IGNOU FREE BHDG-175 मध्यकालीन भारतीय साहित्य एवं संस्कृति Solved Guess Paper 2025
Q1. भक्ति आंदोलन के उद्भव (Origin) के कारणों और इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन का उद्भव एक सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन था, जिसने भारतीय समाज को नई दिशा दी। भक्ति का अर्थ है—भगवान के प्रति निष्काम प्रेम, पूर्ण समर्पण और व्यक्तिगत संबंध। यह आंदोलन 7वीं से 17वीं शताब्दी के बीच विकसित हुआ और पूरे देश में फैल गया।
भक्ति आंदोलन के उद्भव के प्रमुख कारण थे:
1. जटिल वैदिक परंपराएँ:
समाज यज्ञ, कर्मकांड और पुरोहितवाद से बंधा हुआ था। आम जनता समझदार धार्मिक मार्ग चाहती थी, जहाँ ईश्वर तक पहुँच आसान हो।
2. बौद्ध-जैन परंपरा का प्रभाव:
इन धर्मों ने सामाजिक समानता, अहिंसा और सरल आचरण पर बल दिया। भक्ति ने इन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ाया।
3. सूफी आंदोलन का प्रभाव:
सूफियों की प्रेम, मानवता और ईश्वर के साथ व्यक्तिगत संबंध की अवधारणा ने भक्ति को प्रेरित किया।
4. सामाजिक असमानताएँ व जाति-भेद:
निचली जातियों के प्रति भेदभाव बढ़ रहा था। भक्ति आंदोलन ने सभी को बराबरी का संदेश दिया।
भक्ति आंदोलन की मुख्य विशेषताएँ:
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भगवान से सीधा संबंध: गुरु-पुरोहित की आवश्यकता नहीं।
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समानता का संदेश: जाति, धर्म व लिंग-भेद के बिना सबके लिए भक्ति का अधिकार।
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लोकभाषाओं का प्रयोग: संस्कृत की जगह तमिल, अवधी, ब्रज, मराठी, बंगाली आदि।
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सामाजिक सुधार: अंधविश्वास, जाति-भेद और रूढ़ियों का विरोध।
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भक्ति के दो रूप: निर्गुण भक्ति (रूपविहीन ईश्वर) और सगुण भक्ति (साकार ईश्वर)।
भक्ति आंदोलन ने भारतीय समाज में आध्यात्मिक सरलता, सामाजिक समानता और सांस्कृतिक एकता का मार्ग प्रशस्त किया। इसने साहित्यिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव भी रखी।
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Q2. आल्वार और नयनार संतों के योगदान का विश्लेषण कीजिए।
दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन की शुरुआत आल्वार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों से हुई। ये तमिल समाज के लोकभक्त कवि थे, जिन्होंने भक्ति को सरल, भावनात्मक और जनसुलभ बनाया।
आल्वारों का योगदान:
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आल्वारों ने विष्णु को भक्ति का सर्वोच्च रूप माना और प्रेम एवं समर्पण को मुक्ति का साधन बताया।
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प्रमुख आल्वार: नम्माल्वार, अंदाल, पेरियाल्वार।
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इन्होंने नालायिर दिव्यप्रबंधम् रचा, जो तमिल वैष्णव भक्ति साहित्य का आधार है।
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आल्वार कविताओं में निजी भक्ति, कृष्ण-लीला, प्रेम-भाव और ईश्वर के प्रति उत्कट अनुराग व्यक्त है।
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उन्होंने जाति-भेद को नकारा—कई आल्वार निम्न जाति से थे।
नयनारों का योगदान:
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नयनार शिव भक्त थे और उन्होंने भक्ति को सामाजिक सुधार से जोड़ा।
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प्रमुख नयनार: अप्पर, सम्बन्दर, सुंदरमूर्ति।
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उनकी कविताएँ तिरुमुरै में संग्रहीत हैं।
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नयनारों ने आत्मिक भक्ति, सेवा, करुणा और नैतिक जीवन पर बल दिया।
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उन्होंने मंदिर परंपरा और साधना के माध्यम से शैव सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया।
सामूहिक प्रभाव:
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दोनों परंपराओं ने तमिल समाज में धार्मिक समानता स्थापित की।
