IGNOU FREE BSKG-176 भारतीय सामाजिक विचारधारा में व्यक्ति परिवार और समाज Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BSKG-176 भारतीय सामाजिक विचारधारा में व्यक्ति परिवार और समाज Solved Guess Paper 2025

Q1. भारतीय सामाजिक विचारधारा में ‘व्यक्ति’ की अवधारणा तथा उसके सामाजिक महत्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

भारतीय सामाजिक विचारधारा में ‘व्यक्ति’ को केवल जैविक इकाई या स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उसे समाज, परिवार, परंपरा और दायित्वों के संदर्भ में समझा जाता है। व्यक्ति समाज का मूल घटक होते हुए भी अपने को समाज से अलग नहीं मानता। पाश्चात्य चिंतन जहाँ व्यक्ति को स्वतंत्र, स्वायत्त और व्यक्तिगत अधिकारों का धारक मानता है, वहीं भारतीय दृष्टिकोण व्यक्ति को कर्तव्य, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्वों से जुड़ा मानता है। भारतीय दर्शन में व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप ‘आत्मा’ है, जो शाश्वत, सर्वव्यापी और दिव्य है। व्यक्ति का लक्ष्य केवल भौतिक विकास नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार है।

भारतीय सामाजिक विचारधारा में यह माना गया है कि व्यक्ति की उन्नति तभी संभव है जब वह परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझे। मनुस्मृति, महाभारत, गीता, उपनिषद आदि सभी ग्रंथों में व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार, नैतिकता और कर्तव्य को अत्यंत महत्व दिया गया है। व्यक्ति के विकास के पाँच मुख्य आयाम माने गए हैं—शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक। व्यक्ति का आदर्श वह माना गया है जो आत्म-संयम, सत्य, अहिंसा, परोपकार, क्षमा, करुणा और कृतज्ञता जैसे गुणों से युक्त हो।

भारतीय समाज व्यक्ति को अधिकारों की तुलना में कर्तव्यों को अधिक महत्व देता है। यहाँ व्यक्ति का मूल्य उसकी सामाजिक और नैतिक भूमिका से निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए, परिवार में पुत्र, पिता, माता, पत्नी, गुरु आदि की विशिष्ट भूमिकाएँ होती हैं और व्यक्ति अपने-अपने दायित्वों का पालन करके समाज की सुव्यवस्था में योगदान देता है।

आधुनिक संदर्भ में भी भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र, शिक्षा, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में व्यक्ति की जागरूकता और सक्रियता समाज के उत्थान के लिए आवश्यक मानी जाती है। भारतीय सामाजिक विचारधारा व्यक्ति को न तो अत्यधिक स्वतंत्रता देती है कि वह समाज से कट जाए, और न ही उसे समाज में विलीन कर उसकी व्यक्तिगत पहचान समाप्त करती है।

निष्कर्षतः, भारतीय विचारधारा व्यक्ति को संपूर्ण समाज का अंग मानते हुए उसके नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास को सर्वोपरि रखती है। व्यक्ति और समाज के संबंध परस्पर पूरक और सहयोगात्मक हैं, जिससे समाज में संतुलन, सौहार्द और सामूहिक प्रगति संभव होती है।

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Q2. भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ‘परिवार’ का स्थान और उसकी विशेषताओं का विस्तृत विवेचन कीजिए।

भारतीय समाज में परिवार को सामाजिक संगठन की मूल इकाई माना गया है। परिवार न केवल जैविक संरचना है, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक, आर्थिक और नैतिक आधार भी है। भारतीय परिवार प्रणाली अपनी विशिष्टता, स्थिरता और सामूहिकता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ परिवार केवल माता-पिता और बच्चों तक सीमित नहीं, बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन, भतीजे-भतीजी सहित विस्तृत रूप में भी अस्तित्व में रहता है। इस व्यापक संयुक्त परिवार प्रणाली का मूल तत्व ‘सहयोग, साझेदारी और परस्पर निर्भरता’ है।

