IGNOU FREE BSOG-171 भारतीय समाज : छवियाँ एवं वास्तविकताएँ Solved Guess Paper 2025
प्रश्न 1: भारत को एक बहुल और विविध समाज के रूप में समझाइए।
भारत को एक बहुल और विविध समाज इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति, खान-पान, पहनावा, परंपराएँ और जीवन-शैली में अत्यंत विविधता पाई जाती है। भारत कोई एकरूप समाज नहीं है बल्कि अनेक समाजों का संगम है। यहाँ उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भौगोलिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, जिनका प्रभाव लोगों की जीवन-शैली पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भारत में सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं, जिनमें हिंदी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मराठी, उर्दू, गुजराती, पंजाबी आदि प्रमुख हैं। धार्मिक दृष्टि से भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और अनेक जनजातीय धर्मों के लोग साथ-साथ रहते हैं। जाति व्यवस्था ने भी भारतीय समाज को हजारों जातियों और उपजातियों में विभाजित कर दिया है, जिनकी सामाजिक स्थिति और परंपराएँ अलग-अलग हैं। इसके साथ-साथ आदिवासी समुदाय अपनी विशिष्ट संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक संरचना के साथ भारतीय समाज की विविधता को और समृद्ध करते हैं। इतनी अधिक विविधता के बावजूद भारत एक राष्ट्र के रूप में आज भी एकजुट है, इसका कारण साझा इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन, संवैधानिक मूल्य और लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारतीय संविधान ने सभी धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को समान सम्मान दिया है, जिससे यह विविधता एकता में बदल सकी है। हालाँकि यह विविधता कई बार संघर्ष, भेदभाव और सामाजिक तनाव का कारण भी बनती है, फिर भी भारत ने यह साबित किया है कि विविधता किसी समाज की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत हो सकती है। इस प्रकार भारत को सही अर्थों में एक बहुल और विविध समाज कहा जा सकता है।
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प्रश्न 2: भारतीय समाज में “विविधता में एकता” की अवधारणा पर चर्चा कीजिए।
“विविधता में एकता” भारतीय समाज की सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट विशेषता मानी जाती है। इसका अर्थ यह है कि भारत में भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र, संस्कृति और खान-पान में अत्यधिक भिन्नता होने के बावजूद एक मूलभूत राष्ट्रीय एकता मौजूद है। भारत में हजारों जातियाँ, अनेक धर्म और सैकड़ों भाषाएँ होते हुए भी लोग अपने आपको एक भारतीय के रूप में पहचानते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के लोगों ने एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, जिससे राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिली। भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार देकर एकता की भावना को कानूनी आधार प्रदान किया। राष्ट्रीय पर्व, तिरंगा, राष्ट्रगान, चुनाव प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी हमें एक राष्ट्र के रूप में जोड़ती हैं। सामाजिक जीवन में भी एकता की भावना त्यौहारों, मेलों, विवाहों और सामूहिक आयोजनों के माध्यम से दिखाई देती है। हालाँकि जातिवाद, साम्प्रदायिकता, प्रांतीयता और भाषावाद जैसी समस्याएँ इस एकता को कई बार चुनौती देती हैं, फिर भी भारतीय समाज ने समय-समय पर इन संकटों का सामना कर एकता को बनाए रखा है। विविधता में एकता का अर्थ यह नहीं है कि भारत में कोई संघर्ष नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि इन सभी भिन्नताओं के बावजूद लोग मिल-जुलकर रहने की क्षमता रखते हैं। इस प्रकार “विविधता में एकता” भारतीय समाज की आत्मा है।
प्रश्न 3: भारतीय समाज में जाति को एक प्रमुख संस्था के रूप में समझाइए।
