IGNOU FREE BGDG-172 जेंडर संवेदीकरण- संस्कृति, समाज और परिवर्तन Solved Guess Paper 2025
प्रश्न 1: जेंडर की अवधारणा का निर्माण कैसे होता है?
जेंडर की अवधारणा का अर्थ है समाज द्वारा स्त्री और पुरुष के लिए निर्धारित की गई भूमिकाएँ, व्यवहार, सोच और जिम्मेदारियाँ। जेंडर कोई जन्मजात जैविक तथ्य नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक प्रक्रिया के माध्यम से बनता है। जन्म के समय व्यक्ति का “लिंग” (Sex) तय होता है, लेकिन उसका “जेंडर” (Gender) समाज द्वारा गढ़ा जाता है। बचपन से ही बच्चों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाता है। लड़कों को मजबूत, साहसी, आत्मनिर्भर और कमाने वाला बनने की सीख दी जाती है, जबकि लड़कियों को आज्ञाकारी, सहनशील, घरेलू और त्याग करने वाली बनने की शिक्षा दी जाती है। परिवार जेंडर निर्माण की पहली सीढ़ी है, जहाँ खिलौने, कपड़े, काम और व्यवहार के आधार पर जेंडर सिखाया जाता है। स्कूल और शिक्षा व्यवस्था भी लड़के-लड़कियों से अलग अपेक्षाएँ रखती है। समाज, संस्कृति, धर्म और परंपराएँ यह तय करती हैं कि स्त्री और पुरुष का स्थान कहाँ होगा। मीडिया भी जेंडर छवि बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है, जहाँ स्त्रियों को सुंदर, सहनशील और घर तक सीमित दिखाया जाता है, जबकि पुरुषों को शक्तिशाली और निर्णय लेने वाला दिखाया जाता है। इस प्रकार जेंडर एक सामाजिक निर्माण है जिसे बदला भी जा सकता है। यदि समाज की सोच बदले तो जेंडर समानता संभव हो सकती है।
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प्रश्न 2: जेंडर और परिवार के संबंधों की विवेचना कीजिए।
परिवार जेंडर निर्माण और जेंडर भूमिकाओं को सिखाने का सबसे पहला और सबसे प्रभावशाली माध्यम होता है। परिवार में ही बच्चों को यह सिखाया जाता है कि लड़का कैसे व्यवहार करेगा और लड़की कैसे। परिवार में कार्यों का बँटवारा जेंडर असमानता को जन्म देता है। पुरुषों को बाहर का काम, निर्णय लेने की शक्ति और आर्थिक जिम्मेदारी दी जाती है, जबकि महिलाओं को घर का काम, बच्चों की देखभाल और सेवा की भूमिका सौंपी जाती है। बेटी और बेटे के पालन-पोषण में भी स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। बेटे को शिक्षा, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता दी जाती है, जबकि बेटी को सीमाओं में रहने, चुप रहने और समायोजन करने की सीख दी जाती है। विवाह के बाद भी महिला को ससुराल में खुद को साबित करना पड़ता है, जबकि पुरुष को स्वाभाविक अधिकार प्राप्त होता है। कई परिवारों में आज भी बेटियों को बोझ और बेटों को वंश का वाहक माना जाता है। इस प्रकार परिवार जेंडर असमानता को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाता है। यदि परिवार में समानता, सम्मान और बराबरी का व्यवहार किया जाए तो समाज में भी जेंडर समानता संभव हो सकती है।
प्रश्न 3: जेंडर और कार्य का आपसी संबंध स्पष्ट कीजिए।
जेंडर और कार्य का गहरा संबंध है क्योंकि समाज यह तय करता है कि कौन सा कार्य स्त्रियों के लिए है और कौन सा पुरुषों के लिए। परंपरागत रूप से महिलाओं को घरेलू कार्यों जैसे खाना बनाना, सफाई करना और बच्चों की देखभाल तक सीमित रखा गया, जबकि पुरुषों को बाहर कमाने वाला माना गया। महिलाओं द्वारा किया गया घरेलू श्रम आर्थिक रूप से अदृश्य माना जाता है, जबकि पुरुषों का श्रम समाज में मूल्यवान समझा जाता है। आज महिलाएँ शिक्षा, नौकरी और व्यापार में आगे बढ़ रही हैं, फिर