IGNOU Eco-12 Solved assignment in hindi 2025-26 (free)

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  1. वित्तीय विवरण से आप क्या समझते हैं। वित्तीय विवरण को सत्यापित करने में अंकेक्षण आयोजन का क्या महत्व है ? अंकेक्षण कार्यक्रम और अंकेक्षण नोट बुक में क्या अंतर है?

वित्तीय विवरण किसी व्यावसायिक इकाई की आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय स्थिति का औपचारिक रिकॉर्ड होते हैं। ये एक लेखांकन अवधि के अंत में तैयार किए जाते हैं ताकि हितधारकों (मालिकों, निवेशकों, लेनदारों और सरकार) को प्रासंगिक वित्तीय जानकारी दी जा सके।

मुख्य रूप से वित्तीय विवरणों में शामिल हैं:

  1. लाभहानि खाता (Profit & Loss A/c): यह एक निश्चित अवधि के दौरान कंपनी के परिचालन परिणामों (आय और व्यय) को दर्शाता है।
  2. तुलन पत्र (Balance Sheet): यह एक विशिष्ट तिथि पर कंपनी की संपत्ति (Assets), देनदारियों (Liabilities) और शेयरधारक इक्विटी की स्थिति बताता है।
  3. नकद प्रवाह विवरण (Cash Flow Statement): यह व्यावसायिक गतिविधियों में नकदी के आने और जाने के स्रोतों को दर्शाता है।

वित्तीय विवरणों के सत्यापन में अंकेक्षण आयोजन का महत्व

अंकेक्षण आयोजन (Audit Planning) वह प्रक्रिया है जिसमें एक अंकेक्षक (Auditor) यह सुनिश्चित करता है कि अंकेक्षण कार्य कुशलतापूर्वक, प्रभावी ढंग से और समय पर पूरा हो। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है:

  • उचित कार्य विभाजन: आयोजन के माध्यम से अंकेक्षक अपनी टीम के सदस्यों के बीच उनकी क्षमता के अनुसार कार्य बांट सकता है।
  • महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान: यह अंकेक्षक को उन वित्तीय मदों की पहचान करने में मदद करता है जहाँ धोखाधड़ी या गलती (Error) की संभावना अधिक होती है।
  • समय की बचत: एक नियोजित अंकेक्षण कार्य बिना किसी अनावश्यक देरी के संपन्न होता है।
  • साक्ष्य जुटाना: यह सुनिश्चित करता है कि वित्तीय विवरणों को सत्यापित करने के लिए पर्याप्त और उचित ‘अंकेक्षण साक्ष्य’ (Audit Evidence) एकत्र किए गए हैं।
  • जोखिम मूल्यांकन: अंकेक्षक पहले ही समझ पाता है कि संस्थान का आंतरिक नियंत्रण (Internal Control) कितना मजबूत है।

अंकेक्षण कार्यक्रम और अंकेक्षण नोट बुक में अंतर

अंकेक्षण की प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए दो प्रमुख दस्तावेजों का उपयोग किया जाता है। इनके बीच का मुख्य अंतर नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:

आधार अंकेक्षण कार्यक्रम (Audit Programme) अंकेक्षण नोट बुक (Audit Note Book)
परिभाषा यह अंकेक्षण कार्य को करने की एक विस्तृत योजना या रूपरेखा है। यह एक डायरी या रजिस्टर है जिसमें अंकेक्षण के दौरान मिली कठिनाइयों और महत्वपूर्ण बिंदुओं को दर्ज किया जाता है।
प्रकृति यह ‘भविष्योन्मुखी’ (Forward-looking) होता है, यानी क्या करना है। यह ‘रिकॉर्डिंग’ (Recording) प्रकृति का होता है, यानी क्या पाया गया।
सामग्री इसमें कार्य की सूची, समय सीमा और उत्तरदायी कर्मचारी का नाम होता है। इसमें स्पष्टीकरण मांगने वाले बिंदु, अधूरी प्रविष्टियां और महत्वपूर्ण पूछताछ दर्ज होती हैं।
उद्देश्य कार्य का व्यवस्थित संचालन और नियंत्रण करना। भविष्य में संदर्भ के लिए और न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने हेतु।
परिवर्तन इसे स्थिति के अनुसार बदला जा सकता है। इसमें केवल वास्तविक निष्कर्ष दर्ज किए जाते हैं, यह बदला नहीं जाता।
  1. वाउचर क्या होता है ? इसका वर्गीकरण किस प्रकार करेंगे? एक वाउचर की जाँच करते समय अंकेक्षक को कौन सी विशेष बातें ध्यान में रखनी चाहिये ?

