IGNOU FREE BPCG-175 जीवन यापन के लिए मनोविज्ञान Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BPCG-175 जीवन यापन के लिए मनोविज्ञान Solved Guess Paper 2025

Q1. मनोविज्ञान और ‘स्व’ (Self) की अवधारणा समझाइए। मनोविज्ञान ‘स्व’ के विकास को कैसे समझाता है?

मनोविज्ञान मानव व्यवहार, मानसिक प्रक्रियाओं, भावनाओं और पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। मनोविज्ञान का एक प्रमुख क्षेत्र “स्व” (Self) को समझना है, जो व्यक्ति की पहचान, व्यक्तित्व, विचारों, भावनाओं, उद्देश्यों और आत्म-धारणा को दर्शाता है। “स्व” कोई स्थिर इकाई नहीं है; यह अनुभवों, सामाजिक संपर्कों और व्यक्तिगत चिंतन से निरंतर विकसित होता रहता है। जन्म से लेकर वयस्कता तक व्यक्ति विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों—घर, विद्यालय, मित्र, संस्कृति—से सीखता है और उनके आधार पर अपना आत्म-संकल्प (self-concept) बनाता है। विलियम जेम्स, जॉर्ज मीड और कार्ल रोजर्स जैसे मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि आत्मसम्मान, आत्म-छवि और व्यक्तिगत पहचान सामाजिक अनुभवों और आत्म-चिंतन से विकसित होती है।

मनोविज्ञान यह भी समझाता है कि भावनाएँ, प्रेरणा, संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ और सामाजिक अपेक्षाएँ “स्व” को कैसे आकार देती हैं। नकारात्मक सोच, आघात, सामाजिक तुलना या असुरक्षित वातावरण “स्व” को कमजोर कर देते हैं, जबकि सकारात्मक प्रतिक्रिया, समर्थन और आत्म-जागरूकता “स्व” को मजबूत बनाती है। थेरेपी, परामर्श और स्वयं-चिंतन की तकनीकें व्यक्ति को अपनी भावनाओं, कमजोरियों, ताकतों और व्यवहार पैटर्न को समझने में मदद करती हैं। इससे आत्म-नियंत्रण, आत्मविश्वास, बेहतर संबंध और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। इस प्रकार मनोविज्ञान न केवल “स्व” को समझने में मदद करता है, बल्कि उसे विकसित करने और सुदृढ़ बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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Q2. स्व के सहसंबंध—आत्मसम्मान, स्व-प्रभावकारिता (Self-Efficacy) और आत्म-नियमन पर चर्चा कीजिए। ये व्यवहार को कैसे प्रभावित करते हैं?

आत्मसम्मान वह मूल्यांकन है जो व्यक्ति स्वयं के बारे में करता है। यह सफलता, असफलता, संबंधों और अनुभवों से प्रभावित होता है। उच्च आत्मसम्मान वाला व्यक्ति अधिक आत्मविश्वासी, सक्रिय और भावनात्मक रूप से स्थिर होता है, जबकि कम आत्मसम्मान चिंता, असुरक्षा और नकारात्मक सोच पैदा करता है। स्व-प्रभावकारिता, जिसे एल्बर्ट बंडूरा ने विकसित किया, वह विश्वास है कि व्यक्ति किसी कार्य को सफलतापूर्वक कर पाएगा। उच्च स्व-प्रभावकारिता वाले व्यक्ति चुनौतियों को अवसर के रूप में देखते हैं और कठिन परिस्थितियों में भी लगातार प्रयास करते हैं। आत्म-नियमन व्यक्ति की वह क्षमता है जिससे वह अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित कर पाता है। ये तीनों मिलकर “स्व” की मजबूती को निर्धारित करते हैं।

व्यवहार पर इनका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। जो व्यक्ति उच्च आत्मसम्मान और उच्च स्व-प्रभावकारिता रखता है, वह चुनौतियों का सामना धैर्य और आत्मविश्वास से करता है। आत्म-नियमन वाले लोग तनाव को नियंत्रित करते हैं, आवेगों पर काबू रखते हैं और दीर्घकालिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यदि व्यक्ति में ये तीनों कमज़ोर हों, तो वह तनाव, आक्रामकता, अवसाद या गलत निर्णय जैसे समस्याओं से जूझ सकता है। मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप—जैसे संज्ञानात्मक-व्यवहारिक तकनीक, माइंडफुलनेस और प्रेरक प्रशिक्षण—इन सहसंबंधों को मजबूत करते हैं और स्वस्थ व्यवहार को बढ़ावा देते हैं। इस प्रकार, आत्मसम्मान, स्व-प्रभावकारिता और आत्म-नियमन स्वस्थ व्यक्तित्व और सफल जीवन के आधारस्तंभ हैं।