भी उन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है – घर और बाहर दोनों की। कार्यस्थलों पर महिलाओं को कम वेतन, लैंगिक उत्पीड़न और पदोन्नति में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पुरुषों पर भी हमेशा कमाने का दबाव होता है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है। इस प्रकार जेंडर आधारित कार्य विभाजन दोनों के लिए असमानता और दबाव पैदा करता है। जेंडर समानता तभी संभव है जब कार्यों का विभाजन योग्यता के आधार पर हो, न कि जेंडर के आधार पर।
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प्रश्न 4: स्वास्थ्य एवं जेंडर के संबंध को समझाइए।
स्वास्थ्य और जेंडर का आपस में गहरा संबंध है क्योंकि समाज स्त्री और पुरुष के स्वास्थ्य को अलग-अलग दृष्टि से देखता है। महिलाओं को अक्सर अपने स्वास्थ्य से अधिक परिवार के स्वास्थ्य की चिंता करने की शिक्षा दी जाती है। गर्भावस्था, प्रसव, कुपोषण, मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएँ महिलाओं के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ी होती हैं, लेकिन इन पर खुलकर बात नहीं की जाती। ग्रामीण और गरीब क्षेत्रों में महिलाओं को पोषण, इलाज और दवाइयों की पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिलती हैं। पुरुषों पर काम का अधिक दबाव होता है, जिससे उन्हें तनाव, हृदय रोग और मानसिक बीमारी का खतरा अधिक रहता है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तो स्वास्थ्य सेवाओं में भयंकर भेदभाव झेलना पड़ता है। इस प्रकार जेंडर असमानता सीधे स्वास्थ्य असमानता को जन्म देती है। समाज में स्वास्थ्य के क्षेत्र में जेंडर संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 5: जेंडर, कानून और समाज के आपसी संबंधों की विवेचना कीजिए।
जेंडर, कानून और समाज का संबंध बहुत गहरा और प्रभावशाली है। समाज में महिलाओं और अन्य जेंडर वर्गों की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों को बनाए रखने के लिए कानून बनाए गए हैं। भारतीय संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है। दहेज निषेध कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम, यौन उत्पीड़न कानून, बाल विवाह निषेध कानून जैसे अनेक कानून महिलाओं के संरक्षण के लिए बनाए गए हैं। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भी अब कानूनी पहचान और अधिकार दिए गए हैं। लेकिन केवल कानून बना देने से समाज नहीं बदलता। समाज की सोच में बदलाव जरूरी है। आज भी कई महिलाएँ कानून के बावजूद हिंसा, शोषण और भेदभाव का शिकार होती हैं। इसलिए कानून और समाज दोनों को साथ मिलकर जेंडर समानता के लिए काम करना होगा।
प्रश्न 6: जेंडर प्रतिनिधित्व एवं मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
मीडिया समाज का दर्पण माना जाता है, लेकिन वास्तव में वह समाज को दिशा देने वाला एक शक्तिशाली माध्यम भी है। जेंडर प्रतिनिधित्व के निर्माण में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि टीवी, फिल्में, विज्ञापन, सोशल मीडिया और समाचार पत्र लोगों की सोच और व्यवहार को सीधे प्रभावित करते हैं। मीडिया में स्त्रियों को प्रायः सुंदर, सहनशील, गृहिणी, त्याग करने वाली और वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जाता है, जबकि पुरुषों को शक्तिशाली, निर्णय लेने वाला, कमाने वाला और प्रभुत्वशाली दिखाया जाता है। इससे समाज में यह धारणा मजबूत होती है कि स्त्री का मुख्य