वाउचर (Voucher) क्या होता है?

लेखांकन में, वाउचर वह दस्तावेजी साक्ष्य (Documentary Evidence) है जो किसी व्यापारिक लेनदेन की सत्यता की पुष्टि करता है। सरल शब्दों में, यह एक ऐसा कागज है जो बताता है कि कोई लेन-देन वास्तव में हुआ है, उसकी राशि कितनी है और वह किस उद्देश्य के लिए था। अंकेक्षण की भाषा में इसे प्रमाणन की आत्मा कहा जाता है।

वाउचर का वर्गीकरण (Classification of Vouchers)

वाउचरों को उनकी प्रकृति और स्रोत के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  1. प्राथमिक वाउचर (Primary Vouchers): ये वे मूल दस्तावेज होते हैं जो लेनदेन के समय प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए:
  • नकद रसीदें।
  • खरीद बीजक (Invoices)।
  • बैंक स्टेटमेंट।
  1. गौण वाउचर (Collateral Vouchers): जब मूल वाउचर खो जाता है या उपलब्ध नहीं होता, तो उसकी पुष्टि के लिए जो अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं, उन्हें गौण वाउचर कहते हैं। उदाहरण के लिए:
  • मूल रसीद खोने पर उसकी फोटोकॉपी।
  • किसी अनुबंध (Contract) की प्रति।

वाउचर की जाँच करते समय अंकेक्षक के लिए विशेष ध्यान देने योग्य बातें

वाउचिंग (Vouching) करते समय एक अंकेक्षक को ‘जासूस’ नहीं, बल्कि ‘सतर्क प्रहरी’ की तरह व्यवहार करना चाहिए। उसे निम्नलिखित बिंदुओं की जांच करनी चाहिए:

  1. संस्थान का नाम: वाउचर उसी कंपनी या व्यक्ति के नाम पर होना चाहिए जिसका अंकेक्षण किया जा रहा है।
  2. तारीख की जाँच: वाउचर की तारीख उसी वित्तीय वर्ष की होनी चाहिए जिसका ऑडिट हो रहा है।
  3. उचित प्राधिकार (Authorization): क्या वाउचर पर किसी जिम्मेदार अधिकारी के हस्ताक्षर हैं? बिना मंजूरी के किया गया खर्च संदिग्ध हो सकता है।
  4. राशि का मिलान: वाउचर पर लिखी राशि (शब्दों और अंकों में) लेखा पुस्तकों (Ledgers) में दर्ज राशि से मेल खानी चाहिए।
  5. व्यावसायिक उद्देश्य: अंकेक्षक को यह देखना चाहिए कि खर्च निजी न होकर केवल व्यवसाय के उद्देश्य से किया गया हो।
  6. राजस्व बनाम पूंजीगत व्यय: यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पूंजीगत व्यय (जैसे मशीनरी की खरीद) को गलती से राजस्व व्यय (जैसे मरम्मत) न मान लिया गया हो।
  7. रद्द करना (Cancellation): जाँच के बाद वाउचर पर “Checked” या “Audited” की मुहर लगा देनी चाहिए ताकि उसी वाउचर का उपयोग दोबारा किसी अन्य फर्जी प्रविष्टि के लिए न किया जा सके।
  8. राजस्व टिकट (Revenue Stamp): यदि भुगतान एक निश्चित सीमा (जैसे ₹5000 से अधिक) से ज्यादा है, तो क्या उस पर कानूनी रूप से आवश्यक राजस्व टिकट लगा है?