भारतीय परिवार की पहली विशेषता है—संस्कार–संप्रेषण। परिवार ही वह संस्था है जहाँ बच्चे अनुशासन, नैतिकता, कर्तव्य, सम्मान, धर्म, मूल्य और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं। परिवार बच्चों का पहला विद्यालय है। दूसरी विशेषता है—आर्थिक सहयोग। परंपरागत भारतीय परिवार में आय का स्रोत भले ही एक हो, परंतु व्यय सभी की आवश्यकताओं के अनुसार साझा होता था। इससे परिवार में आर्थिक सुरक्षा बनी रहती थी। तीसरी विशेषता है—भावनात्मक समर्थन—कठिनाइयों, दुःख-दर्द और चुनौतियों का सामना परिवार के सामूहिक सहयोग से किया जाता है।

भारतीय परिवार की चौथी विशेषता है—सामाजिक नियंत्रण। परिवार सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित कर सही दिशा देता है। पाँचवीं विशेषता—धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन—त्योहार, संस्कार, पूजा, व्रत आदि परिवार में ही सिखाए जाते हैं।

आधुनिक समय में परिवार कई बदलावों से गुजर रहा है। संयुक्त परिवारों का स्थान तेजी से एकल परिवारों ने लिया है। रोजगार, शिक्षा और स्थानांतरण जैसे कारकों ने परिवार को छोटा बनाया है। फिर भी भारतीय परिवार का मूल स्वरूप—स्नेह, सहयोग, परस्पर सम्मान और जिम्मेदारी—आज भी कायम है।

भारतीय सामाजिक विचारधारा परिवार को समाज का नैतिक स्तंभ मानती है। परिवार व्यक्ति को पहचान, सुरक्षा, मूल्य और जीवन-दर्शन प्रदान करता है। इसलिए परिवार केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना का आधार है।

Q3. भारतीय सामाजिक विचारधारा में ‘समाज’ की अवधारणा तथा उसकी संरचना का विस्तृत वर्णन कीजिए।

भारतीय सामाजिक विचारधारा में समाज को एक जीवंत, गतिशील और सांस्कृतिक इकाई माना गया है। समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों के बीच संबंधों, मान्यताओं, मूल्यों, परंपराओं और व्यवहार-नियमों का संगठित रूप है। भारतीय समाज विविधता और एकता—दोनों का अद्भुत संगम है। भाषा, धर्म, संस्कृति, भोजन, पहनावा, रीति-रिवाज में भिन्नता के बावजूद भारतीय समाज एक सांस्कृतिक धारा से बंधा हुआ है।

समाज की संरचना कई संस्थाओं पर आधारित है—परिवार, जाति, ग्राम, समुदाय, शिक्षा, धर्म, राज्य आदि। इनमें परिवार सबसे छोटी इकाई है, जो सामाजिक मूल्यों का निर्माण करता है। जाति व्यवस्था भारतीय समाज की विशिष्ट संरचना रही है, जो जन्म के आधार पर सामाजिक वर्गीकरण का एक पारंपरिक रूप था। हालांकि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था ने इससे जुड़े भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया है, फिर भी जाति आज भी सामाजिक पहचान का एक हिस्सा है।

भारतीय समाज की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता है—धार्मिक विविधता। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि सभी समुदाय भारतीय समाज का अभिन्न अंग हैं। धर्म सामाजिक व्यवहार और नैतिकता का बड़ा निर्धारक है।

तीसरी विशेषता—सामूहिकता (Collectivism)। यहाँ व्यक्ति स्वयं को समाज से अलग नहीं देखता बल्कि परिवार, समुदाय और राष्ट्र का हिस्सा मानकर कार्य करता है। पश्चिमी समाज जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल देता है, वहीं भारतीय समाज कर्तव्य, संबंध और परस्पर सहयोग को प्राथमिकता देता है।

चौथी विशेषता—परंपरा और आधुनिकता का संतुलन। भारतीय समाज न तो परंपराओं से पूरी तरह बँधा है, न पूरी तरह आधुनिक हुआ है। यह निरंतर परिवर्तनशील है—नई तकनीक, शिक्षा, उद्योग, आधुनिकीकरण आदि ने समाज में बड़े बदलाव किए हैं, परंतु सांस्कृतिक मूल्य अभी भी मजबूत हैं।

भारतीय समाज की चुनौतियों में गरीबी, शिक्षा-अभाव, लैंगिक असमानता, जातीय भेदभाव, बेरोजगारी आदि शामिल हैं। सामाजिक सुधार आंदोलनों—राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, गांधी आदि—ने इन समस्याओं को दूर करने का बड़ा प्रयास किया।

