IGNOU MHI 10 Free Assignment In Hindi 2021-22

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IGNOU MHI 10 Free Assignment In Hindi 2021-22

प्रश्न 1. मध्यकालीन नगरों के अध्ययन संबंधी दृष्टिकोण क्या हैं?

उत्तर मध्यकालीन नगरों के अध्ययन के दृष्टिकोणों को दो भागों यूरोपीय मध्यकालीन नगरौं संबंधी दृष्टिकोण तथा मध्यकालीन भारतीय नगरों संबंधी दृष्टिकोण में विभाजित किया जा सकता है।

यूरोपीय दृष्टिकोण में सैक्स बैबर ने मध्यकालीन नगरों को उत्पादन केन्द्र के रूप में देखा। ये मध्यकालीन नगर पश्चिम में पूंजीवाद के विकास के लिए प्रक्षेप स्थल बन गए। हेनरी पिरेन मध्यकालीन नगरों की प्रधानता और लम्बी दूरी के व्यापार को सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में देखते हैं।

उनके अनुसार ग्यारहवीं सदी के बाद से पश्चिमी यूरोप में व्यापारिक उन्नति के साथ यूरोपीय नगरों का उदभव हआ। फर्नान्ड बॉडल के अनुसार नगरों के विकास के क्रम तीन बुनियादी प्रकार के नगर थे।

(i) मुक्तनगर, (ii) आरक्षित नगर,(iii) अधीनस्थ नगर।

मिशेल, फूको, हेनरी लेफेब्र और एडवर्ड सोजा का कहना है कि नगरीय इकाइयों के निर्माण में सम्मिलित स्थानिक प्रक्रियाओं का विश्लेषण और अध्ययन उनसे मानवीय निर्माताओं के उद्देश्य तथा उनकी पूर्ति की सीमा का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।

मध्यकालीन भारतीय नगरों संबंधी दृष्टिकोण में मोहम्मद हबीब के अनुसार मोहम्मद गौरी की विजय के पश्चात उत्तर भारत में श्रम प्रक्रिया में अचानक वृद्धि के फलस्वरूप नगरीय क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ।

बी.डी. चट्टोपाध्याय और आर. चम्पकलक्ष्मी ने मध्यकालीन भारतीय नगरों का उद्भव नौवीं सदी के बाद के काल को माना है।

मोरलैंड और नकवी का अध्ययन मुख्य रूप से उत्तर भारत के प्रमुख नगरों की मुख्य विशेषताओं तथा आर्थिक प्रगति के साथ उनके संबंधों की जाँच के इर्द-गिर्द घूमता है।

शीरीन मूसवी ने उत्तर भारत के प्रमुख शिल्प उत्पादक नगरों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। इंदु बंगा का अध्ययन पत्तन के नगरीकरण की प्रक्रिया से संबंधित है। MHI 10 Free Assignment In Hindi

मध्यकालीन यूरोपीय नगर मैक्स वेबर ने प्राचीन ग्रीक तथा रोमन नगरों, जो मुख्यतः उपभोग के केन्द्र थे, के विपरीत यूरोपीय मध्यकालीन नगरों को उत्पादन केन्द्र के रूप में देखा। पूँजीवादी विकास की प्रक्रियाओं को विनिमय की प्रक्रियाओं से जोड़ दिया गया।

यहां उत्पादकों एवं व्यापारियों के हितों को राजनीतिक तथा सांस्कृतिक प्राथमिकता भी प्रदान की। मध्यकालीन पश्चिम के निवासियों की रचना उत्पादकों तथा व्यापारियों से मिलकर हुई थी।

उन्होंने अपने चारों ओर फैले वैध सामंती प्राधिकारियों पर अपनी निर्भरता को समाप्त कर दिया और अपना अवैध प्रभुत्व जमाने के लिए सत्ता हड़प ली। उसके अनुसार, जिसे एक आदर्श पूर्व नगरीय समुदाय समझा जाता था,

वह एक ऐसी बसावट थी, जिसमें व्यापार वाणिज्यिक संबंधों के सापेक्षिक पूर्व प्रभुत्व तथा इसकी किलेबंदी, बाजार इसके अपने न्यायालय तथा स्वायत्त कानून थे।

