IGNOU FREE BSKG-172 भारतीय दर्शन के मूल सिद्धान्त Solved Guess Paper 2025
Q1. भारतीय दर्शन के मूलभूत सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
भारतीय दर्शन विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध दार्शनिक परंपराओं में से एक है, जिसके मूल में आध्यात्मिकता, नैतिकता, अनुभूति और मुक्ति की साधना निहित है। भारतीय दर्शन का उद्देश्य केवल सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन की समस्याओं का समाधान और आत्म-उद्धार है। इसके मुख्य सिद्धांतों में अनुभूतिपरकता, अद्वैत-दृष्टि, कर्म सिद्धांत, पुनर्जन्म सिद्धांत, मोक्ष, धर्म, ऋत, और समन्वयवाद शामिल हैं। भारतीय दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह तर्क के साथ-साथ अनुभूति को भी ज्ञान का प्रमाण मानता है; प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—चार प्रमाण माने गए हैं। भारतीय दर्शन के अनुसार संसार का मूल कारण ब्रह्म या परमात्मा है, जो सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और निराकार है। जीवात्मा उसी का अंश है, इसलिए आत्मानुभूति ही मुक्ति का मार्ग है।
कर्म और पुनर्जन्म सिद्धांत भारतीय दर्शन की रीढ़ हैं। मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर सुख-दुःख का अनुभव करता है और मृत्यु के बाद भी उसका कर्मफल भविष्य जन्मों को प्रभावित करता है। मोक्ष का अर्थ है जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, जिसे ज्ञान, भक्ति, ध्यान या कर्म-शुद्धि के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। भारतीय दर्शन नैतिक जीवन पर अत्यधिक बल देता है—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, करुणा, समता, संयम आदि इसके केंद्रीय मूल्य हैं। भारतीय दर्शन की एक अनोखी विशेषता समन्वयवादी भावना है—नास्तिक और आस्तिक दोनों विचारधाराओं को मान्यता दी गई है। सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त जैसे आस्तिक दर्शन और चार्वाक, बौद्ध, जैन जैसी नास्तिक परंपराएँ सभी सत्य की खोज को अपने-अपने ढंग से समझाती हैं।
समग्र रूप से भारतीय दर्शन का स्वरूप जीवन-व्यवहार से जुड़ा, व्यावहारिक, मोक्ष-केंद्रित और आध्यात्मिक है। यह व्यक्ति को आत्म-ज्ञान, आत्म-संयम, नैतिकता और सार्वभौमिक प्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
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Q2. सांख्य दर्शन और योग दर्शन के मूल सिद्धांतों की तुलना कीजिए।
सांख्य और योग भारतीय आस्तिक दर्शन के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और एक-दूसरे के पूरक माने जाने वाले दर्शन हैं। सांख्य दर्शन, जिसे कपिल मुनि ने प्रतिपादित किया, द्वैतवादी दर्शन है जहाँ पुरुष और प्रकृति दो अनादि तत्व माने गए हैं। पुरुष चेतन तत्व है—शुद्ध, निष्क्रिय और साक्षी भाव वाला। प्रकृति अचेतन है और उससे महत, अहंकार, मन, इंद्रियाँ और पंचमहाभूतों का विकास होता है। सांख्य दर्शन के अनुसार संसार में दुख का कारण पुरुष का प्रकृति से मिथ्या संबंध है, और मुक्ति तब मिलती है जब पुरुष अपनी स्वतंत्र सत्ता को पहचान लेता है। सांख्य का मुख्य मार्ग ज्ञान है—तत्वों के विवेक से मुक्ति प्राप्त होती है।
दूसरी ओर योग दर्शन, जिसे पतंजलि मुनि ने योगसूत्र में व्यवस्थित किया, सांख्य के सिद्धांतों पर आधारित होते हुए भी साधना-प्रक्रिया को केंद्र में रखता है। योग का उद्देश्य चित्तवृत्ति निरोध के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार है। योग अष्टांग साधना—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—के माध्यम से मन को स्थिर, शुद्ध और नियंत्रित करता है। जहाँ सांख्य दर्शन ज्ञानमार्ग पर बल देता है, वही योग दर्शन अभ्यास और अनुशासन को मुक्ति का मार्ग मानता है। सांख्य में ईश्वर की उपस्थिति आवश्यक नहीं मानी गई, जबकि पतंजलि योग में ईश्वर को विशेष पुरुष के रूप में स्वीकार किया गया है, जो योगियों का आदर्श और साधना का सहायक है।