निष्कर्षतः, भारतीय समाज विविधता, सामूहिकता, नैतिकता और सांस्कृतिक एकता पर आधारित एक अनोखी सामाजिक संरचना है, जो निरंतर परिवर्तन के साथ आगे बढ़ रही है।

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Q4. भारतीय सामाजिक विचारधारा में ‘व्यक्ति और समाज’ के परस्पर संबंध का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

भारतीय सामाजिक विचारधारा में व्यक्ति और समाज के संबंध को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह संबंध परस्पर आश्रित, सामंजस्यपूर्ण और पूरक प्रकृति का है। व्यक्ति और समाज को कभी भी दो अलग-अलग इकाइयों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि दोनों को एक-दूसरे की उन्नति और अस्तित्व के लिए आवश्यक माना गया है। भारतीय दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि व्यक्ति का वास्तविक विकास तभी संभव है जब वह समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए जीवन जीए। व्यक्ति अपने गुणों, कर्मों और मूल्य-चिंतन के माध्यम से समाज को समृद्ध करता है, जबकि समाज व्यक्ति को पहचान, अवसर, सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत प्रदान करता है।

पाश्चात्य समाज में व्यक्ति को अधिकारों के आधार पर समझा जाता है, जबकि भारतीय विचारधारा कर्तव्यों पर बल देती है। गीता में कहा गया है कि मनुष्य का कर्तव्य-पालन ही उसे श्रेष्ठ बनाता है। रामायण, महाभारत और उपनिषदों में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि व्यक्ति का चरित्र, नैतिकता और आचरण समाज की नैतिक संरचना को प्रभावित करते हैं। व्यक्ति समाज से संस्कार, शिक्षा, भाषा, संस्कृति और व्यवहार सीखता है, इसलिए वह समाज से अलग नहीं रह सकता।

भारतीय समाज समन्वयवादी दृष्टिकोण पर आधारित है—यह व्यक्ति की स्वतंत्रता को मान्यता देता है, परंतु उसे पूर्ण स्वतंत्रता नहीं देता कि वह समाज से विमुख हो जाए। व्यक्ति परिवार, समुदाय और समाज की ज़रूरतों के अनुसार अपना आचरण निर्धारित करता है। इस सामूहिक दृष्टि से समाज में एकता, स्थिरता और सहयोग बना रहता है।

आधुनिक संदर्भ में, व्यक्ति की महत्वाकांक्षाएँ बढ़ी हैं, लेकिन समाज की अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था ने व्यक्ति को अधिकार दिए हैं, परंतु सामाजिक न्याय, समानता और नैतिकता की अपेक्षा भी व्यक्ति से की जाती है।

इस प्रकार, भारतीय सामाजिक विचारधारा व्यक्ति और समाज के संबंध को द्वंद्वात्मक नहीं, बल्कि सामंजस्यपूर्ण मानती है। व्यक्ति समाज का निर्माण करता है, और समाज व्यक्ति के विकास का साधन बनता है। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

Q5. भारतीय सामाजिक संरचना में संयुक्त परिवार प्रणाली की विशेषताएँ और आधुनिक परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए।

भारतीय समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली सदियों से एक सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रही है। संयुक्त परिवार केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और नैतिक आधार का केंद्र रहा है। इसकी मुख्य विशेषताओं में सामूहिकता, साझा संसाधन, कार्य-विभाजन, पीढ़ीगत सह-अस्तित्व, संस्कार-प्रदर्शन और सामाजिक सुरक्षा शामिल हैं। संयुक्त परिवार में सभी सदस्य एक छत के नीचे रहते हैं, आर्थिक भार साझा करते हैं, निर्णय सामूहिक रूप से लेते हैं, और कठिन परिस्थितियों में एक-दूसरे का साथ देते हैं।

संयुक्त परिवार बच्चों के लिए पहला विद्यालय होता है, जहाँ वे अनुशासन, सम्मान, संस्कार, परंपरा, व्यवहार और नैतिकता सीखते हैं। दादा-दादी और अन्य वरिष्ठ सदस्यों की उपस्थिति बच्चों के लिए नैतिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शन का स्रोत होती है। आर्थिक दृष्टि से, संयुक्त परिवार प्रणाली अत्यधिक लाभकारी है क्योंकि परिवार में उपलब्ध संसाधन जैसे संपत्ति, आय और श्रम का साझापन आर्थिक बोझ को कम करता है और सुरक्षा का आधार बनता है।

