IGNOU FREE BABG-171 बी. आर. अम्बेडकर चिंतन Solved Guess Paper 2025
प्रश्न 1. डॉ. अंबेडकर की जाति-व्यवस्था पर आलोचना और ‘जाति-उन्मूलन’ की उनकी अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार भारत की जाति-व्यवस्था सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति के लिए सबसे बड़ा अवरोध है। उन्होंने कहा कि जाति न केवल श्रम का विभाजन है, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है। यह व्यवस्था जन्म के आधार पर असमानता, ऊँच-नीच और शोषण को स्थायी बनाती है। जाति व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा को छीन लेती है।
अपने ऐतिहासिक ग्रंथ “Annihilation of Caste” में अंबेडकर ने बताया कि जाति-व्यवस्था का आधार धार्मिक ग्रंथों में है, और इसे धर्म के नाम पर उचित ठहराया जाता है। जाति-संरचना की जड़ में सजातीय विवाह (Endogamy) है, जो जाति को स्थायी बनाए रखता है। अंबेडकर के अनुसार, जब तक धार्मिक आधार को चुनौती नहीं दी जाएगी, जाति समाप्त नहीं हो सकती।
अंबेडकर ने जाति को लोकतंत्र का शत्रु बताया, क्योंकि लोकतंत्र स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित है, जिसे जाति मान्यता नहीं देती। उनका मानना था कि केवल राजनीतिक सुधार पर्याप्त नहीं; पहले सामाजिक सुधार ज़रूरी है। जाति-उन्मूलन का अर्थ है—समाज में बराबरी का व्यवहार, सामाजिक गतिशीलता और धार्मिक रूढ़ियों का त्याग।
अंततः, अंबेडकर की जाति के विरुद्ध आलोचना तर्क, समानता और मानव गरिमा पर आधारित थी, और उन्होंने कहा कि जाति का उन्मूलन भारत के राष्ट्र बनने की पहली शर्त है।
प्रश्न 2. अंबेडकर ने भारतीय गाँव को “स्थानीयता का गड्ढा और अज्ञानता की खान” क्यों कहा?
अंबेडकर ने भारतीय गाँव को अक्सर आदर्श और शांतिपूर्ण मानने की धारणा का विरोध किया। उनके अनुसार गाँव जातिगत भेदभाव, ऊँच-नीच, शोषण और सामाजिक बहिष्कार के केंद्र थे। उन्होंने कहा—
“गाँव वास्तव में स्थानीयता का गड्ढा और अज्ञानता, संकीर्णता तथा साम्प्रदायिकता की खान है।”
अंबेडकर के अनुसार:
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गाँव जातिगत उत्पीड़न के केंद्र थे।
अछूत और निचली जातियों को गाँव के बाहर रहने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्हें कुएँ, मंदिर, स्कूल और सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच नहीं थी। -
आर्थिक शोषण गहरी जड़ें जमाए था।
जमीन ऊँची जातियों के पास थी और दलित भूमिहीन मजदूर थे। इससे वे आर्थिक और सामाजिक रूप से आश्रित बने रहे। -
शिक्षा की कमी और अंधविश्वास प्रचलित थे।
शिक्षा की अनुपलब्धता ने अज्ञानता और रूढ़िवादिता को बढ़ाया। -
सामाजिक गतिशीलता असंभव थी।
जाति के कारण निचली जातियों के लिए अपने जीवन में कोई परिवर्तन संभव नहीं था।
अंबेडकर मानते थे कि शहरीकरण, औद्योगीकरण और शिक्षा ही ग्रामीण समाज की जमी हुई असमानताओं को तोड़ सकते हैं। इसलिए उन्होंने गाँवों का आदर्शीकरण न करके उनके सामाजिक यथार्थ को उजागर किया।
प्रश्न 3. डॉ. अंबेडकर के आदर्श समाज की अवधारणा का वर्णन कीजिए।
अंबेडकर के आदर्श समाज की नींव तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित है—
स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality, Fraternity)।
ये सिद्धांत समाज को मानवीय, लोकतांत्रिक और नैतिक बनाते हैं।
अंबेडकर ने कहा कि कोई समाज तब तक आदर्श नहीं हो सकता जब तक उसमें जन्म-आधारित विशेषाधिकार, ऊँच-नीच और भेदभाव मौजूद हों। उन्होंने जाति-व्यवस्था को आदर्श समाज का सबसे बड़ा शत्रु बताया क्योंकि यह असमानता को जन्म देती है और बंधुत्व को समाप्त कर देती है।
अंबेडकर के आदर्श समाज की विशेषताएँ:
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समान अवसर:
हर व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उन्नति के समान अवसर मिलने चाहिए। -
मानव गरिमा:
व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से हो, जन्म से नहीं। समाज को मानव गरिमा का सम्मान करना चाहिए। -
वैज्ञानिक सोच:
शिक्षा और तार्किकता समाज को रूढ़ियों से मुक्त करती है। -
आर्थिक न्याय:
अंबेडकर ने आर्थिक समानता, भूमि सुधार और श्रमिक अधिकारों को अनिवार्य बताया। केवल राजनीतिक लोकतंत्र ही पर्याप्त नहीं; आर्थिक लोकतंत्र भी आवश्यक है। -
सामाजिक लोकतंत्र:
सामाजिक लोकतंत्र एक जीवन पद्धति है—जहाँ लोग एक-दूसरे को बराबरी का नागरिक मानते हैं।
अंबेडकर का आदर्श समाज आधुनिक, न्यायसंगत, समानतामूलक और मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज है।
प्रश्न 4. अंबेडकर ने अस्पृश्यों (दलितों) की मुक्ति के लिए कौन-कौन सी रणनीतियाँ अपनाई?
