IGNOU FREE MPC-01 मनोविज्ञान, अधिगम और स्मृति Solved Guess Paper With Imp Questions 2025

IGNOU FREE MPC-01 मनोविज्ञान, अधिगम और स्मृति Solved Guess Paper 2025

1.संज्ञानात्मक मनोविज्ञान क्या है? इसके मुख्य घटक कौनकौन से हैं?

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान मनोविज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो इस बात का अध्ययन करती है कि लोग कैसे सोचते हैं, सीखते हैं, याद रखते हैं और समस्या का समाधान करते हैं। यह मानव मस्तिष्क की उन मानसिक प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास करती है जिनके माध्यम से हम सूचनाओं को ग्रहण (perceive), संसाधित (process) और संग्रहीत (store) करते हैं। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान इस बात की भी जांच करता है कि हम अपने अनुभवों से कैसे सीखते हैं और निर्णय लेते हैं।

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के मुख्य घटक

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान में विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं को मुख्य घटकों के रूप में माना जाता है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:

  1. ध्यान (Attention)

ध्यान मानसिक प्रक्रिया का वह भाग है, जिसके द्वारा हम अपने वातावरण से प्राप्त होने वाली सूचनाओं पर केंद्रित होते हैं। ध्यान यह निर्धारित करता है कि हम किस सूचना को महत्त्व देंगे और किसे नजरअंदाज करेंगे। ध्यान के बिना प्रभावी संज्ञानात्मक कार्य संभव नहीं है।

  1. अनुभूति (Perception)

अनुभूति वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम अपनी इंद्रियों (जैसे दृष्टि, श्रवण, स्पर्श आदि) से प्राप्त सूचनाओं को समझते हैं और उनका अर्थ निकालते हैं। उदाहरण के लिए, किसी वस्तु को देखकर उसका रंग और आकार पहचानना अनुभूति का कार्य है।

  1. स्मृति (Memory)

स्मृति उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके द्वारा हम सूचनाओं को संग्रहित (store) करते हैं और आवश्यकतानुसार उन्हें पुनः प्राप्त (recall) करते हैं। स्मृति के तीन प्रमुख चरण होते हैं:

  • एन्कोडिंग (Encoding): सूचना को मस्तिष्क में दर्ज करना।
  • भंडारण (Storage): सूचना को मस्तिष्क में सुरक्षित रखना।
  • पुनः प्राप्ति (Retrieval): आवश्यकतानुसार सूचना को स्मृति से निकालना।
  1. भाषा (Language)

भाषा के माध्यम से हम अपने विचारों और भावनाओं को दूसरों के साथ साझा करते हैं। भाषा का विकास, समझ और प्रयोग संज्ञानात्मक मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण घटक है। भाषा के बिना संचार और विचारों का आदान-प्रदान संभव नहीं है।

  1. समस्या समाधान (Problem Solving)

मनुष्य विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए तर्क (reasoning) और विचार (thinking) का उपयोग करता है। समस्या समाधान के दौरान व्यक्ति विभिन्न रणनीतियों (strategies) और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं का उपयोग करता है।

  1. निर्णय लेना (Decision Making)

निर्णय लेना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करता है और सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव करता है। इसमें व्यक्ति की सोचने की शैली, पूर्व अनुभव और वर्तमान परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

  1. तर्क (Reasoning)

तर्क वह मानसिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से व्यक्ति विभिन्न सूचनाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालता है। यह व्यक्ति को संगठित और तर्कपूर्ण ढंग से सोचने की क्षमता प्रदान करता है।

निष्कर्ष

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान यह समझने का प्रयास करता है कि मस्तिष्क सूचनाओं को कैसे ग्रहण करता है, उनका अर्थ कैसे निकालता है, और उनका उपयोग किस प्रकार करता है। ध्यान, अनुभूति, स्मृति, भाषा, समस्या समाधान, निर्णय लेना और तर्क संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के प्रमुख घटक हैं। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान का उपयोग शिक्षा, चिकित्सा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्रों में किया जाता है, जिससे व्यक्ति के व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलती है।

2.संज्ञानात्मक विकास के लिए जीन पियाजे के सिद्धांत को विस्तार से समझाइए।

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत

जीन पियाजे (Jean Piaget) एक प्रसिद्ध स्विस मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने बच्चों के संज्ञानात्मक (cognitive) विकास को समझाने के लिए एक व्यापक सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, बच्चे का मानसिक विकास एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जो अनुभवों, परिवेश और सीखने के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित होती है। पियाजे का मानना था कि बच्चे स्वयं अपने वातावरण के साथ परस्पर क्रिया करके ज्ञान का निर्माण करते हैं।

पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार प्रमुख चरणों में विभाजित किया, जो बच्चों के मानसिक विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। ये चरण निम्नलिखित हैं:

  1. संवेदीगति चरण (Sensorimotor Stage) [जन्म से 2 वर्ष तक]
  • इस चरण में शिशु अपने इंद्रियों (जैसे देखने, सुनने, छूने) और शारीरिक गतिविधियों (जैसे रेंगने, पकड़ने) के माध्यम से अपने परिवेश को समझते हैं। इस चरण की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
  • प्रत्यक्ष अनुभव: शिशु अपने आस-पास की दुनिया को स्पर्श करके, चखकर और देखकर समझते हैं।
  • आकस्मिक क्रियाएं (Reflex Actions): प्रारंभ में बच्चे अनैच्छिक क्रियाएं करते हैं, जो बाद में उनके सीखने का आधार बनती हैं।
  • वस्तु स्थायित्व (Object Permanence): इस अवधारणा के अनुसार, बच्चा यह समझना शुरू करता है कि कोई वस्तु भले ही उसकी दृष्टि से ओझल हो जाए, फिर भी वह अस्तित्व में बनी रहती है। यह उपलब्धि इस चरण का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
  1. पूर्वसंक्रियात्मक चरण (Preoperational Stage) [2 से 7 वर्ष तक]
  • इस चरण में बच्चे प्रतीकों (symbols) और भाषा का प्रयोग करके अपने विचार व्यक्त करना सीखते हैं। इस चरण की विशेषताएं हैं:
  • भाषा विकास: बच्चे इस चरण में भाषा को तेजी से सीखते हैं और इसका उपयोग अपने विचारों को व्यक्त करने में करते हैं।
  • अहं-केंद्रित सोच (Egocentrism): बच्चे अपने दृष्टिकोण को ही सही मानते हैं और दूसरों के दृष्टिकोण को समझने में कठिनाई महसूस करते हैं।
  • काल्पनिक खेल (Pretend Play): बच्चे इस दौरान कल्पनाशील खेल खेलते हैं, जैसे गुड़िया से बात करना या खिलौनों को जीवित मानना।
  • संज्ञानात्मक जड़ता (Centration): इस अवस्था में बच्चे केवल किसी वस्तु के एक ही पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि अन्य पहलुओं की अनदेखी करते हैं।
  1. ठोस संक्रियात्मक चरण (Concrete Operational Stage) [7 से 11 वर्ष तक]
  • इस चरण में बच्चे तर्कसंगत और संगठित ढंग से सोचने में सक्षम हो जाते हैं। उनकी सोच ठोस (concrete) स्थितियों पर आधारित होती है। इस चरण की मुख्य विशेषताएं हैं:
  • संरक्षण (Conservation): बच्चे यह समझने लगते हैं कि किसी वस्तु का आकार, मात्रा या संख्या भले ही बदल जाए, उसकी कुल मात्रा वही रहती है।
  • वर्गीकरण (Classification): बच्चे वस्तुओं को उनके गुणों के आधार पर श्रेणियों में विभाजित करना सीखते हैं।
  • क्रमबद्धता (Seriation): बच्चे वस्तुओं को उनके आकार, रंग या अन्य विशेषताओं के आधार पर व्यवस्थित कर सकते हैं।
  • प्रतिवर्ती सोच (Reversibility): बच्चे यह समझने लगते हैं कि क्रियाओं को उलटकर प्रारंभिक अवस्था में लाया जा सकता है।

