IGNOU FREE BPCG-171 सामान्य मनोविज्ञान Solved Guess Paper 2025
Q1. मनोविज्ञान की प्रकृति, क्षेत्र और आधुनिक जीवन में उसकी उपयोगिता का विस्तृत वर्णन कीजिए।
मनोविज्ञान मानव व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है। इसकी प्रकृति बहुआयामी है क्योंकि यह मानव अनुभवों, भावनाओं, विचारों और व्यवहार को वैज्ञानिक तरीकों से समझता है। मनोविज्ञान को एक विज्ञान इसलिए माना गया है क्योंकि इसमें प्रयोग, अवलोकन, मापन, विश्लेषण और निष्कर्ष निकालने के वैज्ञानिक नियमों का पालन किया जाता है। मनोविज्ञान का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है—यह संवेदना, धारणा, स्मृति, अधिगम, बुद्धि, प्रेरणा, व्यक्तित्व, सामाजिक व्यवहार, विकास, असामान्य व्यवहार, और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित विषयों का अध्ययन करता है।
मनोविज्ञान केवल सिद्धांत तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवहारिक जीवन में भी उपयोगी है। शिक्षा के क्षेत्र में यह शिक्षक और विद्यार्थियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। मनोविज्ञान के सिद्धांत बच्चों की सीखने की गति, उनकी क्षमताओं और रुचियों को समझने में सहायता करते हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में मनोविज्ञान तनाव, अवसाद, घबराहट, और मानसिक विकारों के उपचार में सहयोग करता है। परामर्श मनोविज्ञान व्यक्तियों को अपने जीवन की समस्याओं से निपटने, निर्णय लेने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने और सही दिशा में आगे बढ़ने में सहायता करता है।
संगठन और उद्योगों में मनोविज्ञान कर्मचारी चयन, प्रशिक्षण, नेतृत्व, प्रेरणा और कार्यक्षमता बढ़ाने में मदद करता है। सामाजिक जीवन में मनोविज्ञान संघर्ष समाधान, समूह व्यवहार, सामूहिक निर्णय, पूर्वाग्रह, भीड़-व्यवहार और सामाजिक समरसता को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आधुनिक युग में तनाव, डिजिटल जीवनशैली, प्रतिस्पर्धा, संबंधों का दबाव और मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों के कारण मनोविज्ञान की उपयोगिता और भी बढ़ गई है। मनोविज्ञान हमें यह समझना सिखाता है कि हम कैसे सोचते हैं, क्यों भावनाएँ बदलती हैं, और कैसे व्यवहार को नियंत्रित या सुधार सकते हैं। अतः मनोविज्ञान आधुनिक जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है—व्यक्ति, परिवार, समाज, और संगठन—सभी के लिए इसका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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Q2. व्यक्तिगत भिन्नताएँ क्या हैं? इनके प्रकार, कारण और महत्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
व्यक्तिगत भिन्नताएँ उन विविधताओं को दर्शाती हैं जो एक व्यक्ति को दूसरे से अलग बनाती हैं। ये अंतर शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक, सामाजिक, व्यवहारिक और व्यक्तित्व से जुड़े हो सकते हैं। कोई दो व्यक्ति बिल्कुल समान नहीं होते, इसलिए मानव व्यवहार को समझने के लिए व्यक्तिगत भिन्नताओं का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
व्यक्तिगत भिन्नताओं के कई प्रकार होते हैं—शारीरिक भिन्नताएँ, जैसे ऊँचाई, वजन, रंग; बौद्धिक भिन्नताएँ, जैसे बुद्धि स्तर, तर्क क्षमता, समस्या समाधान; व्यक्तित्व भिन्नताएँ, जैसे अंतर्मुखता–बहिर्मुखता, स्थिरता–अस्थिरता; भावनात्मक भिन्नताएँ, जैसे भय, क्रोध, खुशी, सहानुभूति; और सामाजिक भिन्नताएँ, जैसे नेतृत्व, सहयोग, संचार कौशल।