डॉ. अंबेडकर का पूरा जीवन दलितों की मुक्ति और अधिकारों के लिए समर्पित था। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक—सभी स्तरों पर रणनीतियाँ तैयार कीं।
1. शिक्षा पर जोर
अंबेडकर का मानना था कि शिक्षा ही मुक्ति का सबसे शक्तिशाली हथियार है। उन्होंने कहा—
“Educate, Agitate, Organize.”
शिक्षा से दलितों को आत्मसम्मान, जागरूकता और अधिकार के लिए संघर्ष की शक्ति मिली।
2. राजनीतिक प्रतिनिधित्व
अंबेडकर ने पृथक निर्वाचक मंडल और बाद में आरक्षण की व्यवस्था की वकालत की। उनका मानना था कि राजनीतिक शक्ति के बिना सामाजिक मुक्ति संभव नहीं।
3. संवैधानिक अधिकार
संविधान सभा में अंबेडकर ने दलितों के लिए सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए—
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अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन
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समानता का अधिकार
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शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण
4. सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व
महाड़ सत्याग्रह (तालाब का पानी अधिकार), नासिक मंदिर प्रवेश आंदोलन—इनसे सामाजिक भेदभाव को चुनौती मिली।
5. धर्म परिवर्तन (बौद्ध धर्म स्वीकारना)
अंबेडकर ने माना कि हिंदू धर्म में जाति-व्यवस्था समाप्त नहीं हो सकती। 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया और लाखों दलितों को समानता की राह दिखाई।
इन रणनीतियों ने दलित चेतना, आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा दी।
प्रश्न 5. महिलाओं के समानता और सशक्तिकरण के क्षेत्र में अंबेडकर का योगदान स्पष्ट कीजिए।
डॉ. अंबेडकर भारत में महिला अधिकारों के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे। उनका मानना था कि किसी समाज की प्रगति उसकी महिलाओं की स्थिति से तय होती है।
1. सामाजिक सुधार
अंबेडकर ने स्त्री शिक्षा, समान अवसर और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। उन्होंने जाति-व्यवस्था की आलोचना की क्योंकि यह महिलाओं को नियंत्रित करती है और उन्हें पितृसत्ता का शिकार बनाती है।
2. विधिक सुधार — Hindu Code Bill
अंबेडकर ने महिला अधिकारों के लिए ऐतिहासिक हिंदू कोड बिल प्रस्तावित किया, जिसमें शामिल थे—
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संपत्ति पर बराबरी का अधिकार
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तलाक का अधिकार
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गोद लेने का अधिकार
हालाँकि उस समय विरोध के कारण बिल पारित नहीं हुआ, लेकिन बाद के कानून इसी पर आधारित बने।
3. संविधान में महिला अधिकारों की रक्षा
अंबेडकर ने सुनिश्चित किया कि संविधान महिलाओं को—
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समानता का अधिकार
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भेदभाव से सुरक्षा
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विशेष संरक्षण
प्रदान करे।
4. आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण
उन्होंने महिलाओं को नौकरी, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। महिला संगठनों ने उनके नेतृत्व में बड़ी भूमिका निभाई।
अंबेडकर की दृष्टि में महिला सशक्तिकरण केवल अधिकार देना नहीं, बल्कि उन्हें सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर देना है।
प्रश्न 6. अंबेडकर के संवैधानिक उपायों (Constitutional Methods) की अवधारणा और सामाजिक न्याय की प्राप्ति में उनकी भूमिका समझाइए।
डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि सामाजिक परिवर्तन हिंसा, विद्रोह या असंवैधानिक तरीकों से नहीं, बल्कि संवैधानिक तरीकों से ही संभव है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सफलता उन नागरिकों पर निर्भर करती है जो समस्याओं का समाधान कानून, संवाद और संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से करते हैं।
अंबेडकर के अनुसार संवैधानिक उपायों में शामिल हैं—
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तर्क और विचार-विमर्श का उपयोग