Q3. स्व, अनुपयुक्ति (Maladjustment) और मानसिक विकारों के बीच संबंध समझाइए। ‘स्व’ में असंतुलन मनोवैज्ञानिक समस्याएँ कैसे उत्पन्न करता है?

अनुपयुक्ति तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों या आंतरिक संघर्षों के साथ प्रभावी रूप से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। “स्व” इस प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि व्यक्ति स्थितियों की व्याख्या अपने आत्म-संकल्प के आधार पर करता है। जब “स्व” नकारात्मक, कमजोर या अस्थिर हो जाता है, तो व्यक्ति में भय, अपराधबोध, हीनता भावना, असुरक्षा और निराशा जैसी भावनाएँ बढ़ने लगती हैं। यह चिंता विकार, अवसाद, सामाजिक भय और पहचान भ्रम जैसी समस्याएँ पैदा कर सकता है। आत्म-नियमन की कमी और विकृत सोच पैटर्न व्यक्ति को संघर्षों से भागने, असामान्य व्यवहार अपनाने या स्वयं को नुकसान पहुँचाने की ओर ले जा सकते हैं।

असमाधित बचपन के अनुभव, आघात, आलोचना, सामाजिक अस्वीकृति और तनाव भी “स्व” को क्षति पहुँचाते हैं। व्यक्तित्व विकार, जैसे Borderline Personality Disorder, सीधे एक अस्थिर और खंडित “स्व” से जुड़े होते हैं। अवसाद में व्यक्ति स्वयं को नकारात्मक रूप से देखता है, जबकि चिंता विकार में स्वयं को लगातार खतरे में महसूस करता है। मनोचिकित्सा (therapy) का उद्देश्य “स्व” को पुनर्निर्मित करना है—अर्थात् नकारात्मक विचारों को बदलना, भावनाओं को संतुलित करना, आत्मसम्मान बढ़ाना और वास्तविकता-आधारित आत्म-संकल्प विकसित करना। इस प्रकार, मानसिक विकारों का मूल कारण अक्सर “स्व” की कमजोर संरचना होती है, और उसका सुदृढ़ होना मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है।

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Q4. सकारात्मक विकास (Positive Growth) की अवधारणा समझाइए। व्यक्ति अनुपयुक्ति से सकारात्मक कार्यप्रणाली की ओर कैसे बढ़ता है?

सकारात्मक विकास वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपनी क्षमताओं, संभावनाओं और शक्तियों को पहचानकर एक संतुलित, अर्थपूर्ण और सफल जीवन की ओर बढ़ता है। यह विकास भावनात्मक परिपक्वता, आत्म-स्वीकार, लचीलापन (resilience), रचनात्मकता और आंतरिक प्रेरणा पर आधारित है। मानवतावादी मनोवैज्ञानिक कार्ल रोजर्स और मैस्लो मानते थे कि हर व्यक्ति के भीतर स्व-विकास की क्षमता होती है, लेकिन इसे उभरने के लिए सहायक वातावरण और आत्म-जागरूकता की आवश्यकता होती है। सकारात्मक विकास का अर्थ समस्याओं का अभाव नहीं है, बल्कि उन्हें समझदारी और दृढ़ता से सामना करने की क्षमता है।

अनुपयुक्ति से सकारात्मक विकास की यात्रा में व्यक्ति नकारात्मक सोच, भावनात्मक असंतुलन और व्यवहारिक समस्याओं को पहचानकर उन्हें सुधारता है। संज्ञानात्मक-व्यवहारिक तकनीकें, माइंडफुलनेस, ध्यान, सामाजिक समर्थन और भावनात्मक प्रशिक्षण इस परिवर्तन में सहायक होते हैं। जैसे-जैसे व्यक्ति आत्म-नियमन, आत्मविश्वास और समस्या-समाधान कौशल विकसित करता है, वह जीवन के निर्णय अधिक परिपक्वता से ले पाता है। उद्देश्य निर्धारण, आत्म-चिंतन और सकारात्मक संबंध व्यक्ति को मजबूत बनाते हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति न केवल समस्याओं से उबरता है, बल्कि उच्च स्तर की संतुष्टि, खुशी और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करता है। यही सकारात्मक विकास है।

