाती है।

प्रश्न 3: भारत में आपदा प्रबंधन के संस्थागत ढाँचे की विवेचना कीजिए।

भारत में आपदा प्रबंधन के लिए एक सुव्यवस्थित और बहु-स्तरीय संस्थागत ढाँचा विकसित किया गया है, जिसकी आधारशिला आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के माध्यम से रखी गई। इस अधिनियम के तहत राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की स्थापना की गई। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) देश की सर्वोच्च संस्था है, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। NDMA राष्ट्रीय नीतियाँ, दिशानिर्देश और योजनाएँ बनाता है तथा विभिन्न मंत्रालयों के साथ समन्वय स्थापित करता है। इसके क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (NEC) कार्य करती है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) एक विशेष प्रशिक्षित बल है, जो बाढ़, भूकंप, चक्रवात, रासायनिक आपदाओं और अन्य आपात स्थितियों में खोज-बचाव कार्य करता है। राज्य स्तर पर प्रत्येक राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) होता है, जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं। यह राज्य स्तर पर योजनाएँ बनाता है और राहत एवं पुनर्वास कार्यों का संचालन करता है। जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) कार्य करता है, जिसका अध्यक्ष जिला कलेक्टर होता है। यह स्थानीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण संस्था होती है, जो आपदा के समय तत्काल प्रतिक्रिया और राहत कार्यों का संचालन करती है। इसके अतिरिक्त पुलिस, अग्निशमन सेवाएँ, सशस्त्र बल, नागरिक सुरक्षा, स्वास्थ्य विभाग, पंचायती राज संस्थाएँ और शहरी स्थानीय निकाय भी आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गैर-सरकारी संगठन (NGOs), स्वयंसेवी संस्थाएँ और सामुदायिक संगठन भी खोज-बचाव, राहत वितरण और पुनर्वास में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी बड़े स्तर की आपदाओं में सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार भारत का आपदा प्रबंधन ढाँचा बहु-एजेंसी, बहु-स्तरीय और समन्वय पर आधारित है, जो आधुनिक आपदा जोखिम न्यूनीकरण दृष्टिकोण को अपनाता है।

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प्रश्न 4: आपदाओं और विकास के बीच अन्तर्संबंध की विवेचना कीजिए।

आपदाओं और विकास के बीच गहरा और जटिल संबंध होता है। विकास की दिशा और प्रकृति यह निर्धारित करती है कि कोई समाज आपदाओं के प्रति कितना संवेदनशील है। यदि विकास असंतुलित, अनियोजित और पर्यावरण-विरोधी हो, तो वह आपदाओं के खतरे को बढ़ा देता है। उदाहरण के लिए वनों की कटाई से बाढ़ और भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है, नदियों के किनारे अनियंत्रित निर्माण बाढ़ के जोखिम को बढ़ाता है और औद्योगिक विस्तार से रासायनिक व औद्योगिक दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती है। इस प्रकार असतत विकास आपदाओं को जन्म देता है। दूसरी ओर, आपदाएँ विकास की उपलब्धियों को भी नष्ट कर देती हैं। बाढ़, भूकंप और चक्रवात घरों, सड़कों, पुलों, स्कूलों, अस्पतालों और उद्योगों को नष्ट कर देते हैं, जिससे वर्षों की विकास प्रक्रिया कुछ ही क्षणों में समाप्त हो जाती है। गरीबी, बेरोजगारी और पलायन बढ़ जाता है और सरकार को विकास के लिए निर्धारित संसाधनों को राहत एवं पुनर्निर्माण में लगाना पड़ता है। लेकिन यदि विकास सतत और संवेदनशील हो, तो वह आपदा जोखिम को कम भी कर सकता है। बेहतर आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, मजबूत बुनियादी ढाँचा, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ और सामाजिक सुरक्षा आपदाओं के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकती हैं। इसी सोच से अब “आपदा जोखिम न्यूनीकरण” (DRR) और “बिल्ड बैक बेटर” जैसे अवधारणाएँ सामने आई हैं, जिनमें विकास और आपदा प्रबंधन का एकीकरण किया जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि विकास और आपदा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि परस्पर गहराई से जुड़े हुए हैं।

प्रश्न 6: आपदा प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी की भूमिका की विवेचना कीजिए।

