IGNOU FREE BPCG-176 जेंडर मनोविज्ञान Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BPCG-176 जेंडर मनोविज्ञान Solved Guess Paper 2025

प्रश्न 1: जेंडर क्या है? जेंडर और सेक्स में अंतर स्पष्ट कीजिए।

जेंडर और सेक्स दोनों शब्दों का प्रयोग सामान्यतः एक ही अर्थ में कर लिया जाता है, जबकि वास्तव में दोनों में मूलभूत अंतर है। सेक्स का संबंध व्यक्ति की जैविक संरचना से होता है, जो जन्म के समय ही निर्धारित हो जाती है, जैसे पुरुष या स्त्री। इसके विपरीत जेंडर एक सामाजिक और सांस्कृतिक अवधारणा है, जो यह बताती है कि समाज किसी व्यक्ति से पुरुष या स्त्री होने के आधार पर किस प्रकार के व्यवहार, कार्य और भूमिकाओं की अपेक्षा करता है। सेक्स अपरिवर्तनीय होता है, जबकि जेंडर परिवर्तनशील होता है और समय, समाज तथा संस्कृति के अनुसार बदलता रहता है। उदाहरण के रूप में, समाज यह मानता है कि पुरुष को मजबूत, साहसी और परिवार का पालन-पोषण करने वाला होना चाहिए, जबकि स्त्री को कोमल, सहनशील और गृहकार्य करने वाली माना जाता है। यह सभी धारणाएँ जैविक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से निर्मित होती हैं। अलग-अलग संस्कृतियों में जेंडर की भूमिकाएँ अलग-अलग देखने को मिलती हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जेंडर कोई प्राकृतिक नियम नहीं है, बल्कि सामाजिक निर्माण है। आधुनिक समय में यह भी स्वीकार किया जाने लगा है कि जेंडर केवल दो वर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक विस्तृत अवधारणा है। इस प्रकार, सेक्स जैविक पहचान है जबकि जेंडर सामाजिक पहचान है, और दोनों के बीच का अंतर समझना लैंगिक समानता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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प्रश्न 2: जेंडर समाजीकरण क्या है? इसके प्रमुख माध्यमों का वर्णन कीजिए।

जेंडर समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति यह सीखता है कि उसे समाज में एक पुरुष या स्त्री के रूप में किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। जन्म के समय बच्चा केवल जैविक लिंग के साथ पैदा होता है, परंतु जैसे-जैसे वह समाज के संपर्क में आता है, वह अपने जेंडर से जुड़ी भूमिकाएँ और अपेक्षाएँ सीखने लगता है। परिवार जेंडर समाजीकरण का पहला और सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होता है, जहाँ लड़कों को मजबूत, आत्मनिर्भर और बाहर के कार्यों के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि लड़कियों को शांत, आज्ञाकारी और घरेलू कार्यों के लिए तैयार किया जाता है। विद्यालय भी जेंडर समाजीकरण को प्रभावित करता है, जहाँ पुस्तकों, शिक्षकों और गतिविधियों के माध्यम से लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग व्यवहार अपेक्षित किए जाते हैं। मीडिया जैसे टेलीविजन, फिल्में और विज्ञापन पुरुष को शक्तिशाली और स्त्री को सुंदर तथा कोमल रूप में चित्रित करते हैं, जिससे बच्चों के मन में जेंडर से जुड़ी धारणाएँ गहराई से बैठ जाती हैं। इसके अतिरिक्त समाज, परंपराएँ, रीति-रिवाज और धर्म भी जेंडर समाजीकरण को मजबूती प्रदान करते हैं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लड़के अपनी भावनाओं को दबाना सीखते हैं और लड़कियाँ स्वयं को कमजोर मानने लगती हैं। वर्तमान समय में शिक्षा, जागरूकता और लैंगिक समानता के प्रयासों के माध्यम से जेंडर समाजीकरण में सकारात्मक परिवर्तन लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

प्रश्न 3: जेंडर के जैविक दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए।

