IGNOU FREE BPYG-171 अनुप्रयुक्त नीतिशास्त्र Solved Guess Paper 2025
प्रश्न 1: अनुप्रयुक्त नैतिकता (Applied Ethics) का अर्थ, स्वरूप और क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
अनुप्रयुक्त नैतिकता नैतिक दर्शन की वह शाखा है, जो नैतिक सिद्धांतों को वास्तविक जीवन की व्यावहारिक समस्याओं पर लागू करती है। जहाँ परंपरागत नैतिक दर्शन अच्छे और बुरे, कर्तव्य, सद्गुण और नैतिक नियमों पर सैद्धांतिक चर्चा करता है, वहीं अनुप्रयुक्त नैतिकता यह जांचती है कि इन सिद्धांतों का प्रयोग चिकित्सा, व्यापार, पर्यावरण, राजनीति, मीडिया, विज्ञान और पेशेवर जीवन की ठोस परिस्थितियों में कैसे किया जाए। इसका मुख्य उद्देश्य वास्तविक जीवन में उत्पन्न नैतिक दुविधाओं का समाधान करना है, जैसे—क्या गर्भपात नैतिक रूप से उचित है, मृत्यु-दया (युथेनेशिया) सही है या नहीं, व्यापार में अधिक लाभ के लिए श्रमिकों का शोषण कितना उचित है, या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाकर विकास करना नैतिक है या नहीं। अनुप्रयुक्त नैतिकता का स्वरूप व्यावहारिक, समस्याकेंद्रित और अंतर्विषयक है। यह केवल दर्शन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि चिकित्सा, कानून, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति और विज्ञान जैसे क्षेत्रों से भी जुड़ी होती है। इसका स्वरूप मानकात्मक है, क्योंकि यह यह निर्धारित करती है कि किसी परिस्थिति में क्या नैतिक रूप से सही है और क्या गलत। इसका स्वरूप गतिशील भी है, क्योंकि जैसे-जैसे समाज और तकनीक में परिवर्तन आता है, नैतिक समस्याएँ भी बदलती जाती हैं। उदाहरण के लिए आज जैव-प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर अपराध, डेटा गोपनीयता और जलवायु परिवर्तन नई नैतिक चुनौतियाँ बन चुके हैं। अनुप्रयुक्त नैतिकता का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें जैव-नैतिकता (चिकित्सा और स्वास्थ्य से जुड़े प्रश्न), व्यापार नैतिकता, पर्यावरणीय नैतिकता, मीडिया नैतिकता, राजनीतिक नैतिकता, लैंगिक न्याय और पेशेवर नैतिकता जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं। इस प्रकार अनुप्रयुक्त नैतिकता मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र में नैतिक दिशा प्रदान करती है और यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय केवल लाभ और शक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि मानव गरिमा, न्याय और सामाजिक हित के आधार पर लिए जाएँ।
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प्रश्न 2: नैतिक दर्शन (Moral Philosophy) और अनुप्रयुक्त नैतिकता (Applied Ethics) के बीच संबंध की विवेचना कीजिए।
नैतिक दर्शन और अनुप्रयुक्त नैतिकता के बीच अत्यंत घनिष्ठ और पूरक संबंध है। नैतिक दर्शन नैतिकता के सैद्धांतिक पक्ष से संबंधित है, जिसमें यह प्रश्न उठाए जाते हैं कि नैतिकता का आधार क्या है, अच्छा और बुरा क्या है, कर्तव्य क्या है, सद्गुण क्या है और नैतिक निर्णय का मापदंड क्या होना चाहिए। इसके विपरीत, अनुप्रयुक्त नैतिकता इन सैद्धांतिक सिद्धांतों को व्यावहारिक जीवन की समस्याओं पर लागू करती है। दूसरे शब्दों में, नैतिक दर्शन सिद्धांत प्रस्तुत करता है और अनुप्रयुक्त नैतिकता उन सिद्धांतों को व्यवहार में उतारती है। उदाहरण के लिए उपयोगितावाद (Utilitarianism) सबसे अधिक लोगों के अधिकतम सुख को नैतिकता का आधार मानता है, कर्तव्यवाद (Deontology) कर्तव्य और नियमों को प्रधानता देता है, जबकि सद्गुण नैतिकता (Virtue Ethics) व्यक्ति के चरित्र को नैतिकता का केंद्र मानती है। इन तीनों सिद्धांतों का उपयोग