Q5. जीवनकाल (Life Span) में सकारात्मक विकास को बढ़ावा देने में मनोविज्ञान की भूमिका समझाइए।

मनोविज्ञान जीवन के प्रत्येक चरण—बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवा अवस्था, मध्य आयु और वृद्धावस्था—में सकारात्मक विकास को बढ़ावा देता है। बाल्यावस्था में यह विकास संज्ञानात्मक कौशल, भावनात्मक अभिव्यक्ति, सुरक्षित लगाव (attachment) और सामाजिक व्यवहार के माध्यम से होता है। किशोरावस्था में मनोविज्ञान पहचान निर्माण, भावनात्मक संतुलन, आत्मसम्मान, संघर्ष समाधान और निर्णय-निर्माण में मार्गदर्शन देता है। वयस्कता में मनोविज्ञान कार्य-जीवन संतुलन, संबंध, तनाव प्रबंधन, करियर विकास और आत्म-विकास के लिए आवश्यक उपकरण प्रदान करता है।

वृद्धावस्था में मनोविज्ञान अकेलेपन, स्वास्थ्य समस्याओं, भूमिका परिवर्तन और जीवन के अर्थ को समझने में सहायता करता है। सकारात्मक मनोविज्ञान—जैसे कृतज्ञता, आशावाद, mindfulness, जीवन का उद्देश्य—हर आयु में मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करता है। परामर्श, थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति को चुनौतियों से निपटने, लचीलापन बढ़ाने और संतोषपूर्ण जीवन जीने में मदद करते हैं। इस प्रकार, मनोविज्ञान जीवनभर विकास, आत्म-विस्तार, और मानसिक कल्याण का आधार प्रदान करता है।

Q6. भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) क्या है? स्वस्थ अनुकूलन (Healthy Adjustment) में इसकी क्या भूमिका है?

भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EI) वह क्षमता है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी भावनाओं को पहचानता, समझता, नियंत्रित करता है और दूसरों की भावनाओं की भी सटीक व्याख्या कर पाता है। डेनियल गोल्मैन के अनुसार EI के पाँच मुख्य घटक हैं—आत्म-जागरूकता, आत्म-नियमन, प्रेरणा, सहानुभूति और सामाजिक कौशल। उच्च EI वाला व्यक्ति अपने भावनात्मक ट्रिगर को पहचानकर उचित प्रतिक्रिया देता है, तनाव के दौरान शांत रहता है और संबंधों को सहयोगपूर्ण बनाए रखता है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता निर्णय लेने में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भावनाएँ व्यक्ति के विचारों और व्यवहार को गहराई से प्रभावित करती हैं। EI वाले लोग अधिक संतुलित, आत्मविश्वासी और लचीले होते हैं तथा विपरीत परिस्थितियों में भी शांतिपूर्ण व्यवहार बनाए रखते हैं।

स्वस्थ अनुकूलन में EI की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जीवन में आने वाले तनाव, असफलता, संघर्ष और अनिश्चितता का सामना वही लोग अच्छे से कर पाते हैं जिनमें भावनात्मक संतुलन और लचीलापन होता है। EI व्यक्ति को आक्रोश, निराशा, भय और चिंता जैसी नकारात्मक भावनाओं को संभालने में सक्षम बनाता है। यह रिश्तों में सामंजस्य, सहानुभूति और समझ बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति सामाजिक रूप से बेहतर जुड़ाव बना पाता है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता मानसिक स्वास्थ्य का भी रक्षक है क्योंकि यह नकारात्मक भावनाओं को कम करता है और सकारात्मक सोच को बढ़ाता है। इस प्रकार, भावनात्मक बुद्धिमत्ता स्वस्थ, संतुलित और सफल जीवन का आधार है।