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लोकभाषा तमिल को महान साहित्यिक ऊँचाइयों पर पहुँचाया।
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भक्ति आंदोलन को देशभर में फैलाने की नींव दक्षिण में ही पड़ी।
इन संतों ने भारत की भक्ति परंपरा, साहित्य और सामाजिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया।
Q3. वचनकार परंपरा (Basavanna आदि) की विशेषताएँ और सामाजिक महत्व स्पष्ट कीजिए।
कर्नाटक में उभरा वचन साहित्य दक्षिण भारतीय भक्ति आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण चरण था। वचनकारों ने भक्ति को सामाजिक क्रांति का साधन बनाया।
प्रमुख वचनकार:
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बसवन्ना
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अक्का महादेवी
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अल्लमा प्रभु
वचन साहित्य की विशेषताएँ:
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सादगी और संक्षिप्तता: वचन (Vachana) बेहद छोटे, सरल और सीधे होते हैं।
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व्यक्तिगत भक्ति: भगवान शिव (वीरशैव परंपरा) के प्रति गहरी व्यक्तिगत अनुभूति।
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रूढ़ियों का विरोध: यज्ञ, जाति-भेद, ब्राह्मणवाद का प्रतिरोध।
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सामाजिक सुधार: स्त्री-स्वतंत्रता, श्रम की गरिमा और समानता का संदेश।
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आध्यात्मिक लोकतंत्र: धर्म सबके लिए, जाति आधारित विशेषाधिकार अस्वीकार।
सामाजिक महत्व:
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दलितों, महिलाओं और पिछड़ों को धार्मिक सम्मान मिला।
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सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत हुई।
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आध्यात्मिक जीवन को आडंबरों से मुक्त किया।
इस प्रकार वचन साहित्य ने दक्षिण भारत में भक्ति, साहित्य और सामाजिक चेतना को नया आयाम दिया।
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Q4. महाराष्ट्र के संत साहित्य (ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम) की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
पश्चिम भारत, विशेषकर महाराष्ट्र, भक्ति साहित्य का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम जैसे संतों ने मराठी भाषा में अद्वितीय आध्यात्मिक साहित्य रचा।
संत ज्ञानेश्वर
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ज्ञानेश्वरी उनकी मुख्य कृति है, जो भगवद्गीता का सरल मराठी भाष्य है।
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उन्होंने भक्ति को दार्शनिक और नैतिक आधार दिया।
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सभी के लिए ज्ञान और धर्म के द्वार खोलने का प्रयास किया।
संत नामदेव
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उनकी कविता में ईश्वर से अंतरंग प्रेम का भाव है।
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उन्होंने सामाजिक समानता और निर्गुण भक्ति को बढ़ावा दिया।
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उनकी रचनाएँ गुरुग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं।
संत तुकाराम
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उनके अभंग भक्ति साहित्य के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
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उन्होंने जीवित मनुष्य की सेवा को सर्वोत्तम भक्ति माना।
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आडंबर, कुटिलता और सामाजिक अन्याय का कठोर विरोध किया।
मुख्य विशेषताएँ:
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सरल मराठी भाषा
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भावुकता और सहज भक्ति
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जाति-विरोध, समानता और प्रेम