अनुप्रयुक्त नैतिकता में गर्भपात, मृत्युदंड, व्यापारिक नीतियों और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर विचार करने के लिए किया जाता है। नैतिक दर्शन सार्वभौमिक सिद्धांतों की खोज करता है, जबकि अनुप्रयुक्त नैतिकता सांस्कृतिक, सामाजिक, कानूनी और व्यावहारिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखती है। इसका संबंध केवल एकतरफा नहीं है, बल्कि द्विदिशात्मक है। आधुनिक तकनीकी और सामाजिक समस्याएँ, जैसे क्लोनिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर नैतिकता, नैतिक दर्शन के सामने नए प्रश्न खड़े करती हैं, जिससे नैतिक दर्शन भी विकसित होता है। इस प्रकार नैतिक दर्शन अनुप्रयुक्त नैतिकता को आधार देता है और अनुप्रयुक्त नैतिकता नैतिक दर्शन को नई दिशा प्रदान करती है। दोनों के बिना नैतिक चिंतन अधूरा है।
प्रश्न 3: समकालीन प्रमुख नैतिक वाद-विवादों (Ethical Debates) की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
आधुनिक समाज में वैज्ञानिक, तकनीकी, सामाजिक और राजनीतिक बदलावों के कारण अनेक नए नैतिक वाद-विवाद सामने आए हैं। सबसे प्रमुख नैतिक विवाद गर्भपात से संबंधित है। एक ओर महिला के शरीर पर उसके अधिकार की बात की जाती है, तो दूसरी ओर भ्रूण के जीवन के अधिकार की। इसी प्रकार युथेनेशिया या मृत्यु-दया का प्रश्न भी गंभीर नैतिक बहस का विषय है। समर्थक इसे गरिमामय मृत्यु का अधिकार मानते हैं, जबकि विरोधी इसे जीवन की पवित्रता के विरुद्ध मानते हैं। मृत्युदंड भी एक बड़ा नैतिक विवाद है। कुछ लोग इसे जघन्य अपराधों के लिए उचित दंड मानते हैं, जबकि अन्य इसे अमानवीय और मानवाधिकारों के विरुद्ध मानते हैं। जैव-प्रौद्योगिकी, आनुवंशिक इंजीनियरिंग और क्लोनिंग से जुड़े प्रश्न भी गंभीर नैतिक चिंता का विषय हैं, क्योंकि ये मानव स्वभाव से छेड़छाड़ और “डिज़ाइनर बेबी” जैसे खतरों को जन्म देते हैं। पर्यावरणीय नैतिकता में यह प्रश्न प्रमुख है कि क्या मनुष्य को प्रकृति के असीमित दोहन का अधिकार है या उसे भावी पीढ़ियों के लिए सीमित और जिम्मेदार उपयोग करना चाहिए। व्यापारिक नैतिकता में श्रमिक शोषण, उपभोक्ता धोखाधड़ी, पर्यावरण प्रदूषण और लाभ बनाम सामाजिक दायित्व जैसे मुद्दे उभरते हैं। इसके अतिरिक्त लैंगिक समानता, LGBTQ+ अधिकार, डेटा गोपनीयता और मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी आज के प्रमुख नैतिक वाद-विवाद हैं। ये सभी विवाद यह दिखाते हैं कि आधुनिक समाज में नैतिक प्रश्न सरल नहीं हैं, बल्कि बहु-आयामी हैं, जिनके समाधान के लिए गहन तार्किक, भावनात्मक और सामाजिक समझ की आवश्यकता है।
प्रश्न 4: पेशेवर नैतिकता (Professional Ethics) की अवधारणा, स्वरूप और महत्व की विवेचना कीजिए।
पेशेवर नैतिकता से तात्पर्य उन नैतिक मूल्यों, मानकों और नियमों से है, जो विभिन्न पेशों से जुड़े व्यक्तियों के आचरण को निर्देशित करते हैं। प्रत्येक पेशा—जैसे चिकित्सा, शिक्षा, कानून, प्रशासन, पत्रकारिता, इंजीनियरिंग और व्यापार—अपनी विशिष्ट जिम्मेदारियों के कारण विशेष नैतिक अपेक्षाएँ रखता है। पेशेवर नैतिकता का आधार यह धारणा है कि पेशेवर व्यक्ति के पास विशेष ज्ञान और शक्ति होती है, जिसका दुरुपयोग समाज को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। पेशेवर नैतिकता का स्वरूप मानकात्मक, संस्थागत और व्यावहारिक होता है। यह मानकात्मक इसलिए है क्योंकि यह यह निर्धारित करती है कि पेशेवर को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह संस्थागत इसलिए है क्योंकि इसे अक्सर पेशेवर संगठनों द्वारा बनाए गए आचार-संहिताओं में व्यक्त किया जाता है। इसका महत्व अत्यंत व्यापक है। यह समाज में विश्वास की स्थापना करती है, क्योंकि लोग डॉक्टर, शिक्षक, वकील और प्रशासक पर इसलिए भरोसा करते हैं कि वे नैतिक रूप से ईमानदार होंगे। यह ग्राहकों और नागरिकों को शोषण, अन्याय और हानि से बचाती है। यह पेशेवर गुणवत्ता और जिम्मेदारी को बढ़ाती है और नैतिक दुविधाओं में सही निर्णय लेने में सहायता करती है। इस प्रकार पेशेवर नैतिकता किसी भी सभ्य और न्यायपूर्ण समाज की आधारशिला है।