कार्य घर संभालना है और पुरुष का कार्य बाहर कमाना और शासन करना है। विज्ञापनों में भी महिलाओं को सौंदर्य उत्पादों, रसोई और बच्चों की देखभाल से जोड़ा जाता है, जबकि पुरुषों को कार, बैंक, तकनीक और शक्ति से। फिल्मों और धारावाहिकों में महिलाओं को या तो अत्यधिक संस्कारी या अत्यधिक ग्लैमरस दिखाया जाता है, जिससे वास्तविक स्त्री जीवन और संघर्ष छिप जाता है। सोशल मीडिया ने जहाँ एक ओर महिलाओं को अपनी बात रखने का मंच दिया है, वहीं दूसरी ओर वहाँ भी ट्रोलिंग, बॉडी शेमिंग और यौन उत्पीड़न तेजी से बढ़ा है। ट्रांसजेंडर और अन्य जेंडर पहचान को मीडिया या तो मज़ाक के रूप में दिखाता है या पूरी तरह अनदेखा कर देता है। इस तरह मीडिया जेंडर असमानता को मजबूत करता है। हालांकि हाल के वर्षों में कुछ सकारात्मक बदलाव भी आए हैं, जहाँ महिला सशक्तिकरण, जेंडर समानता और ट्रांसजेंडर अधिकारों पर आधारित कार्यक्रम और फिल्में बनी हैं। फिर भी अभी मीडिया को और अधिक जेंडर संवेदनशील बनने की आवश्यकता है ताकि समाज में समानता और सम्मान की भावना विकसित हो सके।
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प्रश्न 7: जेंडर संवेदनशीलता क्या है? इसके महत्व की विवेचना कीजिए।
जेंडर संवेदनशीलता का अर्थ है स्त्री, पुरुष और अन्य जेंडर वर्गों के प्रति समान भाव, समझ और सम्मान रखना तथा उनके अनुभवों, समस्याओं और अधिकारों को सही दृष्टि से समझना। जेंडर संवेदनशील व्यक्ति किसी को भी उसके जेंडर के आधार पर कमजोर, कमतर या श्रेष्ठ नहीं मानता। यह सोच लोगों के व्यवहार, नीति निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल जैसे सभी क्षेत्रों में समानता लाने में मदद करती है। समाज में जेंडर असंवेदनशीलता के कारण महिलाओं को हिंसा, भेदभाव, शोषण और असमान अवसरों का सामना करना पड़ता है। पुरुषों पर भी “मजबूत बनो”, “रोना मना है” जैसी सोच का मानसिक दबाव पड़ता है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तो समाज अक्सर पूरी तरह बहिष्कृत कर देता है। जेंडर संवेदनशीलता इन सब समस्याओं को समझने और उन्हें दूर करने की दिशा में पहला कदम है। स्कूलों में अगर बचपन से ही जेंडर संवेदनशील शिक्षा दी जाए तो बच्चे लड़का-लड़की को समान समझना सीखते हैं। पुलिस, डॉक्टर, शिक्षक, जज जैसे सभी पेशेवरों के लिए जेंडर संवेदनशीलता अनिवार्य है ताकि वे निष्पक्ष निर्णय ले सकें। कार्यस्थल पर जेंडर संवेदनशील वातावरण होने से महिलाओं को सुरक्षित, सम्मानपूर्ण और समान अवसर मिलते हैं। जब समाज जेंडर संवेदनशील बनता है, तब घरेलू हिंसा, बाल विवाह, दहेज प्रथा, यौन उत्पीड़न जैसी कुरीतियाँ कमजोर होती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि जेंडर समानता की नींव जेंडर संवेदनशीलता पर ही टिकी होती है।
प्रश्न 8: जेंडर और संस्कृति के आपसी संबंधों की विवेचना कीजिए।
जेंडर और संस्कृति का आपस में गहरा संबंध है क्योंकि समाज की संस्कृति यह तय करती है कि स्त्री और पुरुष के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। संस्कृति ही यह निर्धारित करती है कि कौन कौन से कार्य, पहनावा, व्यवहार, शिक्षा और जिम्मेदारियाँ किस जेंडर के लिए तय होंगी। भारतीय संस्कृति में परंपरागत रूप से पुरुष को घर का मुखिया और कमाने वाला माना गया है, जबकि महिला को सेवा, त्याग और गृहकार्य से जोड़ दिया गया है। त्योहारों, व्रतों, परंपराओं और सामाजिक रस्मों में भी महिलाओं से अधिक त्याग और अनुशासन की अपेक्षा की जाती है। कई संस्कृतियों