3.भाषा के संज्ञानात्मक विकास में नोम चॉम्स्की के योगदान को स्पष्ट कीजिए।

नोम चॉम्स्की (Noam Chomsky) 20वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध भाषाविद् (linguist) और संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक (cognitive psychologist) हैं, जिन्होंने भाषा के विकास और संरचना को समझाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चॉम्स्की ने यह तर्क दिया कि भाषा सीखना केवल एक सामाजिक या सांस्कृतिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मानव मस्तिष्क की एक जैविक (biological) क्षमता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि मनुष्य में जन्म से ही भाषा सीखने की एक सहज प्रवृत्ति (Innate Ability) होती है।

नोम चॉम्स्की के भाषा विकास के प्रमुख सिद्धांत

चॉम्स्की ने भाषा के संज्ञानात्मक विकास को समझाने के लिए कई महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किए, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं:

  1. भाषा अधिग्रहण यंत्र (Language Acquisition Device – LAD) सिद्धांत

नोम चॉम्स्की का मानना था कि प्रत्येक मानव मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का मानसिक तंत्र (LAD) मौजूद होता है, जो भाषा सीखने में सहायक होता है। इस यंत्र के कारण मनुष्य प्राकृतिक रूप से भाषा के नियमों और संरचना को समझने में सक्षम होता है।

  • यह यंत्र बच्चों को व्याकरण (grammar) और वाक्य संरचना (sentence structure) को समझने में सहायता करता है।
  • चॉम्स्की के अनुसार, बच्चों को केवल न्यूनतम इनपुट (minimal input) की आवश्यकता होती है, और वे सहज रूप से व्याकरण के नियमों को समझ लेते हैं।
  • उदाहरण के लिए, बच्चे बिना किसी औपचारिक शिक्षा के वाक्यों को सही ढंग से बनाना सीख जाते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि भाषा अधिग्रहण में जैविक क्षमता का योगदान होता है।
  1. सार्वभौमिक व्याकरण (Universal Grammar) सिद्धांत
  • चॉम्स्की ने सार्वभौमिक व्याकरण का विचार प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार सभी भाषाओं के मूलभूत व्याकरणिक नियम समान होते हैं।
  • उन्होंने यह तर्क दिया कि सभी भाषाओं में कुछ समान संरचनात्मक नियम होते हैं, जिन्हें मनुष्य जन्मजात रूप से समझता है।
  • उदाहरण के लिए, सभी भाषाओं में संज्ञा (noun) और क्रिया (verb) जैसी श्रेणियाँ पाई जाती हैं।
  • बच्चों के मस्तिष्क में पहले से ही इन व्याकरणिक नियमों की समझ मौजूद होती है, जिससे वे किसी भी भाषा को सीखने में सक्षम होते हैं।
  1. संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive Structure) का महत्व
  • चॉम्स्की ने बताया कि भाषा विकास के लिए केवल पर्यावरण (environment) और अनुभव (experience) ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि बच्चों के मस्तिष्क की संरचना और जैविक प्रक्रियाएँ (biological processes) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • बच्चे अपने अनुभवों से सीखते हैं, लेकिन उनके सीखने की क्षमता का आधार उनकी संज्ञानात्मक संरचना पर निर्भर करता है।
  • चॉम्स्की ने इस बात पर बल दिया कि बच्चों के मस्तिष्क में भाषा सीखने के लिए एक प्राकृतिक ढाँचा होता है, जो उन्हें भाषाई संरचना को समझने में सहायता करता है।
  1. रचनात्मकता (Creativity) का सिद्धांत
  • चॉम्स्की ने यह भी कहा कि बच्चे भाषा के नियमों को समझने के बाद नई वाक्य संरचना (sentence structure) का निर्माण कर सकते हैं।
  • बच्चे केवल उन्हीं वाक्यों का उपयोग नहीं करते, जो उन्होंने सुने हैं, बल्कि वे नए वाक्य बनाकर अपनी रचनात्मकता (creativity) का प्रदर्शन करते हैं।
  • उदाहरण के लिए, अगर एक बच्चा “मैं खाना खा रहा हूँ” वाक्य समझता है, तो वह अपने अनुभव के आधार पर “मैं पानी पी रहा हूँ” जैसे नए वाक्य भी बना सकता है।

नोम चॉम्स्की के सिद्धांतों का प्रभाव

  • चॉम्स्की के सिद्धांतों ने मनोविज्ञान, भाषाविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक प्रभाव डाला है। उनके सिद्धांतों के प्रभाव निम्नलिखित हैं:
  • भाषा शिक्षा: चॉम्स्की के सिद्धांतों के आधार पर बच्चों को भाषा सिखाने के नए तरीके विकसित किए गए।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): चॉम्स्की के सार्वभौमिक व्याकरण के सिद्धांत ने मशीन लर्निंग और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • बचपन विकास: चॉम्स्की के सिद्धांतों ने यह समझने में मदद की कि भाषा का विकास बच्चों के संज्ञानात्मक विकास से कैसे जुड़ा होता है।