हेनरी पिरेन मध्यकालीन नगरों की स्थापना का श्रेय सामाजिक परिवर्तन को देते हैं, जो व्यापार बढ़ने के कारण हुई। मॉरिस डॉब ने बताया कि मध्यकालीन नगरों के उत्थान और बाजारों के विराम ने सामंतवाद की संरचना पर विघटनकारी प्रभाव डाला था और उन शक्तियों को मजबूत किया, MHI 10 Free Assignment In Hindi

उसने मध्यकालीन नगरों – परतंत्र समाज के मध्य एक नखलिस्तान के रूप में देखा, जिसने दमित तथा शोषित ग्रामीण जनसंख्या को अपनी ओर आकर्षित किया और उन्हें नगरो ‘ बसने के लिए प्रेरित किया।

फर्नान्ड ब्रॉडलर का विचार है कि नगरों के विकास के क्रम में तीन मौलिक प्रकार के नगर थे –

(i) मुक्तनगर अपने आंतरिक भूभाग के समान थे और कभी-कभी इसमें मिश्रित भी होते थे। इसके उदाहरण ग्रीस और रोम हैं। इस प्रकार के नगरों के अधिकांश भाग पर किसानों का कब्जा था।

(ii) आरक्षित नगर आत्मनिर्भर इकाइयों में थे और स्वयं में अधिक सुरक्षित थे। यहां की जीवन-शैली व्यक्तिगत थी। ये नगर सामन्तों से मुक्त थे। इन नगरों में रहने वाले लोगों द्वारा सत्ता को सापेक्षिक रूप से हस्तगत कर लिया गया था।

(iii) अधीनस्थ नगर तीसरे प्रकार के थे। ये नगर राजाओं और राज्य के अधीन थे। फ्लोरेंस और पेरिस इस प्रकार के नगर थे। ये व्यापारिक नगर थे और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध थे।

ब्रॉडल के अनुसार व्यापारिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक नियंत्रण संबंधी प्रकार्य और शिल्प क्रियाकलाप बड़े नगरों के प्रमुख लक्षण हैं।

अनेक इतिहासकारों ने मध्यकालीन नगरों को सांस्कृतिक संरचना के रूप में देखने का प्रयास किया है और सांस्कृतिक निर्माण के रूप में नगरीय पहचानों तथा नगर स्वरूपों की शुरुआत की ओर लगातार नवीनीकृत और संशोधित होते रहे।

नगरीय समुदायों का उनकी सामुदायिक भागीदारी, विदेशी संस्कृतियों के साथ संघर्ष, बहुलवादी समाजों की संरचना, द्विनिष्ठा या बहुनिष्ठा तथा बहुसम्बद्धता के कारण उनके सांस्कृतिक निर्माण के संदर्भ में अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2. आप जीवन-निर्वाह और गैर-जीवन-निर्वाह की अर्थव्यवस्था से क्या समझते हैं। हड़प्पाई सभ्यता के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।

उत्तर निर्वाह अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है, जिसमें विभिन्न प्रकार के कार्यकलाप परिवार के निर्वाह या पालन-पोषण के लिए किए जाते हैं। इसमें उत्पादन उतना ही किया जाता है, जो परिवार के सदस्यों के लिए पर्याप्त हो। यहां अधिशेष की गुजाइश बहुत कम होती है।

निर्वाह अर्थव्यवस्था में कई कार्यकलाप हैं, जो जीवित रहने के लिए बुनियादी खाद्य साधन उपलब्ध कराते हैं। ये कार्यकलाप हैं खेती, पशुपालन, फल संग्रह और शिकार।

हड़प्पा काल में विकसित कृषि व्यवस्था थी, जिसमें पूरे वर्ष खेतों को प्रयोग किया जाता था। शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन दोनों फसलें उगाई थीं,

जिसके प्रमाण उत्खनन से मिले-जुले बीज हैं। प्रमुख खाद्य फसलें गेहूँ, जौ, मटर, चना, सरसों और तिल थे। पटसन जैसी रेशेदार फसल भी उगाई जाता थीं। अनार, काजू और अंगूर जैसे फलों की खेती भी की जाती थी।

हड़प्पा के लोग गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सुअर आदि पालते थे, जिनकी खुदाई में हड्डियाँ मिली हैं। सांड, भेड़ा और कुत्ते भी इनके पालतु पशु थे। पशुओं का प्रयोग दूध, परिवहन और हल जोतने के लिए किया जाता था। लोग विभिन्न जानवरों का मांस भी खाते थे। MHI 10 Free Assignment In Hindi