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Q7. तनाव प्रबंधन में सामंजस्य रणनीतियों (Coping Strategies) की भूमिका समझाइए।

सामंजस्य रणनीतियाँ (Coping Strategies) वे मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक तरीके हैं जिनसे व्यक्ति तनावपूर्ण परिस्थितियों, भावनाओं और चुनौतियों का प्रबंधन करता है। Lazarus और Folkman ने दो प्रमुख प्रकार बताए—समस्या-केंद्रित सामंजस्य (Problem-Focused Coping) और भावना-केंद्रित सामंजस्य (Emotion-Focused Coping)। समस्या-केंद्रित रणनीतियों में समस्या को हल करना, जानकारी इकट्ठा करना, समय प्रबंधन और योजना बनाना शामिल है। भावनात्मक रणनीतियों में ध्यान, गहरी साँस, माइंडफुलनेस, सामाजिक समर्थन, भावनात्मक अभिव्यक्ति और विश्राम तकनीकें आती हैं। Meaning-Focused Coping व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक अर्थ खोजने में सहायता करता है। ये सभी रणनीतियाँ तनाव को कम करती हैं, निर्णय क्षमता बढ़ाती हैं और भावनात्मक संतुलन बनाए रखती हैं।

तनाव प्रबंधन में इन रणनीतियों की भूमिका अत्यधिक व्यापक है। अनुकूल सामंजस्य तकनीकें—जैसे व्यायाम, जर्नलिंग, काउंसलिंग, ध्यान—मानसिक स्थिरता बढ़ाती हैं और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार करती हैं। इसके विपरीत, अनुपयुक्त रणनीतियाँ—जैसे नशा, परिहार, आक्रामकता—तनाव को और बढ़ाती हैं। प्रभावी coping resilience विकसित करती है, जिससे व्यक्ति भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनता है। ये रणनीतियाँ संबंधों में सामंजस्य बनाए रखती हैं क्योंकि व्यक्ति संघर्षों को शांत और तर्कपूर्ण ढंग से संभालता है। कुल मिलाकर, coping strategies व्यक्ति को मानसिक मजबूती, कल्याण और संतुलित जीवन प्राप्त करने में अत्यंत सहायक होती हैं।

Q8. स्व-अभिपूर्ति (Self-Actualization) क्या है? इसके लक्षण और व्यक्तिगत विकास में इसका महत्व बताइए।

स्व-अभिपूर्ति (Self-Actualization) अब्राहम मैस्लो द्वारा दी गई अवधारणा है, जो व्यक्ति की उच्चतम क्षमता और प्राकृतिक प्रतिभाओं के पूर्ण विकास को दर्शाती है। मैस्लो के अनुसार यह आवश्यकता-क्रम (Hierarchy of Needs) के सर्वोच्च स्तर पर स्थित होती है। स्व-अभिपूर्ण व्यक्ति रचनात्मक, स्वतंत्र, प्रामाणिक, आत्म-जागरूक, नैतिक विचारों वाला और समस्या-समाधान में सक्षम होता है। ऐसे व्यक्ति बाहरी मान्यता पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि आंतरिक मूल्यों द्वारा संचालित होते हैं। वे नए अनुभवों के लिए खुले होते हैं और जीवन को गहराई से समझने की क्षमता रखते हैं। वे अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए लगातार आत्म-विकास की दिशा में कार्य करते हैं।

स्व-अभिपूर्ति व्यक्तिगत विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह व्यक्ति को जीवित रहने की अवस्था से ऊपर उठाकर अर्थपूर्ण जीवन की ओर ले जाती है। यह मानसिक स्वतंत्रता, आत्म-स्वीकार और संतुष्टि प्रदान करती है। स्व-अभिपूर्ण व्यक्ति तनाव और विपरीत परिस्थितियों में भी संतुलित रहता है और दूसरों के प्रति करुणा और सहानुभूति रखता है। यह उच्च स्तर की मनोवैज्ञानिक क्षमता व्यक्ति को रचनात्मकता, नवाचार और सकारात्मक सोच विकसित करने में मदद करती है। अंततः यह जीवन में उद्देश्य की भावना, बेहतर संबंध और सुख-समृद्धि लाती है। इसलिए self-actualization मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता दोनों का महत्वपूर्ण आधार है।