निष्कर्ष

नोम चॉम्स्की ने भाषा विकास के क्षेत्र में क्रांतिकारी योगदान दिया। उनके भाषा अधिग्रहण यंत्र (LAD) और सार्वभौमिक व्याकरण (Universal Grammar) के सिद्धांतों ने यह सिद्ध किया कि भाषा सीखना एक जैविक और संज्ञानात्मक प्रक्रिया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि बच्चों के मस्तिष्क में पहले से ही भाषा सीखने की क्षमता मौजूद होती है, जो उनके भाषा विकास की प्रक्रिया को

4.विभिन्न प्रकार के सीखने को विस्तार से समझाइए।

सीखना (Learning) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति अनुभवों, अभ्यासों और शिक्षाओं के आधार पर नए ज्ञान, कौशल, व्यवहार और दृष्टिकोण का विकास करता है। सीखने के माध्यम से व्यक्ति अपने आस-पास के वातावरण के अनुसार स्वयं को ढालता है और समस्याओं का समाधान करता है। मनोविज्ञान में सीखने को एक संज्ञानात्मक (cognitive), व्यवहारिक (behavioral) और सामाजिक (social) प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। सीखना विभिन्न रूपों और तरीकों से हो सकता है, जिसे मनोवैज्ञानिकों ने अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत किया है।

सीखने के प्रमुख प्रकार

सीखने के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं:

  1. शास्त्रीय अनुबंधन (Classical Conditioning)

शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक इवान पावलोव (Ivan Pavlov) ने प्रस्तुत किया था। इस सिद्धांत के अनुसार, व्यक्ति किसी विशेष उद्दीपन (stimulus) के प्रति एक विशेष प्रतिक्रिया (response) देना सीखता है।

मुख्य तत्त्व:

प्राकृतिक उद्दीपन (Unconditioned Stimulus – UCS): एक ऐसा उद्दीपन जो स्वाभाविक रूप से एक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।

प्राकृतिक प्रतिक्रिया (Unconditioned Response – UCR): प्राकृतिक उद्दीपन के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया।

सशर्त उद्दीपन (Conditioned Stimulus – CS): एक ऐसा उद्दीपन जो स्वाभाविक प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करता, लेकिन अभ्यास के माध्यम से इसे प्रतिक्रिया से जोड़ा जाता है।

सशर्त प्रतिक्रिया (Conditioned Response – CR): सशर्त उद्दीपन के प्रति सीखी गई प्रतिक्रिया।

उदाहरण:

पावलोव ने कुत्तों पर किए गए अपने प्रयोग में देखा कि जब घंटी बजाने के बाद कुत्ते को भोजन दिया जाता था, तो कुछ समय बाद केवल घंटी बजाने से ही कुत्ते के मुँह में लार आनी शुरू हो जाती थी।

इस प्रयोग में भोजन प्राकृतिक उद्दीपन था, जबकि घंटी सशर्त उद्दीपन थी।

  1. प्रचालन अनुबंधन (Operant Conditioning)

प्रचालन अनुबंधन का सिद्धांत बी.एफ. स्किनर (B.F. Skinner) ने प्रस्तुत किया था। इस सिद्धांत के अनुसार, सीखना तब होता है जब व्यक्ति किसी व्यवहार के परिणामस्वरूप मिलने वाले पुरस्कार (reward) या दंड (punishment) के आधार पर उस व्यवहार को दोहराने या छोड़ने का निर्णय लेता है।

मुख्य तत्त्व:

सकारात्मक प्रेरक (Positive Reinforcement): किसी व्यवहार के बाद पुरस्कार मिलने से वह व्यवहार मजबूत हो जाता है।

नकारात्मक प्रेरक (Negative Reinforcement): किसी अप्रिय स्थिति को हटाने से व्यवहार की पुनरावृत्ति बढ़ जाती है।

दंड (Punishment): किसी व्यवहार के बाद अप्रिय प्रतिक्रिया मिलने से उस व्यवहार की पुनरावृत्ति कम हो जाती है।

उदाहरण:

यदि बच्चे को पढ़ाई के बाद अच्छा प्रदर्शन करने पर इनाम मिलता है, तो उसकी पढ़ाई करने की प्रवृत्ति बढ़ जाएगी (सकारात्मक प्रेरक)।

यदि शोर के कारण व्यक्ति के सिरदर्द को दवा लेने के बाद राहत मिलती है, तो भविष्य में वह व्यक्ति सिरदर्द होने पर दवा लेगा (नकारात्मक प्रेरक)।

5) बुनियादी शोध से प्राप्त अंतर्दृष्टि रोजमर्रा की सेटिंग में व्यावहारिक उपयोग कैसे ला सकती है?

बुनियादी शोध (Basic Research) वैज्ञानिक अनुसंधान का वह रूप है, जिसका मुख्य उद्देश्य किसी घटना, प्रक्रिया या समस्या के बारे में मौलिक ज्ञान (fundamental knowledge) प्राप्त करना होता है। इसका उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप से किसी व्यावहारिक समस्या का समाधान करना नहीं होता, बल्कि नए सिद्धांतों, अवधारणाओं और प्रक्रियाओं को विकसित करना होता है। हालांकि, बुनियादी शोध से प्राप्त अंतर्दृष्टि (insights) का उपयोग विभिन्न व्यावहारिक क्षेत्रों में किया जा सकता है, जैसे शिक्षा, चिकित्सा, प्रौद्योगिकी, व्यवसाय और सामाजिक विकास।

बुनियादी शोध से प्राप्त ज्ञान को अनुप्रयुक्त शोध (Applied Research) के माध्यम से रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान में उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया ज्ञान के सैद्धांतिक (theoretical) स्वरूप को व्यावहारिक (practical) उपयोग में परिवर्तित करती है। बुनियादी शोध से प्राप्त अंतर्दृष्टि किस प्रकार रोजमर्रा की जिंदगी में उपयोग की जा सकती है, इसे निम्नलिखित पहलुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  1. शिक्षा के क्षेत्र में उपयोग

बुनियादी शोध से प्राप्त संज्ञानात्मक मनोविज्ञान (Cognitive Psychology), अधिगम (Learning Theories) और बाल विकास (Child Development) से जुड़ी अंतर्दृष्टियाँ शिक्षा की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।

उदाहरण:

संज्ञानात्मक अधिगम सिद्धांत (Cognitive Learning Theory): जीन पियाजे (Jean Piaget) के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत के आधार पर बच्चों के मानसिक विकास के अनुसार पाठ्यक्रम (curriculum) तैयार किया जाता है।

अवलोकन अधिगम (Observational Learning): अल्बर्ट बंदुरा (Albert Bandura) के अवलोकन सिद्धांत के आधार पर बच्चों को प्रेरित करने के लिए शिक्षकों और माता-पिता के सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा दिया जाता है।