जाति भारतीय समाज की एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रही है। जाति व्यवस्था जन्म के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, पेशा, खान-पान, विवाह और सामाजिक संबंधों को निर्धारित करती थी। परंपरागत रूप से भारतीय समाज चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—में विभाजित था तथा इनसे बाहर तथाकथित “अछूत” वर्ग था, जिसे आज दलित कहा जाता है। इस व्यवस्था ने समाज में ऊँच-नीच, भेदभाव और शोषण को जन्म दिया। ऊँची जातियों को शिक्षा, संपत्ति और सत्ता का अधिकार मिला, जबकि निचली जातियों को वंचित रखा गया। सामाजिक सुधार आंदोलनों और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जाति व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठी। डॉ. भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और पेरियार जैसे समाज सुधारकों ने जाति उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष किया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया और अनुसूचित जाति एवं जनजाति को विशेष संरक्षण दिया गया। आरक्षण व्यवस्था के माध्यम से शिक्षा और रोजगार में अवसर दिए गए। इसके बावजूद आज भी भारतीय समाज में जाति का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। विवाह, राजनीति, पंचायत व्यवस्था और सामाजिक संबंधों में जाति की भूमिका आज भी दिखाई देती है। इस प्रकार जाति भारतीय समाज की एक ऐसी संस्था है, जो रूप बदलकर आज भी सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रही है।
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प्रश्न 4: भारतीय समाज में परिवार की बदलती प्रकृति पर चर्चा कीजिए।
परिवार भारतीय समाज की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रहा है और समय के साथ इसकी प्रकृति में बड़े परिवर्तन आए हैं। पारंपरिक रूप से भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी, जिसमें कई पीढ़ियाँ एक साथ रहती थीं और संपत्ति, भोजन तथा जिम्मेदारियाँ साझा होती थीं। संयुक्त परिवार में बुजुर्गों का सम्मान, आपसी सहयोग, सामूहिक निर्णय और सामाजिक सुरक्षा की भावना मजबूत होती थी। लेकिन औद्योगीकरण, नगरीकरण, शिक्षा, रोजगार के अवसरों और पश्चिमी प्रभाव के कारण परिवार की संरचना में परिवर्तन हुआ है। अब संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल या नाभिकीय परिवारों की संख्या बढ़ रही है, जिसमें केवल पति-पत्नी और उनके बच्चे रहते हैं। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार ने भी परिवार की संरचना और निर्णय-प्रक्रिया को बदला है। अब महिलाएँ भी आर्थिक रूप से योगदान देने लगी हैं, जिससे उनकी स्थिति मजबूत हुई है। बुजुर्गों की स्थिति भी बदली है, क्योंकि पहले जहाँ संयुक्त परिवार में उनका पालन-पोषण स्वाभाविक था, अब वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है। साथ ही परिवार में पीढ़ियों के बीच सोच और जीवन-शैली को लेकर टकराव भी बढ़ा है। इस प्रकार भारतीय परिवार में परंपरा और आधुनिकता का मिश्रण देखने को मिलता है।
प्रश्न 5: भारतीय समाज में असमानता और सामाजिक अन्याय की वास्तविकता की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
भारतीय संविधान समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है, फिर भी व्यवहार में भारतीय समाज आज भी असमानता और सामाजिक अन्याय से ग्रस्त है। जाति, वर्ग, लिंग, धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज में गहरी असमानताएँ विद्यमान हैं। दलित और आदिवासी आज भी गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक भेदभाव का सामना कर रहे हैं। महिलाओं की स्थिति में भी सुधार के बावजूद शिक्षा, रोजगार, वेतन, राजनीति और सुरक्षा के क्षेत्र में गंभीर असमानता बनी हुई है। दहेज, घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याएँ आज भी समाज में मौजूद हैं। आर्थिक असमानता भी तेजी से बढ़ रही है, जहाँ एक ओर कुछ लोग अत्यधिक संपत्ति अर्जित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बड़ी आबादी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही है। धार्मिक और क्षेत्रीय असमानताएँ भी सामाजिक तनाव उत्पन्न करती हैं। सरकार द्वारा आरक्षण, कल्याणकारी योजनाएँ और कानूनी सुरक्षा दी गई हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, कमजोर क्रियान्वयन और सामाजिक जागरूकता की कमी के कारण इनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इस प्रकार भारतीय समाज की वास्तविकता यह दर्शाती है कि आदर्श और व्यवहार के बीच गहरी खाई आज भी मौजूद है, जिसे पाटने के लिए निरंतर सामाजिक संघर्ष और सुधार की आवश्यकता है।
प्रश्न 6: भारतीय समाज में धर्म संस्था की भूमिका एवं सामाजिक महत्व पर चर्चा कीजिए।
