IGNOU FREE BSKG-173 आधार संस्कृत Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE BSKG-173 आधार संस्कृत Solved Guess Paper 2025

Q1. संस्कृत व्याकरण का महत्व और उसके मूल अंगों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

संस्कृत व्याकरण भारतीय भाषाओं का आधार माना जाता है, क्योंकि यह न केवल संस्कृत भाषा की संरचना को स्पष्ट करता है बल्कि अन्य भाषाओं की व्याकरणिक प्रणालियों पर भी गहरा प्रभाव डालता है। संस्कृत व्याकरण का निर्धारण मुख्यतः पाणिनि के अष्टाध्यायी से होता है, जिसे विश्व का सबसे वैज्ञानिक, व्यवस्थित और संक्षिप्त व्याकरण ग्रंथ माना जाता है। व्याकरण का मुख्य उद्देश्य भाषा को शुद्ध, स्पष्ट और व्यवस्थित बनाना है। इसके तीन प्रमुख अंग हैं—शब्द-रूप, धातु-रूप, और वाक्य-रचना। शब्द-रूपों में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि के विभक्ति रूप शामिल होते हैं। संस्कृत में आठ विभक्तियाँ हैं जो वाक्य में शब्द के कार्य को स्पष्ट करती हैं। धातु-रूप संस्कृत की रीढ़ है, क्योंकि सभी क्रियाएँ धातुओं से बनती हैं। इन धातुओं के आधार पर लट्, लङ्, लोट् आदि लकारों में क्रिया-रूप बनते हैं। व्याकरण के तीसरे महत्वपूर्ण भाग वाक्य-रचना में शब्दों का उचित संयोजन तथा कारक-व्यवस्था आती है। संस्कृत में कारक-व्यवस्था अत्यंत वैज्ञानिक है; कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण आदि कारक वाक्य की संरचना को अर्थपूर्ण बनाते हैं। व्याकरण न केवल भाषा को सही ढंग से लिखने और बोलने में सहायक होता है, बल्कि यह विचारों को स्पष्ट और सुसंगत रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता भी विकसित करता है। संस्कृत व्याकरण का अध्ययन विद्यार्थियों में तार्किक क्षमता, अनुशासन और भाषिक सौंदर्य का भी विकास करता है। इसके अतिरिक्त, वेद, उपनिषद, पुराण, काव्य और दर्शन के अध्ययन हेतु संस्कृत व्याकरण की समझ आवश्यक है। इस प्रकार व्याकरण संस्कृत भाषा का आधार स्तंभ है जो भाषा के सौंदर्य, संरचना और उपयोग को निर्धारित करता है।

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Q2. संस्कृत निबंध लेखन की विशेषताएँ तथा उसका शिक्षण-शास्त्रीय महत्व स्पष्ट कीजिए।

संस्कृत निबंध लेखन भाषा-अभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो विद्यार्थियों की रचनात्मकता, अभिव्यक्ति-शक्ति और भाषिक ज्ञान को विकसित करता है। संस्कृत निबंध की प्रथम विशेषता उसकी सरलता और स्पष्टता है—निबंध में प्रयुक्त भाषा सुबोध, प्रवाहपूर्ण और व्याकरण-सम्मत होनी चाहिए। दूसरी विशेषता है विषय-वस्तु की सुसंगति; निबंध में विचारों को क्रमबद्ध और तार्किक रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है। संस्कृत निबंध में संस्कृत-व्याकरण, संधि, समास, तद्धित, कृदन्त, भावार्थ, कारक-व्यवस्था आदि का सही प्रयोग निबंध को परिशुद्ध बनाता है। तीसरी विशेषता है शब्द-संपदा का उचित प्रयोग—अर्थात भाषा में शुद्ध, मधुर एवं साहित्यिक संस्कृत शब्दों का प्रयोग निबंध को प्रभावशाली बनाता है।

निबंध लेखन में उपोद्घात (प्रस्तावना), मुख्य विवेचन, और उपसंहार का क्रम होता है। प्रस्तावना में विषय का संक्षिप्त परिचय दिया जाता है, मुख्य भाग में तार्किक विवेचना होती है, और उपसंहार में सार-संक्षेप प्रस्तुत किया जाता है। संस्कृत निबंध में भाषा का सौंदर्य भी महत्त्वपूर्ण है—यत्र-तत्र श्लोक, सूक्ति, लोकोक्ति आदि का प्रयोग निबंध को साहित्यिक रूप प्रदान करता है।