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न्यायालयों के माध्यम से विधिक उपाय
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जनप्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी
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विधानमंडल के माध्यम से सुधार
अंबेडकर ने चेतावनी दी कि असहयोग, सविनय अवज्ञा या हिंसक आंदोलनों जैसे असंवैधानिक तरीकों का उपयोग लोकतंत्र को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि एक बार जब देश संविधान द्वारा संचालित होने लगे, तब सभी सुधार कानूनी ढंग से ही किए जाने चाहिए।
सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए अंबेडकर ने संविधान में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए—
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अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार
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अनुच्छेद 15: भेदभाव का निषेध
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अनुच्छेद 16: आरक्षण व्यवस्था
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अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन
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अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए विशेष सुरक्षा
अंबेडकर का मानना था कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक अन्याय को केवल नैतिक उपदेशों से नहीं, बल्कि कानूनी हस्तक्षेप और सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) द्वारा ही मिटाया जा सकता है।
इस प्रकार अंबेडकर ने संविधान को सामाजिक क्रांति का साधन बनाया। उनका दृष्टिकोण शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और न्यायोन्मुख परिवर्तन पर आधारित था।
प्रश्न 7. अंबेडकर के वित्तीय प्रबंधन (Financial Management) और रुपए की समस्या (Problem of Rupee) संबंधी विचारों का वर्णन कीजिए।
अंबेडकर केवल समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ अर्थशास्त्री भी थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution” भारतीय मुद्रा और वित्तीय तंत्र को समझने में मील का पत्थर मानी जाती है।
अंबेडकर ने बताया कि भारत की मुद्रा-समस्या का मुख्य कारण औपनिवेशिक शासन द्वारा अपनाई गई चाँदी आधारित मुद्रा प्रणाली (Silver Standard) थी। विश्व बाजार में चाँदी के मूल्य में उतार-चढ़ाव होने से रुपए का मूल्य अस्थिर रहता था। इससे व्यापार, मजदूरी और बचत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता था।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि भारत को वैज्ञानिक मुद्रा प्रणाली अपनानी चाहिए, जो किसी बाहरी धातु के मूल्य पर निर्भर न हो। अंबेडकर ने स्वतंत्र केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था की भी आवश्यकता बताई। उनके सुझावों के आधार पर बाद में Reserve Bank of India (RBI) की स्थापना की गई।
अंबेडकर का मानना था कि स्थिर मुद्रा प्रणाली—
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आर्थिक विकास
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मजदूरी सुरक्षा
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मूल्य स्थिरता
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गरीबी उन्मूलन
के लिए आवश्यक है।
उन्होंने जोर दिया कि बिना ठोस वित्तीय आधार के सामाजिक न्याय संभव नहीं। उनकी आर्थिक सोच आज भी भारतीय वित्तीय नीतियों का आधार है।
प्रश्न 8. अंबेडकर की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था (Colonial Economy) की आलोचना स्पष्ट कीजिए।
अंबेडकर ने औपनिवेशिक शासन को भारत की आर्थिक गिरावट का मुख्य कारण माना। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन का लक्ष्य भारतीय जनता का विकास नहीं, बल्कि अपने आर्थिक हितों की पूर्ति था।
अंबेडकर के अनुसार औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की प्रमुख समस्याएँ थीं:
1. धन का निष्कासन (Drain of Wealth)
भारत से कच्चा माल ब्रिटेन भेजा जाता था और तैयार माल ऊँचे दामों पर वापस बेचा जाता था। इससे देश की पारंपरिक उद्योगों का विनाश हुआ।
