IGNOU FREE BPAG-172 शासन : मुद्दे और चुनौतियाँ Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BPAG-172 शासन : मुद्दे और चुनौतियाँ Solved Guess Paper 2025

प्रश्न 1: ‘सरकार’ और ‘शासन (Governance)’ में अंतर स्पष्ट कीजिए तथा शासन की बदलती अवधारणा की विवेचना कीजिए।

‘सरकार’ और ‘शासन’ दोनों शब्द आपस में जुड़े हुए हैं, परंतु इनका अर्थ और स्वरूप अलग-अलग है। सरकार से आशय उन औपचारिक संस्थाओं से है जो संविधान और कानून के अंतर्गत राज्य की सत्ता का प्रयोग करती हैं, जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और नौकरशाही। सरकार आदेश, नियम और कानून के माध्यम से शासन करती है और उसके पास दंड देने की वैधानिक शक्ति होती है। इसके विपरीत शासन (Governance) एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें केवल सरकार ही नहीं बल्कि निजी क्षेत्र, सिविल सोसायटी, मीडिया, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और आम नागरिक भी शामिल होते हैं। शासन यह दर्शाता है कि निर्णय कैसे लिए जाते हैं, नीतियाँ कैसे बनती हैं, उन्हें कैसे लागू किया जाता है और जनहित में संसाधनों का उपयोग कैसे होता है। पारंपरिक शासन की अवधारणा राज्य-केंद्रित थी, जिसमें सरकार को ही विकास और प्रशासन की एकमात्र शक्ति माना जाता था, किंतु वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, सूचना क्रांति और बढ़ती नागरिक चेतना के कारण शासन की अवधारणा में बड़ा परिवर्तन आया है। आज शासन बहु-अभिनेत्री व्यवस्था (Multi-Stakeholder System) बन गया है, जहाँ सरकार केवल एक समन्वयक की भूमिका निभाती है। बदलती शासन अवधारणा में पारदर्शिता, जवाबदेही, जन-भागीदारी, कुशलता, विधि का शासन, समानता और समावेशिता को विशेष महत्व दिया जाता है। नई सार्वजनिक प्रबंधन (New Public Management) ने शासन में निजी क्षेत्र की कार्यशैली को शामिल किया, जबकि नई सार्वजनिक सेवा (New Public Service) ने नागरिकों को ‘ग्राहक’ नहीं बल्कि ‘सह-भागीदार’ माना। इस प्रकार आधुनिक शासन अब केवल नियंत्रण की प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि सहभागिता, सहयोग और विश्वास पर आधारित एक समावेशी व्यवस्था बन गया है।

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प्रश्न 2: शासन और विकास के बीच संबंध की विवेचना कीजिए।

शासन और विकास के बीच अत्यंत घनिष्ठ और परस्पर निर्भर संबंध होता है। आज विकास को केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसमें सामाजिक न्याय, मानव विकास, राजनीतिक सशक्तिकरण और पर्यावरणीय संतुलन भी शामिल हैं। अच्छे शासन को अब सतत विकास की पूर्व-शर्त माना जाता है। प्रभावी शासन के माध्यम से ही नीतियों का सही निर्माण, उनका सफल क्रियान्वयन और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण संभव हो पाता है। जहाँ शासन कमजोर होता है वहाँ भ्रष्टाचार, अक्षमता, संसाधनों का दुरुपयोग और असमानता बढ़ती है, जिससे विकास बाधित होता है। भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ग्रामीण विकास, शहरी सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की सफलता सीधे शासन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। विश्व बैंक के अनुसार शासन का अर्थ है—किस प्रकार किसी देश के आर्थिक और सामाजिक संसाधनों का प्रबंधन किया जाता है। अच्छे शासन से निवेश बढ़ता है, गरीबी घटती है, सामाजिक सेवाएँ बेहतर होती हैं और नागरिकों का राज्य पर विश्वास मजबूत होता है। दूसरी ओर, विकास भी शासन को सशक्त बनाता है। शिक्षा, डिजिटल सुविधाएँ, आय में वृद्धि और नागरिक जागरूकता शासन में भागीदारी और जवाबदेही की माँग को बढ़ाती है। हालाँकि भ्रष्टाचार, नौकरशाही में विलंब, राजनीतिक हस्तक्षेप, क्षेत्रीय असमानता और डिजिटल विभाजन जैसे कारक शासन–विकास संबंध को कमजोर करते हैं। इस प्रकार शासन और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों का संतुलित विकास ही किसी देश की प्रगति का आधार बनता है।

