IGNOU FREE BSKG-178 प्राचीन भारतीय राजनीति Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BSKG-178 प्राचीन भारतीय राजनीति Solved Guess Paper 2025

Q1. प्राचीन भारतीय राजनीति की उत्पत्ति, विशेषताएँ और उसके वैचारिक आधार का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

प्राचीन भारतीय राजनीति भारत की सभ्यता, संस्कृति, धर्म और दार्शनिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। इसकी उत्पत्ति वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों और धर्मशास्त्रों में निहित है। ऋग्वैदिक काल में राजनीति एक सामूहिक और जनमूलक व्यवस्था के रूप में विकसित हुई, जहाँ जन, विष, ग्राम, कुल और गोत्र राजनीतिक इकाइयाँ थीं। राजा को देवताओं का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि जन-प्रमुख के रूप में स्वीकार किया गया। प्राचीन भारतीय राजनीति की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि यह धर्म पर आधारित थी—धर्म व्यवस्था का केंद्र था और राजा पर भी धर्म का पालन अनिवार्य था।

राजनीति का मूल उद्देश्य लोकक्षेम अर्थात जनता का कल्याण था। ‘राजा जनता के लिए है, न कि जनता राजा के लिए’—यह भारतीय दृष्टिकोण रहा है। वेदों और महाभारत में राजा को न्यायकारी, दयालु, सत्यप्रिय और धर्मनिष्ठ होना आवश्यक बताया गया है। राजधर्म को राजनीति का सबसे बड़ा आधार माना गया, जिसमें राजकीय कर्तव्य, न्याय, दंडनीति और सामाजिक संरक्षण शामिल थे।

प्राचीन भारतीय राजनीति दार्शनिक चिंतन से भी प्रभावित थी—सांख्य, योग, न्याय, वेदान्त और बौद्ध-जैन विचारों ने शासन के नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं को प्रभावित किया। बौद्ध धर्म ने अहिंसा, करुणा और कल्याणकारी शासन की अवधारणा को प्रमुखता दी, जबकि कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने राजनीति को एक विज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया।

अर्थशास्त्र में राज्य के सात अंग—स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, निधि, सेना और मित्र—राजनीतिक संरचना की नींव बने। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति केवल शक्ति का खेल नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित विज्ञान था।

वेदों से लेकर मौर्यकाल तक राजनीति जनसहयोग, धर्म, उत्तरदायित्व, दंडनीति और कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों पर आधारित रही। इस प्रकार, प्राचीन भारतीय राजनीति नैतिकता, सामूहिकता और मानव कल्याण पर केंद्रित एक अद्वितीय राजनीतिक परंपरा थी।

Buy IGNOU Solved Guess Paper With Important Questions  :-

📞 CONTACT/WHATSAPP 88822 85078

Q2. प्राचीन भारत में राज्य के विभिन्न प्रकारों और उनके स्वरूप का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

प्राचीन भारत में राज्य की अवधारणा समय के साथ विकसित हुई और विविध रूपों में प्रकट हुई। राजनीतिक संरचनाओं का विकास सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक परिवर्तन के साथ-साथ हुआ। राज्य के प्रमुख प्रकार दो श्रेणियों में विभाजित थे—राज्य-राज्य (Monarchical States) और गण-राज्य (Republics)

राज्य-राज्य में सत्ता राजा के हाथ में केंद्रित होती थी। यह शासन-व्यवस्था वैदिक काल से प्रारंभ हुई और मौर्य, गुप्त, कुषाण, सातवाहन आदि राजवंशों में अपने चरम पर पहुँची। राजा को ‘धर्म का संरक्षक’ माना गया। राजा सर्वश्रेष्ठ था, परंतु निरंकुश नहीं—उसे धर्म, मंत्रीमंडल और सभाओं के अधीन रहना पड़ता था। राज्य-राज्यों की विशेषताओं में उत्तराधिकार व्यवस्था, दंडनीति, केंद्रीय प्रशासन, कर-व्यवस्था और सेना का विस्तार शामिल था।