शिक्षण-शास्त्रीय दृष्टि से संस्कृत निबंध लेखन का उद्देश्य विद्यार्थियों में भाषा-रुचि, भाषिक सृजनशीलता, तार्किकता, और अभिव्यक्ति-शक्ति का विकास करना है। निबंध लेखन छात्रों को भाषा-व्यवहार सीखने में मदद करता है और उन्हें व्याकरण के नियमों को वास्तविक उपयोग में लाने का अवसर देता है। यह विद्यार्थियों में संस्कृत साहित्य एवं संस्कृति के प्रति अनुराग भी उत्पन्न करता है।

अतः संस्कृत निबंध लेखन केवल भाषा अभ्यास नहीं, बल्कि संस्कृत भाषा की शुद्धि, सौंदर्य और अभिव्यक्ति के विकास का सशक्त माध्यम है।

Q3. संस्कृत साहित्य की प्रमुख शाखाओं का वर्णन और उनकी विशेषताएँ बताइए।

संस्कृत साहित्य विश्व की सबसे प्राचीन, विस्तृत और विविधतापूर्ण साहित्य परंपराओं में से एक है। इसे सामान्यतः तीन मुख्य वर्गों में विभाजित किया जाता है—वैदिक साहित्य, लौकिक साहित्य, और वैदिकेतर दार्शनिक साहित्य। वैदिक साहित्य में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद शामिल हैं, जो मानव सभ्यता की प्राचीनतम काव्यात्मक और दार्शनिक उपलब्धियाँ हैं। वैदिक सूक्तों में काव्यात्मकता, प्रकृति-चित्रण, दार्शनिक अनुभूति और आध्यात्मिक ज्ञान का अद्भुत संगम मिलता है।

लौकिक संस्कृत साहित्य की प्रमुख शाखाओं में काव्य, नाटक, गद्य साहित्य, और कथा साहित्य आते हैं। काव्य में कालिदास, भट्टि, भारवि, माघ आदि कवियों की रचनाएँ प्रमुख हैं। कालिदास को संस्कृत काव्य का शिखर माना जाता है, उनकी रचनाओं में प्रकृति, प्रेम, करुणा और सौंदर्य का अद्भुत अनुपम रूप मिलता है। नाटक-साहित्य की परंपरा भी अत्यंत समृद्ध है—भास, कालिदास, शूद्रक, भट्टनारायण आदि महान नाटककारों ने संस्कृत नाटक को विश्व-स्तर पर प्रतिष्ठित किया। अभिज्ञानशाकुंतलम् और मृच्छकटिकम् संस्कृत नाट्य परंपरा की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।

संस्कृत साहित्य का गद्य-भंडार भी विशाल है—बाणभट्ट, दण्डी, सुबन्धु आदि महान गद्यकारों ने संस्कृत को काव्यमयी गद्य का स्वरूप दिया। कथा-साहित्य में पंचतंत्र, हितोपदेश, बृहत्कथा आदि कृतियाँ आज भी साहित्य और नीति-शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

वैदिकेतर साहित्य में उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, स्मृति, पुराण, धर्मशास्त्र, और दर्शनशास्त्र की समृद्ध परंपरा है। उपनिषदों में अद्वैत, ब्रह्म, आत्मा, संसार और मोक्ष के गहन दार्शनिक विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

संस्कृत साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वांगीणता है—यह धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, अध्यात्म, राजनीति, अर्थशास्त्र से लेकर प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति तक सभी विषयों का व्यापक वर्णन करता है। इसकी भाषा मधुर, लयात्मक और अत्यंत वैज्ञानिक है।

इस प्रकार संस्कृत साहित्य केवल भाषा का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और भावना का आधार स्तंभ है।

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Q4. संस्कृत व्याकरण में ‘संधि’ का महत्व और उसके प्रकारों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

संधि संस्कृत व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मूलभूत विभाग है। ‘संधि’ का अर्थ है—दो शब्दों या दो वर्णों का मेल। संस्कृत भाषा अपनी वैज्ञानिक व्यवस्था, ध्वनि-सौंदर्य और उच्चारण-शुद्धता के लिए प्रसिद्ध है, और इन सभी गुणों की आधारशिला संधि पर टिकी हुई है। संधि का मुख्य उद्देश्य है—भाषा को प्रवाहपूर्ण बनाना, उच्चारण को सुलभ करना और ध्वनियों में सामंजस्य स्थापित करना। संधि के माध्यम से शब्द केवल जोड़ते नहीं, बल्कि नई ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं, जिससे भाषिक सौंदर्य और भी बढ़ जाता है।