इन भिन्नताओं के कारण दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किए जाते हैं—अनुवांशिक (Heredity) और पर्यावरण (Environment)।
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अनुवांशिक कारक शारीरिक संरचना, बुद्धि की संभावनाएँ, स्वभाव, तंत्रिका-तंत्र आदि को प्रभावित करते हैं।
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पर्यावरणिक कारक—परिवार, शिक्षा, संस्कृति, मित्र-समूह, आर्थिक स्थिति, अनुभव, अवसर—व्यक्ति के व्यवहार को आकार देते हैं।
आज अधिकांश मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि ये दोनों कारक मिलकर व्यक्ति को बनाते हैं।
व्यक्तिगत भिन्नताओं का महत्व अत्यधिक है। शिक्षा में शिक्षक को यह समझना होता है कि हर बच्चा अलग तरह से सीखता है, इसलिए शिक्षण-पद्धति भी भिन्न होनी चाहिए। मनोवैज्ञानिक परामर्श में यह समझ व्यक्ति की समस्याओं को सटीक रूप से पहचानने में मदद करती है। उद्योगों में सही कर्मचारी चयन, प्रशिक्षण, और कार्य वितरण में व्यक्तिगत भिन्नताएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अतः व्यक्तिगत भिन्नताएँ मानव व्यवहार की विविधता को समझने का आधार हैं। उनके अध्ययन से व्यक्ति को बेहतर समझा जा सकता है, समाज को अधिक सहिष्णु बनाया जा सकता है, और शिक्षा तथा उद्योग अधिक प्रभावी बन सकते हैं।
Q3. मानव विकास की प्रकृति, चरणों और विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तृत विवरण दें।
मानव विकास जन्म से लेकर मृत्यु तक चलने वाली एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और भावनात्मक परिवर्तन शामिल होते हैं। विकास की प्रकृति क्रमिक, निरंतर, पूर्वानुमेय और बहुआयामी होती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी गति से विकसित होता है, इसलिए विकास में व्यक्तिगत अंतर भी पाया जाता है।
विकास के प्रमुख चरण हैं—गर्भावस्था, जिसमें शारीरिक संरचनाओं का तेजी से निर्माण होता है; शैशवावस्था, जहाँ संवेदनशीलता, मोटर विकास और प्रारंभिक भावनाएँ विकसित होती हैं; बाल्यावस्था, जिसमें भाषा, सामाजिक व्यवहार, जिज्ञासा, और सोच क्षमता बढ़ती है; किशोरावस्था, जो पहचान, भावनात्मक अस्थिरता, सामाजिक दबाव, और शारीरिक परिवर्तन का चरण है; युवावस्था, जहाँ करियर, संबंध, जिम्मेदारी और स्वतंत्रता का विकास होता है; प्रौढ़ावस्था, जिसमें स्थिरता, सामाजिक योगदान और अनुभव महत्वपूर्ण होते हैं; और वृद्धावस्था, जहाँ शारीरिक कमजोरी, स्मृति-ह्रास और जीवन मूल्यांकन होता है।
विकास को प्रभावित करने वाले कारक दो मुख्य श्रेणियों में आते हैं—जैविक (Biological) और पर्यावरणीय (Environmental)।
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जैविक कारक अनुवांशिकता, मस्तिष्क विकास, तंत्रिका तंत्र, हार्मोन और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं।
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पर्यावरणीय कारक परिवार का वातावरण, पालन-पोषण शैली, शिक्षा, मित्र-समूह, आर्थिक स्थिति, संस्कृति, मीडिया और जीवन अनुभव शामिल हैं।
इसके साथ मनोवैज्ञानिक कारक—जैसे प्रेरणा, भावनाएँ, व्यक्तित्व, रुचि, और सीखने की दक्षता—भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति अपने जीवन में विकसित होता है। विकास को समझना माता-पिता, शिक्षकों, परामर्शदाताओं और समाज के लिए आवश्यक है ताकि बच्चों और वयस्कों को उचित दिशा और सहायता प्रदान की जा सके।
