IGNOU FREE BPCG-174 मनोविज्ञान और मीडिया Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BPCG-174 मनोविज्ञान और मीडिया Solved Guess Paper 2025

Q1. मनोविज्ञान और मीडिया का संबंध समझाइए। मीडिया मानव विचार, भावना और व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है?

मनोविज्ञान और मीडिया का रिश्ता अत्यंत गहरा है क्योंकि मीडिया मानव मस्तिष्क, भावनाओं और व्यवहार पर सीधा प्रभाव डालता है। मनोविज्ञान यह समझने में मदद करता है कि व्यक्ति किसी संदेश को कैसे ग्रहण करता है, उसकी व्याख्या कैसे करता है और उसके अनुसार व्यवहार कैसे बदलता है। मीडिया इन्हीं मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों—जैसे ध्यान (attention), सीखना (learning), स्मृति (memory), भावनात्मक अपील (emotional appeal), और प्रोत्साहन (reinforcement)—का उपयोग करके प्रभावी संदेश तैयार करता है। उदाहरण के लिए, विज्ञापन उपभोक्ता के अवचेतन मन को प्रभावित कर उनकी पसंद बदलते हैं; समाचार फ्रेमिंग लोगों की राय बनाती है; फिल्में और धारावाहिक सामाजिक मान्यताओं और मूल्यों को आकार देते हैं। मीडिया भावनाओं को सक्रिय करने में सबसे प्रभावी है—डर, खुशी, दुख, गर्व, गुस्सा—ये सब निर्णय लेने पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

मीडिया व्यवहार को भी व्यापक स्तर पर बदलता है। सोशल मीडिया आत्म-छवि और आत्मसम्मान को प्रभावित करता है, क्योंकि लोग अपने आपको दूसरों से तुलना करते रहते हैं। राजनीतिक अभियानों में मीडिया जनता की सोच को बदल सकता है। मनोरंजन मीडिया आक्रामकता, रोमांटिक विचार, सामाजिक भूमिकाएँ, और सांस्कृतिक अपेक्षाएँ विकसित करता है। लगातार किसी संदेश को देखने से वह व्यक्ति के सोचने का हिस्सा बन जाता है, जिसे priming और conditioning कहा जाता है। अतः मनोविज्ञान बताता है कि मीडिया इतना प्रभावी क्यों है, और मीडिया यह तय करता है कि मन मानव अनुभव को कैसे आकार देगा। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और आधुनिक समाज के सबसे शक्तिशाली प्रभाव क्षेत्रों में से एक हैं।

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Q2. वर्चुअल दुनिया की प्रकृति और मानव व्यवहार पर उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर चर्चा कीजिए।

वर्चुअल दुनिया—सोशल मीडिया, ऑनलाइन चैट, वीडियो कॉल, गेमिंग, और वर्चुअल रियलिटी—ने मानव संपर्क के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। यह दुनिया वास्तविक संपर्क से अलग होते हुए भी भावनात्मक और सामाजिक अनुभव को गहराई से प्रभावित करती है। वर्चुअल इंटरैक्शन व्यक्ति को अपनी छवि नियंत्रित करने की स्वतंत्रता देता है और उसे बिना सामाजिक दबाव के अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है। ऑनलाइन पहचान अक्सर वास्तविक पहचान से अलग होती है, जिससे व्यक्ति में आत्म-तुलना, असुरक्षा और पहचान भ्रम पैदा हो सकता है। वर्चुअल दुनिया में anonymity के कारण लोग ऐसे व्यवहार दिखाते हैं जो वास्तविक जीवन में नहीं करते—जैसे कठोर टिप्पणी, आक्रामक संवाद, साइबर बुलिंग आदि।