प्रश्न 3: समकालीन युग में शासन के उभरते दृष्टिकोणों की विवेचना कीजिए।

समकालीन युग में शासन की प्रकृति पारंपरिक नौकरशाही शासन से आगे बढ़कर अधिक सहभागी, तकनीक-आधारित और बहु-स्तरीय हो गई है। अच्छे शासन (Good Governance) की अवधारणा में पारदर्शिता, जवाबदेही, भागीदारी, कुशलता, समानता और विधि का शासन प्रमुख तत्व माने जाते हैं। नई सार्वजनिक प्रबंधन (New Public Management) दृष्टिकोण ने शासन में दक्षता, प्रतिस्पर्धा, परिणाम-आधारित कार्यप्रणाली और निजी क्षेत्र की तकनीकों को अपनाने पर ज़ोर दिया। इसके विपरीत नई सार्वजनिक सेवा (New Public Service) ने नागरिकों को शासन का केंद्र मानते हुए सार्वजनिक हित, लोकतांत्रिक मूल्यों और सहयोग को प्रमुख माना। नेटवर्क शासन और सहयोगी शासन (Collaborative Governance) में सरकार, निजी क्षेत्र, NGOs और नागरिक मिलकर नीति निर्माण और क्रियान्वयन करते हैं। ई-शासन और डिजिटल शासन वर्तमान युग का सबसे प्रभावशाली दृष्टिकोण है, जिसमें ऑनलाइन सेवाएँ, डिजिटल पहचान, डाटा आधारित निर्णय और मोबाइल गवर्नेंस शासन को तेज़, सुलभ और पारदर्शी बना रहे हैं। सतत शासन (Sustainable Governance) में पर्यावरण संतुलन और दीर्घकालिक विकास को जोड़ा गया है। अधिकार-आधारित शासन में शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और सूचना को नागरिक अधिकार के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार आधुनिक शासन नियंत्रण से हटकर सहभागिता, तकनीक और सतत विकास की ओर बढ़ रहा है।

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प्रश्न 4: भारत में स्थानीय शासन की भूमिका और महत्व का विश्लेषण कीजिए।

भारत में स्थानीय शासन लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने और विकास को जन-सहभागिता से जोड़ने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया गया और उन्हें शासन की तीसरी परत के रूप में मान्यता मिली। स्थानीय शासन का मुख्य उद्देश्य स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन करना है। जल आपूर्ति, स्वच्छता, सड़कों का निर्माण, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, ग्रामीण आजीविका और आवास जैसे कार्य स्थानीय शासन के अंतर्गत आते हैं। ग्राम सभा और वार्ड समितियों के माध्यम से नागरिक सीधे निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं, जिससे सहभागी लोकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण से सामाजिक न्याय और राजनीतिक सशक्तिकरण को बल मिला है। हालाँकि स्थानीय शासन वित्तीय निर्भरता, प्रशासनिक कमजोरी, प्रशिक्षण की कमी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, फिर भी यह भारत में समावेशी और विकेंद्रीकृत विकास की आधारशिला बना हुआ है।

प्रश्न 5: भारत में अच्छे शासन (Good Governance) की प्रमुख पहलों की विवेचना कीजिए।

भारत में अच्छे शासन को सुदृढ़ करने के लिए कई महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को अत्यधिक मजबूती दी। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के माध्यम से ऑनलाइन सेवाएँ, डिजिलॉकर, UMANG ऐप, ई-ऑफिस और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिला। आधार और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और बिचौलियों को काफी हद तक समाप्त किया गया। वस्तु एवं सेवा कर (GST) ने कर प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाया। जन-धन योजना ने वित्तीय समावेशन को व्यापक बनाया। स्वच्छ भारत मिशन, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना और उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने शासन को जन-केन्द्रित बनाया। नागरिक चार्टर, सामाजिक अंकेक्षण और लोक शिकायत निवारण प्रणाली ने प्रशासनिक उत्तरदायित्व को मज़बूत किया। इन सभी पहलों ने भारत में शासन को अधिक पारदर्शी, प्रौद्योगिकी-सक्षम और नागरिकोन्मुख बनाया है।

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प्रश्न 6: भारत में शासन के समक्ष प्रमुख चुनौतियों की विवेचना कीजिए।