गण-राज्य प्राचीन भारत की अनोखी राजनीतिक उपलब्धि माने जाते हैं। बौद्ध साहित्य में लिच्छवि, मल्ल, शक्य, वैशाली आदि प्रमुख गणराज्यों का उल्लेख मिलता है। इन राज्यों में राजा नहीं, बल्कि एक सभा या परिषद शासन चलाती थी। निर्णय सामूहिक होते थे। जनता की भागीदारी राज्य प्रबंधन का आधार थी। इन गणराज्यों में ‘संग’, ‘गण’ और ‘परिषद’ जैसी संस्थाएँ थीं। महिलाएँ भी कई मामलों में भाग लेती थीं।

इसके अतिरिक्त राज्य को आकार, शक्ति, और भौगोलिक स्थितियों के आधार पर भी विभाजित किया गया—महा-जनपद, नगर-राज्य, साम्राज्य आदि। मौर्यकाल में साम्राज्य का स्वरूप सबसे सुदृढ़ रहा, जिसमें केंद्रीकृत प्रशासन, विस्तृत जासूसी व्यवस्था और वैज्ञानिक कर-प्रणाली देखी गई।

राज्य का स्वरूप कौटिल्य के अनुसार सप्तांग सिद्धांत पर आधारित था—स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, सेना और मित्र। राज्य तभी पूर्ण माना जाता था जब ये सभी अंग समृद्ध, संगठित और कार्यक्षम हों।

समग्र रूप से, प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था विविध, वैज्ञानिक और जनता-केन्द्रित थी। यह केवल शक्ति-प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि धर्म, कल्याण और सामाजिक स्थिरता का संरक्षक माना जाता था।

Q3. प्राचीन भारतीय राजनीति में मंत्री-परिषद और विभिन्न सभाओं की संरचना तथा कार्यों का विस्तृत वर्णन कीजिए।

प्राचीन भारतीय राजनीति में मंत्री-परिषद और सभाएँ शासन-व्यवस्था की रीढ़ थीं। राजा को सर्वशक्तिमान नहीं माना गया; उसे प्रशासन चलाने के लिए सलाह, सहयोग और निरीक्षण की आवश्यकता होती थी, जो मंत्री-परिषद और सभाएँ पूरी करती थीं।

मंत्री-परिषद (Council of Ministers) राजा के शासन का सबसे महत्वपूर्ण अंग थी। कौटिल्य ने मंत्रियों को राजा की आँख और कान कहा है। परिषद में अनुभवी, विद्वान, नीति-ज्ञान, धर्मनिष्ठ, साहसी और सत्यप्रिय व्यक्तियों को शामिल किया जाता था। मंत्रियों के मुख्य कार्य थे—राजा को निर्णय में सहायता, वित्त व्यवस्था की देखभाल, न्यायिक सलाह, विदेश नीति, शांति-संधि, युद्ध नीति, प्रशासनिक प्रबंधन और जनता की समस्याओं का समाधान। परिषद सामूहिक निर्णय को प्राथमिकता देती थी।

महामात्र, अमात्य, प्रधानमंत्री (महामात्य), सेनापति, युकर, संद्धिविज्ञ आदि मंत्री-परिषद में महत्वपूर्ण पदाधिकारी थे।

सभाएँ (Sabhas)—प्राचीन भारत में दो मुख्य सभाएँ थीं—सभा और समिति

  • सभा विशेषज्ञों की संस्था थी, जिसमें विद्वान, बुजुर्ग और अधिकारी शामिल होते थे। यह प्रशासन, न्याय और दंड-विधान से संबंधित सलाह देती थी।

  • समिति जन-संघर्ष या जन-भागीदारी का प्रतिनिधित्व करती थी। इस सभा में जनता के प्रतिनिधि शामिल होते थे और यह युद्ध, कर, कानून, परंपरा, ग्राम व्यवस्था आदि विषयों पर निर्णय लेती थी।

बाद के काल में मौर्य सभा, गुप्त सभा, ग्राम सभा, नगर सभा, गण-सभा आदि विकसित हुए। विशेष रूप से गणराज्यों में सभा और समिति का अत्यधिक महत्व था।

राजा इन सभाओं की सलाह का सम्मान करता था। यदि राजा अनुचित कार्य करता, तो सभा उसे टोक भी सकती थी। यह व्यवस्था प्राचीन भारत में लोकशाही तत्वों का प्रमाण है।

