IGNOU FREE BSOG-176 अर्थव्यवस्था एवं समाज Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BSOG-176 अर्थव्यवस्था एवं समाज Solved Guess Paper 2025

प्रश्न 1: अर्थव्यवस्था का समाजशास्त्रीय अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा अर्थव्यवस्था और समाज के संबंध की विवेचना कीजिए।

समाजशास्त्र में अर्थव्यवस्था को केवल वस्तुओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग की व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे एक गहराई से सामाजिक संस्था माना जाता है, जो संस्कृति, परंपरा, सत्ता, वर्ग, जाति, लिंग और राजनीतिक संरचनाओं से प्रभावित होती है। अर्थव्यवस्था का समाजशास्त्रीय अर्थ यह बताता है कि आर्थिक गतिविधियाँ केवल लाभ और तर्क पर आधारित नहीं होतीं, बल्कि वे सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं और संबंधों के भीतर संचालित होती हैं। उदाहरण के लिए, भारत में आज भी जाति और लिंग का प्रभाव रोजगार, मजदूरी और कार्य-विभाजन में स्पष्ट दिखाई देता है। अर्थव्यवस्था और समाज का संबंध परस्पर और गतिशील होता है। एक ओर अर्थव्यवस्था समाज की संरचना को प्रभावित करती है। औद्योगीकरण के कारण नगरीकरण बढ़ा, संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवार बने, महिलाओं की भूमिका बदली और नए सामाजिक वर्ग जैसे पूँजीपति और मजदूर वर्ग उभरे। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था ने प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और व्यक्तिगत लाभ की भावना को मजबूत किया। दूसरी ओर समाज भी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। धार्मिक विश्वास, सांस्कृतिक परंपराएँ और सामाजिक नियम यह तय करते हैं कि कौन सा कार्य सम्मानजनक माना जाएगा और कौन सा नहीं। सत्ता संबंध भी अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करते हैं, जहाँ संसाधनों पर नियंत्रण रखने वाले वर्ग आर्थिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं। कार्ल मार्क्स ने अर्थव्यवस्था को समाज की आधार संरचना माना और कहा कि राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ इसी आधार पर निर्मित होती हैं, जबकि मैक्स वेबर ने संस्कृति और धर्म को आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण कारक बताया। कार्ल पोलान्यी ने यह स्पष्ट किया कि अर्थव्यवस्था समाज में निहित (Embedded) होती है और उसे समाज से अलग नहीं किया जा सकता। इस प्रकार अर्थव्यवस्था और समाज एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं और किसी एक को दूसरे से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

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प्रश्न 2: विनिमय (Exchange) के प्रमुख रूपों का वर्णन कीजिए तथा उनके सामाजिक महत्व की विवेचना कीजिए।

विनिमय समाज की एक मूलभूत आर्थिक और सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से वस्तुओं, सेवाओं और संसाधनों का आदान-प्रदान होता है। समाजशास्त्र के अनुसार विनिमय केवल आर्थिक लेन-देन नहीं होता, बल्कि इसके भीतर सामाजिक संबंध, विश्वास, दायित्व, सत्ता और सहयोग भी शामिल रहते हैं। विनिमय का पहला प्रमुख रूप पारस्परिक विनिमय (Reciprocity) है, जो आदिवासी और पारंपरिक समाजों में अधिक पाया जाता है। इसमें उपहार, सहायता और वस्तुओं का लेन-देन बिना तत्काल लाभ की गणना के किया जाता है, जिससे सामाजिक संबंध और एकता मजबूत होती है। दूसरा प्रमुख रूप पुनर्वितरण (Redistribution) है, जिसमें कोई केंद्रीय सत्ता, जैसे राजा या आधुनिक राज्य, संसाधनों को एकत्र कर समाज में पुनः वितरित करती है। आधुनिक समय में सरकार करों के माध्यम से संसाधन एकत्र कर कल्याणकारी योजनाओं के रूप में समाज में वितरण करती है, जिससे सामाजिक असमानता कम करने का प्रयास होता है। तीसरा प्रमुख रूप बाजार विनिमय (Market Exchange) है, जो मुद्रा पर आधारित होता है और माँग–आपूर्ति तथा लाभ के सिद्धांत पर चलता है। यह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है, जिसने उत्पादन और उपभोग को तीव्र बनाया, लेकिन इसके साथ शोषण, असमानता और उपभोक्तावाद भी बढ़ा। चौथा रूप वस्तु-विनिमय (Barter System) है, जिसमें बिना मुद्रा के वस्तुओं का सीधा आदान-प्रदान होता है, जो छोटे समुदायों और संकट की परिस्थितियों में देखने को मिलता है। सामाजिक दृष्टि से विनिमय समाज में विश्वास, सहयोग और संघर्ष तीनों को जन्म देता है। बाजार विनिमय में जहाँ प्रतिस्पर्धा और सत्ता संबंध मजबूत होते हैं, वहीं पारस्परिक विनिमय में सहयोग और सामुदायिकता को बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार विनिमय के विभिन्न रूप समाज की सामाजिक संरचना और संबंधों को गहराई से प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 3: उत्पादन प्रणाली (Mode of Production) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए तथा इसके प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिए।