संधि तीन प्रकार की मानी गई है—स्वर संधि, व्यंजन संधि, और विसर्ग संधिस्वर संधि तब होती है जब दो स्वरों का आपस में मेल होता है। इसमें गुण संधि, वृद्धि संधि, यण संधि, आयादि संधि आदि उपप्रकार शामिल हैं। उदाहरणतः राम + इति = राम इति (गुण संधि)। स्वर संधि भाषा को लयात्मक बनाती है और शब्दों को एकसाथ जोड़कर सुश्राव्यता उत्पन्न करती है।

दूसरी है व्यंजन संधि, जिसमें दो व्यंजनों के मिलने से ध्वनि-परिवर्तन होता है। इसमें जश्त्व, जष्त्व, अनुकरण, परसवर्ण संधि आदि शामिल हैं। जैसे—सत् + जन = सज्जन। इस संधि का वैज्ञानिक आधार ध्वनि-उच्चारण में सहजता है; कठोर ध्वनि के बाद कई बार कोमल ध्वनि स्वतः परिवर्तित हो जाती है।

तीसरी है विसर्ग संधि, जो विसर्ग (: / ः) के बाद आने वाले अक्षरों के अनुसार बदलती है। जैसे—हरिः + इति = हरिरिति। विसर्ग संधि संस्कृत के उच्चारण में विशिष्ट मधुरता प्रदान करती है।

संधि का महत्त्व न केवल भाषिक है बल्कि व्याकरणिक और काव्यात्मक भी है। संस्कृत के श्लोकों में छंद, लय और सौंदर्य संधि के कारण ही बनता है। संधि के बिना संस्कृत भाषा असंबद्ध और कठोर प्रतीत होती। व्याकरणिक दृष्टि से, संधि समझे बिना शब्द-रूपों, समास, धातु-रूप और वाक्य-विन्यास को सही प्रकार से समझना संभव नहीं।

सार रूप में, संधि केवल वर्ण-परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्कृत भाषा की ध्वन्यात्मक, वैज्ञानिक और सौंदर्यपरक संरचना का आधार है।

Q5. संस्कृत व्याकरण में ‘समास’ का स्वरूप, प्रकार और उसके उपयोग का वर्णन कीजिए।

समास संस्कृत भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण व्याकरणिक अंग है। ‘समास’ का अर्थ है—दो या अधिक शब्दों का संक्षिप्त रूप में संयोजन। जहाँ विभक्ति-युक्त विस्तृत रूप में अभिव्यक्ति होती है, वहीं समास भाषा को संक्षिप्त, प्रभावशाली और साहित्यिक बनाता है। समास से भाषा की शक्ति और अभिव्यक्ति-कौशल में वृद्धि होती है।

समास चार प्रकारों में वर्गीकृत है—अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्विगु, और बहुव्रीहि
अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और संपूर्ण समास अव्यय के समान अर्थ देता है। जैसे—यथाशक्ति, उपरि-गृह। यह समास वाक्य में अव्यय रूप से कार्य करता है।

तत्पुरुष समास संस्कृत का सबसे व्यापक समास है। इसमें दूसरा पद प्रधान होता है और पहला पद उसके विभक्ति-विभक्त अर्थ के समान होता है। उदाहरण—राजगृह (राज्ञः गृह)। इसके कई उपप्रकार भी हैं: कर्मधारय, द्वितीया-तत्पुरुष, षष्ठी-तत्पुरुष आदि। यह समास संस्कृत साहित्य में अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि यह अर्थ को स्पष्ट और संक्षिप्त बनाता है।

द्विगु समास में संख्यावाचक शब्द पहले आता है और संपूर्ण समास बहुवचन अर्थ देता है। जैसे—त्रिलोकी, पंचजनाः। यह समास संख्या के कारण विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है।

बहुव्रीहि समास वह समास है जिसका अर्थ उसके पदों से भिन्न और बाहरी होता है। जैसे—पुंडरीकाक्ष (जिसकी आँखें कमल के समान हैं)। यह समास विशेषणात्मक होता है और काव्य में विशेष सौंदर्य लाता है।

समास का व्याकरणिक महत्व अत्यधिक है। इससे भाषा संक्षिप्त होती है, अनावश्यक शब्दों से बचाव होता है, और अभिव्यक्ति प्रभावी बनती है। काव्य में समास शब्दों की लय, छंद और सौंदर्य के लिए अनिवार्य है। समास के कारण संस्कृत को “संक्षेप-प्रधान भाषा” कहा गया है।