दोनों दर्शनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है—पुरुष की प्रकृति से मुक्ति और आत्मानुभूति। सांख्य दर्शन सैद्धांतिक ढाँचा प्रदान करता है और योग उसे व्यवहारिक बना देता है। इस प्रकार, सांख्य दर्शन ज्ञान का और योग दर्शन अभ्यास का मार्ग है—दोनों मिलकर भारतीय दर्शन की एक संपूर्ण आध्यात्मिक प्रणाली प्रस्तुत करते हैं।
Q3. अद्वैत वेदान्त के मूल सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिए।
अद्वैत वेदान्त भारतीय दर्शन का सर्वोच्च और गहनतम आध्यात्मिक दर्शन माना जाता है, जिसका प्रतिपादन आदि शंकराचार्य ने किया। अद्वैत का मूल सिद्धांत है—ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः। अर्थात ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है; जगत मिथ्या है और जीव उसी ब्रह्म का प्रतिबिंब है, अलग नहीं। अद्वैत दर्शन के अनुसार ब्रह्म निराकार, निरगुण, अनंत और अद्वितीय है। जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न प्रतीत होती है, लेकिन यह भेद केवल अविद्या या अज्ञान के कारण है। जब अज्ञान नष्ट होता है, तब जीव realizes करता है कि वह ब्रह्मस्वरूप है—यही मोक्ष है।
अद्वैत वेदान्त में माया का सिद्धांत महत्वपूर्ण है। माया वह शक्ति है जो ब्रह्म को अनेक रूपों में प्रकट करती है। जैसे सपना वास्तविक दिखता है लेकिन होता नहीं, वैसे ही यह जगत अनुभव में आता है परंतु वास्तविक नहीं। अद्वैत के अनुसार मोक्ष ज्ञान द्वारा ही संभव है—श्रवण, मनन और निदिध्यासन तीन चरणों के माध्यम से साधक आत्मज्ञान प्राप्त करता है।
अद्वैत वेदान्त नैतिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण दिशा देता है। यह बताता है कि जब सब कुछ एक ही ब्रह्म का रूप है, तब घृणा, ईर्ष्या, हिंसा और स्वार्थ का कोई स्थान नहीं। अद्वैत का दृष्टिकोण व्यक्ति को अहंकार से मुक्त करता है और सार्वभौमिक प्रेम तथा करुणा की भावना जगाता है। आधुनिक युग में अद्वैत वेदान्त ने विश्वभर के दार्शनिकों, लेखकों और वैज्ञानिकों को प्रभावित किया है, क्योंकि इसका केंद्रबिंदु चेतना की एकता है, जो आज मनोविज्ञान और क्वांटम विज्ञान में भी महत्वपूर्ण चर्चा का विषय है।
अतः अद्वैत वेदान्त केवल दर्शन नहीं, बल्कि आत्मिक मुक्ति और सार्वभौमिक सत्य का मार्ग है, जो भारतीय आध्यात्मिकता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
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Q4. भारतीय दर्शन की प्रमुख समस्याओं (ज्ञान, ईश्वर, आत्मा, संसार और मोक्ष) का विश्लेषण कीजिए।
भारतीय दर्शन जीवन की गहरी समस्याओं को समझने और सुलझाने का प्रयास करता है। इसकी प्रमुख चिंताएँ—ज्ञान, ईश्वर, आत्मा, संसार और मोक्ष—सभी दार्शनिक परंपराओं का केंद्र हैं। ज्ञान की समस्या यह समझने का प्रयास है कि सत्य का ज्ञान कैसे प्राप्त हो? प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—इन प्रमाणों को विभिन्न दर्शनों ने अलग-अलग महत्व दिया। बौद्ध दर्शन ने प्रत्यक्ष ज्ञान को सर्वोच्च माना, जबकि वेदान्त शब्द-प्रमाण (वेद) को अंतिम मानता है।
ईश्वर की समस्या पर भी भारतीय दर्शन में विविध दृष्टियाँ मिलती हैं। सांख्य नास्तिक है, लेकिन योग ईश्वर को स्वीकार करता है। अद्वैत वेदान्त ब्रह्म को निरगुण, अद्वितीय ईश्वर मानता है। जैन और बौद्ध दर्शन ईश्वर को सृष्टिकर्ता नहीं मानते। यह विविधता भारतीय दर्शन की समन्वयवादी विशेषता है।