वर्चुअल दुनिया मनोवैज्ञानिक रूप से लाभकारी भी है और हानिकारक भी। सकारात्मक पक्ष में यह सामाजिक जुड़ाव, सूचना प्राप्ति, मनोरंजन, और आत्म-अभिव्यक्ति का अवसर देती है। नकारात्मक रूप में यह डिजिटल लत, सामाजिक अलगाव, चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और आत्मसम्मान की कमी को बढ़ाती है। सोशल मीडिया का reward system dopamine रिलीज करता है, जिससे व्यक्ति बार-बार मोबाइल चेक करता है। इससे ध्यान भंग, चिड़चिड़ापन और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ सकती है। वर्चुअल दुनिया वास्तविक संबंधों को कमजोर कर सकती है क्योंकि डिजिटल संचार में भावनात्मक संकेत सीमित होते हैं। कुल मिलाकर, वर्चुअल दुनिया ने व्यवहार, भावनाओं और सामाजिक अनुभव को गहराई से बदल दिया है।

Q3. मीडिया में प्रलोभन (Persuasion) की प्रक्रिया समझाइए। मीडिया लोगों की राय, दृष्टिकोण और उपभोक्ता व्यवहार को कैसे बदलता है?

मीडिया में प्रलोभन वह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा संदेश इस तरह डिज़ाइन किए जाते हैं कि वे लोगों के दृष्टिकोण, विचार और व्यवहार को बदल दें। विज्ञापन, राजनीतिक भाषण, समाचार फ्रेमिंग, और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रलोभन तकनीकों का उपयोग करते हैं। इनमें भावनात्मक अपील, डर अपील, हास्य, repetition, विश्वसनीयता (credibility), और कहानी (storytelling) शामिल हैं। Media framing लोगों को मुद्दों को एक विशेष नज़रिये से देखने पर मजबूर करता है, जबकि priming यह तय करता है कि दर्शक किन बातों को महत्वपूर्ण मानें। उदाहरण के लिए, अगर किसी उत्पाद को खुशी, आकर्षण या सफलता से जोड़ा जाए, तो दर्शक उस उत्पाद की ओर आकर्षित हो जाते हैं।

मीडिया उपभोक्ता व्यवहार को गहराई से प्रभावित करता है क्योंकि repeated exposure व्यक्ति की पसंद बदल देता है। विज्ञापन desire पैदा करते हैं, चाहे जरूरत हो या न हो। सोशल मीडिया influencers parasocial relationships बनाते हैं—जहाँ followers खुद को उनके “करीब” महसूस करते हैं—और उनकी सलाह आसानी से मान लेते हैं। मीडिया beauty standards, lifestyle, fashion, और even political मतों को निर्धारित करता है। जब मीडिया लगातार किसी विचार को दोहराता है, तो वह सामाजिक सत्य जैसा लगने लगता है। इस प्रकार, persuasion एक शक्तिशाली मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यवहार को आकार देती है।

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Q4. मीडिया में प्रस्तुतीकरण (Representation) सामाजिक व्यवहार, रूढ़ियों (Stereotypes) और सांस्कृतिक धारणाओं को कैसे प्रभावित करता है?

मीडिया में किसी समूह, लिंग, संस्कृति या समुदाय का जैसे चित्रण किया जाता है, वह समाज की धारणाओं और व्यवहार को सीधे प्रभावित करता है। यदि मीडिया महिलाओं को केवल सुंदरता या घरेलूपन से जोड़कर दिखाता है, तो यह gender stereotypes को मजबूत करता है। इसी तरह, किसी समुदाय को अपराध से जोड़ना लोगों के मन में डर और भेदभाव पैदा करता है। मीडिया representation के कारण stereotypes बनते हैं और समय के साथ सच्चाई की तरह स्वीकार कर लिए जाते हैं। फिल्में और विज्ञापन शरीर सौंदर्य, शक्ति, क्षमता और भूमिकाओं के बारे में अवास्तविक मानक स्थापित करते हैं। यह लोगों की self-image और सामाजिक उम्मीदों पर सीधा प्रभाव डालता है।