उत्पादन प्रणाली की अवधारणा कार्ल मार्क्स के समाजशास्त्रीय विचारों का एक केंद्रीय तत्व है। उत्पादन प्रणाली से आशय उस व्यवस्था से है, जिसके अंतर्गत समाज में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाता है। इसमें दो प्रमुख तत्व होते हैं—उत्पादन की शक्तियाँ (Forces of Production), जैसे श्रम, औजार, तकनीक और कच्चा माल, तथा उत्पादन के संबंध (Relations of Production), अर्थात उत्पादन प्रक्रिया में लोगों के बीच बनने वाले सामाजिक संबंध, जैसे मालिक और मजदूर का संबंध। सबसे प्रारंभिक उत्पादन प्रणाली आदिम साम्यवादी प्रणाली थी, जिसमें निजी संपत्ति नहीं थी और संसाधनों पर सामूहिक स्वामित्व था। इसके बाद दास प्रथा आधारित उत्पादन प्रणाली आई, जिसमें मनुष्य को ही उत्पादन का साधन बना दिया गया और दासों का पूर्ण शोषण किया गया। सामंती उत्पादन प्रणाली में भूमि पर सामंतों का अधिकार था और किसान उनके अधीन काम करते थे। पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली आधुनिक समाज की प्रमुख व्यवस्था है, जिसमें उत्पादन के साधनों पर पूँजीपतियों का स्वामित्व होता है और मजदूर अपनी श्रम-शक्ति बेचकर जीविका कमाते हैं। इसमें लाभ, प्रतिस्पर्धा और वर्ग संघर्ष प्रमुख तत्व होते हैं। समाजवादी उत्पादन प्रणाली में उत्पादन के साधनों पर सामूहिक या राज्य का स्वामित्व होता है और उत्पादन का उद्देश्य सामाजिक कल्याण होता है, न कि निजी लाभ। मार्क्स के अनुसार इतिहास का विकास इन्हीं उत्पादन प्रणालियों के संघर्ष और परिवर्तन के माध्यम से आगे बढ़ता है। इस प्रकार उत्पादन प्रणाली समाज की वर्ग संरचना, सत्ता संबंधों और सामाजिक परिवर्तन की दिशा को निर्धारित करती है।

प्रश्न 4: वर्ग, अर्थव्यवस्था और सामाजिक असमानता के बीच संबंध की विवेचना कीजिए।

वर्ग, अर्थव्यवस्था और सामाजिक असमानता के बीच गहरा और प्रत्यक्ष संबंध है। सामाजिक वर्ग उन समूहों को कहा जाता है, जिनकी आर्थिक स्थिति, आय, संपत्ति, पेशा और संसाधनों तक पहुँच समान स्तर की होती है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में समाज मुख्य रूप से उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग, श्रमिक वर्ग और गरीब वर्ग में विभाजित होता है। उच्च वर्ग के पास भूमि, उद्योग, पूँजी और सत्ता का नियंत्रण होता है, जबकि श्रमिक वर्ग अपना श्रम बेचकर जीवन यापन करता है। इस आर्थिक विभाजन के कारण समाज में गहरी असमानता उत्पन्न होती है। उच्च वर्ग को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और राजनीतिक प्रभाव प्राप्त होता है, जबकि गरीब वर्ग बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रहता है। भारत में वर्ग असमानता जाति, लिंग और क्षेत्रीय भेदभाव से भी जुड़ी हुई है। दलित, आदिवासी, महिलाएँ और ग्रामीण गरीब आर्थिक रूप से सबसे अधिक पिछड़े पाए जाते हैं। वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद यह असमानता और बढ़ी है, क्योंकि एक ओर कॉरपोरेट और मध्यम वर्ग समृद्ध हुआ है, वहीं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र के मजदूर और किसान अधिक असुरक्षित हुए हैं। वर्ग आधारित असमानता सामाजिक गतिशीलता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को भी कमजोर करती है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था वर्ग संरचना को जन्म देती है और वर्ग संरचना सामाजिक असमानता को लगातार पुनः उत्पन्न करती रहती है।