इस प्रकार मंत्री-परिषद और सभाएँ शासन को संतुलित, उत्तरदायी और नैतिक बनाती थीं।

Buy IGNOU Solved Guess Paper With Important Questions  :-

📞 CONTACT/WHATSAPP 88822 85078

Q4. प्राचीन भारत की न्याय व्यवस्था का स्वरूप, सिद्धांत और न्यायिक संस्थाओं का विस्तृत वर्णन कीजिए।

प्राचीन भारत की न्याय व्यवस्था धर्म, नैतिकता और लोकहित पर आधारित थी। न्याय का मूल उद्देश्य समाज में शांति, व्यवस्था और समरसता बनाए रखना था। न्याय केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि धर्मानुसार न्याय प्रदान करना माना जाता था।

न्याय के सिद्धांत—सत्य, अहिंसा, समानता, दंड, धर्म और निष्पक्षता। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, अर्थशास्त्र, और नारद स्मृति में न्याय सिद्धांतों का विस्तृत उल्लेख है।

न्याय व्यवस्था में तीन स्तर थे—

  1. राजा का न्यायालय – राजा सर्वोच्च न्यायाधीश था।

  2. मंत्री-परिषद का न्याय – महत्वपूर्ण मामलों में सामूहिक न्याय।

  3. स्थानीय न्यायालय – ग्राम, जनपद और नगर स्तर पर पंचायत या सभा न्याय करती थी।

न्यायिक अधिकारियों में धर्मस्थ, प्रादेशिक, विहारिक, महामात्र आदि शामिल थे।

न्याय प्रक्रिया में साक्ष्य, शपथ, प्रत्यक्ष, परिस्थितिजन्य प्रमाण, गवाह आदि का महत्व था। दंड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं बल्कि सुधार और निवारण था। अपराध के अनुसार दंड में जुर्माना, कारावास, सामाजिक दंड और कुछ गंभीर मामलों में शारीरिक दंड शामिल थे।

महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और गरीबों को विशेष सुरक्षा दी जाती थी। अदालतें मुफ्त न्याय देने के सिद्धांत पर चलती थीं।

इस प्रकार प्राचीन भारत की न्याय व्यवस्था अत्यंत विकसित, मानवीय और नैतिक आधार पर टिकी हुई थी।

Q5. प्राचीन भारतीय कर-प्रणाली की विशेषताएँ और करों के प्रकार का विस्तृत विवरण दीजिए।

प्राचीन भारत की कर-प्रणाली सुव्यवस्थित और संगठित थी। करों का उद्देश्य राजकोष को सुदृढ़ बनाना, प्रशासन चलाना और जनता की सुरक्षा करना था। कर उचित, न्यायसंगत और धर्मसम्मत होना चाहिए—यह सिद्धांत अर्थशास्त्र में स्पष्ट रूप से दिया गया है।

कर-प्रणाली के मुख्य प्रकार थे—

  1. भूमि-कर (भोग, कर, उच्छिष्ट) – किसानों पर उनकी उपज का एक निश्चित भाग लिया जाता था।

  2. वाणिज्य-कर – व्यापारियों से सीमा-कर, मार्ग-कर और बंधर-कर वसूला जाता था।

  3. वन-कर, पशु-कर और खनिज-कर – प्राकृतिक संपदाओं पर कर।

  4. शिल्प-कर – कारीगरों और शिल्पकारों द्वारा दिया जाने वाला कर।

  5. उपहार (कर का अंश) – राजा को स्वेच्छा से दिया जाने वाला यज्ञिक या धार्मिक दान।

कर वसूली में अत्याचार न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाता था। कौटिल्य ने अत्यधिक कर को राज्य के विनाश का कारण बताया है। कर का उपयोग सेना, दुर्ग, सड़कों, सिंचाई, शिक्षा, न्याय और धार्मिक कार्यक्रमों पर होता था।

कर-प्रणाली का एक अनोखा पहलू यह था कि राजा स्वयं भी कर के अधीन माना जाता था—अर्थात राज्य व्यय में पारदर्शिता आवश्यक थी।

इस प्रकार, प्राचीन भारत की कर-प्रणाली व्यावहारिक, न्यायपूर्ण और जन-कल्याण पर आधारित थी।