हालांकि मीडिया stereotypes को चुनौती भी दे सकता है। सकारात्मक representation—जैसे महिलाओं को वैज्ञानिक या नेता के रूप में दिखाना, LGBTQ+ समुदाय की सम्मानजनक प्रस्तुति, या विभिन्न जातियों के योगदान दिखाना—सामाजिक समानता और स्वीकृति बढ़ाता है। मीडिया empathy बढ़ाने वाला एक शक्तिशाली माध्यम है क्योंकि दृश्य कथाएँ भावनाओं को गहराई से प्रभावित करती हैं। लेकिन पक्षपाती, अतिरंजित या गलत प्रस्तुति सामाजिक विभाजन और हिंसा पैदा कर सकती है। अतः मीडिया representation सामाजिक व्यवहार का निर्माणकर्ता भी है और परिवर्तक भी।

Q5. शिक्षा में मीडिया की भूमिका समझाइए। मीडिया सीखने, प्रेरणा और ज्ञान अर्जन को कैसे बदलता है?

मीडिया ने शिक्षा को आधुनिक, सुलभ और इंटरैक्टिव बना दिया है। टीवी, रेडियो, इंटरनेट, डिजिटल ऐप्स, ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म और वर्चुअल क्लासरूम ने सीखने की प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं। जटिल विषय वीडियो, एनीमेशन, ग्राफिक्स और सिमुलेशन की मदद से सरल हो जाते हैं। मीडिया छात्रों में रुचि और प्रेरणा बढ़ाता है क्योंकि audio-visual सामग्री मस्तिष्क को सक्रिय करती है। डिजिटल शिक्षा छात्रों को self-paced learning और global knowledge प्रदान करती है, जिससे सीखने की गुणवत्ता बढ़ती है।

सामाजिक और भावनात्मक सीखने में भी मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऑनलाइन समूह कार्य, वेबिनार, वर्चुअल चर्चाएँ और cross-cultural communication कौशल बढ़ाते हैं। मीडिया creativity, critical thinking और समस्या-समाधान कौशल विकसित करता है। हालांकि अत्यधिक मीडिया उपयोग ध्यान भंग और misinformation जैसी चुनौतियाँ भी ला सकता है। लेकिन संतुलित और जागरूक उपयोग शिक्षा को अधिक प्रभावी, सहभागी और आधुनिक बना देता है।

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Q6. सोशल मीडिया का आत्मसम्मान, पहचान निर्माण और पारस्परिक संबंधों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव समझाइए।

सोशल मीडिया आत्मसम्मान पर गहरा प्रभाव डालता है क्योंकि लोग अपनी तुलना दूसरों की edited, perfect दिखने वाली तस्वीरों और जीवनशैली से करते रहते हैं। इस तुलना से insecurity, body dissatisfaction और anxiety बढ़ सकती है। लोग दूसरों के validation—likes, comments, followers—पर निर्भर होने लगते हैं, जिससे उनका self-worth डिजिटल approval से जुड़ जाता है। युवाओं में यह समस्या अधिक है क्योंकि उनकी identity निर्माण प्रक्रिया सोशल मीडिया से बहुत प्रभावित होती है। वे curated या idealized versions of self बनाते हैं, जिससे वास्तविक और वर्चुअल पहचान के बीच टकराव होता है।

पारस्परिक संबंध भी सोशल मीडिया से बदल गए हैं। ऑनलाइन संपर्क global connectivity देता है, लेकिन यह भावनात्मक गहराई कम कर देता है क्योंकि डिजिटल बातचीत में non-verbal cues नहीं होते। इससे गलतफहमियाँ बढ़ती हैं और संबंध सतही हो सकते हैं। सोशल मीडिया jealousy, comparison और online conflicts पैदा करता है, जो वास्तविक संबंधों को कमजोर कर देते हैं। स्क्रीन पर अधिक समय परिवार और दोस्तों के offline समय को कम करता है, जिससे अकेलापन बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, सोशल मीडिया पहचान, आत्मछवि और संबंधों में बड़ा मनोवैज्ञानिक परिवर्तन लाता है।

Q7. हिंसक मीडिया (फिल्में, गेम्स, समाचार) आक्रामकता और सामाजिक व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है?