समास केवल व्याकरण नहीं बल्कि संस्कृत साहित्यिक परंपरा की संवाहक शक्ति है।

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Q6. संस्कृत साहित्य में काव्य के लक्षण और उसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

संस्कृत साहित्य में काव्य का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। काव्य केवल छंदबद्ध वाणी नहीं, बल्कि भाव, सौंदर्य, कल्पना और अभिव्यक्ति का अद्भुत संगम है। आचार्य वामन ने कहा—“रीतिरात्मा काव्यस्य”—अर्थात शैली ही काव्य की आत्मा है। जबकि मम्मट का मत है—“वाक्यं रसात्मकं काव्यम्”—रस से युक्त वाक्य ही काव्य है।

संस्कृत काव्य की विशेषताएँ अनेक हैं। पहली है भाव-संपन्नता। काव्य में स्थायी भाव, संचारी भाव और विभाव के माध्यम से रस उत्पन्न होता है। शृंगार, करुण, वीर, अद्भुत आदि रस काव्य को जीवंत बनाते हैं।

दूसरी विशेषता है अलंकार-प्रयोग। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा जैसे अलंकार काव्य में सौंदर्य-वृद्धि करते हैं। संस्कृत काव्य अलंकारों की समृद्ध परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।

तीसरी विशेषता है कल्पनाशीलता। कवि संसार को अपने दृष्टिकोण से पुनः रचता है—जो सामान्य आँखों से दिखाई नहीं देता उसे कवि अपने काव्य द्वारा जीवंत करता है।

चौथी विशेषता है भाषा का माधुर्य। संस्कृत की स्वच्छ ध्वनियाँ, लयात्मकता, समास और संधि-व्यवस्था काव्य को सुश्राव्य बनाती हैं।

पाँचवीं विशेषता है ध्वनि और वक्रोक्ति। इनके माध्यम से काव्य में अप्रत्यक्ष अर्थ, संकेत और गूढ़ता आती है।

काव्य का दार्शनिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यधिक है। कालिदास, भास, माघ, भारवि, भवभूति आदि कवियों ने काव्य को केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर समृद्ध किया।

इस प्रकार संस्कृत काव्य भारतीय साहित्य की आत्मा है, जिसमें सौंदर्य, ज्ञान और अनुभूति का अद्भुत संगम मिलता है।

Q7. संस्कृत नाटक की विशेषताएँ और उसकी परंपरा का ऐतिहासिक विकास समझाइए।

संस्कृत नाटक विश्व की सबसे प्राचीन और व्यवस्थित नाट्य परंपराओं में से एक है। इसका आधार भरतमुनि का नाट्यशास्त्र है, जिसे नाट्य कला का पंचम वेद माना गया है। संस्कृत नाटक की प्रमुख विशेषताएँ हैं—रस सिद्धांत, संगीत-नृत्य का मेल, उच्च साहित्यिक भाषा, राजसी विषय-वस्तु, और नैतिक संदेश

संस्कृत नाटक में हास्य, करुण, शृंगार, वीर आदि रसों के माध्यम से दर्शकों को मनोरंजन और शिक्षा दोनों प्रदान की जाती है। नाटक में संवाद, अभिनय, संगीत, वेशभूषा और दृश्य सुंदरता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

इतिहास में संस्कृत नाटक की परंपरा भास से आरंभ होती है। भास के नाटकों में सरलता, भावनाओं का प्रभावी चित्रण और कथानक की सजीवता दिखाई देती है। इसके बाद कालिदास ने संस्कृत नाटक को चरम पर पहुँचाया। उनका नाटक अभिज्ञानशाकुंतलम् विश्वभर में प्रसिद्ध है। शूद्रक का मृच्छकटिकम् सामाजिक यथार्थ और मानवीय रिश्तों पर आधारित उत्कृष्ट कृति है। भवभूति के नाटकों में करुण रस की गहन अभिव्यक्ति मिलती है।

संस्कृत नाटक की एक विशेषता यह भी है कि नाटक दुखांत (Tragedy) नहीं होता। उसका उद्देश्य मनुष्य को आशा, समाधान और नैतिक मार्ग प्रदान करना है।

इस प्रकार संस्कृत नाटक भारतीय संस्कृति, सौंदर्यशास्त्र और सामाजिक मूल्यों का जीवंत दर्पण है।

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Q8. संस्कृत गद्य साहित्य की मुख्य विशेषताओं और प्रमुख गद्यकारों का वर्णन कीजिए।