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प्रश्न 5: पेशेवर जीवन में नैतिक समस्याएँ एवं नैतिक दायित्वों की विवेचना कीजिए।
पेशेवर जीवन में व्यक्ति को कई प्रकार की नैतिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सबसे आम समस्या हितों का टकराव (Conflict of Interest) है, जहाँ व्यक्ति का निजी लाभ उसके पेशेवर कर्तव्य में बाधा बनता है। गोपनीयता का उल्लंघन, रिश्वत, भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग और पक्षपात भी गंभीर नैतिक समस्याएँ हैं। चिकित्सकों में लापरवाही, पत्रकारों में फर्जी समाचार, शिक्षकों में भेदभाव और व्यापार में उपभोक्ता धोखाधड़ी पेशेवर नैतिकता के उल्लंघन के उदाहरण हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए पेशेवरों पर कई नैतिक दायित्व होते हैं। उन्हें ईमानदारी, निष्पक्षता, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, मानव गरिमा का सम्मान और सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्हें व्यक्तिगत लाभ के ऊपर सार्वजनिक हित को रखना चाहिए और अपने कार्य में निरंतर कौशल विकास करना चाहिए। इस प्रकार नैतिक दायित्व पेशेवर जीवन को सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक रूप से भी अनुशासित और मानवीय बनाते हैं।
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प्रश्न 6: जैव-नैतिकता (Bioethics) से संबंधित प्रमुख नैतिक मुद्दों की विवेचना कीजिए।
जैव-नैतिकता अनुप्रयुक्त नैतिकता की वह शाखा है, जो जीवन, स्वास्थ्य, चिकित्सा और जैव-प्रौद्योगिकी से जुड़े नैतिक प्रश्नों का अध्ययन करती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने जहाँ उपचार की नई संभावनाएँ खोली हैं, वहीं अनेक गंभीर नैतिक समस्याएँ भी उत्पन्न की हैं। जैव-नैतिकता का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चिकित्सा और जैविक अनुसंधान मानव गरिमा, करुणा, न्याय और उत्तरदायित्व के मूल्यों से निर्देशित हों। गर्भपात जैव-नैतिकता का एक प्रमुख विवादित विषय है, जिसमें एक ओर महिला के शरीर पर उसके अधिकार की बात की जाती है, तो दूसरी ओर भ्रूण के जीवन के नैतिक अधिकार का प्रश्न उठता है। मृत्यु-दया या युथेनेशिया भी एक महत्वपूर्ण नैतिक मुद्दा है, जिसमें असहनीय पीड़ा से ग्रस्त रोगी को गरिमामय मृत्यु का अधिकार देने और जीवन की पवित्रता के बीच संघर्ष दिखाई देता है। अंग प्रत्यारोपण और अंगदान से जुड़े प्रश्नों में सहमति, गरीबों का शोषण, अंगों की अवैध बिक्री और समान वितरण जैसी नैतिक समस्याएँ सामने आती हैं। आनुवंशिक इंजीनियरिंग और क्लोनिंग ने “डिज़ाइनर बेबी”, मानव स्वभाव से छेड़छाड़ और जीवन के व्यवसायीकरण जैसी नई नैतिक चिंताएँ पैदा कर दी हैं। चिकित्सा अनुसंधान और क्लीनिकल ट्रायल में सूचित सहमति (Informed Consent), जोखिम, कमजोर वर्गों का शोषण और मानव अधिकारों की सुरक्षा भी प्रमुख मुद्दे हैं। जैव-नैतिकता के चार मूल सिद्धांत—स्वायत्तता (Autonomy), उपकार (Beneficence), अहिंसा (Non-maleficence) और न्याय (Justice)—इन सभी विषयों में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इस प्रकार जैव-नैतिकता आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की नैतिक चेतना बनकर यह सुनिश्चित करती है कि वैज्ञानिक प्रगति मानवता के विरुद्ध न जाए।