सकारात्मक प्रेरक (Positive Reinforcement): बी.एफ. स्किनर (B.F. Skinner) के प्रचालन अनुबंधन के आधार पर छात्रों को पुरस्कार और मान्यता देकर उनकी सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जाता है।

  1. चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपयोग

बुनियादी शोध से प्राप्त जैविक, मानसिक और व्यवहारिक ज्ञान का उपयोग चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र में नई विधियों के विकास और स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है।

उदाहरण:

तंत्रिका तंत्र (Nervous System) पर शोध: मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर किए गए बुनियादी शोध से न्यूरोलॉजिकल विकारों (जैसे – अल्जाइमर, पार्किंसंस) के उपचार के नए तरीके विकसित किए गए हैं।

मानसिक स्वास्थ्य: तनाव, अवसाद और चिंता से जुड़ी संज्ञानात्मक प्रक्रिया पर शोध से मनोचिकित्सा (Psychotherapy) और औषधियों के विकास में सहायता मिली है।

निदान (Diagnosis) और चिकित्सा: आनुवंशिक (genetic) और जैविक (biological) शोध के आधार पर नई चिकित्सा पद्धतियाँ (जैसे – जीन थेरेपी) विकसित की गई हैं।

  1. प्रौद्योगिकी और नवाचार में उपयोग

प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बुनियादी शोध से प्राप्त ज्ञान नए आविष्कारों (inventions) और नवाचारों (innovations) के विकास का आधार बनता है।

उदाहरण:

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI): संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science) पर आधारित शोध ने मशीन लर्निंग (Machine Learning) और एआई में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

इंटरनेट और कंप्यूटर: गणित और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में किए गए बुनियादी शोध ने इंटरनेट, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और डेटा एनालिटिक्स के विकास में सहायता की है।

स्वचालन (Automation): स्वचालित मशीनों और रोबोटिक्स (Robotics) के विकास के पीछे भौतिकी और इंजीनियरिंग से संबंधित बुनियादी शोध की प्रमुख भूमिका है।

  1. सामाजिक और व्यवहारिक विज्ञान में उपयोग

बुनियादी शोध से प्राप्त अंतर्दृष्टि का उपयोग समाजशास्त्र (Sociology), राजनीति विज्ञान (Political Science) और अर्थशास्त्र (Economics) जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।

उदाहरण:

सामाजिक व्यवहार: समूह व्यवहार, नेतृत्व, निर्णय लेने की प्रक्रिया और सामाजिक मनोविज्ञान से जुड़े शोध का उपयोग संगठनात्मक विकास (Organizational Development) में किया जाता है।

राजनीतिक नीति: सामाजिक समस्याओं और जनसांख्यिकी (Demographics) पर आधारित शोध के आधार पर सरकारें नीतियाँ बनाती हैं।

आर्थिक विकास: बाजार और उपभोक्ता व्यवहार पर आधारित शोध से कंपनियाँ अपने उत्पाद और सेवाओं को अधिक प्रभावी ढंग से तैयार करती हैं।

  1. व्यापार और प्रबंधन में उपयोग

बुनियादी शोध से प्राप्त ज्ञान का उपयोग व्यावसायिक निर्णय लेने, रणनीति निर्माण और विपणन (Marketing) में किया जाता है।

उदाहरण:

  • उपभोक्ता व्यवहार: उपभोक्ताओं की पसंद-नापसंद और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर शोध के आधार पर कंपनियाँ विपणन रणनीति तैयार करती हैं।
  • नेतृत्व और प्रबंधन: संगठनात्मक व्यवहार (Organizational Behavior) पर किए गए शोध के आधार पर नेतृत्व शैली और कर्मचारी प्रबंधन को प्रभावी बनाया जाता है।
  • व्यापार मॉडल: बाजार की प्रवृत्तियों और प्रतिस्पर्धा पर किए गए शोध के आधार पर कंपनियाँ अपने

6. संवेदी स्मृति, अल्पकालिक स्मृति और दीर्घकालिक स्मृति की दोदो विशेषताओं का वर्णन करें

  1. संवेदी स्मृति

संवेदी स्मृति वह स्मृति है, जिसमें हमारे इंद्रियों (जैसे – दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, स्वाद और गंध) द्वारा प्राप्त की गई सूचना कुछ क्षणों के लिए संग्रहीत रहती है। यह स्मृति बहुत ही अल्पकालिक होती है और इसकी अवधि मिलीसेकंड से लेकर कुछ सेकंड तक होती है।

संवेदी स्मृति की विशेषताएँ:

अल्पकालिक अवधि

संवेदी स्मृति की अवधि बहुत कम होती है, यह कुछ मिलीसेकंड से लेकर 1-2 सेकंड तक होती है।

उदाहरण: किसी वस्तु को देखकर आँख बंद करने के बाद उसका चित्र कुछ सेकंड तक मस्तिष्क में रहना।

उच्च क्षमता

संवेदी स्मृति में बड़ी मात्रा में सूचनाएँ संचित की जा सकती हैं।

हालांकि, यह सूचना बहुत जल्दी लुप्त हो जाती है, यदि उस पर ध्यान न दिया जाए।

  1. अल्पकालिक स्मृति (Short-Term Memory) या कार्यशील स्मृति (Working Memory)

अल्पकालिक स्मृति वह स्मृति है, जिसमें सूचना कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट तक संचित रहती है। इसमें सीमित मात्रा में सूचनाओं को रखा जा सकता है।

अल्पकालिक स्मृति की विशेषताएँ:

सीमित भंडारण क्षमता (Limited Capacity):

अल्पकालिक स्मृति में लगभग 5 से 9 सूचनाओं (7 ± 2 नियम के अनुसार) को ही संचित किया जा सकता है।

उदाहरण: किसी फोन नंबर को कुछ समय तक याद रखना।

सूचना को दोहराने से स्थायित्व (Retention through Rehearsal):

यदि किसी सूचना को बार-बार दोहराया जाए, तो वह अधिक समय तक याद रह सकती है और दीर्घकालिक स्मृति में जा सकती है।

उदाहरण: किसी महत्वपूर्ण तिथि को याद करने के लिए उसे बार-बार दोहराना।

  1. दीर्घकालिक स्मृति (Long-Term Memory)

दीर्घकालिक स्मृति वह स्मृति है, जिसमें सूचना लंबे समय तक (कुछ दिनों से लेकर जीवन भर) के लिए संचित रहती है।

दीर्घकालिक स्मृति की विशेषताएँ:

असीमित भंडारण क्षमता (Unlimited Capacity):

दीर्घकालिक स्मृति में सूचना को असीमित मात्रा में और लंबे समय तक संग्रहीत किया जा सकता है।