संस्कृत गद्य साहित्य अपनी समृद्ध अभिव्यक्ति, कथन-कला और शैलीगत सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। गद्यकारों ने वर्णन, संवाद, चरित्र-चित्रण और भाव-प्रस्तुति को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। संस्कृत गद्य में सरल गद्य से लेकर अत्यंत अलंकारिक काव्य-गद्य तक सभी रूप मिलते हैं।

प्रमुख गद्यकारों में बाणभट्ट का स्थान सर्वोच्च है। उनकी कृतियाँ कादंबरी और हर्षचरित संस्कृत गद्य की उत्कृष्ट मिसाल हैं। बाणभट्ट की शैली अलंकारिक, मधुर, कल्पनाशील और जीवंत है।

दण्डी की दशकुमारचरितम् संस्कृत गद्य का एक अद्भुत उदाहरण है, जिसमें रोमांच, प्रेम, नीति और मनोरंजन का सुंदर मिश्रण मिलता है।

सुबन्धु की वासवदत्ता काव्य-गद्य की चरम सीमा को दर्शाती है, जिसकी भाषा अत्यंत संस्कृत-प्रधान और सौंदर्यपूर्ण है।

संस्कृत गद्य की विशेषताएँ हैं—विस्तृत वर्णन, भावनाओं की गहन अभिव्यक्ति, कथानक की रोचकता और भाषा की सुश्राव्यता।

इस प्रकार संस्कृत गद्य भारतीय साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है।

Q9. संस्कृत साहित्य में नीति-कथाओं की परंपरा और उनके शैक्षणिक महत्व का विश्लेषण कीजिए।

संस्कृत साहित्य में नीति-कथाओं की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। ये कथाएँ ज्ञान, नैतिकता और व्यवहारिक जीवन के मार्गदर्शन के लिए रची जाती थीं। नीति-कथा का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शिक्षा देना है।

सबसे प्रसिद्ध नीति-कथा संग्रह पंचतंत्र है, जिसे विष्णु शर्मा ने रचा। इसमें पशु-पक्षियों के माध्यम से मनुष्य की कमजोरियाँ, चतुराई, मित्रता, शत्रुता, राजनीति और जीवन-नीति का अद्भुत वर्णन है। हितोपदेश, वंशकथाएँ, जातक-कथाएँ आदि भी इसी परंपरा के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

नीति-कथाओं की विशेषता यह है कि वे सरल भाषा, रोचक कथानक और गूढ़ संदेश के माध्यम से बच्चों और वयस्कों दोनों के लिए उपयोगी होती हैं। इनमें जीवन-व्यवहार, सत्य, संयम, धैर्य, विवेक और कर्तव्य की शिक्षा मिलती है।

शैक्षणिक दृष्टि से इन कथाओं का महत्त्व अत्यंत है, क्योंकि वे नैतिक मूल्यों का निर्माण करती हैं, मानसिक विकास करती हैं और निर्णय-क्षमता बढ़ाती हैं।

इस प्रकार नीति-कथाएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का अद्भुत खजाना हैं।

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Q10. संस्कृत साहित्य की सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्ता पर विस्तृत टिप्पणी कीजिए।

संस्कृत साहित्य भारतीय संस्कृति, दर्शन, धर्म, कला और विज्ञान की सजीव परंपरा का आधार है। इसकी महत्ता केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक स्तर पर भी अत्यंत व्यापक है।

संस्कृत साहित्य में वेद, उपनिषद्, महाकाव्य, नाटक, गद्य, पुराण, स्मृति, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, वास्तु, संगीत, व्याकरण आदि सभी विषयों पर विशाल ज्ञान-संपदा उपलब्ध है। वेदों में आध्यात्मिकता और प्रकृति-दर्शन है; उपनिषदों में ब्रह्म, आत्मा और मोक्ष का गहन चिंतन है। महाभारत और रामायण में धर्म, नीति, करुणा और मानवीय संघर्षों का समन्वय है।

सांस्कृतिक दृष्टि से संस्कृत साहित्य भारतीय समाज की जड़ों से जुड़ा है—त्योहार, अनुष्ठान, संगीत, नृत्य, कला, वास्तुकला सभी संस्कृत ग्रंथों में वर्णित हैं।

दार्शनिक दृष्टि से यह साहित्य मनुष्य को आत्म-ज्ञान, सत्य, अहिंसा, कर्म, करुणा और मोक्ष की दिशा में प्रेरित करता है।

इस प्रकार, संस्कृत साहित्य केवल भाषा का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और जीवन-दर्शन की आत्मा है।

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