हड़प्पा के लोग प्रायः नदियों के किनारे रहते थे और मत्स्यन का कार्य करते थे। यहाँ सिन्धु नदी की कुछ मछलियों की हड्डियां मिली हैं। हड़प्पा समुद्री मछलियां अन्तर्देशीय बसावटों में पहुँचाई जाती थीं। लोग जंगली जानवरों का शिकार करके उनका आहार के रूप में प्रयोग करते थे।

हड़प्पा नगरों में कृषि उत्पादन हड़प्पा क्षेत्र की कृषि गहन थी, क्योंकि एक ही खेत का एक वर्ष में एक से अधिक फसल उगाने के लिए प्रयोग किया जाता था। शीत और ग्रीष्म दोनों फसलों के साक्ष्य का अर्थ है कि हड़प्पा निवासी दोहरी फसल की परंपरा का पालन करते थे।

हड़प्पा की कृषि विभिन्न किस्मों के अन्न, तेल और रेशे वाली फसलों सहित फसलों की एक व्यापक श्रृंखला उपलब्ध कराती थी। सक्रिय प्रोटीन के साथ इसमें दर्शाया कि हड़प्पा का भोजन विविधता से पूर्ण था।

यद्यपि हल का फाल अभी तक खुदाई में नहीं मिला है, किन्तु हल के मिट्टी के खिलौने मॉडल इनके प्रयोग की ओर इंगित करते हैं।

प्रारंभिक हडप्पाई कालीबंगा में दो अलग-अलग प्रकार के खाँचों से जोते गए। खेत के साक्ष्य से प्रमाणित होता है कि एक से अधिक फसल उगाने का प्रचलन भी था।

उत्खनन में मिले अनेक पाषाण फलकों से प्रमाणित होता है कि कुछ का प्रयोग फसल की कटाई के लिए हंसिये के रूप में किया जाता होगा। MHI 10 Free Assignment In Hindi

हड़प्पा नगरों में खेती के लिए सिंचाई के लिए भी समुचित व्यवस्था थी, यद्यपि नदियों की बाढ़ से खतरा था, परंतु इसके द्वारा छोड़ी गई उपजारू मिट्टी का भी किसानों ने भरपूर फायदा उठाया होगा।

नदियों की अपेक्षा नहर या चैनल सिंचाई के लिए अधिक उपयोगी रही होंगी। उन्हें इस प्रौद्योगिकी के बारे में जानकारी भी थी, क्योंकि इसका प्रयोग उन्होंने नाली प्रणाली में किया। भारत में नहरों का साक्ष्य नहीं मिला है, परंतु अफगानिस्तान में शोर्तुघई के स्थल से इसका प्रमाण मिला है।

सिंचाई के लिए दूसरी युक्तिसंगत पद्धति कुओं का प्रयोग रही होगी। हड़प्पा के निवासियों को पेयजल के लिए कुएं के निर्माण की प्रौद्योगिकी ज्ञात थी और इसकी पूरी संभावना है

कि फसलों के लिए कुओं का पानी खींचने की तकनीकी का सिंचाई के लिए प्रयोग किया गया होगा। हड़प्पा नगर में गैर-कृषि उत्पादन के तीन पैटर्न मौजूद थे, जिसमें पहला पैटर्न लोथल है।

पीरियड I में लोथल एक गैर-हड़प्पई ग्राम है, जहां प्रयोग किए जा रहे, अभ्रकी लाल बर्तन प्राथमिक मृद्भाण्ड थे।

पीरियड II के बाद की अवधि में गांव को साफ कर दिया गया और एक नई नियोजित बसावट स्थापित की गई। इस बसावट से विभिन्न कार्यकलापों, के लिए सीमांकित विशेषीकृत क्षेत्र थे।

निचले नगर के घर दूर-दूर हैं, जो शिल्पों; जैसे सीपी के काम, धातुकर्म और मनकों के काम का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। इनके स्वाभाविक (organic) विकास की संभावना नगण्य प्रतीत होती है और सड़कों के साथ एक सीधी पंक्ति के रूप में बने हैं।

एक ऊंचे स्थान पर तथाकथित नसर दुर्ग (Acropolis) था. जहां पकी हुई ईंटों से नालियां और हवन कुंड बनाए गए थे।