भारत में शासन के समक्ष अनेक संरचनात्मक, प्रशासनिक, सामाजिक और तकनीकी चुनौतियाँ मौजूद हैं, जो इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित करती हैं। भ्रष्टाचार शासन की सबसे गंभीर चुनौती माना जाता है, जो सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग, योजनाओं में लीकेज और जनविश्वास के ह्रास का कारण बनता है। नौकरशाही में लालफीताशाही, प्रक्रियागत जटिलता और निर्णय लेने में अनावश्यक विलंब सेवा वितरण को कमजोर बनाते हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप भी प्रशासनिक निष्पक्षता और पेशेवर क्षमता को प्रभावित करता है, क्योंकि स्थानांतरण और नियुक्तियाँ कई बार योग्यता के बजाय राजनीतिक प्रभाव से होती हैं। शासन संस्थाओं में क्षमता की कमी भी एक गंभीर समस्या है, विशेषकर जिला और स्थानीय स्तर पर जहाँ प्रशिक्षित मानव संसाधन, आधुनिक तकनीक और आंकड़ा आधारित निर्णय प्रणाली का अभाव है। सामाजिक असमानता और बहिष्करण भी शासन की बड़ी चुनौती है, क्योंकि अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, महिलाएँ, प्रवासी और शहरी गरीब प्रभावी रूप से सेवाओं का लाभ नहीं उठा पाते। डिजिटल शासन के विस्तार के साथ डिजिटल विभाजन भी एक नई चुनौती बन गया है, जहाँ ग्रामीण, गरीब और बुजुर्ग डिजिटल सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। कानून-व्यवस्था, आतंकवाद, उग्रवाद और सीमा संबंधी समस्याएँ भी शासन पर भारी दबाव डालती हैं। पर्यावरणीय संकट और जलवायु परिवर्तन ने शासन के लिए नई प्रकार की जटिल दीर्घकालिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इस प्रकार भारत में शासन बहुस्तरीय चुनौतियों से घिरा हुआ है, जिनका समाधान केवल कानूनी सुधारों से नहीं बल्कि नैतिक नेतृत्व, प्रशासनिक क्षमता, नागरिक भागीदारी और तकनीकी समावेशन से ही संभव है।

प्रश्न 7: शासन को सुदृढ़ करने में नागरिक समाज (Civil Society) की भूमिका की विवेचना कीजिए।

नागरिक समाज शासन को सुदृढ़ करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह राज्य और नागरिकों के बीच सेतु का कार्य करता है। नागरिक समाज में गैर-सरकारी संगठन, स्वैच्छिक संस्थाएँ, सामाजिक आंदोलन, ट्रेड यूनियन, पेशेवर संगठन, मीडिया और जागरूक नागरिक शामिल होते हैं। इसकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ‘निगरानीकर्ता’ (Watchdog) की होती है, जिसके माध्यम से यह सरकार की नीतियों, योजनाओं और निर्णयों पर निगरानी रखता है तथा भ्रष्टाचार, अनियमितता और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करता है। भारत में सूचना का अधिकार आंदोलन नागरिक समाज की इस शक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण है। नागरिक समाज जनभागीदारी को बढ़ावा देता है, जिससे लोग जनसुनवाई, सामाजिक अंकेक्षण, जनआंदोलन और नीति संवाद के माध्यम से शासन प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनते हैं। कई क्षेत्रों में जहाँ सरकारी पहुँच कमजोर होती है, वहाँ NGOs शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में सेवाएँ प्रदान करते हैं। नागरिक समाज नीति निर्माण पर भी प्रभाव डालता है, जैसे पर्यावरण कानून, महिला अधिकार, वन अधिकार और खाद्य सुरक्षा जैसे अधिनियमों के पीछे आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही है। मीडिया, जो नागरिक समाज का एक सशक्त माध्यम है, घोटालों का पर्दाफाश, जनसमस्याओं की प्रस्तुति और जनमत निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाता है। हालाँकि नागरिक समाज को भी धन की कमी, राजनीतिक दबाव, विदेशी चंदे पर निर्भरता और आंतरिक पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, फिर भी यह लोकतांत्रिक शासन की आत्मा बना हुआ है और अच्छे शासन के बिना नागरिक समाज कमजोर पड़ जाता है तथा मजबूत नागरिक समाज के बिना शासन निरंकुश हो सकता है।

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प्रश्न 8: सार्वजनिक सेवा वितरण में ई-शासन (E-Governance) के महत्व की विवेचना कीजिए।

ई-शासन का अर्थ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के माध्यम से प्रशासनिक प्रक्रियाओं, सेवाओं और निर्णय प्रणाली को डिजिटल बनाना है, ताकि शासन को अधिक पारदर्शी, तेज़, जवाबदेह और नागरिकोन्मुख बनाया जा सके। सार्वजनिक सेवा वितरण में ई-शासन का महत्व अत्यंत व्यापक है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से नागरिक जन्म प्रमाण-पत्र, आय प्रमाण-पत्र, पासपोर्ट, राशन कार्ड, जमीन के रिकॉर्ड, पेंशन, छात्रवृत्ति, कर भुगतान और शिकायत निवारण जैसी सेवाएँ घर बैठे प्राप्त कर सकते हैं, जिससे समय, धन और भ्रष्टाचार—तीनों की बचत होती है। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम, आधार, डिजिलॉकर, UMANG ऐप और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ने नागरिक और सरकार के संबंध को पूरी तरह बदल दिया है। DBT के माध्यम से सब्सिडी और पेंशन सीधे लाभार्थी के खाते में पहुँचती है, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हुई है। ई-शासन पारदर्शिता को भी बढ़ाता है, क्योंकि डैशबोर्ड, पोर्टल और रीयल-टाइम डाटा के माध्यम से योजनाओं की प्रगति सार्वजनिक होती है। ई-ऑफिस प्रणाली से फाइलों की गति तेज़ हुई है और प्रशासनिक दक्षता बढ़ी है। नागरिक सहभागिता भी बढ़ी है, क्योंकि ऑनलाइन फीडबैक, सोशल मीडिया और जनपरामर्श के माध्यम से लोग अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। हालाँकि ई-शासन के समक्ष डिजिटल साक्षरता की कमी, नेटवर्क समस्या, साइबर सुरक्षा खतरे और डाटा गोपनीयता जैसी चुनौतियाँ हैं, फिर भी यह भारत में अच्छे शासन का सबसे शक्तिशाली उपकरण बन चुका है।