उदाहरण: बचपन की घटनाओं को कई वर्षों बाद भी याद रखना।

सूचना की पुनः प्राप्ति (Retrieval):

दीर्घकालिक स्मृति में संचित सूचनाओं को आवश्यकता पड़ने पर पुनः मस्तिष्क में लाया जा सकता है।

उदाहरण: किसी पुराने मित्र का नाम याद आना।

7) सीखने और स्मृति के सूचना प्रसंस्करण दृष्टिकोणों पर चर्चा करें।

सीखने (Learning) और स्मृति (Memory) के अध्ययन में सूचना प्रसंस्करण दृष्टिकोण (Information Processing Approach) एक प्रमुख सिद्धांत है, जो यह समझाने का प्रयास करता है कि मस्तिष्क में सूचना कैसे संचित (store), संसाधित (process) और पुनः प्राप्त (retrieve) की जाती है। यह दृष्टिकोण कंप्यूटर मॉडल पर आधारित है, जिसमें मस्तिष्क की कार्यप्रणाली की तुलना कंप्यूटर के डेटा प्रोसेसिंग से की जाती है। इस मॉडल के अनुसार, मनुष्य का मस्तिष्क सूचना को ग्रहण (input), प्रसंस्करण (processing) और पुनः प्राप्ति (output) की प्रक्रिया के माध्यम से सीखता और स्मरण करता है।

सूचना प्रसंस्करण दृष्टिकोण के अनुसार, सीखना और स्मरण एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जिसमें सूचना को विभिन्न चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। एटकिंसन और शिफरिन (Atkinson & Shiffrin) ने 1968 में तीन-स्तरीय मॉडल (Three-Stage Model) प्रस्तुत किया, जिसमें संवेदी स्मृति (Sensory Memory), अल्पकालिक स्मृति (Short-Term Memory) और दीर्घकालिक स्मृति (Long-Term Memory) को सूचना के प्रसंस्करण के तीन मुख्य घटकों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

  1. सूचना ग्रहण (Information Acquisition)

सीखने की प्रक्रिया का पहला चरण सूचना का ग्रहण (Input) है। व्यक्ति अपने परिवेश से मिलने वाली सूचनाओं को अपनी इंद्रियों (जैसे – दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, गंध और स्वाद) के माध्यम से प्राप्त करता है। यह सूचना संवेदी स्मृति (Sensory Memory) में संचित होती है।

संवेदी स्मृति (Sensory Memory):

संवेदी स्मृति अल्पकालिक होती है और कुछ मिलीसेकंड से लेकर 2-3 सेकंड तक रहती है।

संवेदी स्मृति से केवल वही सूचना अल्पकालिक स्मृति में स्थानांतरित होती है, जिस पर व्यक्ति का ध्यान केंद्रित होता है।

उदाहरण के रूप में, भीड़भाड़ वाली जगह पर किसी परिचित व्यक्ति की आवाज सुनकर उसकी पहचान करना।

संवेदी स्मृति में सूचना को चयन करने के बाद वह अल्पकालिक स्मृति में जाती है, जहाँ उसका प्रसंस्करण (processing) किया जाता है।

  1. सूचना प्रसंस्करण (Information Processing)

सीखने का दूसरा चरण सूचना का प्रसंस्करण है। इस चरण में मस्तिष्क सूचना को व्यवस्थित (organize), वर्गीकृत (categorize) और विश्लेषित (analyze) करता है। यह प्रक्रिया अल्पकालिक स्मृति (Short-Term Memory) या कार्यशील स्मृति (Working Memory) में होती है।

अल्पकालिक स्मृति (Short-Term Memory):

अल्पकालिक स्मृति में सूचना कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट तक बनी रहती है।

इसमें सूचना की मात्रा सीमित होती है (7 ± 2 सूचनाएँ)।

सूचना का दोहराव (Rehearsal) करने पर वह दीर्घकालिक स्मृति में चली जाती है।

अल्पकालिक स्मृति में सूचना का मस्तिष्क के अन्य भागों से संयोजन करके अर्थ निकाला जाता है।

उदाहरण के रूप में, किसी फोन नंबर को अल्पकालिक स्मृति में याद रखना और दोहराव के माध्यम से उसे स्थायी रूप से सीखना।

कार्यशील स्मृति (Working Memory):

बैडली (Baddeley) के अनुसार, कार्यशील स्म

8) सूचना प्रसंस्करण के मूल सिद्धांत क्या हैं?

सूचना प्रसंस्करण (Information Processing) का सिद्धांत मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझाने के लिए एक प्रमुख संज्ञानात्मक दृष्टिकोण (Cognitive Approach) है। यह सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि मस्तिष्क किस प्रकार सूचना को ग्रहण (Input), संसाधित (Process) और पुनः प्राप्त (Retrieve) करता है। इस सिद्धांत की उत्पत्ति कंप्यूटर मॉडल से हुई है, जिसमें मानव मस्तिष्क को एक सूचना संसाधक (Information Processor) के रूप में देखा गया है। कंप्यूटर की भांति मानव मस्तिष्क भी सूचना को इनपुट के रूप में ग्रहण करता है, उसे व्यवस्थित (Organize) करता है, उसका विश्लेषण (Analyze) करता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे आउटपुट (Output) के रूप में पुनः प्रस्तुत करता है।

सूचना प्रसंस्करण के सिद्धांत की प्रमुख नींव एटकिंसन और शिफरिन (Atkinson & Shiffrin) के तीन-स्तरीय मॉडल (Three-Stage Model) पर आधारित है, जिसमें संवेदी स्मृति (Sensory Memory), अल्पकालिक स्मृति (Short-Term Memory) और दीर्घकालिक स्मृति (Long-Term Memory) को मुख्य घटकों के रूप में शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त, बैडली (Baddeley) ने कार्यशील स्मृति (Working Memory) के माध्यम से सूचना के संगठन और उपयोग के सिद्धांत को विस्तारित किया। इस दृष्टिकोण के अनुसार, सीखने और स्मरण की प्रक्रिया में विभिन्न संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ (जैसे – ध्यान, धारणा, पुनः स्मरण, संकेतन, आदि) शामिल होती हैं।

  1. सूचना के तीन मुख्य घटक (Three Components of Information Processing)

सूचना प्रसंस्करण सिद्धांत के अनुसार मस्तिष्क में सूचना के प्रवाह के लिए तीन मुख्य घटक कार्य करते हैं:

(i) संवेदी स्मृति (Sensory Memory):