प्रश्न 7: पर्यावरणीय नैतिकता (Environmental Ethics) की अवधारणा एवं प्रमुख नैतिक प्रश्नों की विवेचना कीजिए।
पर्यावरणीय नैतिकता वह नैतिक दृष्टिकोण है, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच नैतिक संबंधों का अध्ययन करता है। यह इस प्रश्न पर विचार करता है कि क्या केवल मनुष्य ही नैतिक महत्व रखता है या प्रकृति, पशु-पक्षी, वनस्पति और पारिस्थितिकी तंत्र भी नैतिक सम्मान के पात्र हैं। आधुनिक औद्योगीकरण, शहरीकरण और उपभोक्तावाद के कारण पर्यावरणीय संकट—जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनों की कटाई, जैव विविधता का ह्रास और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन—तेजी से बढ़े हैं। जलवायु परिवर्तन पर्यावरणीय नैतिकता का सबसे बड़ा नैतिक मुद्दा है, क्योंकि इसके लिए मुख्य रूप से विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी मानी जाती है, जबकि इसके दुष्परिणाम विकासशील और गरीब देशों को अधिक झेलने पड़ते हैं। वनों की कटाई और प्रजातियों के विलुप्त होने से यह प्रश्न उठता है कि क्या मनुष्य को प्रकृति के असीमित शोषण का अधिकार है। वायु, जल और मृदा प्रदूषण मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को गंभीर क्षति पहुँचाते हैं, जिससे उद्योगों, सरकारों और नागरिकों की नैतिक जिम्मेदारी तय होती है। पशु अधिकार भी एक प्रमुख विषय है, जिसमें पशुओं पर प्रयोग, फैक्ट्री फार्मिंग और मनोरंजन के नाम पर क्रूरता जैसे मुद्दे शामिल हैं। पर्यावरणीय नैतिकता अंतर-पीढ़ी न्याय (Inter-generational Justice) पर बल देती है, अर्थात वर्तमान पीढ़ी भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों का हनन न करे। यह सतत विकास, हरित जीवनशैली, संसाधनों के संयमित उपयोग और प्रकृति के प्रति करुणा की भावना को नैतिक दायित्व मानती है। इस प्रकार पर्यावरणीय नैतिकता मानव सभ्यता को आत्म-विनाश से बचाने की नैतिक चेतावनी है।
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प्रश्न 8: व्यापार एवं कॉर्पोरेट नैतिकता (Business and Corporate Ethics) में प्रमुख नैतिक समस्याओं की विवेचना कीजिए।
व्यापार नैतिकता वह अनुप्रयुक्त नैतिकता है, जो व्यापार और उद्योग जगत में नैतिक मूल्यों के पालन से संबंधित है। आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में कंपनियों के पास अपार आर्थिक शक्ति है, जिससे उन पर समाज, श्रमिकों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण के प्रति गहरी नैतिक जिम्मेदारी भी आती है। श्रमिकों का शोषण, न्यूनतम मजदूरी न देना, असुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ और बाल श्रम व्यापार जगत की गंभीर नैतिक समस्याएँ हैं। रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और कर चोरी से न केवल कानून का उल्लंघन होता है, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता भी प्रभावित होती है। उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी, झूठे विज्ञापन, घटिया उत्पाद और गलत सूचना भी व्यावसायिक नैतिकता के विरुद्ध हैं। कई उद्योग पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाते हैं—जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, विषैले अपशिष्ट और वनों की कटाई इसके उदाहरण हैं। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) का सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि कंपनियाँ केवल लाभ कमाने तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और पर्यावरण के कल्याण में भी योगदान दें। डिजिटल युग में डेटा का दुरुपयोग, साइबर सुरक्षा की कमजोरी, ऑनलाइन धोखाधड़ी और उपभोक्ता की निजता का उल्लंघन नई नैतिक चुनौतियाँ बन गई हैं। इस प्रकार व्यापार नैतिकता यह सुनिश्चित करती है कि आर्थिक विकास मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर न हो।