Buy IGNOU Solved Guess Paper With Important Questions  :-

📞 CONTACT/WHATSAPP 88822 85078

Q6. प्राचीन भारत की अंतर्राज्यीय व्यवस्था और विदेश नीति का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

प्राचीन भारत में अंतर्राज्यीय संबंध अत्यंत विकसित थे। राजाओं के बीच संबंध शांति, मैत्री, व्यापार, दूतावास, संधि, युद्ध और कूटनीति पर आधारित थे। कौटिल्य का मण्डल सिद्धांत प्राचीन भारत का सबसे महत्वपूर्ण अंतर्राज्यीय मॉडल माना जाता है।

मण्डल सिद्धांत के अनुसार राजा के चार प्रकार के राज्य संबंध होते हैं—

  • मित्र (Friend)

  • शत्रु (Enemy)

  • मध्यस्थ

  • उदासीन

राजनीति में मैत्री-संधियाँ, विवाह-संधियाँ और व्यापारिक संधियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं। मौर्यकाल में चाणक्य और अशोक ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को नए स्तर पर पहुँचाया। अशोक ने धम्म नीति के माध्यम से शांति, सह-अस्तित्व और करुणा का संदेश पड़ोसी देशों तक पहुँचाया।

दूतावास व्यवस्था अत्यंत विकसित थी—दूतों को पूर्ण अधिकार, कूटनीति का ज्ञान और सुरक्षा दी जाती थी। युद्ध केवल अंतिम विकल्प माना जाता था।

व्यापारिक संबंध भी अंतर्राज्यीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे—सड़क, समुद्र और कारवां मार्गों द्वारा भारत का रोम, यूनान, चीन, फारस आदि से व्यापार होता था।

समग्र रूप से, प्राचीन भारत की अंतर्राज्यीय व्यवस्था नैतिकता, कूटनीति और कल्याणकारी नीति पर आधारित थी।

Q7. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित ‘दंडनीति’ का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन का सबसे वैज्ञानिक एवं तर्कपूर्ण ग्रंथ माना जाता है, जिसमें ‘दंडनीति’ को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। दंडनीति का अर्थ है—राजा द्वारा समाज में व्यवस्था और न्याय बनाए रखने हेतु दंड (कानून) का उपयोग। कौटिल्य के अनुसार राज्य तभी स्थिर और सुरक्षित रह सकता है जब दंड-व्यवस्था प्रभावी, उचित और न्यायपूर्ण हो। यदि दंड अत्यधिक कठोर या अत्यधिक शिथिल हो, तो राज्य का संतुलन बिगड़ जाता है। कौटिल्य कहते हैं कि राजा की शक्ति उसके द्वारा पालन की जाने वाली दंडनीति पर निर्भर है।

दंडनीति का मुख्य उद्देश्य लोक-शांति, सुरक्षा और सुव्यवस्था को बनाए रखना है, न कि केवल अपराधी को दंड देना। कौटिल्य दंड को ‘राजा का दाहिना हाथ’ बताते हैं, क्योंकि दंड के बिना समाज अराजकता में बदल सकता है। अपराध की प्रकृति, परिस्थिति, अपराधी का उद्देश्य और सामाजिक परिणामों के आधार पर दंड निर्धारित किया जाता था। दंड के प्रकार थे—धनदंड, कारावास, बहिष्कार, शारीरिक दंड, और कुछ गंभीर मामलों में मृत्यु दंड भी।

दंडनीति के सिद्धांतों में निष्पक्षता सर्वोपरि थी। राज्य का कोई अधिकारी, मंत्री या स्वयं राजा भी दंड कानून से ऊपर नहीं था। न्यायालयों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अनुमति थी। कौटिल्य ने यह भी कहा कि दंड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि अपराधों का निवारण और समाज में भय (Deterrence) उत्पन्न करना है, ताकि भविष्य में अपराध न हों।

दंडनीति का संबंध आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से भी था। कर चोरी, सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग, जासूसी, भ्रष्टाचार और विद्रोह जैसे अपराधों के लिए कड़े दंड निर्धारित थे। राजा को यह अधिकार था कि वह अपराध के अनुसार दंड की कठोरता को बढ़ा या घटा सके।