प्रश्न 9: भारत में विकेंद्रीकरण (Decentralization) की समस्याओं और संभावनाओं का विश्लेषण कीजिए।

विकेंद्रीकरण का अर्थ है शासन की शक्तियों, दायित्वों और संसाधनों का केंद्र और राज्य स्तर से स्थानीय सरकारों—पंचायतों और शहरी निकायों—को हस्तांतरण। भारत में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से विकेंद्रीकरण को संवैधानिक दर्जा मिला, जिससे लोकतंत्र को जड़ों तक मजबूत किया गया। विकेंद्रीकरण की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों को स्थानीय नेतृत्व में अवसर मिला, जिससे सामाजिक न्याय और राजनीतिक सहभागिता को बल मिला। स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर होने से योजनाएँ अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बनीं। लेकिन इसके बावजूद विकेंद्रीकरण कई समस्याओं से जूझ रहा है। स्थानीय निकायों की सबसे बड़ी समस्या वित्तीय निर्भरता है, क्योंकि उनके पास पर्याप्त कराधान अधिकार और स्वतंत्र आय स्रोत नहीं हैं। प्रशासनिक क्षमता की कमी, प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव, तकनीकी ज्ञान की कमी और डेटाबेस का अभाव भी उनके कार्यों को सीमित करता है। राजनीतिक हस्तक्षेप और स्थानीय अभिजात वर्ग का वर्चस्व (Elite Capture) भी गरीबों की भागीदारी को सीमित कर देता है। भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी भी कई स्थानों पर देखी जाती है। फिर भी विकेंद्रीकरण की संभावनाएँ अत्यंत व्यापक हैं। यदि वित्तीय अधिकार, पेशेवर प्रशिक्षण, डिजिटल उपकरण और ग्राम सभाओं की सक्रियता सुनिश्चित की जाए तो स्थानीय शासन भारत में समावेशी, जवाबदेह और सतत विकास का सबसे सशक्त माध्यम बन सकता है।

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प्रश्न 10: भारत में अच्छे शासन (Good Governance) की अवधारणा और व्यवहार की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

अच्छा शासन वह व्यवस्था है जो पारदर्शिता, जवाबदेही, जनभागीदारी, कुशलता, समानता, विधि का शासन और संवेदनशीलता जैसे मूल्यों पर आधारित होती है। भारत में 1990 के दशक के बाद अच्छे शासन को नीति-निर्माण का केंद्रीय लक्ष्य बनाया गया। सूचना का अधिकार अधिनियम, ई-शासन, DBT, सामाजिक अंकेक्षण, नागरिक चार्टर, लोक शिकायत पोर्टल और डिजिटल सेवाएँ अच्छे शासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहे हैं। स्वच्छ भारत मिशन, आयुष्मान भारत, जन-धन योजना, उज्ज्वला योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं ने सेवा वितरण को जन-केन्द्रित बनाया है। लेकिन व्यवहार में अच्छे शासन के सामने अभी भी कई बाधाएँ हैं। भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसके रूप बदल गए हैं। नौकरशाही विलंब, प्रक्रियागत जटिलता और राजनीतिक हस्तक्षेप अब भी आम समस्याएँ हैं। सामाजिक असमानता के कारण गरीब और हाशिए के वर्ग आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार से वंचित हैं। डिजिटल शासन ने एक ओर सुविधा दी है, तो दूसरी ओर साइबर सुरक्षा, निगरानी और डिजिटल बहिष्करण जैसी नई समस्याएँ भी पैदा की हैं। इसलिए भारत में अच्छा शासन एक विकसित हो रही प्रक्रिया है, न कि पूरी तरह प्राप्त स्थिति। इसके लिए केवल कानून और तकनीक ही नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व, प्रशासनिक ईमानदारी, सक्रिय नागरिक समाज और सामाजिक न्याय की निरंतर प्रतिबद्धता आवश्यक है।

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