परंतु आधुनिक समय में संयुक्त परिवार प्रणाली में कई परिवर्तन हुए हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा, नौकरी की तलाश और स्वतंत्र जीवन-शैली की चाह ने संयुक्त परिवारों को एकल परिवारों में बदल दिया है। महिलाओं के कार्यक्षेत्र में आने से पारंपरिक भूमिकाओं में भी परिवर्तन हुआ है। माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ी है, क्योंकि भौतिक परिस्थितियाँ संयुक्त निवास की अनुमति नहीं देतीं।

हालांकि, संयुक्त परिवार प्रणाली पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। अब यह नए रूपों में उभर रही है—सह-निवास संयुक्त परिवार, डिजिटल संयुक्त परिवार, और मूल्य-आधारित संयुक्त परिवार जैसे मॉडल आधुनिक समय में दिखाई देते हैं।

निष्कर्षतः, संयुक्त परिवार की आत्मा—सहयोग, प्रेम, सम्मान और सामूहिकता—आज भी भारतीय सामाजिक जीवन का आधार है, और उचित परिवर्तनों के साथ यह व्यवस्था भविष्य में भी प्रासंगिक बनी रहेगी।

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Q6. भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।

भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था का उद्भव वैदिक काल से माना जाता है। प्रारंभिक काल में जाति कर्म और गुण पर आधारित थी, जिसे वर्ण व्यवस्था कहा गया। इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण समाज के कार्य-विभाजन के प्रतीक थे। मूल उद्देश्य समाज को संगठित और कार्यक्षम बनाना था।

समय के साथ जाति जन्म-आधारित हो गई, जिससे सामाजिक विभाजन, ऊँच-नीच और भेदभाव उत्पन्न हुआ। सामाजिक गतिशीलता कम हो गई और जातियाँ पेशों से जुड़कर स्थायी समूह बन गईं। इस प्रणाली का प्रभाव भारतीय समाज पर गहरा पड़ा—एक ओर इसने सामाजिक पहचान, समुदाय और सुरक्षा दी, परंतु दूसरी ओर सामाजिक भेदभाव का कारण भी बनी।

जाति-व्यवस्था ने विवाह, भोजन, निवास, पेशा और सामाजिक संबंधों को प्रभावित किया। यह व्यवस्था सामाजिक एकता की बाधा बनी और दलितों एवं पिछड़े वर्गों पर अत्याचार हुए।

सामाजिक सुधार आंदोलनों ने जातिगत भेदभाव को चुनौती दी। बुद्ध, कबीर, रैदास, गुरु नानक, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति-व्यवस्था को सामाजिक अन्याय का मूल बताया और समानता की वकालत की। संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया और सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए।

फिर भी जाति आज भी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राजनीति में जाति एक शक्तिशाली तत्त्व है। विवाह और सामाजिक पहचान भी जाति-आधारित विचारों से प्रभावित होती है।

अतः जाति-व्यवस्था भारतीय समाज का ऐतिहासिक अवशेष है, जिसका सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में प्रभाव पड़ा। आज आवश्यकता है कि जाति को पहचान के बजाय विविधता और समानता के दृष्टिकोण से देखा जाए।

Q7. भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन के कारकों का विस्तृत विवेचन कीजिए।

भारतीय समाज निरंतर परिवर्तनशील रहा है। सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख कारक—आर्थिक विकास, शिक्षा, तकनीकी प्रगति, शहरीकरण, औद्योगीकरण, राजनीतिक विचारधाराएँ, सामाजिक सुधार आंदोलन और वैश्वीकरण हैं।

पहला कारक आर्थिक विकास समाज में अवसर, रोजगार और जीवन-स्तर में सुधार लाता है, जिससे जीवन-शैली और सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन होता है।

दूसरा कारक शिक्षा व्यक्ति की सोच, दृष्टिकोण और व्यवहार को बदलती है। शिक्षा समानता, स्वतंत्रता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवाधिकारों की समझ प्रदान करती है।

तीसरा कारक औद्योगीकरण और शहरीकरण है। इससे परिवार संरचना, रोजगार, पारंपरिक संबंधों और सामाजिक गतिशीलता पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

सामाजिक सुधार आंदोलन भी महत्वपूर्ण रहे हैं—राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले, आंबेडकर, गांधी, विवेकानंद आदि ने सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई।