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Q4. शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और समाज में मनोविज्ञान के मुख्य अनुप्रयोगों का विस्तृत विवेचन कीजिए।
मनोविज्ञान का उपयोग जीवन के लगभग हर क्षेत्र में होता है। शिक्षा में मनोविज्ञान सीखने की प्रक्रिया, प्रेरणा, बुद्धि, स्मृति, कक्षा व्यवहार, परामर्श और विशेष शिक्षा को समझने में मदद करता है। शिक्षक मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग करके बेहतर शिक्षण रणनीतियाँ तैयार करते हैं, बच्चों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझते हैं और कक्षा में सकारात्मक वातावरण बनाते हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र में मनोविज्ञान मानसिक रोगों—जैसे अवसाद, चिंता, फोबिया, तनाव—के निदान और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक विभिन्न उपचार विधियों जैसे CBT, परामर्श, व्यवहार संशोधन, मनोविश्लेषण आदि का उपयोग करते हैं। हेल्थ साइकोलॉजी यह समझती है कि कैसे तनाव, जीवनशैली और व्यवहार शरीर को प्रभावित करते हैं।
उद्योग और संगठनात्मक क्षेत्रों में मनोविज्ञान कर्मचारी चयन, प्रशिक्षण, प्रेरणा, नेतृत्व, कार्य संतुष्टि, उत्पादकता और संचार को सुधारने में मदद करता है। संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक कार्यस्थल में तनाव कम करने, टीम-वर्क बढ़ाने और व्यवस्था मजबूत करने में भूमिका निभाते हैं।
समाज में, मनोविज्ञान पूर्वाग्रह, हिंसा, सामाजिक तनाव, भीड़ व्यवहार, अपराध, लत, परिवारिक विवाद, और सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य समझने में उपयोगी है। इसके अलावा परामर्श मनोविज्ञान संबंध समस्याओं, नशा मुक्ति, करियर दिशा आदि में सहायता करता है। आज के डिजिटल युग में साइबर मनोविज्ञान—सोशल मीडिया की लत, ऑनलाइन पहचान, साइबर बुलिंग—को समझने में महत्वपूर्ण है।
अतः मनोविज्ञान समाज, व्यक्ति और संगठन सभी के विकास में केंद्रीय भूमिका निभाता है। यह मनुष्य के भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक जीवन को संतुलित व समृद्ध बनाने का माध्यम है।
Q5. मनोविज्ञान के प्रमुख विद्यालयों—संरचनावाद, कार्यात्मकवाद, व्यवहारवाद, मनोविश्लेषण, और मानववादी मनोविज्ञान—का विस्तार से वर्णन करें।
मनोविज्ञान के विकास में विभिन्न विद्यालयों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सबसे पहला विद्यालय संरचनावाद (Structuralism) था, जिसे विल्हेम वुंट ने प्रारंभ किया और बाद में टिच्नर ने विकसित किया। इसका उद्देश्य चेतना को उसके मूल घटकों—संवेदनाओं, भावनाओं और कल्पनाओं—में विभाजित कर अध्ययन करना था। संरचनावाद में आत्मावलोकन (Introspection) का प्रयोग किया जाता था, जिसे बाद में इसकी व्यक्तिपरक (subjective) प्रकृति के कारण आलोचना भी मिली।
कार्यात्मकवाद (Functionalism) विलियम जेम्स द्वारा विकसित हुआ। यह चेतना की संरचना की बजाय उसके कार्य पर ध्यान देता था—अर्थात् मनुष्य क्यों सोचता है, कैसे सीखता है, और उसकी मानसिक प्रक्रियाएँ क्या उपयोग करती हैं। इस विद्यालय ने अनुकूलन, व्यवहार, और शिक्षा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
व्यवहारवाद (Behaviorism) जॉन वॉटसन और बाद में बी.एफ. स्किनर द्वारा विकसित हुआ। यह केवल प्रत्यक्ष, मापने योग्य व्यवहार को मनोविज्ञान का आधार मानता है। व्यवहारवाद ने मनोविज्ञान को वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ बनाया। पावलॉव का शास्त्रीय अनुबन्धन और स्किनर का प्रचालन अनुबन्धन इसके मुख्य सिद्धांत हैं।
मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) सिगमंड फ्रायड का सिद्धांत है। यह मानव व्यवहार पर अवचेतन मन, दबी इच्छाओं, बाल्यकाल के अनुभवों और आंतरिक संघर्षों के प्रभाव को समझाता है। फ्रायड ने ‘इड, ईगो और सुपरइगो’ व्यक्तित्व संरचना के रूप में प्रस्तुत किए। रक्षा-तंत्र (defence mechanisms) का सिद्धांत भी बड़ा योगदान है।
मानववादी मनोविज्ञान (Humanistic Psychology) कार्ल रोजर्स और अब्राहम मैस्लो द्वारा विकसित हुआ। यह मनुष्य को स्वाभाविक रूप से अच्छा और विकासशील मानता है। मैस्लो की आवश्यकताओं की श्रेणी (Hierarchy of Needs) और रोजर्स की क्लाइंट-केंद्रित चिकित्सा इसकी प्रमुख उपलब्धियाँ हैं। यह स्वतंत्र इच्छा, आत्म-विकास और आत्म-सम्मान पर जोर देता है।
इन सभी विद्यालयों ने मिलकर आधुनिक मनोविज्ञान की नींव तैयार की है—जहाँ संरचनावाद ने वैज्ञानिक प्रयोग की शुरुआत की, कार्यात्मकवाद ने उपयोगिता पर जोर दिया, व्यवहारवाद ने वस्तुनिष्ठता लाई, मनोविश्लेषण ने मन की गहराइयों का अध्ययन किया, और मानववाद ने मानवीय मूल्यों को केंद्र में रखा।
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Q6. बुद्धि (Intelligence) की अवधारणा और उसके प्रमुख सिद्धांतों (स्पीयरमैन, थर्स्टन, गार्डनर, स्टर्नबर्ग) का वर्णन करें।
बुद्धि वह क्षमता है जिसके द्वारा मनुष्य सीखता है, समझता है, समस्या हल करता है और नए अनुभवों को अपनाता है। बुद्धि को समझने के लिए कई महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तावित हुए।
स्पीयरमैन का द्वि-घटक सिद्धांत (Two-Factor Theory) कहता है कि बुद्धि दो भागों से मिलकर बनती है—सामान्य कारक (g-factor) और विशिष्ट कारक (s-factor)। g-factor सभी मानसिक कार्यों के लिए सामान्य होता है, जबकि s-factor विशेष कार्यों में उपयोग होता है।
थर्स्टन का प्राथमिक मानसिक क्षमताओं का सिद्धांत (Primary Mental Abilities) स्पीयरमैन के विचार का विरोध करता है। थर्स्टन ने बुद्धि को कम से कम सात स्वतंत्र क्षमताओं—शब्दज्ञान, संख्यात्मक क्षमता, तर्क, स्थानिक क्षमता, स्मृति, धारणा-गति, और वाचन प्रवाह—का समूह माना। यह सिद्धांत बताता है कि बुद्धि बहुआयामी है।
गार्डनर का बहु-बुद्धि सिद्धांत (Multiple Intelligences) बुद्धि के अध्ययन में क्रांतिकारी सिद्धांत है। गार्डनर ने आठ प्रकार की बुद्धियों का उल्लेख किया—भाषिक, तार्किक-गणितीय, संगीतात्मक, शारीरिक-गतिशील, स्थानिक, सामाजिक (interpersonal), आत्मानुभव (intrapersonal), और प्रकृति-ज्ञान। इससे स्पष्ट हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग प्रकार की बुद्धियों में उत्कृष्ट हो सकता है।
स्टर्नबर्ग का त्रि-आयामी सिद्धांत (Triarchic Theory) बुद्धि को तीन भागों में बाँटता है—विश्लेषणात्मक बुद्धि (analytical intelligence), रचनात्मक बुद्धि (creative intelligence), और व्यवहारिक बुद्धि (practical intelligence)। स्टर्नबर्ग कहते हैं कि जीवन में सफलता केवल किताबों के ज्ञान से नहीं बल्कि व्यवहारिक समझ और सृजनात्मक क्षमताओं से प्राप्त होती है।
इन सिद्धांतों से स्पष्ट होता है कि बुद्धि एक जटिल, बहुआयामी और गतिशील अवधारणा है। आधुनिक शिक्षा और मनोविज्ञान अब बहु-बुद्धियों और व्यवहारिक बुद्धि को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना पारंपरिक IQ स्कोर को।