संवेदी स्मृति वह घटक है, जिसमें बाहरी पर्यावरण से प्राप्त संवेदी सूचनाएँ (जैसे – ध्वनि, दृष्टि, स्पर्श) कुछ मिलीसेकंड से लेकर कुछ सेकंड तक संचित रहती हैं।

यह सूचना अत्यंत अल्पकालिक होती है और यदि व्यक्ति इस पर ध्यान केंद्रित न करे, तो यह शीघ्र ही लुप्त हो जाती है।

उदाहरण: किसी चमकीली वस्तु को देखकर तुरंत आंख बंद करने के बाद उसकी छवि का कुछ क्षणों तक बना रहना।

(ii) अल्पकालिक स्मृति (Short-Term Memory):

संवेदी स्मृति से चयनित सूचना अल्पकालिक स्मृति में स्थानांतरित हो जाती है।

इसमें सूचना की अवधि कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट तक हो सकती है।

सूचना को याद रखने के लिए दोहराव (Rehearsal) आवश्यक होता है।

अल्पकालिक स्मृति की क्षमता सीमित होती है (7 ± 2 सूचना इकाइयाँ)।

उदाहरण: किसी नए मोबाइल नंबर को याद रखना।

(iii) दीर्घकालिक स्मृति (Long-Term Memory):

अल्पकालिक स्मृति से बार-बार दोहराव या अर्थ समझने की स्थिति में सूचना दीर्घकालिक स्मृति में स्थानांतरित हो जाती है।

यह स्मृति स्थायी होती है और इसमें असीमित मात्रा में सूचना संग्रहित की जा सकती है।

उदाहरण: बचपन की घटनाओं को कई वर्षों बाद भी याद कर पाना।

  1. सूचना प्रसंस्करण की प्रमुख प्रक्रियाएँ

सूचना प्रसंस्करण सिद्धांत के अनुसार सूचना को ग्रहण करने, संरक्षित करने और पुनः प्राप्त करने की निम्नलिखित प्रमुख प्रक्रियाएँ होती हैं:

(i) ध्यान (Attention):

ध्यान वह प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति संवेदी सूचनाओं में से महत्वपूर्ण सूचनाओं का चयन करता है।

सूचना को अल्पकालिक स्मृति में स्थानांतरित करने के लिए ध्यान केंद्रित करना आवश्यक होता है।

उदाहरण: भीड़ में किसी परिचित व्यक्ति की आवाज सुनकर उस पर ध्यान देना।

(ii) संकेतन (Encoding):

सूचना के अर्थ को समझकर उसे संरक्षित करने की प्रक्रिया संकेतन (Encoding) कहलाती है।

सूचना को दृश्य (Visual), श्रवण (Auditory) या अर्थ आधारित (Semantic) रूप में संकेतन किया जा सकता है।

उदाहरण: किसी महत्वपूर्ण तारीख को याद रखने के लिए उसे किसी विशेष घटना से जोड़ना।

(iii) भंडारण (Storage):

संकेतन के बाद सूचना को भंडारित (Store) किया जाता है।

अल्पकालिक स्मृति में सूचना का भंडारण सीमित समय के लिए होता है, जबकि दीर्घकालिक स्मृति में भंडारण असीमित और स्थायी होता है।

उदाहरण: बचपन की किसी घटना को दीर्घकालिक स्मृति में संचित करना।

(iv) पुनः स्मरण (Retrieval):

सूचना के आवश्यकता पड़ने पर उसे स्मृति से पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया को पुनः स्मरण (Retrieval) कहा जाता है।

पुनः स्मरण की क्षमता सूचना के संकेतन और भंडारण की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

उदाहरण: परीक्षा में पढ़ी गई सामग्री को उत्तर के रूप में प्रस्तुत करना।

  1. सूचना के प्रसंस्करण में संज्ञानात्मक नियंत्रण (Cognitive Control)

सूचना के प्रभावी प्रसंस्करण के लिए संज्ञानात्मक नियंत्रण आवश्यक है। इसमें निम्नलिखित घटक शामिल होते हैं:

(i) स्वचालित (Automatic) और नियंत्रित (Controlled) प्रक्रिया:

स्वचालित प्रक्रिया मस्तिष्क द्वारा बिना किसी प्रयास के होती है (जैसे – सांस लेना, चलना)।

नियंत्रित प्रक्रिया में मस्तिष्क को ध्यान और प्रयास की आवश्यकता होती है (जैसे – समस्या समाधान करना)।

(ii) कार्यशील स्मृति (Working Memory):

बैडली (Baddeley) के अनुसार, कार्यशील स्मृति सूचना के भंडारण और प्रसंस्करण दोनों में कार्य करती है।

यह सूचना को व्यवस्थित करने, विश्लेषण करने और समस्या समाधान में सहायता करती है।

(iii) विकर्षण प्रबंधन (Distraction Management):

ध्यान केंद्रित करने और बाहरी विकर्षणों (Distractions) को रोकने की क्षमता भी संज्ञानात्मक नियंत्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उदाहरण: परीक्षा के समय शोर-शराबे को अनदेखा करना।

  1. सूचना प्रसंस्करण के प्रमुख मॉडल (Major Models of Information Processing)

(i) एटकिंसन और शिफरिन का मॉडल (Atkinson and Shiffrin’s Model):

इस मॉडल के अनुसार सूचना संवेदी स्मृति, अल्पकालिक स्मृति और दीर्घकालिक स्मृति के माध्यम से प्रवाहित होती है।

(ii) लेवल ऑफ प्रोसेसिंग मॉडल (Levels of Processing Model):

क्रेक और लॉकहार्ट (Craik and Lockhart) के अनुसार, सूचना की गहराई से समझना उसे दीर्घकालिक स्मृति में बनाए रखने में सहायक होता है।

(iii) पैरलल डिस्ट्रिब्यूटेड प्रोसेसिंग (Parallel Distributed Processing):

इस मॉडल के अनुसार सूचना मस्तिष्क में विभिन्न न्यूरॉन्स के माध्यम से समानांतर रूप से संचित और संसाधित होती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

सूचना प्रसंस्करण सिद्धांत के अनुसार मस्तिष्क एक जटिल सूचना प्रोसेसर के रूप में कार्य करता है, जिसमें सूचना के ग्रहण, संकेतन, भंडारण और पुनः स्मरण की प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। यह सिद्धांत शिक्षा, मनोविज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science) के क्षेत्र में उपयोगी है।