2. भूस्वामी आधारित व्यवस्था (Zamindari System)
ब्रिटिशों ने ऐसे राजस्व सिस्टम बनाए, जिन्होंने किसानों को अत्यधिक करों और कर्ज के जाल में फँसा दिया। भूमिहीनता और गरीबी बढ़ती गई।
3. ग्रामीण उद्योगों का विनाश
हस्तकरघा, कारीगरी और कुटीर उद्योग विदेशी मशीनों के कारण नष्ट हुए। इससे बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैली।
4. शिक्षा, स्वास्थ्य और श्रम सुधारों की उपेक्षा
औपनिवेशिक सरकार ने सामाजिक सुधारों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
अंबेडकर का मानना था कि भारत की उन्नति के लिए—
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औद्योगीकरण
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भूमि सुधार
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श्रमिक अधिकार
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राज्य का हस्तक्षेप
आवश्यक है। उनकी आलोचना ने स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियों को नई दिशा दी।
प्रश्न 9. पूँजीवाद (Capitalism) और राज्य समाजवाद (State Socialism) पर अंबेडकर के विचारों की व्याख्या कीजिए।
अंबेडकर ने पूँजीवाद को सावधानीपूर्वक देखा। उनका मानना था कि पूँजीवाद धन और संसाधनों को कुछ हाथों में केंद्रित कर देता है, जिससे सामाजिक असमानता, शोषण और गरीबी बढ़ती है। पूँजीवादी व्यवस्था में मजदूर कमजोर और असुरक्षित रहते हैं।
इसीलिए अंबेडकर ने राज्य समाजवाद का समर्थन किया। लेकिन उनका समाजवाद मार्क्सवादी हिंसा या क्रांति पर आधारित नहीं था। उनका मॉडल संवैधानिक और लोकतांत्रिक समाजवाद था।
अंबेडकर के अनुसार राज्य समाजवाद में—
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प्रमुख उद्योग सरकारी नियंत्रण में हों
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भूमि का राष्ट्रीयकरण किया जाए
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सामूहिक खेती लागू की जाए
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श्रमिकों को सुरक्षा और अधिकार मिलें
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संसाधनों का समतामूलक वितरण हो
अंबेडकर का तर्क था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो।
उनका समाजवाद सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानव गरिमा पर आधारित था, न कि निजी संपत्ति के पूर्ण उन्मूलन पर।
इस प्रकार, अंबेडकर ने पूँजीवाद की कमियों को पहचाना और एक ऐसे समाजवादी मॉडल का सुझाव दिया जो लोकतंत्र और न्याय दोनों को मजबूत करे।
प्रश्न 10. भारत में भूमि, सूक्ष्म भू-खंड (Small Holdings) और कृषि समस्याओं पर अंबेडकर का विश्लेषण समझाइए।
अंबेडकर के अनुसार भारत की कृषि संकट का मुख्य कारण है—छोटी और बिखरी हुई भूमि, तकनीकी पिछड़ापन और जातिगत असमानता। छोटे भू-खंडों पर आधुनिक कृषि तकनीक अपनाना कठिन होता है, जिससे उत्पादकता कम रहती है।
उन्होंने कहा कि छोटे भू-खंड—
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निवेश
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सिंचाई
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मशीनरी उपयोग
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फसल विविधीकरण
को सीमित करते हैं। इससे किसान गरीबी और कर्ज में फँसते जाते हैं।
अंबेडकर का समाधान था—
1. भूमि का समेकन (Consolidation of Land)
भूमि को बड़े हिस्सों में संगठित किया जाए ताकि आधुनिक खेती संभव हो सके।
2. सामूहिक खेती (Collective Farming)
भूमि राज्य के स्वामित्व में रहे, किसान सहकारी रूप से खेती करें और उत्पादन का समान वितरण हो।
3. भूमि सुधार
जमींदारी जैसी मध्यस्थ प्रथाओं को समाप्त कर किसानों को प्रत्यक्ष अधिकार दिए जाएँ।
4. तकनीकी समर्थन
सिंचाई, बीज, मशीनरी और प्रशिक्षण में राज्य सहायता दे।
अंबेडकर का मानना था कि कृषि तभी समृद्ध हो सकती है जब भूमि-संबंधी असमानताओं को खत्म कर आधुनिक कृषि नीति लागू की जाए। उनका विश्लेषण आज भी भारतीय कृषि सुधारों की बहस में प्रासंगिक है।
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