Q7. शास्त्रीय अनुबन्धन (Classical Conditioning) और प्रचालन अनुबन्धन (Operant Conditioning) की व्याख्या करें तथा इनके वास्तविक जीवन में उपयोग लिखें।
शास्त्रीय अनुबन्धन का सिद्धांत इवान पावलॉव ने दिया। यह सीखने की प्रक्रिया है जिसमें एक तटस्थ उद्दीपन (neutral stimulus) किसी प्राकृतिक उद्दीपन (unconditioned stimulus) से जुड़कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करने लगता है। उदाहरण के लिए, घंटी की आवाज़ को भोजन के साथ कई बार प्रस्तुत करने पर कुत्ता केवल घंटी सुनकर लार छोड़ने लगता है। यह भावनात्मक और स्वचालित प्रतिक्रियाओं के सीखने को समझाता है।
प्रचालन अनुबन्धन बी.एफ. स्किनर द्वारा विकसित सिद्धांत है। इसमें सीखना परिणामों (consequences) पर आधारित होता है। यदि किसी व्यवहार के बाद इनाम मिले, तो वह व्यवहार बढ़ता है; दंड मिले तो कम होता है। स्किनर बॉक्स में चूहा लीवर दबाकर भोजन प्राप्त करता था—यह सकारात्मक प्रोत्साहन का उदाहरण है।
वास्तविक जीवन में उपयोग:
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शिक्षा में: पुरस्कार, प्रशंसा, ग्रेड, प्रमाणपत्र—ये सब छात्रों को प्रोत्साहित करते हैं।
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पालन-पोषण में: बच्चों के अच्छे व्यवहार पर इनाम और गलत व्यवहार पर ‘टाइम-आउट’।
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क्लीनिकल मनोविज्ञान में: भय और फोबिया दूर करने की तकनीकें।
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संस्थाओं में: बोनस, प्रमोशन, और प्रशंसा प्रचालन अनुबन्धन के उदाहरण हैं।
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सोशल मीडिया में: लाइक्स, नोटिफिकेशन, रिवॉर्ड—उपयोगकर्ता को बार-बार लौटने के लिए प्रेरित करते हैं।
ये दोनों सिद्धांत मानव सीखने के आधार हैं और व्यवहार संशोधन में अत्यंत उपयोगी हैं।
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Q8. व्यक्तित्व के प्रमुख सिद्धांत—फ्रायड, जंग, ऐडलर, व्यवहारवादी और मानववादी सिद्धांत—का विस्तृत वर्णन करें।
फ्रायड का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत व्यक्तित्व को अवचेतन मानसिक प्रक्रियाओं, बाल्यकाल के अनुभवों और दबी इच्छाओं का परिणाम मानता है। इड, ईगो और सुपरइगो व्यक्तित्व के तीन भाग हैं। व्यक्ति अपने संघर्षों से बचने के लिए रक्षा-तंत्र (defence mechanisms) का उपयोग करता है।
जंग का विश्लेषणात्मक सिद्धांत फ्रायड से अलग होकर विकसित हुआ। जंग ने ‘सामूहिक अवचेतन’ और ‘आर्कटाइप’ की अवधारणा दी। उन्होंने अंतर्मुखता–बहिर्मुखता को व्यक्तित्व का मूल आयाम माना।
ऐडलर का व्यक्तिगत मनोविज्ञान सिद्धांत कहता है कि मनुष्य में हीनता-बोध (inferiority feeling) स्वाभाविक है, और व्यक्ति श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है। सामाजिक रुचि और सहयोग क्षमता स्वस्थ व्यक्तित्व का संकेत हैं।
व्यवहारवादी सिद्धांत व्यक्तित्व को सीखा हुआ व्यवहार मानता है। स्किनर और वॉटसन के अनुसार, प्रोत्साहन, दंड, और सीखने का इतिहास व्यक्तित्व बनाते हैं।
मानववादी सिद्धांत (रोजर्स, मैस्लो) व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से सकारात्मक, रचनात्मक और आत्म-विकासशील मानते हैं। मैस्लो की जरूरतों की सीढ़ी और रोजर्स की क्लाइंट-केंद्रित चिकित्सा मानववादी दृष्टिकोण का आधार हैं।
इन सभी सिद्धांतों से व्यक्तित्व की समझ अधिक व्यापक और गहरी बनती है।