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लोकधर्मी संगीत और लौकिक जीवन का चित्रण
इन संतों ने समाज और साहित्य दोनों को गहरे रूप से प्रभावित किया।
Q5. चैतन्य महाप्रभु और पूर्वी भारत में वैष्णव भक्ति आंदोलन का महत्व समझाइए।
पूर्वांचल में भक्ति आंदोलन का सबसे प्रभावशाली स्वरूप वैष्णव प्रेमभक्ति थी, जिसका नेतृत्व चैतन्य महाप्रभु ने किया।
चैतन्य महाप्रभु का योगदान:
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उन्होंने संकीर्तन (हरि नाम गान) को भक्ति का मुख्य साधन बनाया।
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कृष्ण के प्रति माधुर्य भाव (प्रेम) को भक्ति का सर्वोच्च रूप बताया।
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संपूर्ण समाज को जाति-भेद से ऊपर उठकर भक्ति का मार्ग अपनाने को प्रेरित किया।
पूर्वांचल भक्ति की विशेषताएँ:
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संगीत, नृत्य और समूह-गान के माध्यम से आध्यात्मिक आनंद।
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लोकभाषाओं (बंगला, असमिया, ओड़िया) में रचनाएँ, जिससे आंदोलन जनसुलभ बना।
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कृष्ण-लीला का मार्मिक और काव्यात्मक चित्रण।
सांस्कृतिक प्रभाव:
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ओड़िशा में जगन्नाथ संस्कृति का विकास।
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असम में शंकरदेव की एकांकर परंपरा।
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बंगाल में गौड़ीय वैष्णव परंपरा का उभार।
पूर्वांचल भक्ति ने भारतीय कला, संगीत और संस्कृति को नई दिशा दी और समानता तथा प्रेम का सार्वभौमिक संदेश दिया।
Q6. निर्गुण और सगुण भक्ति परंपरा (Kabir, Ravidas, Surdas, Tulsidas, Meera) की तुलना कीजिए।
उत्तरी भारत का भक्ति साहित्य दो धाराओं में बँटा—
निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति।
निर्गुण भक्ति (Kabir, Ravidas)
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ईश्वर निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी।
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मूर्ति-पूजा, मंदिर, कर्मकांड का विरोध।
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सामाजिक समानता और जाति-विरोध।
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अत्यंत सरल, सीधे, तर्कपूर्ण और क्रांतिकारी पद।
कबीर: आडंबरों का विरोध, प्रेम और सत्य पर आधारित भक्ति।
रैदास: सहानुभूति, दया और एक समतामूलक समाज की कल्पना।
सगुण भक्ति (Surdas, Tulsidas, Meera)
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ईश्वर साकार रूप में—राम, कृष्ण आदि।
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भक्ति में प्रेम, करुणा और भावनात्मक सौंदर्य।
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भगवान से भक्त का अंतरंग संबंध।
सूरदास: कृष्ण-लीला का अत्यंत सुंदर वर्णन।
तुलसीदास: राम को आदर्श पुरुष और धर्म का प्रतीक बताया।
मीरा: कृष्ण के प्रति अतुलनीय प्रेम और समर्पण।
तुलनात्मक निष्कर्ष:
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निर्गुण → दर्शन आधारित, सामाजिक चेतना।
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सगुण → भावनात्मक, काव्यात्मक सौंदर्य।
दोनों धाराओं ने हिंदुस्तानी भक्ति साहित्य को समृद्ध और संतुलित बनाया।
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Q7. हिंदी भक्ति साहित्य की मुख्य विशेषताएँ और उसका सांस्कृतिक महत्व समझाइए।
हिंदी भक्ति साहित्य भारतीय संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय है। यह 14वीं से 17वीं शताब्दी में विशेष रूप से फला-फूला और पूरे देश को आध्यात्मिक व सामाजिक स्तर पर प्रभावित किया।
मुख्य विशेषताएँ:
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लोकभाषा का प्रयोग: अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली आदि भाषाओं ने साहित्य को जनसुलभ बनाया।
