IGNOU FREE BHIS-183 भारत में शिल्प की परंपराएँ और धारणा Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BHIS-183 In Hindi Solved Guess Paper 2025

प्रश्न 1: भारत में हस्तकला का ऐतिहासिक दृष्टिकोण क्या है?

भारत में हस्तकला का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। पारंपरिक रूप से, हस्तकला केवल उपयोगी वस्तुएँ बनाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह संस्कृति, धर्म और सामाजिक जीवन से जुड़ी थी। प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, अर्थशास्त्र और बौद्ध साहित्य में हस्तकला का उल्लेख मिलता है।

कौशल अक्सर पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों या कारीगर समुदायों में हस्तांतरण होता था। इस प्रकार की कारीगरी से बने श्रेणियाँ (गिल्ड) सामाजिक और आर्थिक संगठन का आधार थीं।
हस्तकला में वस्त्र बुनाई, कढ़ाई, धातु शिल्प, मिट्टी का काम, लकड़ी और पत्थर की नक्काशी शामिल थीं, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती थीं।

विभिन्न ऐतिहासिक कालों में हस्तकला में बदलाव आए। उदाहरण के लिए, मुग़ल काल में धातु और पत्थर में जड़ाई और सूक्ष्म चित्रकला का विकास हुआ। हस्तकला केवल कला का माध्यम नहीं थी, बल्कि आर्थिक महत्व भी रखती थी और इसे स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार किया जाता था।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि हस्तकला अभिव्यक्ति, पहचान और आजीविका का माध्यम रही है। यह नवाचार, क्षेत्रीय विविधता और स्थिरता को दर्शाती है।

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प्रश्न 2: औपनिवेशिक भारत में हस्तकला का संगठन और प्रभाव क्या था?

औपनिवेशिक भारत में हस्तकला पर ब्रिटिश प्रशासन का गहरा प्रभाव पड़ा। ब्रिटिश नीतियों ने पारंपरिक कारीगर उद्योगों को कमजोर कर दिया। हाथ से बने वस्त्र, धातु और मिट्टी के सामान मशीन-निर्मित आयातित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए, जिससे कारीगरों की आजीविका प्रभावित हुई।

हस्तकला उत्पादन को उपनिवेशी बाजार की मांग के अनुसार व्यवस्थित किया गया। ब्रिटिश प्रशासन ने कारीगरों को जाति, क्षेत्र और विशेषज्ञता के आधार पर वर्गीकृत किया। इससे आधुनिक हस्तकला अध्ययन की नींव पड़ी, लेकिन यह हस्तकला के वाणिज्यीकरण और बदलते स्वरूप की ओर भी इशारा करता है।

प्रभाव:

  • आर्थिक गिरावट: कई कारीगरों ने पारंपरिक बाजार खो दिए।

  • नवाचार और अनुकूलन: कुछ कारीगर नई बाजार मांग के अनुसार उत्पादन करने लगे।

  • कौशल संरक्षण: उच्च वर्ग या स्थानीय मांग के कारण कुछ शिल्प जीवित रहे।

औपनिवेशिक शासन ने हस्तकला की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना बदल दी, लेकिन साथ ही आधुनिक हस्तकला उद्यम और संरक्षण की नींव भी रखी।

प्रश्न 3: राष्ट्रीय आंदोलन का भारत में हस्तकला पर क्या प्रभाव पड़ा?

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने हस्तकला को स्वराज और आत्मसंतुष्टि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। महात्मा गांधी ने खादी और हस्थकला को ब्रिटिश वस्त्रों के विरोध का माध्यम बनाया।

हस्तकला राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता का साधन बन गई। खादी और हस्तloom उत्पाद आर्थिक स्वतंत्रता और स्थानीय सशक्तिकरण का प्रतीक बन गए। स्थानीय सहकारी और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया।

राष्ट्रीय आंदोलन ने हस्तकला की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक भूमिका को पुनर्जीवित किया। स्वतंत्रता के बाद हस्तकला नीतियाँ इसी दृष्टिकोण पर आधारित हुईं।

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प्रश्न 4: आधुनिक भारत में हस्तकला नीतियों का विकास

स्वतंत्रता के बाद सरकार ने हस्तकला संरक्षण, कारीगरों की आजीविका और बाजार तक पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए नीतियाँ बनाई। प्रमुख पहल:

  • हस्तकला बोर्ड (1952) की स्थापना।

  • कारीगर सहकारी समितियाँ।

  • कौशल विकास, विपणन और डिज़ाइन नवाचार के लिए योजनाएँ।

मुख्य उद्देश्य:

  • पारंपरिक तकनीकों और सतत प्रथाओं का संरक्षण।

  • घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विपणन।

  • कारीगरों के लिए कौशल विकास और प्रशिक्षण।

  • उद्यमिता और लघु उद्योगों को बढ़ावा।

इन नीतियों ने पारंपरिक हस्तकला को पुनर्जीवित किया और अर्थव्यवस्था में योगदान सुनिश्चित किया।

प्रश्न 5: हस्तकला शिक्षा में पाठ्यक्रम और पद्धति (Pedagogy) का महत्व

हस्तकला शिक्षा में अनुभवात्मक और व्यवहारिक प्रशिक्षण पर जोर दिया जाता है। पारंपरिक ज्ञान परिवार या गिल्ड से हस्तांतरण होता था। आधुनिक शिक्षा में:

  • अनुभवात्मक शिक्षण: वास्तविक उत्पाद निर्माण।

  • समस्या-समाधान दृष्टिकोण: नवाचार और पारंपरिक तकनीकों का मिश्रण।

  • इतिहास और सिद्धांत का अध्ययन: सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ।

  • उद्यमिता कौशल: विपणन, डिज़ाइन और व्यवसाय प्रबंधन।

इस प्रकार की शिक्षा केवल हस्तकला संरक्षण ही नहीं करती बल्कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में जीविका के अवसर भी देती है।

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प्रश्न 6: “Craft Thinking” क्या है और यह समस्याओं को कैसे हल करता है?

“Craft Thinking” में कारीगर रचनात्मकता, कौशल और नवाचार के माध्यम से डिजाइन और उत्पादन की समस्याओं का समाधान करते हैं। यह औद्योगिक प्रक्रियाओं से भिन्न है और लचीलापन, अनुकूलन और समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है।

मुख्य तत्व:

  • अवलोकन: सामग्री, पर्यावरण और ग्राहक आवश्यकताओं को समझना।

  • प्रयोग: नई तकनीक या पारंपरिक विधियों का संयोजन।

  • संशोधन: उत्पाद डिज़ाइन का निरंतर सुधार।

  • सांस्कृतिक संवेदनशीलता: परंपराओं का सम्मान और नवाचार।

यह दृष्टिकोण कारीगरों को बाजार चुनौतियों, सामग्री की कमी और ग्राहक अपेक्षाओं का सामना करने में सक्षम बनाता है।

प्रश्न 7: भारत में हस्तकला पर समकालीन दृष्टिकोण

समकालीन दृष्टिकोण हस्तकला को सांस्कृतिक धरोहर और आर्थिक संसाधन दोनों के रूप में देखता है। मुख्य रुझान:

  • नवाचार: नई सामग्री और डिज़ाइन।

  • उद्यमिता: कुटीर उद्योग और स्टार्टअप।

  • सततता: पर्यावरण-अनुकूल और नैतिक उत्पादन।

  • वैश्वीकरण: हस्तकला का निर्यात और सांस्कृतिक कूटनीति।

इस दृष्टिकोण से पारंपरिक कौशल का संरक्षण और बाजार में प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित होती है।

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प्रश्न 8: हस्तकला में मांग, आपूर्ति और विपणन की भूमिका

मांग, आपूर्ति और विपणन हस्तकला उद्योग के स्थायित्व के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  • मांग: उपभोक्ता रुचि, पर्यटन, वैश्वीकरण।

  • आपूर्ति: कारीगर कौशल, सामग्री उपलब्धता।

  • विपणन: प्रदर्शनी, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ब्रांडिंग और निर्यात।

सफल रणनीति से कारीगरों की आय बढ़ती है, पारंपरिक प्रथाएँ बनी रहती हैं और वैश्विक ग्राहकों से संपर्क स्थापित होता है।

प्रश्न 9: भारत के प्रमुख कारीगरों का जीवन परिचय

उदाहरण: रघुनाथ पटनायक (पत्तचित्र), बी.पी. गोविंदराजन (लकड़ी का काम), फिरोज शाई (वस्त्र)

  • कौशल में महारत।

  • आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को पार करना।

  • पारंपरिक कला को संरक्षित करते हुए नवाचार।

इन कहानियों से प्रेरणा मिलती है और यह दर्शाता है कि हस्तकला व्यवसाय और सांस्कृतिक संपदा दोनों बन सकती है।

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प्रश्न 10: हस्तकला में उद्यमिता और नवाचार की सफलता की कहानियाँ

प्रसिद्ध केस स्टडीज़:

  • मुश्तक खान: पारंपरिक धातु शिल्प के आधुनिक डिज़ाइन।

  • सुनील प्रसाद: हस्तloom वस्त्रों में नवाचार।

ये कहानियाँ दिखाती हैं कि बाजार चुनौतियों का सामना करते हुए नवाचार और तकनीक का सही उपयोग कैसे किया जा सकता है। उद्यमिता से सांस्कृतिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टि से स्थिरता सुनिश्चित होती है।

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