आत्मा की समस्या भारतीय दर्शन का केंद्रीय विषय है। अधिकांश दर्शन आत्मा को शाश्वत मानते हैं—वह शरीर से अलग, चेतन और अविनाशी है। बौद्ध दर्शन इस आत्म-सत्ता को अस्वीकार करता है और अनात्म सिद्धांत प्रस्तुत करता है।
संसार की समस्या जन्म, मृत्यु, दुख और पुनर्जन्म से जुड़ी है। भारतीय दर्शन संसार को दुखमय मानता है, क्योंकि यह अज्ञान, राग-द्वेष, कर्म और प्रकृति के बंधनों से संचालित है। संसार परिवर्तनशील और अनित्य है।
मोक्ष इस दुखयुक्त संसार से मुक्ति है। विभिन्न दर्शन इसके अलग मार्ग बताते हैं—योग चित्तवृत्ति निरोध द्वारा, सांख्य विवेक द्वारा, वेदान्त ज्ञान द्वारा, भक्ति दर्शन भक्ति द्वारा, जैन दर्शन तप और संयम द्वारा, बौद्ध दर्शन अष्टांग मार्ग द्वारा मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग बताते हैं।
भारतीय दर्शन इन सभी समस्याओं को केवल सैद्धांतिक नहीं मानता, बल्कि व्यावहारिक जीवन से जोड़कर देखता है। इसका उद्देश्य मनुष्य को दुख से मुक्त कर सत्य, शांति और आत्मानुभूति की ओर ले जाना है।
Q5. भारतीय दर्शन में ‘कर्म सिद्धांत’ का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए तथा उसके नैतिक और आध्यात्मिक महत्व को समझाइए।
कर्म सिद्धांत भारतीय दर्शन की मूल आधारशिला है, जिसे लगभग सभी आस्तिक और नास्तिक भारतीय दर्शनों ने स्वीकार किया है। कर्म का अर्थ है—मन, वचन और शरीर द्वारा किया गया कोई भी कार्य। भारतीय दर्शन के अनुसार, प्रत्येक कर्म का फल अनिवार्य रूप से व्यक्ति को प्राप्त होता है, चाहे वह इस जन्म में मिले या आगामी जन्मों में। यही कारण है कि कर्म सिद्धांत नैतिक उत्तरदायित्व का आधार बनता है। मनुष्य जैसा बोता है, वैसा ही फल पाता है—यह विचार व्यक्ति को अपनी क्रियाओं के प्रति सजग बनाता है।
कर्म तीन प्रकार के बताए गए हैं—संचित, प्रारब्ध, और क्रियमाण। संचित कर्म वह समस्त कर्म-संचय है जो व्यक्ति के अनेक जन्मों से जमा होता आया है। प्रारब्ध वही भाग है जो वर्तमान जन्म में भोगना निश्चित है। क्रियमाण कर्म वे हैं जो हम अभी कर रहे हैं। वर्तमान कर्म भविष्य के संचित कर्मों में जुड़ते जाते हैं। यह प्रणाली मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा और नियति के बीच संतुलन प्रदान करती है।
कर्म सिद्धांत व्यक्ति को यह समझाता है कि वह अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। यदि वह अच्छे कर्म करेगा तो सुख प्राप्त होगा, बुरे कर्म उसे दुख देंगे। इस प्रकार, कर्म सिद्धांत नैतिक आचरण—सत्य, अहिंसा, दया, ईमानदारी, आत्म-संयम—को बढ़ावा देता है। यह बाह्य नैतिकता ही नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि का भी आधार है।
आध्यात्मिक दृष्टि से कर्म सिद्धांत मोक्ष का मार्ग दिखाता है। मोक्ष तभी संभव है जब व्यक्ति अपने कर्मबंधनों को समाप्त या क्षीण कर दे। योग, वेदान्त, जैन और बौद्ध दर्शन, सभी इस बात को मानते हैं कि मोक्ष आत्मज्ञान, विवेक या पूर्ण करुणा द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जिससे कर्म-संचय समाप्त होता है।
कुल मिलाकर, भारतीय दर्शन में कर्म सिद्धांत केवल दंड-विधान नहीं, बल्कि जीवन की गहरी आध्यात्मिक समझ है, जो व्यक्ति को नैतिक बनाता है, आत्म-जागरूक करता है, और मुक्ति की दिशा में प्रेरित करता है।
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Q6. बौद्ध दर्शन के चार आर्य सत्यों और अष्टांग मार्ग का विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिए।