आपदा प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी को आज सबसे प्रभावी और अनिवार्य तत्व माना जाता है, क्योंकि किसी भी आपदा का सबसे पहला प्रभाव स्थानीय समुदाय पर ही पड़ता है और वही लोग सबसे पहले प्रतिक्रिया देते हैं। आधुनिक आपदा प्रबंधन दृष्टिकोण यह मानता है कि केवल सरकारी एजेंसियाँ ही नहीं, बल्कि समुदाय स्वयं भी आपदा जोखिम न्यूनीकरण, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्वास में सक्रिय भागीदार होते हैं। निवारण चरण में समुदाय स्थानीय खतरों की पहचान, असुरक्षित क्षेत्रों के चिन्हांकन, पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, जल-स्रोतों की सुरक्षा और सुरक्षित निर्माण पद्धतियों को अपनाकर जोखिम कम कर सकता है। पूर्व तैयारी के चरण में समुदाय के सदस्यों को प्राथमिक उपचार, खोज-बचाव, अग्नि सुरक्षा, सुरक्षित निकासी और आपात संचार का प्रशिक्षण दिया जाता है। ग्राम आपदा प्रबंधन समितियाँ बनाकर मॉक ड्रिल कराई जाती हैं, जिससे आपदा के समय घबराहट कम होती है और समन्वय बना रहता है। प्रतिक्रिया चरण में समुदाय की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि बाहरी सहायता पहुँचने से पहले पड़ोसी ही एक-दूसरे को बचाते हैं, घायलों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाते हैं और अस्थायी आश्रय व भोजन की व्यवस्था करते हैं। पुनर्वास के चरण में समुदाय की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि सहायता वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँचे और पुनर्निर्माण टिकाऊ एवं न्यायपूर्ण हो। सामुदायिक सहभागिता से भ्रष्टाचार, संसाधनों के दुरुपयोग और सामाजिक बहिष्करण को रोका जा सकता है। हालाँकि अशिक्षा, गरीबी, लिंग भेदभाव और प्रशिक्षण की कमी जैसी चुनौतियाँ समुदाय की भूमिका को सीमित करती हैं, फिर भी “समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन” (CBDM) को आज सबसे सफल मॉडल माना जाता है, क्योंकि यह लोगों को पीड़ित नहीं बल्कि सक्षम भागीदार बनाता है।

प्रश्न 7: आपदा प्रबंधन में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका की विवेचना कीजिए।

आपदा प्रबंधन में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि ये संगठन प्रशासन और समुदाय के बीच सेतु का कार्य करते हैं। पूर्व-आपदा चरण में NGOs जनजागरूकता अभियान चलाते हैं, विद्यालयों और ग्रामीण क्षेत्रों में आपदा सुरक्षा का प्रशिक्षण देते हैं, स्वयंसेवकों को प्राथमिक उपचार, खोज-बचाव और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के उपयोग की जानकारी देते हैं तथा ग्राम-स्तरीय आपदा प्रबंधन योजनाएँ बनवाते हैं। आपदा के समय ये संगठन राहत सामग्री—जैसे भोजन, पानी, कपड़े, दवाइयाँ और टेंट—त्वरित रूप से प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाते हैं, विशेषकर उन दूरस्थ और हाशिए पर स्थित क्षेत्रों में जहाँ सरकारी सहायता देर से पहुँचती है। ये संगठन महिलाओं, बच्चों, वृद्धों और दिव्यांगों के लिए विशेष सहायता और सुरक्षा की व्यवस्था भी करते हैं। आपदा के बाद पुनर्वास चरण में NGOs घरों के पुनर्निर्माण, आजीविका पुनर्स्थापना, स्व-सहायता समूहों के गठन, कौशल प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसी सेवाएँ प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, ये संगठन पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी भूमिका निभाते हैं तथा प्रशासन की नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा कर जनहित के मुद्दे उठाते हैं। हालाँकि कभी-कभी NGOs के बीच समन्वय की कमी, संसाधनों की असमान उपलब्धता और दानदाता-निर्भरता जैसी समस्याएँ सामने आती हैं, फिर भी आपदा प्रबंधन में इनकी भूमिका अत्यंत प्रभावी, लचीली और जन-केंद्रित मानी जाती है।

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प्रश्न 8: आपदा प्रबंधन में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) का महत्व स्पष्ट कीजिए।