में बेटा होना गर्व की बात और बेटी होना बोझ समझा जाता है। यही सांस्कृतिक सोच भ्रूण हत्या, बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियों को जन्म देती है। संस्कृति भाषा के माध्यम से भी जेंडर को मजबूत करती है, जैसे “पराया धन”, “घर की इज्जत”, “मर्द बनो” जैसे शब्द जेंडर भेदभाव को बढ़ाते हैं। हालांकि समय के साथ संस्कृति में परिवर्तन भी हो रहा है। शिक्षा, शहरीकरण और जागरूकता के कारण कई परिवारों में लड़के और लड़कियों को समान अवसर मिलने लगे हैं। इस प्रकार संस्कृति जेंडर को गढ़ती भी है और समय के साथ उसमें बदलाव भी संभव है।
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प्रश्न 9: जेंडर और सामाजिक परिवर्तन के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
जेंडर और सामाजिक परिवर्तन का संबंध द्विपक्षीय है, अर्थात जेंडर में परिवर्तन समाज को बदलता है और सामाजिक परिवर्तन जेंडर संबंधों को प्रभावित करता है। पहले महिलाएँ शिक्षा, रोजगार और राजनीति से वंचित रहती थीं, लेकिन सामाजिक जागरूकता, आंदोलनों और कानूनों के माध्यम से आज महिलाओं की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। लड़कियाँ अब शिक्षा के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, महिलाएँ डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिकारी और नेता बन रही हैं। इससे परिवार और समाज में उनकी भूमिका बदली है। पुरुषों की भूमिका में भी बदलाव आया है, अब वे घरेलू कार्यों में भागीदारी करने लगे हैं। ट्रांसजेंडर समुदाय को भी धीरे-धीरे सामाजिक मान्यता और कानूनी अधिकार मिलने लगे हैं। महिला आंदोलन, श्रमिक आंदोलन, दलित आंदोलन और एलजीबीटीक्यू आंदोलन ने जेंडर समानता को सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है। हालांकि बदलाव की गति धीमी है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में कई कुप्रथाएँ मौजूद हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि जब समाज बदलता है, तब जेंडर संबंध भी बदलते हैं और जब जेंडर में समानता आती है, तब समाज अधिक न्यायपूर्ण और प्रगतिशील बनता है।
प्रश्न 10: जेंडर असमानता के सामाजिक प्रभावों की विवेचना कीजिए।
जेंडर असमानता समाज के हर क्षेत्र को गहराई से प्रभावित करती है। जब किसी समाज में स्त्री, पुरुष और अन्य जेंडर वर्गों को समान अधिकार, अवसर और सम्मान नहीं मिलता, तो उसका सीधा प्रभाव शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। जेंडर असमानता के कारण लड़कियों की शिक्षा बाधित होती है, जिससे पूरा समाज बौद्धिक और आर्थिक रूप से कमजोर हो जाता है। महिलाओं को रोजगार और संपत्ति से वंचित करने से गरीबी बढ़ती है। घरेलू हिंसा, दहेज, यौन उत्पीड़न जैसी समस्याएँ समाज में डर और असुरक्षा का वातावरण बनाती हैं। पुरुषों पर भी हमेशा मजबूत और कमाऊ बनने का दबाव होता है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है। ट्रांसजेंडर और अन्य जेंडर व्यक्ति सामाजिक बहिष्कार, बेरोजगारी और शोषण का शिकार होते हैं। जेंडर असमानता लोकतंत्र को भी कमजोर बनाती है क्योंकि जब आधी आबादी निर्णय प्रक्रिया से बाहर रहती है तो समाज संतुलित विकास नहीं कर पाता। इस प्रकार जेंडर असमानता केवल महिलाओं की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या है। समाज का सच्चा विकास तभी संभव है जब सभी जेंडर को समान अवसर, सुरक्षा और सम्मान मिले।
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