बौद्ध दर्शन भारतीय दर्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसकी नींव चार आर्य सत्यों तथा अष्टांग मार्ग पर आधारित है। पहला आर्य सत्य—दुःख: बुद्ध ने कहा कि जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु, प्रिय-वियोग, अप्रिय-संयोग आदि सभी दुःख हैं। संसार का स्वभाव ही दुखपूर्ण है। दूसरा आर्य सत्य—दुःख-समुदय: दुःख का कारण तृष्णा है—इच्छाएँ, आसक्ति, लोभ और मोह। तृष्णा के कारण मन अशांत रहता है और कर्मों का बंधन बढ़ता है। तीसरा आर्य सत्य—दुःख-निरोध: तृष्णा के निरोध के साथ दुःख का पूर्ण अंत संभव है। यही निर्वाण या मोक्ष है। चौथा आर्य सत्य—दुःख-निरोध मार्ग: निर्वाण प्राप्ति का उपाय अष्टांग मार्ग है।
अष्टांग मार्ग आठ अंगों में विभाजित है—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। सम्यक दृष्टि का अर्थ है सत्य को सही रूप में समझना। सम्यक संकल्प अपनी इच्छाओं और आचरण को शुद्ध बनाना। सम्यक वाणी में सत्य बोलना, मधुर भाषण और अहिंसा का पालन करना। सम्यक कर्म का तात्पर्य नैतिक आचरण है। सम्यक आजीविका का अर्थ है कि जीविका ऐसे साधनों से प्राप्त की जाए जो समाज को हानि न पहुँचाए। सम्यक प्रयास आत्म-साधना का प्रयास है। सम्यक स्मृति मन की सजगता और सतर्कता है। अंत में सम्यक समाधि ध्यान की गहन अवस्था है।
बौद्ध दर्शन का उद्देश्य संसार से भागना नहीं, बल्कि मन को शुद्ध करके दुःखों से मुक्त होना है। यह मनोवैज्ञानिक, व्यावहारिक और नैतिक दर्शन है जो आत्मानुशासन, दया, अहिंसा और ज्ञान की दिशा में प्रेरित करता है। चार आर्य सत्य और अष्टांग मार्ग मिलकर जीवन का ऐसा दर्शन प्रस्तुत करते हैं जो व्यक्ति के मन, व्यवहार और चेतना को रूपांतरित कर देता है।
Q7. जैन दर्शन के अनेकार्थवाद, अपरिग्रह और अहिंसा सिद्धांत का विश्लेषण कीजिए।
जैन दर्शन का केंद्र बिंदु अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकार्थवाद है। अहिंसा जैन दर्शन की आत्मा मानी गई है। जैन धर्म के अनुसार, किसी भी प्राणी को मन, वचन या कर्म से चोट पहुँचाना पाप है। जैनों की अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा का निषेध नहीं है, बल्कि क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, विद्वेष आदि मानसिक हिंसा का भी विरोध करती है। इसी कारण जैन दर्शन को विश्व की सबसे शुद्ध नैतिक परंपराओं में गिना जाता है।
अपरिग्रह का अर्थ है—संपत्ति, वस्तुओं और संबंधों में अत्यधिक आसक्ति न रखना। जैन दर्शन के अनुसार, आसक्ति ही हिंसा का मूल कारण है। व्यक्ति जितना अधिक संग्रह करेगा, उतना ही अधिक स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष उत्पन्न होंगे। अपरिग्रह मानसिक शांति, संतोष और संतुलन का मार्ग है।
अनेकार्थवाद (Anekantavada) जैन दर्शन का सबसे विशिष्ट सिद्धांत है। इसके अनुसार सत्य बहुआयामी है, किसी एक दृष्टि से पूर्णतः समझा नहीं जा सकता। प्रत्येक वस्तु में अनेक पक्ष होते हैं, और सभी दृष्टियाँ आंशिक सत्य हैं। यही कारण है कि जैन दर्शन सहिष्णुता, संवाद और बहुमत को महत्व देता है। इसका प्रसिद्ध उदाहरण “सात अंधों और हाथी” की कहानी है, जहाँ सभी लोगों की दृष्टि आंशिक सत्य थी।
इन तीनों सिद्धांतों का संयुक्त प्रभाव यह है कि जैन दर्शन व्यक्ति को आत्म-अनुशासन, नैतिकता, सहिष्णुता और मानसिक शांति की ओर ले जाता है। यह दर्शन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि अत्यंत तर्कसंगत और व्यावहारिक भी है।
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Q8. भारतीय दर्शन में ‘आत्मा’ की अवधारणा और उसका स्वरूप विभिन्न दर्शनों के अनुसार समझाइए।