निष्कर्ष

अंकेक्षण प्रक्रिया में वित्तीय विवरणों की सत्यता केवल तभी सिद्ध हो सकती है जब ‘अंकेक्षण कार्यक्रम’ सुदृढ़ हो और ‘वाउचिंग’ की प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्मता से की गई हो। वाउचर ही वह नींव है जिस पर अंकेक्षक अपनी रिपोर्ट (Audit Report) तैयार करता है।

 

  1. प्रबंध अंकेक्षण से आप क्या समझते हैं? प्रबंध को यह अपने कार्यो में सुधार लेन में किस प्रकार से सहायता करता है ? इसकी प्रमुख विशेषताएं भी बताइए

प्रबंध अंकेक्षण (Management Audit) एक आधुनिक अवधारणा है जो केवल वित्तीय खातों की शुद्धता की जाँच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रबंधन की कार्यकुशलता और प्रभावशीलता का मूल्यांकन करती है।

प्रबंध अंकेक्षण से आप क्या समझते हैं?

सरल शब्दों में, प्रबंध अंकेक्षण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी संस्था के प्रबंधकीय कार्यों, नीतियों, निर्णयों और नियंत्रण प्रणालियों की आलोचनात्मक जाँच की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि क्या प्रबंधन अपने संसाधनों (मानव, मशीन, धन और सामग्री) का उपयोग संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कुशलतापूर्वक कर रहा है।

प्रबंध अंकेक्षण वित्तीय अंकेक्षण से भिन्न होता है क्योंकि जहाँ वित्तीय अंकेक्षण ‘क्या हुआ’ (भूतकाल) पर ध्यान देता है, वहीं प्रबंध अंकेक्षण ‘आगे क्या और कैसे बेहतर हो सकता है’ (भविष्य) पर केंद्रित होता है।

प्रबंध को कार्यों में सुधार लाने में सहायता

प्रबंध अंकेक्षण प्रबंधन के लिए एक ‘निदान’ (Diagnostic) टूल की तरह कार्य करता है। यह निम्नलिखित प्रकार से सुधार लाने में सहायता करता है:

  1. कार्यकुशलता में वृद्धि (Improving Efficiency): अंकेक्षक विभिन्न विभागों की कार्यप्रणाली की तुलना मानकों से करता है। जहाँ भी संसाधनों की बर्बादी या समय की हानि हो रही होती है, उसे पहचानकर सुधार के सुझाव दिए जाते हैं।
  2. नीतियों का पुनर्मूल्यांकन (Evaluation of Policies): कई बार संस्था की पुरानी नीतियां वर्तमान बाजार के अनुसार अनुपयुक्त हो जाती हैं। प्रबंध अंकेक्षण इन नीतियों की कमियों को उजागर करता है।
  3. निर्णय प्रक्रिया में सुधार (Better Decision Making): यह प्रबंधन को यह बताता है कि पिछले निर्णयों का परिणाम क्या रहा, जिससे भविष्य में अधिक सटीक निर्णय लिए जा सकें।
  4. उत्तरदायित्व का निर्धारण (Fixing Responsibility): यह स्पष्ट करता है कि किस स्तर पर प्रबंधकीय विफलता हुई है, जिससे जवाबदेही तय करना आसान हो जाता है।
  5. संप्रेषण में सुधार (Improving Communication): प्रबंध अंकेक्षण के दौरान सूचनाओं के प्रवाह की जाँच होती है, जिससे विभिन्न स्तरों के बीच संवाद की बाधाएं दूर होती हैं।

प्रबंध अंकेक्षण की प्रमुख विशेषताएं

प्रबंध अंकेक्षण की प्रकृति को निम्नलिखित विशेषताओं से समझा जा सकता है:

  • व्यापक कार्यक्षेत्र (Comprehensive Scope): यह केवल खातों की जाँच नहीं करता, बल्कि विपणन, उत्पादन, मानव संसाधन और वित्त जैसे सभी विभागों की जाँच करता है।
  • भविष्योन्मुखी (Forward-Looking): इसका मुख्य जोर भविष्य के सुधारों पर होता है। यह गलतियों को ढूँढने के बजाय सुधार के अवसर तलाशता है।
  • स्वैच्छिक प्रकृति (Voluntary Nature): सामान्यतः प्रबंध अंकेक्षण कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है (जब तक कि सरकार विशेष निर्देश न दे)। इसे संस्था अपनी इच्छा से सुधार के लिए कराती है।
  • बहुविषयक दृष्टिकोण (Multi-disciplinary Approach): एक प्रबंध अंकेक्षक को केवल लेखांकन का ही नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र, प्रबंधन सिद्धांतों और सांख्यिकी का भी ज्ञान होना चाहिए।
  • आलोचनात्मक और रचनात्मक (Critical and Constructive): यह प्रबंधन की आलोचना तो करता है, लेकिन साथ ही समाधान और रचनात्मक सुझाव भी देता है।
  1. फर्म के अंकेक्षण और सीमित कंपनी के अंकेक्षण में अंतर बताइए। किसी कंपनी के अंकेक्षण का प्रारंभ करने के पहले जो प्रारंभिक तैयारियां करनी होती है उनके संबंध में विवेचन कीजिए।