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आध्यात्मिक भाव: प्रेम, समर्पण, करुणा और आत्मानुभूति।
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सामाजिक सुधार: जाति-भेद, अंधविश्वास और रूढ़ियों का विरोध।
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काव्य का उत्कर्ष: दोहा, पद, साखी, भजन आदि विविध रूपों का विकास।
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निर्गुण-सगुण दोनों धाराएँ: साहित्य में दार्शनिक गहराई और भावनात्मक विस्तार।
सांस्कृतिक महत्व:
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समाज में समानता और भाईचारे का संदेश।
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संगीत, नृत्य और कला पर गहरा प्रभाव।
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भारतीय आध्यात्मिकता को मानवतावादी रूप मिला।
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साहित्य में नैतिक शिक्षा और जीवन-दर्शन का समावेश।
हिंदी भक्ति साहित्य ने भारतीय समाज को आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से एक धागे में जोड़ने की भूमिका निभाई।
Q8. संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के मराठी भक्ति साहित्य में योगदान का विस्तृत विवेचन कीजिए।
मराठी भक्ति साहित्य में संत ज्ञानेश्वर और नामदेव का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन दोनों संतों ने भक्ति को दार्शनिक गहराई और भावनात्मक सौंदर्य दोनों रूपों में प्रस्तुत किया। इनके साहित्य ने महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के भक्ति आंदोलन को प्रभावित किया।
संत ज्ञानेश्वर का योगदान:
संत ज्ञानेश्वर (1275–1296) ने भगवद्गीता का सरल मराठी भाष्य ज्ञानेश्वरी (भावार्थ-दीपिका) लिखा। इससे गीता पहली बार सामान्य जनता की भाषा में पहुँची। ज्ञानेश्वर ने भक्ति के साथ अद्वैत वेदांत और योग सिद्धांत का समन्वय किया।
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उन्होंने ईश्वर को सर्वत्र उपस्थित बताया।
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जाति-भेद और कर्मकांड का विरोध किया।
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उनका संदेश था कि ज्ञान और प्रेम दोनों मिलकर मुक्ति का मार्ग बनाते हैं।
ज्ञानेश्वर का साहित्य न केवल आध्यात्मिक है बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
संत नामदेव का योगदान:
नामदेव (1270–1350) मराठी और पंजाबी भक्ति परंपरा के प्रमुख कवि थे। उनकी रचनाएँ अत्यंत भावपूर्ण और भक्तिमय हैं। नामदेव की प्रसिद्धि इसलिए भी अधिक है कि उनकी कई रचनाएँ गुरुग्रंथ साहिब में शामिल की गईं।
उनकी भक्ति की विशेषताएँ:
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ईश्वर के प्रति अत्यंत व्यक्तिगत प्रेम।
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निर्गुण और सगुण भक्ति का सुंदर संतुलन।
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समाज में समानता और प्रेम का संदेश।
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जाति-भेद को स्पष्ट रूप से अस्वीकार।
नामदेव ने भगवान विट्ठल (विठोबा) को अपने मित्र और सहचर के रूप में देखा। उनकी भक्ति में आत्मीयता और गहन भावनात्मकता का उत्कृष्ट मेल मिलता है।
संयुक्त प्रभाव:
ज्ञानेश्वर ने दार्शनिक आधार दिया और नामदेव ने भक्ति को लोकगीतों और अभंग परंपरा के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया। इन दोनों संतों ने मिलकर महाराष्ट्र में वarkari भक्ति संप्रदाय की नींव मजबूत की।
इस प्रकार, मराठी भक्ति साहित्य का निर्माण मुख्यतः इन दोनों संतों की अपूर्व काव्य और आध्यात्मिक दृष्टि पर आधारित है।
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Q9. रामभक्ति आंदोलन में तुलसीदास के योगदान का विश्लेषण कीजिए।
तुलसीदास हिंदी साहित्य और भक्ति आंदोलन के सबसे प्रभावशाली कवि माने जाते हैं। उन्होंने रामभक्ति को जन-सामान्य तक पहुँचाया और इसे लोकधर्म का स्वरूप दिया। तुलसीदास की काव्य कृतियाँ—विशेषकर रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, हितोपदेश—ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला।