हिंसक मीडिया मानव व्यवहार पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है। लगातार हिंसा देखने से desensitization होती है—अर्थात व्यक्ति हिंसा को सामान्य मानने लगता है और दूसरों के दर्द के प्रति असंवेदनशील हो जाता है। Bandura की Social Learning Theory के अनुसार बच्चे और युवा स्क्रीन पर देखी गई हिंसा की नकल करते हैं। जब फिल्मों या गेम्स में हिंसा को पुरस्कार (reward) मिलता है या heroism से जोड़ा जाता है, तो व्यक्ति aggression को समाधान की तरह देखने लगता है। हिंसक समाचार समाज के बारे में डर और असुरक्षा बढ़ाकर “Mean World Syndrome” पैदा करते हैं, जिसमें व्यक्ति दुनिया को वास्तविकता से अधिक खतरनाक मानने लगता है।

हिंसक मीडिया सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित करता है। यह problem-solving को आक्रामक दृष्टिकोण पर आधारित बना सकता है। वीडियो गेम्स में aggressive responses को बार-बार practice करने से impulsivity बढ़ती है। कुछ लोग fragile mental states में वास्तविक जीवन में भी aggressive responses दिखा सकते हैं। हालांकि सभी लोग हिंसक नहीं बनते, लेकिन vulnerable individuals पर इसका प्रभाव अधिक होता है। इस प्रकार हिंसक मीडिया empathy घटाता है, हिंसा को normalise करता है और सामाजिक संबंधों में आक्रामकता बढ़ा सकता है।

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Q8. मीडिया साक्षरता (Media Literacy) क्या है? डिजिटल युग में यह क्यों आवश्यक है?

मीडिया साक्षरता वह क्षमता है जिसके द्वारा व्यक्ति मीडिया संदेशों को समझ, विश्लेषण, मूल्यांकन और व्याख्या कर सकता है। यह सिखाती है कि मीडिया संदेश neutral नहीं होते, बल्कि उनके पीछे उद्देश्य, राजनीतिक विचार, व्यावसायिक हित और भावनात्मक प्रभाव छिपे होते हैं। मीडिया साक्षरता व्यक्ति को bias, propaganda, persuasion techniques, stereotypes और misinformation पहचानने में सक्षम बनाती है। यह critical thinking विकसित करती है और व्यक्ति को यह समझने में मदद करती है कि क्या तथ्य है और क्या मत।

डिजिटल युग में मीडिया साक्षरता अत्यधिक आवश्यक है क्योंकि लोग हर दिन हजारों सूचनाओं से घिरे होते हैं—सोशल मीडिया, न्यूज़ पोर्टल, वीडियो प्लेटफ़ॉर्म, विज्ञापन आदि। Fake news, deepfakes, clickbait, trolls, algorithmic manipulation और targeted advertising दर्शकों के विचारों और भावनाओं को प्रभावित करते हैं। मीडिया साक्षरता व्यक्ति को online safety, privacy, digital well-being और responsible communication सिखाती है। यह युवा पीढ़ी को डिजिटल दुनिया में समझदारी से navigate करने में सक्षम बनाती है। इस प्रकार, मीडिया साक्षरता आधुनिक समाज का अनिवार्य कौशल है।

Q9. मीडिया व्यसन (Media Addiction) क्या है? इसके मनोवैज्ञानिक लक्षण और दैनिक जीवन पर प्रभाव समझाइए।

मीडिया व्यसन वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति सोशल मीडिया, मोबाइल, वीडियो गेम, ऑनलाइन स्ट्रीमिंग या इंटरनेट प्लेटफॉर्म का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग करता है, जिससे उसकी मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। यह व्यसन मस्तिष्क के reward system पर आधारित होता है, जहाँ हर notification, like, message या गेम में जीत dopamine रिलीज करती है, जिससे व्यक्ति बार-बार वही अनुभव प्राप्त करना चाहता है। धीरे-धीरे यह आदत compulsive behaviour बन जाती है। मनोवैज्ञानिक लक्षणों में anxiety, irritability, restlessness, fear of missing out (FOMO), लगातार स्क्रीन देखने की इच्छा, offline गतिविधियों में रुचि की कमी, और अकेले रहने पर अधूरापन महसूस होना शामिल हैं। व्यक्ति ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता, उसकी memory कमजोर होती है, और वह multitasking में उलझकर मानसिक रूप से थक जाता है। अत्यधिक उपयोग नींद की समस्या (insomnia), तनाव, अवसाद और आत्मसम्मान में कमी पैदा करता है।