9) स्मृति के तंत्रिका आधार के अध्ययन के मानव और पशु मॉडल की तुलना और अंतर बताएं

स्मृति (Memory) के तंत्रिका आधार (Neural Basis) का अध्ययन मनोविज्ञान (Psychology), तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) और संज्ञानात्मक विज्ञान (Cognitive Science) के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। स्मृति का तंत्रिका आधार यह समझाने का प्रयास करता है कि मस्तिष्क में सूचना किस प्रकार ग्रहण (Encoding), संचित (Storage) और पुनः प्राप्त (Retrieval) की जाती है। मानव (Human) और पशु (Animal) मॉडल का उपयोग तंत्रिका तंत्र (Nervous System) और मस्तिष्क (Brain) की कार्यप्रणाली को समझने के लिए किया जाता है। दोनों मॉडलों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि स्मृति का निर्माण (Formation), समेकन (Consolidation) और पुनः स्मरण (Recall) विभिन्न जैविक और तंत्रिका प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है।

मानव और पशु मॉडल में कई समानताएँ और भिन्नताएँ हैं, जो स्मृति के तंत्रिका आधार की संरचना और कार्यप्रणाली को बेहतर ढंग से समझने में सहायता करती हैं। पशु मॉडल का उपयोग मुख्य रूप से प्रयोगात्मक स्थितियों (Experimental Conditions) में किया जाता है, जबकि मानव मॉडल के अध्ययन से संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं (Cognitive Processes) और न्यूरोलॉजिकल विकारों (Neurological Disorders) के बारे में गहरी समझ मिलती है।

  1. मानव और पशु मॉडल के अध्ययन के उद्देश्य

(i) मानव मॉडल:

मानव मॉडल का उपयोग मुख्य रूप से जटिल संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं (Complex Cognitive Processes) जैसे – भाषा (Language), निर्णय लेना (Decision Making) और समस्या समाधान (Problem Solving) के अध्ययन के लिए किया जाता है।

मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्रों (Specific Brain Regions) जैसे – हिप्पोकैम्पस (Hippocampus), एमिग्डाला (Amygdala) और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) की भूमिका को समझने के लिए मानव मॉडल उपयोगी होता है।

(ii) पशु मॉडल:

पशु मॉडल का उपयोग मुख्य रूप से प्रयोगशाला स्थितियों में न्यूरॉन्स (Neurons) और न्यूरोट्रांसमीटर (Neurotransmitters) के व्यवहारिक पैटर्न (Behavioral Patterns) के अध्ययन के लिए किया जाता है।

चूहों (Rats), बंदरों (Monkeys), खरगोशों (Rabbits) और समुद्री घोंघे (Sea Snails) जैसे पशुओं का उपयोग मस्तिष्क की संरचना और क्रियाओं को समझने के लिए किया जाता है।

पशु मॉडल में तंत्रिका कोशिकाओं (Neural Cells) की प्रतिक्रिया और उनके न्यूरोकेमिकल परिवर्तन (Neurochemical Changes) को समझने के लिए इलेक्ट्रोड (Electrode) और इमेजिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है।

  1. मानव और पशु मॉडल की तुलना (Comparison of Human and Animal Models):
पहलू मानव मॉडल पशु मॉडल
स्मृति की संरचना मस्तिष्क के जटिल भाग जैसे – हिप्पोकैम्पस, सेरेब्रल कॉर्टेक्स, थैलेमस, एमिग्डाला आदि स्मृति में भूमिका निभाते हैं। पशुओं में मस्तिष्क की संरचना अपेक्षाकृत सरल होती है। हिप्पोकैम्पस और एमिग्डाला समान कार्य करते हैं।
स्मृति का प्रकार स्पष्ट (Explicit) और निहित (Implicit) स्मृति का विभाजन स्पष्ट है। स्पष्ट और निहित स्मृति का कार्य पशुओं में समान नहीं है।
अनुसंधान के तरीके fMRI (Functional MRI), PET Scan, EEG (Electroencephalogram) का उपयोग। न्यूरॉन्स की गतिविधि को मापने के लिए इलेक्ट्रोड, केमिकल इंजेक्शन और ऑप्टोजेनेटिक्स का उपयोग।
अनुभवजन्य अध्ययन (Empirical Study) नैदानिक अध्ययन (Clinical Studies), मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Testing) का उपयोग। व्यवहार परीक्षण (Behavioral Testing), न्यूरोकैमिकल प्रतिक्रिया का अध्ययन।
सीखने और पुनः स्मरण मनुष्य जटिल संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं जैसे – निर्णय लेना, समस्या समाधान में बेहतर है। पशु सरल सीखने की प्रक्रियाओं (जैसे – कंडीशनिंग, एसोसिएशन) में कुशल होते हैं।
अनुकूलनशीलता (Adaptability) मनुष्य नई स्थितियों के अनुसार सीखने और समायोजन में सक्षम होता है। पशु मॉडल सीमित अनुकूलनशीलता दिखाते हैं।
नैतिक मुद्दे (Ethical Issues) मानव मस्तिष्क के प्रत्यक्ष अध्ययन में नैतिक सीमाएँ होती हैं। पशु मॉडल के उपयोग में भी नैतिक सीमाएँ और पशु कल्य

10) स्मृतिलोप से पीड़ित रोगियों पर किए गए स्मृति अध्ययनों से हमें यह पता चलता है कि स्मृतिलोप से पीड़ित लोगों में स्मृति किस प्रकार कार्य करती है?

स्मृतिलोप (Amnesia) एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति की स्मृति क्षीण हो जाती है या पूरी तरह से लुप्त हो जाती है। यह मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में आई किसी गड़बड़ी या क्षति के कारण होता है, जिससे व्यक्ति की नई जानकारी सीखने या पुरानी जानकारी को याद रखने की क्षमता प्रभावित होती है। स्मृतिलोप के अध्ययन से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि मस्तिष्क में स्मृति कैसे संरक्षित पुनः स्मरण और समेकित की जाती है। इसके अलावा, यह अध्ययन हमें स्मृति के विभिन्न प्रकारों, उनके तंत्रिका आधार और स्मृति प्रक्रिया के तंत्रिका तंत्र से संबंध को समझने में भी सहायता करता है।

स्मृतिलोप के दो मुख्य प्रकार होते हैं – पूर्वगामी स्मृतिलोप (Anterograde Amnesia) और आश्रव्य स्मृतिलोप (Retrograde Amnesia)। पूर्वगामी स्मृतिलोप में व्यक्ति नई जानकारी को सीखने में असमर्थ होता है, जबकि आश्रव्य स्मृतिलोप में व्यक्ति पूर्व में सीखी गई जानकारी को पुनः स्मरण करने में असमर्थ होता है। विभिन्न स्मृतिलोप के मामलों का अध्ययन करके यह स्पष्ट किया गया है कि मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus), एमिग्डाला (Amygdala) और कॉर्टेक्स (Cortex) जैसे क्षेत्रों का स्मृति के निर्माण और पुनः स्मरण में महत्वपूर्ण योगदान होता है।