प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली आपदा प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी साधन है, जिसका उद्देश्य आपदा के आने से पहले लोगों और प्रशासन को सचेत करना होता है ताकि समय रहते जान-माल की हानि को कम किया जा सके। यह प्रणाली मुख्यतः चार घटकों पर आधारित होती है—जोखिम की पहचान, निगरानी एवं पूर्वानुमान, चेतावनी का संचार और समुदाय की प्रतिक्रिया क्षमता। मौसम विज्ञान उपग्रह, रडार, भूकंपीय सेंसर, नदी जलस्तर मापक और समुद्री निगरानी उपकरण चक्रवात, बाढ़, सुनामी, हीटवेव और अन्य खतरोें की भविष्यवाणी करते हैं। चेतावनी को मोबाइल संदेश, रेडियो, टीवी, सायरन, सोशल मीडिया और स्वयंसेवकों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया जाता है। भारत में IMD, CWC और INCOIS जैसी संस्थाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं, जिसके कारण ओडिशा जैसे तटीय राज्यों में चक्रवात से होने वाली मृत्यु दर में भारी कमी आई है। प्रारंभिक चेतावनी से मछुआरे समय पर तट पर लौट आते हैं, किसान अपनी फसल बचा लेते हैं और प्रशासन आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा देता है। हालाँकि “लास्ट-माइल कनेक्टिविटी”, तकनीकी विफलता, चेतावनियों पर विश्वास की कमी और अनपढ़ समुदायों तक सूचना पहुँचाने जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, फिर भी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली आपदा जोखिम न्यूनीकरण की रीढ़ मानी जाती है।

प्रश्न 9: भारत में आपदा प्रतिक्रिया एवं राहत कार्यों की विवेचना कीजिए।

भारत में आपदा प्रतिक्रिया और राहत कार्य मुख्यतः जिला प्रशासन के नेतृत्व में प्रारंभ होते हैं, जहाँ जिला कलेक्टर आपात नियंत्रण कक्ष सक्रिय करता है और खोज-बचाव, निकासी, चिकित्सा सहायता, भोजन, पानी और अस्थायी आश्रयों की व्यवस्था करता है। पुलिस, अग्निशमन सेवा, नागरिक सुरक्षा और स्वास्थ्य विभाग तत्काल सहायता प्रदान करते हैं। राज्य स्तर पर SDMA संसाधनों का समन्वय करता है और आवश्यकता पड़ने पर NDRF की तैनाती की जाती है। NDRF बाढ़, भूकंप, इमारत ढहने, रासायनिक रिसाव और चक्रवात जैसी आपदाओं में विशेष प्रशिक्षण के साथ कार्य करता है। बड़े स्तर की आपदाओं में सशस्त्र बल हवाई, नौसैनिक और इंजीनियरिंग सहायता प्रदान करते हैं। राहत कार्यों में प्रभावित लोगों को भोजन, स्वच्छ पानी, कपड़े, दवाइयाँ, अस्थायी आवास और मुआवज़ा प्रदान किया जाता है। महिलाओं, बच्चों, वृद्धों और दिव्यांगों के लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं। हाल के वर्षों में भारत की प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार हुआ है, लेकिन समन्वय की कमी, दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच की समस्या, संसाधन सीमाएँ और कभी-कभी भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। फिर भी तकनीक, पूर्व तैयारी और प्रशिक्षित बलों के कारण भारत की आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली पहले की तुलना में अधिक सशक्त हुई है।

प्रश्न 10: आपदा लचीलापन (Disaster Resilience) की अवधारणा और उसके महत्व की विवेचना कीजिए।

आपदा लचीलापन वह क्षमता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति, समुदाय, संस्थाएँ और समाज आपदाओं का सामना करते हुए भी अपनी मूल कार्यक्षमता बनाए रखते हैं, शीघ्र पुनर्प्राप्ति करते हैं और भविष्य की आपदाओं के प्रति अधिक सशक्त बनते हैं। लचीलापन केवल आपदा से बचने की क्षमता नहीं है, बल्कि उससे सीखकर अधिक सुरक्षित और मजबूत व्यवस्था बनाने की प्रक्रिया भी है। इसमें भौतिक लचीलापन (मजबूत भवन, सुरक्षित ढाँचा), सामाजिक लचीलापन (शिक्षा, जनजागरूकता, सामाजिक नेटवर्क), आर्थिक लचीलापन (बीमा, विविध आजीविका, बचत), पर्यावरणीय लचीलापन (वन, आर्द्रभूमि, मैंग्रोव) और संस्थागत लचीलापन (प्रभावी शासन, नीतियाँ, प्रशिक्षित बल) शामिल हैं। “बिल्ड बैक बेटर” की अवधारणा इस बात पर ज़ोर देती है कि आपदा के बाद पुनर्निर्माण पुराने कमजोर ढाँचों को दोहराने के बजाय अधिक सुरक्षित बनाया जाए। जलवायु परिवर्तन के दौर में लचीलापन और भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि बाढ़, सूखा, चक्रवात और हीटवेव की तीव्रता बढ़ रही है। भारत में आवास, बीमा, डिजिटल चेतावनी प्रणाली और सामुदायिक प्रशिक्षण के माध्यम से लचीलापन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस प्रकार आपदा लचीलापन सतत विकास और मानव सुरक्षा की आधारशिला है।

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