जेंडर का जैविक दृष्टिकोण यह मानता है कि पुरुष और स्त्री के बीच पाए जाने वाले मानसिक, भावनात्मक और व्यवहारिक अंतर उनके शारीरिक ढाँचे, हार्मोनों और अनुवांशिक संरचना के कारण होते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन की अधिकता होती है, जिसके कारण उनमें आक्रामकता, साहस और प्रतिस्पर्धा की प्रवृत्ति अधिक होती है, जबकि स्त्रियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की अधिकता होती है, जिससे उनमें कोमलता, सहनशीलता और मातृत्व की भावना अधिक विकसित होती है। मस्तिष्क की संरचना से जुड़े अध्ययनों में भी यह बताया गया है कि पुरुष और स्त्री की सोच और निर्णय लेने की प्रक्रिया में कुछ अंतर पाए जाते हैं। यह दृष्टिकोण महिलाओं की मातृत्व भूमिका को भी प्राकृतिक बताता है। जैविक दृष्टिकोण का मुख्य लाभ यह है कि यह लैंगिक अंतर को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है, किंतु इसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों की उपेक्षा करता है। कई बार यह दृष्टिकोण लैंगिक असमानता को भी प्राकृतिक सिद्ध करने का प्रयास करता है, जो सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिए आधुनिक मनोविज्ञान में यह माना जाता है कि जेंडर को केवल जैविक आधार पर नहीं समझा जा सकता।

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प्रश्न 4: जेंडर के सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण को समझाइए।

जेंडर का सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण यह मानता है कि पुरुष और स्त्री के बीच पाए जाने वाले अंतर जैविक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से उत्पन्न होते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार व्यक्ति के व्यवहार, सोच और भूमिकाएँ समाज द्वारा निर्धारित की जाती हैं। परिवार, शिक्षा, मीडिया, धर्म, परंपराएँ और रीति-रिवाज मिलकर जेंडर की पहचान का निर्माण करते हैं। अलग-अलग समाजों में जेंडर से जुड़ी अपेक्षाएँ अलग-अलग होती हैं, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जेंडर एक सामाजिक रचना है। उदाहरण के रूप में, कुछ समाजों में महिलाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं, जबकि कुछ समाजों में उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित रखा जाता है। यह अंतर जैविक नहीं बल्कि सांस्कृतिक है। सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण का मुख्य उद्देश्य लैंगिक समानता को बढ़ावा देना और रूढ़िवादी धारणाओं को तोड़ना है। इस दृष्टिकोण के माध्यम से यह भी स्पष्ट होता है कि शिक्षा, कानून और सामाजिक जागरूकता के द्वारा लैंगिक भेदभाव को कम किया जा सकता है। आज महिला सशक्तिकरण और मानवाधिकार आंदोलनों की नींव इसी दृष्टिकोण पर आधारित है।

प्रश्न 5: जेंडर, समूह और संस्कृति के आपसी संबंध की व्याख्या कीजिए।

जेंडर, समूह और संस्कृति के बीच गहरा और परस्पर संबंध होता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी सामाजिक समूह का सदस्य होता है, जैसे परिवार, मित्र, विद्यालय या समाज, और यही समूह उसके व्यवहार, सोच और जेंडर पहचान को प्रभावित करता है। बालक और बालिका अपने साथियों के समूह से यह सीखते हैं कि उन्हें किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। लड़कों के समूह में साहस, प्रतिस्पर्धा और भावनाओं को छुपाना सामान्य माना जाता है, जबकि लड़कियों के समूह में सहयोग, संवेदनशीलता और भावनात्मक अभिव्यक्ति को अधिक महत्व दिया जाता है। संस्कृति भी जेंडर भूमिकाओं को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष को शक्ति, अधिकार और निर्णय का केंद्र माना जाता है, जबकि स्त्री को अधीनस्थ और सेवा की भूमिका में रखा जाता है। इसके विपरीत कुछ मातृसत्तात्मक समाजों में स्त्रियों को अधिक अधिकार और सम्मान प्राप्त होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि जेंडर कोई स्थायी अवधारणा नहीं है, बल्कि यह समूह और संस्कृति के अनुसार बदलती रहती है। जैसे-जैसे समाज और संस्कृति में परिवर्तन आता है, वैसे-वैसे जेंडर भूमिकाओं में भी परिवर्तन होता है। आधुनिक शिक्षा और शहरीकरण के प्रभाव से पारंपरिक जेंडर भूमिकाएँ धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं।

प्रश्न 6: जेंडर पहचान (Gender Identity) क्या है? यह कैसे विकसित होती है?