  1. स्मृतिलोप से संबंधित प्रमुख केस स्टडीज (Major Case Studies of Amnesia):

स्मृतिलोप से संबंधित मामलों के अध्ययन से हमें स्मृति के तंत्रिका आधार और मस्तिष्क के विभिन्न भागों की भूमिका को समझने में सहायता मिली है। इनमें से कुछ प्रमुख केस निम्नलिखित हैं:

(i) एच.एम. (H.M.) का केस स्टडी

एच.एम. (Henry Molaison) स्मृतिलोप का सबसे प्रसिद्ध केस है।

मिर्गी (Epilepsy) के इलाज के लिए उनके मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) और आसपास के क्षेत्रों को शल्य चिकित्सा (Surgical Removal) द्वारा हटा दिया गया था।

इस शल्य चिकित्सा के बाद एच.एम. को पूर्वगामी स्मृतिलोप (Anterograde Amnesia) हो गया, जिससे वे नई जानकारी को सीखने में असमर्थ हो गए।

हालांकि, उनकी अल्पकालिक स्मृति (Short-Term Memory) और प्रक्रियात्मक स्मृति (Procedural Memory) सुरक्षित थी।

इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि हिप्पोकैम्पस नई सूचनाओं के समेकन (Consolidation) और दीर्घकालिक स्मृति (Long-Term Memory) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) क्लाइव वेयरिंग (Clive Wearing) का केस स्टडी

क्लाइव वेयरिंग को एक गंभीर संक्रमण (Herpes Encephalitis) के कारण हिप्पोकैम्पस को नुकसान पहुँचा।

इससे उन्हें पूर्वगामी और आश्रव्य दोनों प्रकार के स्मृतिलोप हो गए।

क्लाइव केवल कुछ सेकंड तक ही नई जानकारी याद रख सकते थे।

हालांकि, उनकी प्रक्रियात्मक स्मृति (जैसे – पियानो बजाना) सुरक्षित थी।

इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रक्रियात्मक स्मृति (Procedural Memory) और स्पष्ट स्मृति (Explicit Memory) के लिए मस्तिष्क के अलग-अलग भाग उत्तरदायी होते हैं।

(iii) के.एफ. (K.F.) का केस स्टडी

के.एफ. को एक दुर्घटना के बाद मस्तिष्क के पेराइटल लोब (Parietal Lobe) को क्षति पहुँची।

इससे उनकी अल्पकालिक स्मृति प्रभावित हुई, लेकिन उनकी दीर्घकालिक स्मृति सुरक्षित रही।

इससे यह स्पष्ट हुआ कि अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृति के लिए मस्तिष्क के विभिन्न भाग उत्तरदायी होते हैं।

  1. स्मृति के प्रकार और स्मृतिलोप का प्रभाव (Types of Memory and Effects of Amnesia):

स्मृति के विभिन्न प्रकारों पर स्मृतिलोप का प्रभाव अलग-अलग होता है।

(i) स्पष्ट स्मृति (Explicit Memory):

इसमें तथ्यात्मक जानकारी (जैसे – नाम, तिथि, स्थान) और व्यक्तिगत अनुभव (जैसे – बचपन की यादें) शामिल होती हैं।

हिप्पोकैम्पस और टेम्पोरल लोब (Temporal Lobe) स्पष्ट स्मृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

एच.एम. जैसे मामलों में स्पष्ट स्मृति का ह्रास हुआ, जिससे नई जानकारी ग्रहण करने की क्षमता खत्म हो गई।

(ii) निहित स्मृति (Implicit Memory):

इसमें कौशल (Skills), आदतें (Habits) और संवेदी धारणा (Perceptual Learning) शामिल होती हैं।

निहित स्मृति मस्तिष्क के बेसल गैंग्लिया (Basal Ganglia) और सेरेबेलम (Cerebellum) पर निर्भर होती है।

क्लाइव वेयरिंग जैसे मामलों में निहित स्मृति संरक्षित रही, जिससे उन्होंने पियानो बजाना जारी रखा।

(iii) कार्यशील स्मृति (Working Memory):

यह अल्पकालिक स्मृति से जुड़ी होती है, जिसमें व्यक्ति सीमित समय तक सूचना को मन में रखता है।

के.एफ. के केस से यह स्पष्ट हुआ कि कार्यशील स्मृति और दीर्घकालिक स्मृति अलग-अलग तंत्रिका प्रणालियों पर निर्भर करती हैं।

  1. स्मृतिलोप से मिली महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियाँ

स्मृतिलोप से पीड़ित रोगियों के अध्ययन से स्मृति के तंत्रिका आधार के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं:

(i) हिप्पोकैम्पस की भूमिका:

हिप्पोकैम्पस नई जानकारी के समेकन और दीर्घकालिक स्मृति के निर्माण में आवश्यक है।

हिप्पोकैम्पस के बिना नई स्पष्ट स्मृति का निर्माण असंभव है।

(ii) प्रक्रियात्मक और स्पष्ट स्मृति का पृथक्करण:

प्रक्रियात्मक स्मृति (जैसे – पियानो बजाना) हिप्पोकैम्पस से स्वतंत्र होती है और सेरेबेलम पर निर्भर करती है।

स्पष्ट स्मृति हिप्पोकैम्पस और कॉर्टेक्स पर निर्भर करती है।

(iii) कार्यशील और दीर्घकालिक स्मृति का पृथक्करण:

कार्यशील स्मृति पेराइटल लोब पर निर्भर करती है, जबकि दीर्घकालिक स्मृति हिप्पोकैम्पस पर निर्भर करती है।

(iv) स्मृति की प्लास्टिसिटी (Plasticity):

मस्तिष्क के अन्य भाग हिप्पोकैम्पस की क्षति के बाद नई तंत्रिका संरचनाएँ (Neural Pathways) विकसित कर सकते हैं।

इससे स्मृति के नए सिरे से निर्माण की संभावना बनी रहती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

स्मृतिलोप से पीड़ित रोगियों पर किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि मानव स्मृति एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें हिप्पोकैम्पस, एमिग्डाला, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और सेरेबेलम जैसे मस्तिष्क के विभिन्न हिस्से अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं। स्पष्ट और निहित स्मृति के लिए अलग-अलग तंत्रिका मार्ग होते हैं। स्मृतिलोप से संबंधित अध्ययनों ने स्मृति के तंत्रिका आधार, संकेतन (Encoding), भंडारण (Storage) और पुनः स्मरण (Retrieval) की प्रक्रियाओं को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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