धर्म भारतीय समाज की एक अत्यंत प्राचीन, प्रभावशाली और व्यापक सामाजिक संस्था है, जिसने समाज की संरचना, मूल्य-व्यवस्था, नैतिकता, परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया है। भारत को विभिन्न धर्मों की भूमि कहा जाता है, जहाँ हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और अनेक जनजातीय धर्मों के अनुयायी एक साथ रहते हैं। धर्म व्यक्ति को जीवन का अर्थ, आस्था, नैतिक आधार और मानसिक शांति प्रदान करता है। धार्मिक संस्थाएँ जैसे मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे केवल पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता और सहयोग के केंद्र भी हैं। धर्म समाज में अनुशासन, नैतिकता, करुणा, सेवा और परोपकार जैसे मूल्यों को मजबूत करता है। त्योहार, व्रत, धार्मिक यात्राएँ और अनुष्ठान लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं और सामाजिक एकता को बढ़ावा देते हैं। दूसरी ओर, धर्म का एक नकारात्मक पक्ष भी रहा है। जाति व्यवस्था को लंबे समय तक धर्म का आधार मिला, जिससे सामाजिक असमानता और छुआछूत को वैधता मिली। कई बार धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक तनाव, दंगे और हिंसा भी हुई है। आधुनिक भारत में संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करता है, जहाँ सभी धर्मों को समान सम्मान प्राप्त है। फिर भी व्यवहार में धर्म आज भी राजनीति, चुनाव, सामाजिक संबंधों और सामूहिक पहचान को प्रभावित करता है। इस प्रकार धर्म भारतीय समाज में एक ओर सामाजिक एकता और नैतिकता को मजबूत करता है तो दूसरी ओर कभी-कभी विभाजन और संघर्ष का कारण भी बनता है।
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प्रश्न 7: भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
शिक्षा भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त और प्रभावी माध्यम रही है। पारंपरिक भारत में शिक्षा केवल उच्च जातियों तक सीमित थी, जबकि महिलाएँ, दलित और आदिवासी वर्ग इससे वंचित थे। अंग्रेजी शासन के दौरान आधुनिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत हुई, जिससे समाज में चेतना, तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हुआ। स्वतंत्रता के बाद शिक्षा को राष्ट्र निर्माण और सामाजिक सुधार का मुख्य साधन माना गया। भारतीय संविधान ने सभी को समान शिक्षा का अधिकार दिया और बाद में प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया गया। शिक्षा ने जातिवाद, अंधविश्वास, रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दी। दलितों और पिछड़े वर्गों को शिक्षा के माध्यम से आत्मसम्मान, अधिकारों की जानकारी और सामाजिक गतिशीलता का अवसर मिला। महिलाओं की शिक्षा से परिवार, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक निर्णय प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आया। शिक्षा ने लोकतंत्र को भी मजबूत किया, क्योंकि शिक्षित नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर ढंग से समझते हैं। आर्थिक विकास में भी शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि इससे तकनीकी, वैज्ञानिक और प्रशासनिक क्षमता का विकास हुआ। हालाँकि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आज भी अनेक असमानताएँ हैं—ग्रामीण-शहरी अंतर, सरकारी-निजी स्कूलों की खाई, ड्रॉपआउट दर, बेरोजगारी और डिजिटल डिवाइड जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। फिर भी यह स्पष्ट है कि शिक्षा ने भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन, जागरूकता और समानता की दिशा में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
प्रश्न 8: भारतीय समाज में आधुनिकीकरण और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं का विश्लेषण कीजिए।
आधुनिकीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समाज पारंपरिकता से आधुनिकता की ओर बढ़ता है और जीवन के हर क्षेत्र में परिवर्तन आता है। भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया औपनिवेशिक काल से शुरू हुई और स्वतंत्रता के बाद इसका विस्तार तेजी से हुआ। औद्योगीकरण, नगरीकरण, विज्ञान, तकनीक, संचार माध्यमों और आधुनिक शिक्षा ने भारतीय समाज को गहराई से बदल दिया। पारंपरिक जाति आधारित पेशों के स्थान पर आधुनिक उद्योग, सेवा क्षेत्र और तकनीकी कार्यों का विस्तार हुआ, जिससे सामाजिक गतिशीलता बढ़ी। गाँव से शहरों की ओर पलायन बढ़ा और संयुक्त परिवारों के स्थान पर नाभिकीय परिवारों का विकास हुआ। महिलाओं की स्थिति में भी बड़ा परिवर्तन आया, क्योंकि वे अब शिक्षा, रोजगार और राजनीति में भाग लेने लगीं। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र, चुनाव प्रणाली, राजनीतिक दलों और जनभागीदारी ने समाज को आधुनिक दिशा दी। आधुनिकता ने व्यक्ति को स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया। लेकिन आधुनिकीकरण के साथ कई समस्याएँ भी बढ़ीं, जैसे उपभोक्तावाद, बेरोजगारी, पर्यावरण प्रदूषण, सांस्कृतिक टकराव और असमान विकास। ग्रामीण और शहरी भारत तथा अमीर और गरीब के बीच खाई भी गहरी हुई। इस प्रकार भारत में आधुनिकीकरण एक विरोधाभासी प्रक्रिया है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता दोनों साथ-साथ चल रही हैं और सामाजिक परिवर्तन को एक जटिल स्वरूप दे रही हैं।
प्रश्न 9: भारतीय समाज में गरीबी की समस्या की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
गरीबी भारतीय समाज की सबसे गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं में से एक है, जो देश की विकासशील छवि और वास्तविकता के बीच गहरे अंतर को उजागर करती है। गरीबी का अर्थ केवल आय की कमी नहीं है, बल्कि भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के अवसरों की कमी भी है। भारत में गरीबी के ऐतिहासिक कारणों में औपनिवेशिक शोषण, भूमि असमानता, बेरोजगारी, कम मजदूरी, जाति आधारित भेदभाव और संसाधनों का असमान वितरण प्रमुख हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी मुख्यतः भूमिहीनता, कृषि की अस्थिरता और प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी है, जबकि शहरी क्षेत्रों में झुग्गी बस्तियाँ, असंगठित क्षेत्र का रोजगार और असुरक्षा गरीबी को बढ़ावा देते हैं। दलित, आदिवासी, महिलाएँ और अल्पसंख्यक वर्ग गरीबी से सबसे अधिक प्रभावित हैं। सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए अनेक योजनाएँ शुरू की हैं, जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना, खाद्य सुरक्षा योजना आदि। इन योजनाओं से कुछ हद तक राहत मिली है, लेकिन भ्रष्टाचार, कमजोर क्रियान्वयन और अपात्र लोगों तक लाभ पहुँचने जैसी समस्याओं के कारण गरीबी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। गरीबी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी को जन्म देती है और यह एक दुष्चक्र बन जाती है। इस प्रकार गरीबी केवल एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानव गरिमा से जुड़ा हुआ गंभीर प्रश्न है।
प्रश्न 10: भारतीय समाज में असमानता को चुनौती देने में सामाजिक आंदोलनों की भूमिका पर चर्चा कीजिए।
भारतीय समाज में सामाजिक आंदोलनों ने असमानता, अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष करने में ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका निभाई है। सामाजिक आंदोलन वे संगठित प्रयास होते हैं, जिनके माध्यम से समाज के वंचित और शोषित वर्ग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं। भारत में जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध ज्योतिबा फुले, पेरियार और डॉ. भीमराव अंबेडकर के आंदोलनों ने दलितों को शिक्षा, आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए जागरूक किया। महिला आंदोलन ने दहेज, सती प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष कर महिलाओं को कानूनी सुरक्षा और सामाजिक पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। किसान और मजदूर आंदोलनों ने भूमि सुधार, उचित मजदूरी और श्रम अधिकारों की माँग को मजबूती दी। पर्यावरण आंदोलनों जैसे चिपको आंदोलन और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विस्थापन, जंगल कटाई और पर्यावरण विनाश के विरुद्ध जनचेतना पैदा की। हाल के वर्षों में आदिवासी, अल्पसंख्यक, विकलांग और एलजीबीटीक्यू समुदायों के अधिकारों के लिए आंदोलन भी उभरे हैं। इन आंदोलनों के कारण कई कानून बने, नीतियाँ बदलीं और सामाजिक सोच में परिवर्तन आया। हालाँकि आंदोलनों को सरकारी दमन, आंतरिक मतभेद और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, फिर भी यह सत्य है कि सामाजिक आंदोलनों ने भारतीय समाज को अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और लोकतांत्रिक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
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