जेंडर पहचान वह आंतरिक अनुभूति है जिसके आधार पर व्यक्ति स्वयं को पुरुष, स्त्री या किसी अन्य जेंडर के रूप में पहचानता है। यह केवल जैविक लिंग पर आधारित नहीं होती, बल्कि व्यक्ति की मानसिक अनुभूति, सामाजिक अनुभव और आत्मबोध से जुड़ी होती है। जेंडर पहचान का विकास बचपन से ही प्रारंभ हो जाता है। लगभग दो से तीन वर्ष की आयु में बच्चा यह समझने लगता है कि वह लड़का है या लड़की। इसके बाद उसने जो समाज, परिवार, मित्र और विद्यालय से अनुभव प्राप्त किए होते हैं, वे उसकी जेंडर पहचान को लगातार आकार देते रहते हैं। माता-पिता की अपेक्षाएँ, उनके द्वारा दिया गया व्यवहार, खिलौनों का चयन, कपड़े, खेल और भाषा — ये सभी जेंडर पहचान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विद्यालय में शिक्षक और सहपाठी भी बच्चे की पहचान को प्रभावित करते हैं। मीडिया के माध्यम से दिखाई जाने वाली स्त्री-पुरुष की छवियाँ भी जेंडर पहचान को मजबूत करती हैं। यदि बच्चा ऐसे वातावरण में पलता है जहाँ जेंडर को कठोर रूप में बाँटा गया हो, तो उसकी पहचान भी उसी ढाँचे में ढल जाती है। इसके विपरीत यदि उसे समानता और स्वतंत्रता का वातावरण मिले, तो उसकी जेंडर पहचान अधिक आत्मविश्वासी और संतुलित होती है। कुछ मामलों में व्यक्ति की जैविक पहचान और उसकी मानसिक जेंडर पहचान मेल नहीं खाती, जिससे उसमें आंतरिक द्वंद्व उत्पन्न होता है। आधुनिक मनोविज्ञान यह स्वीकार करता है कि जेंडर पहचान एक जटिल, बहुआयामी और समय के साथ विकसित होने वाली प्रक्रिया है।

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प्रश्न 7: जेंडर स्टीरियोटाइप (Gender Stereotypes) क्या हैं? इनके समाज पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।

जेंडर स्टीरियोटाइप वे पूर्वनिर्धारित और कठोर धारणाएँ होती हैं, जो समाज यह मानकर बना लेता है कि पुरुष और स्त्री को किस प्रकार का होना चाहिए और कैसा व्यवहार करना चाहिए। उदाहरण के रूप में यह मानना कि पुरुष मजबूत होते हैं, भावनाएँ व्यक्त नहीं करते और परिवार का खर्च उठाते हैं, जबकि स्त्रियाँ कोमल, भावुक और घर सँभालने वाली होती हैं — ये सभी जेंडर स्टीरियोटाइप के उदाहरण हैं। ये धारणाएँ व्यक्ति की वास्तविक क्षमताओं और रुचियों को सीमित कर देती हैं। इनका समाज पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। जेंडर स्टीरियोटाइप के कारण लड़कियों को शिक्षा, खेल और नेतृत्व के अवसरों से वंचित कर दिया जाता है और लड़कों पर यह दबाव होता है कि वे अपनी भावनाओं को छिपाएँ और हर स्थिति में मजबूत दिखें। इसका परिणाम यह होता है कि दोनों ही मानसिक तनाव, असंतोष और पहचान के संकट से गुजरते हैं। ये स्टीरियोटाइप कार्यस्थल पर भी असमानता पैदा करते हैं, जहाँ पुरुषों को अधिक योग्य और स्त्रियों को कम सक्षम माना जाता है। मीडिया इन धारणाओं को और मजबूत करता है, जब वह बार-बार एक ही प्रकार की पुरुष और स्त्री छवि प्रस्तुत करता है। वर्तमान समय में शिक्षा, जागरूकता और महिला सशक्तिकरण के माध्यम से इन स्टीरियोटाइप को तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि समाज में वास्तविक समानता स्थापित हो सके।

प्रश्न 8: जेंडर भेदभाव (Gender Discrimination) क्या है? इसके कारण और प्रभाव बताइए।