रामचरितमानस का योगदान:
रामचरितमानस अवधी भाषा में लिखी गई, जिससे उत्तर भारत के आम लोग सहज ही इसे समझने लगे। तुलसीदास ने राम को केवल राजा या अवतार नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया।
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रामचरितमानस में भक्ति, धर्म, नैतिकता और सदाचार का गहरा संदेश है।
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उन्होंने राम को समाज में आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा के रूप में स्थापित किया।
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राम और सीता का पवित्र संबंध भारतीय आदर्श दाम्पत्य के रूप में प्रस्तुत किया।
भक्ति का स्वरूप:
तुलसीदास ने सगुण भक्ति—विशेषकर राम-भक्ति—को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी भक्ति में—
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प्रेम
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करुणा
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समर्पण
-
लोक-संस्कृति
का अद्भुत मेल है।
सामाजिक दृष्टि:
तुलसीदास ने समाज में—
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सत्य
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अहिंसा
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समानता
-
कर्तव्य
जैसे मूल्यों को मजबूत किया। भक्ति को उन्होंने कर्म और कर्तव्य के साथ जोड़ा।
भाषा-शैली:
उनकी भाषा सरल, मधुर और भावपूर्ण है। रामचरितमानस में दोहा, चौपाई, सोरठा आदि छंदों का अद्वितीय प्रयोग मिलता है। उनकी शैली ने हिंदी साहित्य को नई ऊर्जा और स्वरूप प्रदान किया।
भारतीय संस्कृति पर प्रभाव:
तुलसीदास की रचनाओं ने भारतीय धर्म, साहित्य, संगीत, रंगमंच और सामाजिक जीवन पर स्थायी असर छोड़ा। आज भी उनकी कृतियाँ हर घर में गाई, पढ़ी और सुनी जाती हैं।
इस प्रकार, रामभक्ति आंदोलन को विश्वस्तर पर प्रतिष्ठित करने में तुलसीदास का योगदान अनुपम और ऐतिहासिक है।
Q10. सूरदास की कृष्णभक्ति और उनके काव्य की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
सूरदास हिंदी भक्ति साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। उन्हें अष्टछाप का प्रमुख कवि माना जाता है और उनकी रचनाएँ कृष्णभक्ति की उत्कृष्ट मिसाल हैं। सूरदास ने मुख्यतः बाल-कृष्ण और कृष्ण-राधा लीला का अनुपम काव्य-चित्रण किया।
कृष्णभक्ति का स्वरूप:
सूरदास की भक्ति सगुण माधुर्य भक्ति पर आधारित है। उनकी कविता में—
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प्रेम
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करुणा
-
वात्सल्य
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सौंदर्य
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मान-मनुहार
का अद्भुत मेल मिलता है।
उन्होंने कृष्ण को कभी बालरूप में, कभी गोपाल के रूप में, और कभी प्रेमियों के रूप में चित्रित किया।
साहित्यिक विशेषताएँ:
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वात्सल्य भाव:
सूरदास ने यशोदा और बालकृष्ण के संबंध को अद्वितीय कोमलता से चित्रित किया। उनकी रचनाओं में माँ के प्रेम की गहराई झलकती है। -
मानवीकरण और चित्रमयता:
उनकी भाषा में अद्भुत दृश्यात्मकता है—जैसे कृष्ण का खेलना, माखन चुराना, ग्वालों के साथ क्रीड़ा आदि। -
भाषा:
उनकी भाषा ब्रजभाषा है, जो अत्यंत मधुर और काव्यात्मक है। -
संगीतात्मकता:
उनके पद संगीत के साथ गाए जाते थे। सूरदास के पदों में लय और मधुरता बहुत उच्च स्तर की है। -
भाव और कल्पना:
उन्होंने प्रेम को ईश्वर-प्राप्ति का साधन बताया। उनके काव्य में भक्त और भगवान का संबंध भावनात्मक है।
सांस्कृतिक महत्व:
सूरदास ने कृष्ण को जन-जन का प्रिय देवता बना दिया। लोकगीत, नृत्य, चित्रकला और धार्मिक परंपराओं पर उनका गहरा प्रभाव है।
इस प्रकार, सूरदास की भक्ति और काव्य ने हिंदी साहित्य को अमर और समृद्ध बनाया। कृष्णभक्ति साहित्य में उनका योगदान अतुलनीय है।
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