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Q9. स्मृति की प्रक्रियाएँ—कूटबद्धन (Encoding), संग्रहण (Storage) तथा पुनर्प्राप्ति (Retrieval)—का विस्तृत वर्णन करें तथा स्मृति को प्रभावित करने वाले कारक लिखें।
स्मृति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम जानकारी को ग्रहण करते हैं, उसे संग्रहित रखते हैं और आवश्यकता पड़ने पर पुनः प्राप्त करते हैं। स्मृति तीन चरणों में कार्य करती है—
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कूटबद्धन (Encoding): जानकारी को एक ऐसे रूप में बदलना जिसे मस्तिष्क संग्रहित कर सके। यह दृश्य, श्रवण या अर्थ आधारित हो सकता है।
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संग्रहण (Storage): जानकारी को समय के अनुसार विभिन्न स्मृति-तंत्रों में रखना—संवेदी स्मृति, अल्पकालिक स्मृति और दीर्घकालिक स्मृति।
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पुनर्प्राप्ति (Retrieval): संग्रहित जानकारी को आवश्यकता पड़ने पर निकालना।
स्मृति को प्रभावित करने वाले कारक:
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ध्यान (Attention)
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पुनरावृत्ति (Rehearsal)
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अर्थपूर्णता (Meaningfulness)
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भावनाएँ (Emotion)
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हस्तक्षेप (Interference)
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तनाव, नींद और स्वास्थ्य
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पुनर्प्राप्ति संकेत (Retrieval cues)
स्मृति शिक्षा, दैनिक जीवन और समस्याओं के समाधान में बहुत महत्वपूर्ण है। बेहतर स्मृति के लिए अभ्यास, संगठन, मानसिक चित्र, और विश्राम उपयोगी हैं।
Q10. तनाव (Stress) क्या है? इसके प्रकार, कारण और तनाव प्रबंधन की मनोवैज्ञानिक विधियाँ समझाइए।
तनाव शरीर और मन की वह प्रतिक्रिया है जो चुनौतीपूर्ण, खतरनाक या दबावपूर्ण परिस्थितियों में उत्पन्न होती है। तनाव के मुख्य प्रकार हैं—तीव्र तनाव (Acute stress), दीर्घकालिक तनाव (Chronic stress) और अंतरालिक तनाव (Episodic stress)।
तनाव के कारण बाहरी और आंतरिक दोनों हो सकते हैं—काम का दबाव, पारिवारिक समस्याएँ, बीमारी, आर्थिक चिंता, सामाजिक अपेक्षाएँ, नकारात्मक सोच, असफलता का भय, और आत्म-संदेह।
तनाव के प्रभाव बहुआयामी होते हैं—भावनात्मक (चिंता, क्रोध), संज्ञानात्मक (ध्यान में कमी), शारीरिक (सिरदर्द, थकान), और व्यवहारिक (चिड़चिड़ापन, अलगाव)।
तनाव प्रबंधन की मनोवैज्ञानिक तकनीकें:
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समस्या-केंद्रित रणनीति (Problem-focused coping)
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भावनात्मक रणनीति (Emotion-focused coping)
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संज्ञानात्मक पुनर्गठन (Cognitive restructuring)
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ध्यान, योग, गहरी श्वास
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सामाजिक समर्थन
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समय प्रबंधन
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सकारात्मक सोच और डायरी लेखन
इन तकनीकों से तनाव को नियंत्रित करके मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है।
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