अंकेक्षण का स्वरूप संस्था के कानूनी ढांचे पर निर्भर करता है। साझेदारी फर्म (Partnership Firm) और सीमित कंपनी (Limited Company) के अंकेक्षण में महत्वपूर्ण अंतर होते हैं।

फर्म और सीमित कंपनी के अंकेक्षण में अंतर

अंतर का आधार साझेदारी फर्म का अंकेक्षण सीमित कंपनी का अंकेक्षण
वैधानिक अनिवार्यता यह कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। साझेदारों की इच्छा पर निर्भर है। कंपनी अधिनियम के तहत यह पूर्णतः अनिवार्य है।
कार्यक्षेत्र (Scope) अंकेक्षण का कार्यक्षेत्र साझेदारों और अंकेक्षक के बीच समझौते से तय होता है। इसका कार्यक्षेत्र कंपनी अधिनियम द्वारा निर्धारित होता है, जिसे समझौते से कम नहीं किया जा सकता।
नियुक्ति अंकेक्षक की नियुक्ति साझेदारों के आपसी सहमति से होती है। नियुक्ति अंशधारियों द्वारा वार्षिक साधारण सभा (AGM) में की जाती है।
रिपोर्टिंग अंकेक्षक अपनी रिपोर्ट साझेदारों को सौंपता है। रिपोर्ट अंशधारियों (Shareholders) को दी जाती है और इसे ROC को भेजना होता है।
हटाना साझेदार अपनी इच्छानुसार अंकेक्षक को हटा सकते हैं। अंकेक्षक को हटाने की एक कठिन कानूनी प्रक्रिया है जिसमें विशेष प्रस्ताव की आवश्यकता होती है।

कंपनी अंकेक्षण प्रारंभ करने के पूर्व प्रारंभिक तैयारियाँ

किसी भी कंपनी का अंकेक्षण शुरू करने से पहले एक अंकेक्षक को ठोस आधार तैयार करना होता है ताकि कार्य सुचारू रूप से चले। इन तैयारियों को दो भागों में बांटा जा सकता है:

(A) नियुक्ति संबंधी वैधानिक कार्यवाही

  1. नियुक्ति की जाँच: अंकेक्षक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी नियुक्ति कंपनी अधिनियम की धाराओं के अनुसार हुई है।
  2. सहमति पत्र: अंकेक्षक को अपनी नियुक्ति स्वीकार करने का लिखित पत्र कंपनी को देना चाहिए।
  3. निवर्तमान अंकेक्षक से संपर्क: यदि वह किसी पुराने अंकेक्षक की जगह आया है, तो उसे उस अंकेक्षक से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त करना चाहिए।

(B) संस्था के संबंध में जानकारी प्राप्त करना

  1. महत्वपूर्ण दस्तावेजों का अध्ययन: अंकेक्षक को कंपनी के पार्षद सीमा नियम (MOA) और पार्षद अंतर्नियम (AOA) का अध्ययन करना चाहिए ताकि कंपनी के उद्देश्यों और आंतरिक नियमों को समझ सके।
  2. व्यवसाय की प्रकृति: कंपनी किस प्रकार का व्यापार करती है, इसकी जानकारी प्राप्त करना।
  3. आंतरिक नियंत्रण प्रणाली (Internal Control System): अंकेक्षण शुरू करने से पहले यह देखना जरूरी है कि कंपनी की अपनी आंतरिक जाँच प्रणाली कितनी मजबूत है। यदि आंतरिक नियंत्रण मजबूत है, तो अंकेक्षक ‘परीक्षण जाँच’ (Test Check) कर सकता है।
  4. अधिकारियों की सूची: उन अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची और उनके हस्ताक्षर प्राप्त करना जिनसे उसे सूचनाएं लेनी होंगी।
  5. पिछले वर्ष के खाते: पिछले वर्ष की अंकेक्षित बैलेंस शीट और अंकेक्षक की रिपोर्ट का अध्ययन करना ताकि पुराने ‘क्वालिफिकेशन’ (कमियों) को देखा जा सके।