कौटिल्य की दंडनीति आधुनिक विधि-व्यवस्था की कई अवधारणाओं से मेल खाती है—जैसे समानता का सिद्धांत, दंड का अनुपात, न्यायिक पारदर्शिता, कानून का शासन (Rule of Law)। आज के कई प्रशासनिक सिद्धांत दंडनीति की ही देन हैं।

इस प्रकार, दंडनीति प्राचीन भारतीय राजनीति का सबसे वैज्ञानिक और व्यवहारिक भाग है, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में न्याय, अनुशासन और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

Buy IGNOU Solved Guess Paper With Important Questions  :-

📞 CONTACT/WHATSAPP 88822 85078

Q8. मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था की विशेषताओं का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

मौर्यकालीन प्रशासन प्राचीन भारत की सबसे शक्तिशाली, सुव्यवस्थित और केंद्रीकृत प्रशासनिक संरचनाओं में से एक था। चंद्रगुप्त मौर्य और कौटिल्य ने राज्य का प्रशासन अत्यंत वैज्ञानिक रूप से संगठित किया। अशोक के शासनकाल में यह व्यवस्था और भी मानवीय तथा कल्याणकारी रूप लेती है।

मौर्य प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता केन्द्रियकरण थी—राजा सर्वोच्च शासक था और सभी विभाग सीधे राजा के नियंत्रण में थे। राजा को दैवीय नहीं बल्कि मानवीय और उत्तरदायी शासक माना गया। उसका दायित्व था—न्याय, सुरक्षा, कर-व्यवस्था, एवं जनता का कल्याण।

मंत्री-परिषद प्रशासन का मस्तिष्क थी। इसमें वरिष्ठ, अनुभवी और विद्वान व्यक्तियों को शामिल किया जाता था। विभिन्न विभाग—जैसे कृषि, पशुपालन, खनन, व्यापार, सड़क-निर्माण, जासूसी, सेना, कर-प्रणाली—सभी के लिए नियुक्त अधिकारी होते थे।

अमात्य, राज्यपाल (Kumara), महामात्य, युक्त, समितियाँ, सभी प्रशासनिक तंत्र का भाग थे।

मौर्य प्रशासन की एक विशिष्ट विशेषता जासूसी व्यवस्था थी। कौटिल्य के अनुसार, राजा को अपने राज्य के सभी क्षेत्रों की स्थिति का प्रतिदिन ज्ञान होना चाहिए। जासूस व्यवस्था भ्रष्टाचार रोकने और सुरक्षा सुनिश्चित करने का साधन थी।

सेना अत्यंत बड़ी और संगठित थी। पैदल सेना, घुड़सवार, हाथी, रथ—चारों अंगों की विशाल सेना का रखरखाव प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी।

अशोक का धम्म प्रशासन मौर्य शासन को विशिष्ट बनाता है। अशोक ने हिंसा का त्याग, न्याय, करुणा और नैतिकता पर आधारित प्रशासन चलाया। प्रजा के हित को सर्वोपरि रखते हुए धर्म-महामात्रों की नियुक्ति की गई।

मौर्यकालीन प्रशासन आधुनिक प्रशासनिक विज्ञान के कई सिद्धांतों का आधार है—केन्द्रियकरण, विभागीय संगठन, पर्यवेक्षण, जासूसी, जनकल्याण आदि।

इस प्रकार मौर्य प्रशासन भारतीय इतिहास की सर्वाधिक प्रभावशाली और सुव्यवस्थित प्रणाली थी, जिसने राजनीति और शासन के लिए आदर्श मॉडल प्रस्तुत किया।

Q9. प्राचीन भारतीय विदेश नीति में ‘मण्डल सिद्धांत’ का महत्व और व्यवहारिक उपयोग समझाइए।

कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित मण्डल सिद्धांत प्राचीन भारतीय विदेश नीति का सबसे वैज्ञानिक और प्रभावशाली सिद्धांत है। इसके अनुसार विश्व अनेक राज्यों से मिलकर बना है, जिनके परस्पर संबंध मित्रता, शत्रुता और हितों पर आधारित होते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक राजा के चार प्रकार के पड़ोसी राज्य होते हैं—मित्र, शत्रु, मध्यस्थ, और उदासीन

मण्डल सिद्धांत का मूल विचार यह है कि “पड़ोसी राज्य स्वभावतः शत्रु होते हैं और पड़ोसी का पड़ोसी मित्र होता है।” यह राज्य-व्यवहार की यथार्थवादी समझ पर आधारित था।