प्रश्न 9: मीडिया नैतिकता (Media Ethics) एवं संचार क्षेत्र की नैतिक चुनौतियों की विवेचना कीजिए।
मीडिया नैतिकता उन नैतिक सिद्धांतों का समूह है, जो पत्रकारों, प्रसारकों और डिजिटल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों के आचरण को नियंत्रित करते हैं। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्योंकि यह समाज को सूचना प्रदान करता है, जनमत बनाता है और सत्ता पर निगरानी रखता है। सत्य और निष्पक्षता मीडिया नैतिकता के मूल सिद्धांत हैं, लेकिन आज फर्जी खबरें, अफवाहें, प्रोपेगैंडा और पक्षपात पत्रकारिता की साख को गंभीर रूप से चोट पहुँचा रहे हैं। निजता का उल्लंघन एक और बड़ी नैतिक समस्या है, जहाँ सनसनीखेज खबरों के लिए व्यक्तियों के निजी जीवन में दखल दिया जाता है। पेड न्यूज़, कॉर्पोरेट और राजनीतिक प्रभाव मीडिया की स्वतंत्रता को कमजोर करते हैं। टीआरपी की दौड़ में हिंसा, डर और नफरत फैलाने वाली सामग्री का प्रसार सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाता है। सोशल मीडिया के प्रसार से साइबर बुलिंग, हेट स्पीच, ट्रोलिंग और गलत सूचना की समस्या और भी बढ़ गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन मीडिया नैतिकता की सबसे बड़ी चुनौती है। नैतिक मीडिया वही है, जो सत्य, मानव गरिमा, शांति और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करे। इस प्रकार मीडिया नैतिकता आधुनिक समाज की वैचारिक और नैतिक दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती है।
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प्रश्न 10: समकालीन समाज में अनुप्रयुक्त नैतिकता (Applied Ethics) के महत्व की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
समकालीन समाज में अनुप्रयुक्त नैतिकता का महत्व अत्यंत बढ़ गया है, क्योंकि आज मानव जीवन विज्ञान, तकनीक, राजनीति, व्यापार और मीडिया जैसे शक्तिशाली संस्थानों से गहराई से जुड़ चुका है। आनुवंशिक इंजीनियरिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल निगरानी, वैश्वीकरण, जलवायु परिवर्तन और कॉर्पोरेट शक्ति जैसी घटनाओं ने ऐसे नैतिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिनका समाधान केवल पारंपरिक नैतिक नियमों से संभव नहीं है। अनुप्रयुक्त नैतिकता सिद्धांत और व्यवहार के बीच सेतु बनती है और वास्तविक जीवन की जटिल परिस्थितियों में नैतिक दिशा प्रदान करती है। यह मानव गरिमा, न्याय, समानता, उत्तरदायित्व और करुणा जैसे मूल्यों की रक्षा करती है। चिकित्सा में रोगी के अधिकार, व्यापार में सामाजिक उत्तरदायित्व, मीडिया में सत्य और शासन में पारदर्शिता—all अनुप्रयुक्त नैतिकता की देन हैं। परंतु इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। सांस्कृतिक विविधता के कारण सर्वमान्य नैतिक मानदंड बनाना कठिन होता है। आर्थिक लाभ और राजनीतिक स्वार्थ अक्सर नैतिक मूल्यों पर हावी हो जाते हैं। फिर भी अनुप्रयुक्त नैतिकता के बिना आधुनिक समाज तकनीकी रूप से उन्नत लेकिन नैतिक रूप से खोखला बन जाएगा। इस प्रकार अनुप्रयुक्त नैतिकता आज मानव सभ्यता के नैतिक संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की सबसे आवश्यक आवश्यकता बन चुकी है।
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