(C) अंकेक्षण कार्यक्रम (Audit Program) तैयार करना

उपरोक्त जानकारियों के आधार पर अंकेक्षक एक लिखित रूपरेखा तैयार करता है जिसे ‘अंकेक्षण कार्यक्रम’ कहते हैं। इसमें यह तय किया जाता है कि:

  • कौन सा कार्य कौन सा कर्मचारी (Audit Clerk) करेगा?
  • कार्य पूरा करने की समय सीमा क्या होगी?
  • किन क्षेत्रों में गहन जाँच (Vouching) की आवश्यकता है?

निष्कर्ष: प्रबंध अंकेक्षण जहाँ संस्थान की आंतरिक कार्यक्षमता को निखारने का एक ‘प्रबंधकीय हथियार’ है, वहीं कंपनी अंकेक्षण कानून की अनुपालना और अंशधारियों के हितों की रक्षा करने वाली एक ‘वैधानिक जिम्मेदारी’ है। एक सफल अंकेक्षण के लिए विस्तृत योजना और प्रारंभिक तैयारी अनिवार्य है।

  1. निम्नलिखित पर संक्षिप्त में टिप्पणीयां लिखिए :

() सम्भाव्य देयताओं का प्रमाणन

सम्भाव्य देयताएं वे देयताएं होती हैं जो भविष्य की किसी अनिश्चित घटना के घटित होने या न होने पर निर्भर करती हैं। ये वर्तमान में वास्तविक देयताएं नहीं हैं, लेकिन भविष्य में बन सकती हैं। अंकेक्षक (Auditor) के लिए इनका प्रमाणन करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि ये लेखा पुस्तकों में सीधे तौर पर दर्ज नहीं होती हैं।

प्रमाणन की प्रक्रिया:

  1. विवरण प्राप्त करना: अंकेक्षक को प्रबंधन से उन सभी स्थितियों की सूची प्राप्त करनी चाहिए जो भविष्य में दायित्व बन सकती हैं।
  2. न्यायालय के मामले: यदि कंपनी पर कोई कानूनी मुकदमा चल रहा है, तो अंकेक्षक को कंपनी के वकील से पत्राचार करना चाहिए ताकि संभावित हार और हर्जाने की राशि का अनुमान लगाया जा सके।
  3. गारंटी की जाँच: यदि कंपनी ने किसी तीसरे पक्ष के ऋण के लिए गारंटी दी है, तो अंकेक्षक को गारंटी अनुबंधों की जाँच करनी चाहिए।
  4. भुनाए गए बिल: बैंक से भुनाए गए बिल (Bills Discounted) जो अभी परिपक्व (Mature) नहीं हुए हैं, उन्हें सम्भाव्य देयता माना जाता है। इनकी पुष्टि बैंक विवरण से की जानी चाहिए।
  5. लाभांश का बकाया: संचयी अधिमान अंशों (Cumulative Preference Shares) पर बकाया लाभांश की जाँच करनी चाहिए।

महत्व: यदि सम्भाव्य देयताओं को स्पष्ट रूप से ‘तुलन-पत्र’ (Balance Sheet) के नीचे फुटनोट के रूप में नहीं दिखाया जाता, तो वित्तीय विवरण “सत्य एवं उचित” (True and Fair) दृश्य प्रस्तुत नहीं करेंगे।

() देयताओं का सत्यापन

देयताओं के सत्यापन का अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि संस्था के तुलन-पत्र में दिखाई गई सभी देयताएं वास्तव में अस्तित्व में हैं, संस्था से संबंधित हैं और उनका मूल्यांकन सही ढंग से किया गया है।

सत्यापन के मुख्य उद्देश्य:

  • यह जाँचना कि सभी ज्ञात देयताएं शामिल कर ली गई हैं।
  • यह सुनिश्चित करना कि कोई भी काल्पनिक देयता शामिल नहीं है।
  • यह देखना कि देयताओं का वर्गीकरण (Classification) सही है।

सत्यापन की विधि:

  1. लेनदार (Creditors): लेनदारों के खातों की जाँच उनके विवरणों (Statements) से करनी चाहिए। यदि आवश्यक हो, तो अंकेक्षक को सीधे लेनदारों से पुष्टि (Confirmation) पत्र मांगना चाहिए।
  2. ऋण (Loans): बैंक या वित्तीय संस्थानों से लिए गए ऋण के लिए ऋण अनुबंध (Loan Agreements) और ब्याज के भुगतान की रसीदों की जाँच करनी चाहिए।
  3. अदत्त व्यय (Outstanding Expenses): वेतन, किराया, बिजली बिल आदि जैसे व्यय जो देय हो चुके हैं पर भुगतान नहीं हुए, उनका सत्यापन पिछले महीनों के रिकॉर्ड से करना चाहिए।
  4. प्रमाणपत्र: अंकेक्षक को प्रबंधन से एक प्रमाण-पत्र लेना चाहिए कि सभी देयताओं को पुस्तकों में ले लिया गया है।

() अच्छी रिपोर्ट के गुण

एक अंकेक्षण रिपोर्ट वह औपचारिक दस्तावेज है जिसके माध्यम से अंकेक्षक अपनी जाँच के निष्कर्षों को शेयरधारकों और अन्य हितधारकों को बताता है। एक प्रभावी रिपोर्ट में निम्नलिखित गुण होने चाहिए:

  1. स्पष्टता (Clarity): रिपोर्ट की भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए। इसमें अस्पष्ट या द्विअर्थी शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए ताकि पाठक भ्रमित न हों।
  2. तथ्यात्मकता (Objectivity): रिपोर्ट पूर्णतः तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए। अंकेक्षक को व्यक्तिगत धारणाओं के बजाय प्रमाणों को महत्व देना चाहिए।
  3. संक्षिप्तता (Brevity): अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए। रिपोर्ट को मुद्दे पर केंद्रित होना चाहिए, लेकिन महत्वपूर्ण सूचनाएं नहीं छूटनी चाहिए।
  4. सत्य और उचित (True and Fair): रिपोर्ट को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि वित्तीय विवरण संस्था की आर्थिक स्थिति का सत्य और उचित चित्र प्रस्तुत करते हैं या नहीं।
  5. नियमों का अनुपालन: रिपोर्ट को कंपनी अधिनियम और अंकेक्षण मानकों (Auditing Standards) के अनुसार निर्धारित प्रारूप में होना चाहिए।
  6. सुझाव और कमियाँ: यदि अंकेक्षक को कोई गबन या त्रुटि मिलती है, तो उसे स्पष्ट रूप से रिपोर्ट में उल्लिखित करना चाहिए।

(घ) शेयर हस्तांतरण का अंकेक्षण

जब कोई शेयरधारक अपने शेयर किसी अन्य व्यक्ति को बेचता या हस्तांतरित करता है, तो कंपनी को अपने ‘सदस्य रजिस्टर’ में बदलाव करना होता है। इस प्रक्रिया की जाँच को शेयर हस्तांतरण का अंकेक्षण कहते हैं।

अंकेक्षण के मुख्य चरण:

  1. हस्तांतरण विलेख की जाँच (Check Transfer Deed): अंकेक्षक को हस्तांतरण विलेख की जाँच करनी चाहिए कि वह सही ढंग से भरा गया है, उस पर हस्तांतरणकर्ता और हस्तांतरिती के हस्ताक्षर हैं और उचित स्टाम्प ड्यूटी दी गई है।
  2. बोर्ड का प्रस्ताव: शेयरों का हस्तांतरण केवल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मंजूरी के बाद ही हो सकता है। अंकेक्षक को ‘मिनट बुक’ में इस प्रस्ताव की जाँच करनी चाहिए।
  3. पुराने प्रमाणपत्रों की रद्दगी: अंकेक्षक को यह देखना चाहिए कि पुराने शेयर सर्टिफिकेट रद्द कर दिए गए हैं और उनके स्थान पर नए सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं।
  4. अंश रजिस्टर में प्रविष्टि: यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नए शेयरधारक का नाम सदस्य रजिस्टर में दर्ज कर लिया गया है और पुराने का नाम हटा दिया गया है।
  5. सूचना की जाँच: कंपनी द्वारा हस्तांतरण की सूचना हस्तांतरणकर्ता को दी गई है या नहीं, इसकी जाँच करना ताकि किसी धोखाधड़ी से बचा जा सके।

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