तकनीकी विकास ने संचार, ज्ञान, शिक्षा और सामाजिक संपर्क को नए रूप दिए। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने समाज को वैश्विक बना दिया।

परिवर्तन के साथ-साथ चुनौतियाँ भी आती हैं—सांस्कृतिक संघर्ष, पारिवारिक विघटन, नैतिक संकट, बेरोजगारी आदि।

अतः भारतीय समाज में परिवर्तन निरंतर और बहुआयामी है। परिवर्तन का लक्ष्य समाज को अधिक समान, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील बनाना है

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Q9. भारतीय सामाजिक विचारधारा में धर्म का महत्व और उसकी सामाजिक भूमिका का विश्लेषण कीजिए।

धर्म भारतीय समाज की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था है। धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि नैतिकता, आचरण, मूल्य, सामाजिक व्यवस्था और कर्तव्य-निर्धारण का आधार है। भारतीय संस्कृति में धर्म व्यक्ति के जीवन को दिशा, अनुशासन और उद्देश्य प्रदान करता है।

धर्म की पहली भूमिका नैतिक नियंत्रण है। धर्म व्यक्ति को सत्य, अहिंसा, करुणा, संयम, अनुशासन और परोपकार का पालन करने की प्रेरणा देता है।

दूसरी भूमिका सामाजिक एकता है। त्योहार, अनुष्ठान, पूजा, रीति-रिवाज समाज में सामूहिकता और सांस्कृतिक बंधन को मजबूत करते हैं।

तीसरी भूमिका संस्कार-प्रणाली है—जन्म से मृत्यु तक सोलह संस्कार व्यक्ति के जीवन को नियंत्रित और व्यवस्थित रखते हैं।

चौथी भूमिका सामाजिक स्थिरता है। धर्म कानून, सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक संरचना को प्रभावित करता है।

आधुनिक समय में धर्म के सकारात्मक प्रभावों के साथ-साथ नकारात्मक पहलू भी उजागर हुए हैं, जैसे अंधविश्वास, कट्टरता और धार्मिक राजनीति। फिर भी धर्म भारतीय समाज में नैतिकता और भावनात्मक शक्ति का प्रमुख स्रोत है।

अतः धर्म भारतीय सामाजिक विचारधारा का आधार स्तंभ है, जो व्यक्ति और समाज दोनों को दिशा देता है।

Q10. भारतीय समाज की विविधता और ‘एकता में विविधता’ की अवधारणा का विश्लेषण कीजिए।

भारतीय समाज विश्व की सबसे विविधतापूर्ण सामाजिक संरचनाओं में से एक है। यहाँ विभिन्न भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ, जातियाँ, भोजन, पहनावा, रहन-सहन और परंपराएँ मिलती हैं। इस विशाल विविधता के बावजूद भारत सदियों से एकता का प्रतीक रहा है—इसे ही “एकता में विविधता” कहा गया है।

भाषाई विविधता भारत की अनोखी पहचान है। संविधान ने 22 भाषाओं को मान्यता दी है। फिर भी संचार और राष्ट्रीय पहचान में एकता बनी रहती है।

धार्मिक विविधता—हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन सभी समुदाय मिलकर एक संयुक्त सांस्कृतिक संरचना बनाते हैं।

सांस्कृतिक विविधता—विभिन्न राज्यों के नृत्य, संगीत, कला, त्योहार अलग होते हुए भी भारतीयता का भाव साझा करते हैं।

इतिहास में हमने देखा है कि विभिन्न संस्कृतियों के आगमन ने भारतीय समाज को समृद्ध बनाया—आर्य, द्रविड़, मुगल, अंग्रेज सभी ने संस्कृति पर प्रभाव डाला।

एकता के आधार—संविधान, लोकतंत्र, साझा राष्ट्रीय मूल्य, धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और परंपरा—भारतीय समाज को एक सूत्र में बाँधते हैं।

साथ ही चुनौतियाँ भी हैं—सांप्रदायिकता, जातीयता, भाषायी विवाद, क्षेत्रीयता आदि।

फिर भी भारतीय समाज की क्षमता है कि वह विविधताओं को संघर्ष नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शक्ति में बदल देता है। अतः “एकता में विविधता” केवल नारा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन का वास्तविक स्वरूप है।

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