भारतीय दर्शन में आत्मा की अवधारणा अत्यंत केंद्रीय और व्यापक है। अधिकांश आस्तिक दर्शनों के अनुसार आत्मा शाश्वत, चेतन, अविकारी और सर्वव्यापक है। वेदान्त कहता है कि आत्मा ब्रह्म का ही प्रतिबिंब है—अद्वैत वेदान्त में आत्मा और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित है। आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, वह केवल शरीर बदलती है।
सांख्य दर्शन आत्मा (पुरुष) को पूर्ण चेतन, निष्क्रिय और साक्षी भाव वाला मानता है। पुरुष प्रकृति से भिन्न है, लेकिन प्रकृति के मिश्रण से संसार का अनुभव करता है। मुक्त अवस्था में पुरुष अपनी स्वतंत्र पहचान को समझ लेता है।
योग दर्शन आत्मा को विशुद्ध चेतना स्वरूप मानता है, और चित्तवृत्ति को नियंत्रित करने पर आत्म-साक्षात्कार संभव है।
जैन दर्शन में आत्मा को कर्ता, भोक्ता और स्वतंत्र सत्ता माना गया है। प्रत्येक आत्मा में अनंत ज्ञान, दर्शन और ऊर्जा की क्षमता है, परंतु कर्म बंधन उसे आवृत रखते हैं। साधना द्वारा आत्मा अपना शुद्ध स्वरूप पुनः प्राप्त कर सकती है।
बौद्ध दर्शन आत्मा का निषेध करता है—यह अनात्म सिद्धांत प्रस्तुत करता है। बुद्ध के अनुसार, स्थाई आत्मा नहीं, बल्कि पंच-स्कंधों का प्रवाह ही “व्यक्ति” का रूप है।
भारतीय दर्शन में आत्मा का स्वरूप केवल दार्शनिक अवधारणा नहीं है, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन के लिए दिशा-निर्देशक है।
Q9. मोक्ष की अवधारणा का सभी प्रमुख भारतीय दर्शनों के अनुसार तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।
मोक्ष भारतीय दर्शन का अंतिम लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र, कर्मबंधनों और दुखों से मुक्त हो जाता है। वेदान्त में मोक्ष आत्मा और ब्रह्म की एकता के ज्ञान से प्राप्त होता है। जब अज्ञान नष्ट होता है, तब व्यक्ति समझता है कि वह ब्रह्मस्वरूप है।
योग दर्शन में मोक्ष (कैवल्य) चित्तवृत्ति निरोध द्वारा प्राप्त होता है। मन के पूर्ण शांत होने पर पुरुष अपनी स्वतंत्र चेतना का अनुभव करता है।
सांख्य दर्शन मोक्ष को विवेक-ज्ञान द्वारा प्राप्त मानता है—पुरुष और प्रकृति का भेद समझ लेना ही मोक्ष है।
जैन दर्शन में मोक्ष कर्म कणों के पूर्ण क्षय से प्राप्त होता है। तप, संयम, अहिंसा, अपरिग्रह और सत्य पालन जैन मोक्षमार्ग हैं।
बौद्ध दर्शन मोक्ष को निर्वाण कहता है—तृष्णा, द्वेष, मोह के विनाश से जन्म-मरण का अंत संभव होता है।
इन सभी दर्शनों में मोक्ष का स्वरूप भिन्न हो सकता है, परंतु उनका उद्देश्य मनुष्य को दुखों से स्वतंत्र करना और आत्म-शांति प्रदान करना है।
Q10. भारतीय दर्शन की विशिष्टताएँ और उसकी आधुनिक प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए।
भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह व्यावहारिक, आध्यात्मिक और नैतिक जीवन पर केंद्रित है। जहाँ पाश्चात्य दर्शन तर्क और विश्लेषण पर आधारित है, वहीं भारतीय दर्शन अनुभूति, आध्यात्मिक अनुभव और मोक्ष को सर्वोच्च स्थान देता है। इसकी विशिष्टताएँ हैं—समन्वयवादी दृष्टि, बहुलवाद की स्वीकृति, अहिंसा का महत्व, आत्मा की शाश्वतता, कर्म और पुनर्जन्म सिद्धांत, तथा मोक्ष की अवधारणा।
आधुनिक समय में भारतीय दर्शन अत्यंत प्रासंगिक है। तनावपूर्ण जीवन में योग और ध्यान मानसिक शांति देते हैं; अहिंसा और अपरिग्रह आधुनिक सामाजिक संघर्षों का समाधान हैं; अनेकार्थवाद सहिष्णुता और बहुलवाद का आधार है। आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की अवधारणा मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस से भी मेल खाती है।
इस प्रकार, भारतीय दर्शन केवल प्राचीन ग्रंथों की बात नहीं, बल्कि आज के जीवन के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध होता है।
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