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Q9. स्वस्थ जीवन और मनोवैज्ञानिक कल्याण में पारस्परिक संबंधों (Interpersonal Relationships) का महत्व समझाइए।

पारस्परिक संबंध (Interpersonal Relationships) मानव जीवन के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितना भोजन या सुरक्षा। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य भावनात्मक समर्थन, जुड़ाव, सुरक्षा और स्वीकृति की आवश्यकता महसूस करता है। स्वस्थ संबंध व्यक्ति को सहारा, प्रेरणा, सलाह और भावनात्मक शक्ति प्रदान करते हैं। परिवार, मित्र, जीवनसाथी और सहकर्मी व्यक्ति के आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और मानसिक स्थिरता को बढ़ाते हैं। सकारात्मक संबंध तनाव को कम करते हैं, अकेलापन घटाते हैं और खुशी की भावना बढ़ाते हैं। विभिन्न मनोवैज्ञानिक सिद्धांत—जैसे attachment theory—यह बताते हैं कि बचपन में सुरक्षित संबंध आगे के जीवन में व्यक्ति की भावनात्मक परिपक्वता और स्थिरता तय करते हैं।

पारस्परिक संबंध शारीरिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालते हैं। जिन लोगों का social support strong होता है, उनमें ब्लड प्रेशर कम होता है, immunity बेहतर होती है और chronic illness का खतरा कम होता है। सकारात्मक संबंध व्यक्ति को स्वस्थ आदतें अपनाने—जैसे व्यायाम, संतुलित आहार, समय पर चिकित्सा—के लिए प्रेरित करते हैं। इसके विपरीत, तनावपूर्ण या विषाक्त (toxic) संबंध मानसिक थकान, चिंता, अवसाद और नींद की गड़बड़ी पैदा करते हैं। प्रभावी संचार, सहानुभूति, संघर्ष समाधान और सीमाओं का सम्मान स्वस्थ संबंधों की कुंजी हैं। इसलिए मजबूत और संतुलित पारस्परिक संबंध मानसिक स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और जीवन की गुणवत्ता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

Q10. सकारात्मक मनोविज्ञान (Positive Psychology) खुशी, लचीलापन (Resilience) और जीवन-संतुष्टि को कैसे बढ़ाता है?

सकारात्मक मनोविज्ञान मानव शक्तियों, गुणों और जीवन को संतोषपूर्ण बनाने वाले कारकों का अध्ययन करता है। यह केवल बीमारी का उपचार नहीं, बल्कि सुख, आशावाद, कृतज्ञता, करुणा, रचनात्मकता और उद्देश्यपूर्ण जीवन पर केंद्रित है। सकारात्मक भावनाएँ—जैसे आनंद, प्रेम, संतोष—मस्तिष्क को विस्तारित और सशक्त करती हैं, जिससे व्यक्ति अधिक रचनात्मक, लचीला और समस्या-समाधान में सक्षम बनता है। Fredrickson के broaden-and-build सिद्धांत के अनुसार सकारात्मक भावनाएँ दीर्घकालिक मानसिक संसाधन बनाती हैं। gratitude journaling, mindfulness, kindness activities और goal-setting जैसी तकनीकें खुशी बढ़ाती हैं और नकारात्मक भावनाएँ कम करती हैं।

सकारात्मक मनोविज्ञान लचीलापन को भी मजबूत करता है, जिससे व्यक्ति तनाव, विपरीत परिस्थितियों और असफलताओं से उभरकर आगे बढ़ पाता है। आशावाद, स्व-प्रभावकारिता, सामाजिक समर्थन और आत्म-स्वीकृति resilience के मूल तत्व हैं। इन गुणों से व्यक्ति बाधाओं को अवसर के रूप में देखता है, अधिक धैर्यवान बनता है और मानसिक रूप से मजबूत होता है। सकारात्मक मनोविज्ञान जीवन संतुष्टि को बढ़ाता है क्योंकि यह व्यक्ति को जीवन का अर्थ, उद्देश्य और दिशा प्रदान करता है। यह मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को कम करता है, मजबूत संबंध बनाता है और दैनिक जीवन को अधिक संतुलित और खुशहाल बनाता है। इसलिए सकारात्मक मनोविज्ञान एक समृद्ध, उद्देश्यपूर्ण और मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

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