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प्रश्न 5: अर्थव्यवस्था और समाज से जुड़े प्रमुख समकालीन मुद्दों की विवेचना कीजिए।

समकालीन समाज में अर्थव्यवस्था और समाज से जुड़े अनेक गहरे संकट और चुनौतियाँ देखी जा रही हैं। बेरोजगारी और रोजगार की असुरक्षा आज की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन गई है। तकनीकी विकास, स्वचालन और ठेका प्रणाली के कारण स्थायी नौकरियाँ कम हो रही हैं। आर्थिक असमानता भी तेज़ी से बढ़ रही है, जहाँ थोड़े से लोग विशाल संपत्ति के मालिक बनते जा रहे हैं और करोड़ों लोग गरीबी में जीवन जी रहे हैं। श्रम का अनौपचारिकीकरण (Informalisation) एक गंभीर समस्या है, जिसमें अधिकांश मजदूर बिना सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और कानूनी संरक्षण के काम कर रहे हैं। लिंग आधारित आर्थिक असमानता भी बनी हुई है, जहाँ महिलाएँ सबसे अधिक अवैतनिक श्रम करती हैं लेकिन उन्हें समान मजदूरी और नेतृत्व के अवसर नहीं मिलते। पर्यावरण संकट भी अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा हुआ है। औद्योगीकरण और उपभोक्तावाद के कारण प्रदूषण, जल संकट, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। वैश्वीकरण ने एक ओर आर्थिक अवसर दिए हैं, तो दूसरी ओर स्थानीय उद्योगों, किसानों और मजदूरों की स्थिति को कमजोर किया है। इस प्रकार आज की अर्थव्यवस्था केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहराई से सामाजिक समस्याओं से भी जुड़ी हुई है, जिनका समाधान सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और समावेशी विकास के बिना संभव नहीं है।

प्रश्न 6: कार्ल मार्क्स के अनुसार अर्थव्यवस्था और समाज के संबंध की विवेचना कीजिए।

कार्ल मार्क्स ने अर्थव्यवस्था और समाज के संबंध को समझाने के लिए ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार किसी भी समाज की आधार संरचना उसकी अर्थव्यवस्था होती है और उसी पर समाज की अधिरचना, जैसे राजनीति, धर्म, कानून, शिक्षा और संस्कृति विकसित होती हैं। मार्क्स के अनुसार किसी समाज में उत्पादन की प्रणाली यह तय करती है कि वहाँ सामाजिक वर्ग कैसे बनेंगे और सत्ता किसके हाथ में होगी। उन्होंने बताया कि प्रत्येक उत्पादन प्रणाली में दो प्रमुख तत्व होते हैं—उत्पादन की शक्तियाँ (श्रम, तकनीक, औजार) और उत्पादन के संबंध (मालिक और मजदूर के बीच संबंध)। पूँजीवादी समाज में उत्पादन के साधनों पर पूँजीपति वर्ग का स्वामित्व होता है, जबकि मजदूर वर्ग केवल अपनी श्रम-शक्ति बेचने को मजबूर होता है। पूँजीपति मजदूर से उसके श्रम का पूरा मूल्य नहीं देता, बल्कि अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value) का शोषण कर लाभ कमाता है। इसी शोषण के कारण समाज में वर्ग संघर्ष पैदा होता है, जो सामाजिक परिवर्तन की मुख्य शक्ति बनता है। मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था अंतर्विरोधों से भरी हुई है—जैसे बेरोजगारी, आर्थिक संकट, असमानता और शोषण—जो अंततः उसे नष्ट कर देंगे और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना होगी, जहाँ उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व होगा और शोषण समाप्त हो जाएगा। मार्क्स का यह दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि समाज की संरचना, मूल्य और सत्ता संबंध अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़े होते हैं। हालाँकि आलोचक कहते हैं कि मार्क्स ने संस्कृति और विचारधारा की भूमिका को कम आँका, फिर भी वर्ग, शोषण और आर्थिक असमानता को समझने में उनका सिद्धांत आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