नगर दुर्ग ऊंचाई पर स्थित होने के कारण इसे बसावट के अंदर अन्य दूसरे क्षेत्रों से अलग करना सरल था और साथ ही निचले शहर में चलाए जा रहे क्रियाकलापों तथा भंडारगृह और गोदी क्षेत्र पर इससे निगरानी रखी जा सकती थी। MHI 10 Free Assignment In Hindi

लोथल का महत्त्व इसकी अवस्थिति में भी है। समुद्र तट पर आदान-प्रदान के प्रयोजन से खम्भात की खाड़ी के समीप और कच्चे माल; जैसे कार्नेलिर और सेलखडी (Steatite) के स्रोतों के पास अवस्थित होने का तात्पर्य था कि इस बसावट में हडप्पा निवासियों के लिए उत्पादन और वितरण दोनों होते थे।

भाग ख

प्रश्न 6. मुगल राजधानी नगरों के रूप में आगरा, फतहपुर सीकरी तथा शाहजहाँनाबाद की तुलना कीजिए

उत्तर आगरा आगरा मुगलकालीन नगरों में एक प्रसिद्ध नगर था। 1506 ई. में सिकन्दर लोदी ने राजपूतों ओर मेवातियों के आक्रमण से सुरक्षा के लिए दिल्ली को छोड़कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया और यहां एक किले का भी निर्माण करवाया।

आगरा 100 वर्षों से अधिक समय मुगल सम्राटों की राजधानी रहा। इस बीच केवल 15 वर्षों के लिए फतेहपुर-सीकरी अकबर की राजधानी रही। 1648 ई. में शाहजहाँ ने अपनी राजधानी शाहजहानाबाद में स्थापित की।

समय के साथ आगरा उत्तरी भारत के प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र के रूप में उभरने लगा। आगरा होकर नदी मार्ग बहुत महत्त्वपूर्ण था। MHI 10 Free Assignment In Hindi

पेल्मा उल्लेख करता है कि असंख्य व्यापारिक वस्तुएं इस नदी मार्ग से आगरा-सीकरी से भेजी और लाई जाती थीं। शहर का जीवन व्यापारियों, महाजनों और सर्राफों के गतिविधियों का केन्द्र बन गया।

यूरोपियों के लिए सबसे प्रतिष्ठित वस्तु नील थी। 1543 में सिर्फ डचों ने ही आगरा से 7000 मन नील की मांग की। नदियों के किनारे अनेक व्यापारिक घाट बने थे, जिसमें हाथीघाट प्रसिद्ध था।

आगरा बाबर की भी राजधानी रही। हुमायूँ का राज्याभिषेक आगरा की जामा मस्जिद में हुआ था और ऐसा कहा जाता है कि उसने एक महल, एक उद्यान और मस्जिद का निर्माण करवाया।

अकबर ने भी एक विशाल किला बनवाया। इस किले में अनेक संरचनाओं का निर्माण करवाया गया। शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया ताजमहल इस शहर की सबसे खूबसूरत इमारत है।

आगरे का लाल किला यमुना नदी के पश्चिमी तट पर ऊपरी भूमि पर स्थित था। इसकी ऊंची दीवारें, प्रमुख द्वार, बुर्ज और किले की दीवार चारों ओर खाई से घिरी हुई थी।

इस किले में उत्कृष्ट महल, हरम उद्यान, चौक और मस्जिद थे। किले के सामने नक्खास था। इसके बाद किले के बाहर खुर्रम, मान सिंह आदि के आवास थे। इस शहर की कोई पूर्ण निर्धारित योजना नहीं थी।

आगरा एक विस्तृत शहर था। फादर मॉन्सरैट ने इसे 4 मील लम्बा और 2 मील चौड़ा बताया। यहां तक कि मानुकी ने इसे 24 मील लम्बा बताया है। यहां की आबादी भी बहुत घनी थी।

आगरा शहर के बाहर की बड़ी हवेलियों और महलों के कारण यूरोपियों द्वारा सराहा गया है। आगरा शहर को साधारण, परंतु कुशल जल निकासी प्रणाली के साथ विकसित किया गया था,

जिसका श्रेय अकबर को दिया जाता है। पूरे वर्ष जल की उपलब्धता के लिए कई हौजों का निर्माण किया गया था। इसके साथ अनेक कुएं और बावलियां थीं। MHI 10 Free Assignment In Hindi

आगरा एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र भी था, इसलिए वहां अनेक सरायें बनाई गई थीं। सराय में आश्रय, भोजन व्यवस्था के साथ सामान भण्डारण व्यवस्था थी। उद्यान शहरी परिदृश्य के प्रमुख स्थल माने जाते थे।