जेंडर भेदभाव वह स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति के साथ केवल उसके जेंडर के आधार पर अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाता है। यह भेदभाव सामान्यतः स्त्रियों के विरुद्ध अधिक देखने को मिलता है, हालाँकि कई बार पुरुष भी इसके शिकार होते हैं। जेंडर भेदभाव के प्रमुख कारणों में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था, अशिक्षा, रूढ़िवादी परंपराएँ, आर्थिक निर्भरता और जेंडर स्टीरियोटाइप शामिल हैं। परिवार में लड़के को अधिक महत्व देना, उसकी शिक्षा पर अधिक खर्च करना और लड़की को घर के कामों तक सीमित रखना — ये सभी जेंडर भेदभाव के उदाहरण हैं। समाज में रोजगार, वेतन, पदोन्नति और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। इसका प्रभाव व्यक्ति और समाज दोनों पर गहरा पड़ता है। महिलाएँ आत्मविश्वास की कमी, मानसिक तनाव और आर्थिक निर्भरता से ग्रस्त हो जाती हैं, जबकि समाज उनकी क्षमताओं से वंचित रह जाता है। जेंडर भेदभाव विकास की गति को धीमा करता है और सामाजिक असंतुलन को जन्म देता है। वर्तमान समय में शिक्षा, कानून, महिला अधिकार आंदोलनों और सरकारी योजनाओं के माध्यम से जेंडर भेदभाव को समाप्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि एक समान, न्यायपूर्ण और संतुलित समाज का निर्माण किया जा सके।

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प्रश्न 9: जेंडर-भेद के मनोवैज्ञानिक प्रभावों की व्याख्या कीजिए।

जेंडर-भेद के मनोवैज्ञानिक प्रभाव अत्यंत गहरे और दीर्घकालिक होते हैं, जो व्यक्ति के आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। जब किसी व्यक्ति के साथ बार-बार केवल उसके जेंडर के आधार पर भेदभाव किया जाता है, तो वह स्वयं को हीन, कमजोर और अक्षम समझने लगता है। विशेष रूप से स्त्रियाँ इस प्रकार के भेदभाव से अवसाद, चिंता, भय और आत्मग्लानि जैसी मानसिक समस्याओं का शिकार हो जाती हैं। बचपन से ही यदि लड़की को यह सिखाया जाए कि वह लड़कों से कम सक्षम है, तो उसकी सोच सीमित हो जाती है और वह अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाती। इसी प्रकार लड़कों पर यह दबाव होता है कि वे कभी रोएँ नहीं, कमजोर न दिखें और भावनाएँ प्रकट न करें, जिसका परिणाम यह होता है कि वे भावनात्मक रूप से असंतुलित हो सकते हैं। जेंडर-भेद सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करता है और आपसी विश्वास तथा सहयोग की भावना को कमजोर करता है। यह समाज में तनाव, हिंसा और असंतोष को बढ़ावा देता है। इसलिए यह आवश्यक है कि जेंडर-भेद को केवल सामाजिक समस्या न मानकर एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या के रूप में भी समझा जाए और इसे समाप्त करने के लिए संवेदनशीलता, समानता और सम्मान को बढ़ावा दिया जाए।

प्रश्न 10: जेंडर समानता (Gender Equality) का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।

जेंडर समानता का अर्थ है समाज में सभी व्यक्तियों को, चाहे वे किसी भी जेंडर के हों, समान अधिकार, अवसर, सम्मान और स्वतंत्रता प्राप्त होना। इसका आशय यह नहीं है कि सभी को एक जैसा बना दिया जाए, बल्कि यह कि सभी को अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का समान अवसर मिले। जेंडर समानता का महत्व व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय सभी स्तरों पर अत्यंत आवश्यक है। जब समाज में जेंडर समानता होती है, तब महिलाएँ और पुरुष दोनों अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर पाते हैं, जिससे समाज का सर्वांगीण विकास होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और राजनीति के क्षेत्र में समान अवसर मिलने से महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे आत्मनिर्भर बनती हैं। जेंडर समानता से पारिवारिक संबंध भी संतुलित होते हैं और आपसी सम्मान की भावना मजबूत होती है। आर्थिक विकास में भी इसका विशेष योगदान है, क्योंकि जब महिलाएँ कार्यबल का हिस्सा बनती हैं तो देश की उत्पादकता बढ़ती है। जेंडर समानता सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों का मूल आधार है। वर्तमान समय में सरकार, शैक्षिक संस्थान और सामाजिक संगठन मिलकर जेंडर समानता को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएँ और जागरूकता अभियान चला रहे हैं, जिससे आने वाले समय में एक अधिक समान, सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण हो सके।

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