इस नीति का उद्देश्य था—राज्य को सुरक्षित रखना, शत्रुओं को कमजोर करना, कूटनीति का उपयोग करके युद्ध से बचना और सामरिक शक्ति बढ़ाना।

मण्डल सिद्धांत के मुख्य साधन थे—संधि, युद्ध, दूतावास, मैत्री, विवाह-संधि, धन-सहायता, जासूसी, और कूटनीतिक बातचीत

कौटिल्य ने छह नीति विकल्प बताए—

  1. षड्गुण्य नीति—शांति, युद्ध, आसन, द्वैध, संश्रय, और यान।

  2. उपासना नीति—मित्र को बढ़ाना।

  3. विग्रह—शत्रु से संघर्ष की तैयारी।

मण्डल सिद्धांत का व्यवहारिक रूप मौर्यकाल में दिखाई देता है। चंद्रगुप्त और चाणक्य ने सेल्यूकस के साथ संधि कर युद्ध टाला और भू-भाग प्राप्त किया। अशोक ने भी धम्म नीति द्वारा अंतर्राष्ट्रीय शांति और मैत्री को बढ़ावा दिया।

आधुनिक विदेश नीति में भी इस सिद्धांत के अनेक तत्व पाए जाते हैं—संतुलन की नीति, सामरिक गठबंधन, भू-राजनीति, कूटनीतिक बातचीत और युद्ध-निवारण।

इस प्रकार, मण्डल सिद्धांत प्राचीन भारतीय विदेश नीति का अत्यंत व्यवहारिक और वैज्ञानिक मॉडल है, जिसका महत्व आज भी कायम है।

Q10. प्राचीन भारत में आर्थिक प्रशासन, कृषि नीति और व्यापार व्यवस्था का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

प्राचीन भारतीय राजनीति में आर्थिक प्रशासन को अत्यंत महत्त्व दिया गया। अर्थशास्त्र और अन्य ग्रंथों में अर्थव्यवस्था को राज्य के सात अंगों में प्रमुख माना गया है। आर्थिक प्रशासन में कृषि, पशुपालन, व्यापार, कर-प्रणाली और खनन का विशेष महत्व था।

कृषि प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था का आधार थी। भूमि को सर्वोच्च संपत्ति माना जाता था। किसानों को सिंचाई, बीज, पशु, और सुरक्षा उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी थी। कौटिल्य ने भूमि-मापन, सिंचाई-कर, उर्वरता-अनुसार कर निर्धारण, तथा प्राकृतिक आपदाओं में राहत की व्यवस्था बताई है।

व्यापार देश के भीतर और बाहर व्यापक रूप से विकसित था। भारत से मसाले, रेशम, धातु, हाथी-दांत, मोती आदि का निर्यात होता था। यवन, फारस, चीन और रोमन साम्राज्यों के साथ भारत के गहरे व्यापारिक संबंध थे। व्यापार के लिए सड़कें, किले, सुरक्षित मार्ग, बंदरगाह और विपणन केंद्र बनाए जाते थे।

शिल्प और उद्योग राज्य के संरक्षण में चलाए जाते थे। धातु-शिल्प, वस्त्र-निर्माण, मिट्टी-शिल्प, जहाज-निर्माण, आभूषण-शिल्प अत्यंत उन्नत थे।

आर्थिक प्रशासन में कोषाध्यक्ष, सांमत, शहराधिकारी, वाणिज्याध्यक्ष आदि पदाधिकारी नियुक्त होते थे। हर विभाग का कार्य शाही आदेश, निरीक्षण और पारदर्शिता पर आधारित था।

कर-प्रणाली सुव्यवस्थित और न्यायपूर्ण थी—भूमि-कर, व्यापार-कर, शिल्प-कर, पशु-कर, तथा प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त कर प्रमुख थे।

प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर, कृषि-आधारित और व्यापार-विस्तारित थी, जो राजनीतिक स्थिरता का मुख्य आधार बनी।

Buy IGNOU Solved Guess Paper With Important Questions  :-

📞 CONTACT/WHATSAPP 88822 85078

Telegram (software) - Wikipedia Follow For Updates: senrigbookhouse

Read Also :

Leave a Comment