प्रश्न 7: मैक्स वेबर के अनुसार अर्थव्यवस्था और समाज के संबंध की विवेचना कीजिए।

मैक्स वेबर ने अर्थव्यवस्था और समाज के संबंध को कार्ल मार्क्स से भिन्न दृष्टिकोण से समझाया। वेबर के अनुसार अर्थव्यवस्था केवल भौतिक परिस्थितियों से ही नहीं बनती, बल्कि उस पर संस्कृति, धर्म, विचारधारा, प्रतिष्ठा और सत्ता का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। वेबर ने यह सिद्ध किया कि आर्थिक विकास में धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उनकी प्रसिद्ध कृति “प्रोटेस्टेंट एथिक और पूँजीवाद की आत्मा” में उन्होंने बताया कि प्रोटेस्टेंट धर्म की नैतिकता—जैसे परिश्रम, संयम, बचत और अनुशासन—ने यूरोप में पूँजीवाद के विकास को प्रोत्साहित किया। वेबर के अनुसार सामाजिक स्तरीकरण केवल वर्ग पर आधारित नहीं होता, बल्कि प्रतिष्ठा (Status) और सत्ता (Power) भी उतने ही महत्वपूर्ण आयाम हैं। कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से गरीब होते हुए भी समाज में उच्च प्रतिष्ठा रख सकता है, और कोई आर्थिक रूप से संपन्न होते हुए भी सामाजिक सम्मान से वंचित हो सकता है। वेबर ने आधुनिक समाज में युक्तिकरण (Rationalization) की प्रक्रिया को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया, जिसके अंतर्गत प्रशासन, उद्योग, बैंक, शिक्षा और शासन सभी नियमों, गणनाओं और दक्षता पर आधारित हो गए हैं। उन्होंने नौकरशाही (Bureaucracy) को आधुनिक अर्थव्यवस्था का अनिवार्य अंग माना, लेकिन साथ ही इसे “लौह पिंजरा” (Iron Cage) भी कहा, क्योंकि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मकता को सीमित कर देती है। इस प्रकार वेबर का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था केवल आर्थिक संरचना नहीं है, बल्कि वह सामाजिक मूल्यों, विश्वासों और सत्ता संरचनाओं से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

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प्रश्न 8: कार्ल पोलान्यी की ‘अर्थव्यवस्था का समाज में अंतर्निहित होना (Embeddedness)’ की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।

कार्ल पोलान्यी ने अर्थव्यवस्था की समाजशास्त्रीय व्याख्या में “अंतर्निहितता” (Embeddedness) की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार पारंपरिक समाजों में अर्थव्यवस्था समाज से अलग कोई स्वतंत्र क्षेत्र नहीं थी, बल्कि वह सामाजिक संबंधों, नैतिकता, परंपराओं और सामूहिक आवश्यकताओं के भीतर अंतर्निहित थी। प्राचीन समाजों में आर्थिक गतिविधियाँ लाभ के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता और सामूहिक कल्याण के लिए होती थीं। पोलान्यी ने तीन प्रमुख गैर-बाजार आर्थिक प्रणालियों की चर्चा की—पारस्परिकता (Reciprocity), पुनर्वितरण (Redistribution) और घरेलू उत्पादन (Householding)। लेकिन पूँजीवादी समाज में बाजार व्यवस्था ने अर्थव्यवस्था को समाज से अलग कर दिया। भूमि, श्रम और मुद्रा को वस्तु (Commodity) बना दिया गया, जबकि ये वास्तव में प्राकृतिक और सामाजिक तत्व हैं। इससे बेरोजगारी, गरीबी, पर्यावरण विनाश और सामाजिक अस्थिरता जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं। पोलान्यी ने इसे “डबल मूवमेंट” कहा—एक ओर बाजार का विस्तार होता है और दूसरी ओर समाज अपने संरक्षण के लिए श्रम कानून, कल्याणकारी राज्य और सामाजिक सुरक्षा की माँग करता है। पोलान्यी ने यह स्पष्ट किया कि यदि अर्थव्यवस्था को पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ दिया गया तो वह समाज और प्रकृति दोनों का विनाश कर देगी। इसलिए अर्थव्यवस्था का सामाजिक नियंत्रण आवश्यक है। आज वैश्वीकरण और निजीकरण के दौर में पोलान्यी की यह अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक हो गई है।