एब्बा कॉक के अनुसार मुगलों का शहर आगरा मुख्यत: उद्यानों का शहर था। सभी मुगल सम्राटों ने उद्यान बनवाये थे। शाही संरचनाओं के अलावा निर्माण के क्षेत्र में कुलीन और अमीर वर्ग भी निर्माण कार्य में शामिल था।

इस शहर की एक अन्य विशेषता धर्म या जाति के आधार पर कोई भौतिक या स्थानिक अलगाव नहीं था। पेल्सर्ट के अनुसार संपूर्ण शहर के घर एक-दूसरे के निकट बने हुए थे। हिन्दू व मुसलमान और गरीब-अमीर सभी समान भाव से रह रहे थे।

फतेहपुर सीकरी

फतेहपुर सीकरी शहर का निर्माण अकबर ने करवाया। आर.नाथन का कहना है कि यह अकबर का सिर्फ आवासीय मुख्यालय था और 1571 में अकबर आगरा में राजधानी का दर्जा हटाए बगैर यहां आ गया था।

नदीम रिजावी के अनुसार यह अकबर की राजधानी और आधिकारिक शहर था। यहाँ शहर घराने के लोग, अमीर और नौकरशाहों के आवास थे। MHI 10 Free Assignment In Hindi

अकबर से पहले सीकरी यहां रहने वाले सीकरवार राजपूतों के नाम पर सीकरी नाम पड़ा। बाबर ने 1527 ई. इसको खानवा युद्ध के बाद जीता था और कई निर्माण कार्य करवाया

अकबर की सीकरी पेटूस्सिओली का कहना है कि सीकरी एक योजनाबद्ध शहर था। अन्य इसे ऐसा नहीं मानते। कंधारी के अनुसार इसका निर्माण तीन प्रमुख चरणों में हुआ
(i) 1571 में (ii) 1573-74 में (iii) 1576-77 में

1580 तक पूरे महल का निर्माण कर लिया गया। महल परिसर की योजना पहले ही बना ली गई थी। पानी की आपूर्ति करने के लिए एक विशाल झील बनाई गयी थी।

मुख्य रिज पर शहर बनाए गए, जबकि रिज के नीचे के किनारे सामान्य लोगों के लिए आवंटित किए गए थे और अमीरों को रहने के लिए यमुना के किनारे स्थान दिया गया। शहर में आठ दरवाजे थे।

रिज में तीन प्रमुख परिसर शामिल थे पवित्र इमारतें, शाही महल और आम लोगों के घर। ) महल-ए-इलाही अकबर का कार्यात्मक और आनुष्ठानिक परिसर था। बैठकखाने में अकबर संगीतकारों और कवियों आदि से मिला करता था। MHI 10 Free Assignment In Hindi

शाही कुतुबखाना शाही पुस्तकालय के रूप में कार्य करता था। पूरा सीकरी शहर ग्रिड योजना पर आधारित था, जिसे चहारबाग पद्धति पर विकसित किया गया सीकरी में पांच अकबरी बाजार और चार सरायें थीं। मुख्य बाजार क्षेत्र और वाणिज्यिक क्षेत्र शहर की दीवारों के भीतर पूर्व दिशा की ओर स्थित था।

औद्योगिक क्षेत्र और कारीगरों का आवास शाही आवासों से दूर था। जोगीपुरा और वेश्यालय (शैतानपुरा) भी शहर की दीवारों के बाहर बसे हुए थे।

किले का मुख्य द्वार हाथी पोल था, जो 800 मीटर लंबी पटरीनुमा सड़क थी, जिसके दोनों ओर दुकानें थीं और आधा रास्ता चहारसुक पर जाकर खत्म होता था।

तेहपुर सीकरी और देशज परम्पराएं

सीकरी में स्थानीय और इस्लामी परम्पराओं का अद्भुत मिश्रण था। अकबर और उसके कारीगरों ने सीकरी के निर्माण के लिए कलात्मक नवीनताओं के साथ स्थानीय और स्वदेशी परम्पराओं से गहन रूप ग्रहण किया, जो अकबर के कॉस्मोपॉलिटन दृष्टिकोण और उसके उदारवादी व्यक्तित्व को दर्शाता है।