मीडिया व्यसन का दैनिक जीवन पर प्रभाव अत्यंत गहरा होता है। यह शिक्षा, काम, सामाजिक संबंधों और स्वास्थ्य को सीधे नुकसान पहुँचाता है। व्यसनी व्यक्ति पढ़ाई या काम के दौरान फोन चेक करता रहता है, जिससे productivity कम हो जाती है। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने की बजाय व्यक्ति वर्चुअल दुनिया में खोया रहता है, जिससे रिश्तों में दूरी बढ़ती है। नींद का समय बिगड़ने से शरीर और दिमाग दोनों थक जाते हैं। लंबे समय तक स्क्रीन का उपयोग आंखों की थकान, सिरदर्द, मोटापा, गलत खानपान और शारीरिक निष्क्रियता का कारण बनता है। किशोरों में यह identity confusion और emotional instability बढ़ा सकता है। गंभीर मामलों में व्यक्ति वास्तविक दुनिया से अलग होकर केवल डिजिटल दुनिया को प्राथमिकता देने लगता है। इस प्रकार, मीडिया व्यसन आधुनिक जीवन का एक बढ़ता हुआ मानसिक स्वास्थ्य संकट है, जिसे जागरूकता, digital discipline, समय प्रबंधन और संतुलित उपयोग के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है।

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Q10. समाज, संस्कृति, सीखने और सामाजिक परिवर्तन पर मीडिया के सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिए।

मीडिया समाज पर कई सकारात्मक प्रभाव डालता है, विशेष रूप से जागरूकता, जानकारी, लोकतांत्रिक भागीदारी और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देता है। समाचार चैनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म लोगों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से जोड़ते हैं, जिससे नागरिक अधिक informed और socially responsible बनते हैं। सोशल मीडिया marginalized communities की आवाज को मंच प्रदान करता है और लोगों को सामाजिक मुद्दों—जैसे gender equality, climate change, human rights—पर एकजुट करता है। फिल्मों, डॉक्यूमेंट्री और वेब सीरीज के माध्यम से विविध संस्कृतियों, भाषाओं और अनुभवों को जानने का अवसर मिलता है। यह सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक सहिष्णुता बढ़ाता है। मीडिया समाज में empathy और सामाजिक जागरूकता भी बढ़ाता है क्योंकि दृश्य कथाएँ लोगों को दूसरों की समस्याओं को भावनात्मक रूप से समझने में सक्षम बनाती हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन कोर्स, YouTube लेक्चर, ई-बुक्स, वर्चुअल लैब्स और शैक्षिक ऐप्स ने ज्ञान को हर व्यक्ति तक पहुँचाना आसान बना दिया है। इससे सीखना interactive, creative और self-paced हो गया है। मीडिया प्रेरणा बढ़ाता है और छात्रों में curiosity एवं critical thinking विकसित करता है। मीडिया सामाजिक परिवर्तन का भी शक्तिशाली माध्यम है। जागरूकता अभियानों ने स्वच्छता, स्वास्थ्य, vaccination, महिला सशक्तिकरण और सड़क सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लाए हैं। मीडिया stereotypes को चुनौती देकर नए सामाजिक मानदंड स्थापित करता है, जैसे महिलाओं के नेतृत्व की स्वीकृति, LGBTQ+ अधिकार, पर्यावरण संरक्षण आदि। कुल मिलाकर, मीडिया समाज को अधिक शिक्षित, संवेदनशील, जागरूक और प्रगतिशील बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

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