प्रश्न 9: वैश्वीकरण का अर्थव्यवस्था और समाज पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।

वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत विश्व की विभिन्न देशीय अर्थव्यवस्थाएँ, बाजार, तकनीक, सूचना और संस्कृति परस्पर अत्यधिक जुड़ गई हैं। वैश्वीकरण ने भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्था और समाज को गहराई से प्रभावित किया है। आर्थिक स्तर पर वैश्वीकरण के कारण विदेशी निवेश, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र का तीव्र विकास हुआ। शहरी मध्यम वर्ग को नए रोजगार, उपभोक्ता वस्तुएँ और अंतरराष्ट्रीय अवसर प्राप्त हुए। लेकिन इसके साथ ही छोटे किसान, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प और असंगठित क्षेत्र के मजदूर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए। ठेका श्रम और अस्थायी रोजगार बढ़ा, जिससे रोजगार की सुरक्षा घट गई। सामाजिक स्तर पर वैश्वीकरण ने उपभोक्तावाद, पश्चिमी जीवन शैली और भौतिकवाद को बढ़ावा दिया, जिससे पारंपरिक संस्कृतियाँ, भाषाएँ और सामुदायिक जीवन कमजोर हुआ। पर्यावरणीय दृष्टि से भी वैश्वीकरण के कारण खनन, औद्योगिकीकरण और बड़े विकास प्रोजेक्ट्स बढ़े, जिससे प्रदूषण, वन विनाश और जल संकट उत्पन्न हुआ। राजनीतिक रूप से भी वैश्वीकरण ने राष्ट्र-राज्य की स्वायत्तता को सीमित किया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं व कॉरपोरेट शक्तियों का प्रभाव बढ़ा। इस प्रकार वैश्वीकरण ने कुछ वर्गों को सुविधा और समृद्धि दी, लेकिन बहुसंख्यक समाज के लिए असमानता, असुरक्षा और पर्यावरण संकट को भी गहरा किया।

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प्रश्न 10: समकालीन समाज में श्रम के अनौपचारिकीकरण (Informalisation of Labour) की समस्या की विवेचना कीजिए।

श्रम का अनौपचारिकीकरण समकालीन अर्थव्यवस्था की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बन गया है। अनौपचारिक क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ मजदूरों को कोई स्थायी रोजगार, कानूनी सुरक्षा, न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा या पेंशन जैसी सुविधाएँ प्राप्त नहीं होतीं। भारत में अधिकांश श्रमिक—जैसे निर्माण मजदूर, घरेलू कामगार, कृषि मजदूर, रिक्शा चालक, सड़क विक्रेता और गिग वर्कर—अनौपचारिक क्षेत्र में ही कार्य करते हैं। वैश्वीकरण, निजीकरण और तकनीकी परिवर्तन के कारण स्थायी नौकरियाँ कम हो गई हैं और ठेका व्यवस्था, आउटसोर्सिंग तथा अस्थायी रोजगार बढ़ा है। इससे मजदूरों की आय अस्थिर हो गई है और उनका शोषण बढ़ा है। महिलाएँ अनौपचारिक क्षेत्र में सबसे अधिक कार्यरत हैं और वे कम मजदूरी, असुरक्षा और दोहरे श्रम—घर और बाहर—का बोझ उठाती हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान यह समस्या और गहराई से सामने आई, जब करोड़ों अनौपचारिक मजदूर बेरोजगार हो गए और उनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं थी। हालाँकि सरकार ने कुछ कल्याणकारी योजनाएँ शुरू की हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर है। इस प्रकार श्रम का अनौपचारिकीकरण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहराई से सामाजिक न्याय, मानव गरिमा और अधिकारों से जुड़ी समस्या है।

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