अधिकांश इमारतों के मुख्य द्वार को शिल्पशास्त्र के अनुसार सबसे अनुकूल दिशाओं- उत्तर और पूर्व में रखा गया था। ज्योतिष शास्त्र और खगोल शास्त्र के शुभ और अशुभ प्रभावों का समान रूप से निर्माण में ध्यान रखा गया।

फतेहपुर सीकरी की एक अन्य विशेषता मुगल शिविरों की धारणा से प्रेरित होना था। इमारतों में बड़े पैमाने पर पत्थरों का प्रयोग किया गया। शिविर तथा नगर दोनों पब्लिक से प्राइवेट क्षेत्र की दिशा में पदानक्रम में योजनाबद्ध थे। MHI 10 Free Assignment In Hindi

सीकरी निर्माण में कई प्रकार के स्तम्भ का प्रयोग किया गया। मेहराब का इस्तेमाल केवल उन पवित्र परिसरों में किया गया, जो अधिकतर आलंकारिक तौर पर बिना प्रमुख डाट पत्थर के इस्तेमाल किए जाते थे।

झरोखे की खिड़कियां और छतरियां अन्य देशज शैली थी, जिसका सीकरी में बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया। प्रायः सभी मुगल सम्राटों ने शहरी निर्माण के लिए उद्यान बनवाया।

शाहजहानाबाद

शाहजहानाबाद दिल्ली में मुगलों का प्राचीन शहर था। दिल्ली की एक भौगोलिक श्रेष्ठता थी। यह यमुना के तट पर अरावली की पहाड़ियों में मध्य जलवायु और घने जंगल के साथ एक सुरम्य परिदृश्य प्रदान करता है।

आगरा की अपेक्षा यह विस्तृत क्षेत्र था। यहां धार्मिक संतों का भी निवास था। 1639 में शाहजहाँ ने अपनी राजधानी शाहजहानाबाद स्थानान्तरित करने का निर्णय किया।

आगरा में जलवायु प्रतिकूल और पानी की कमी के कारण राजधानी को बदलना पड़ा। नई राजधानी के लिए वह स्थान चुना गया, जो नूरपुर और फिरोजशाह कोटला के मध्य था।

शहर दीवारों से घिरा था, जो प्रारम्भ में मिट्टी से बना था। आगे चलकर शाहजहाँ ने शासन काल के 26वें वर्ष में पत्थर और मोर्टार की दीवार बनवायी गई, जो कश्मीरी गेट से शुरू होकर मोरी गेट पर खत्म होती थी, जिसमें 11 विशाल द्वार थे। MHI 10 Free Assignment In Hindi

इस किले में अनेक सुंदर इमारतें थीं; जैसे नक्कारखाना, दीवान-ए-आम, रंगमहल और शीशमहल। किले के चारों ओर 10 गज गहरी और 20 गज चौड़ी खाई थी। किले की सुरक्षा के लिए अनेक प्रकार के सैनिक थे।

इसके अलाबा किला नदी की ओर उद्यानों से घिरा था। किले के आसपास एक बड़ी संरचना जामा मस्जिद और अन्य मस्जिदें थीं। शाहजहानाबाद शहर की योजना इंडो इस्लमिक विचारों से प्रभावित थी।

इस शहर की योजना ‘मनसारा’ नामक शिल्पशास्त्र से प्रभावित थी। यहां महल और किला बनाया गया था।महलकिला का मंह पश्चिम में मक्का की ओर था।

शाहजहानाबाद में सुन्दर बाजार, राजकुमारों एवं कुलीन अमीरों की हवेलियां थीं। सालेह कांबो का कहना है कि शहरों में हबली के अलावा हिन्दू और आर्मेनियन व्यवसायियों के घर 6-7 मंजिल ऊंचे थे।

शहर में यात्रियों के लिए शानदार सरायें थीं; जैसे बेगम, सराय, जहाँआरा की सराय आदि। शहर की दो प्रमुख सड़कें थीं। एक लाहौरी गेट के फतेहपुरी मजिस्द तक और दूसरी लाहौरी गेट के अकबराबादी गेट तक आती थी।

नहर-ए-बहिस्ता सड़क के बीच से गुजरती थी, जिसमें पेड़ और मेहराबहार खुले स्थान थे। शहर में पानी की आपूर्ति नहर-ए-बहिस्ता के द्वारा प्रदान की गई थी। MHI 10 Free Assignment In Hindi

शहर के कई उद्यान थे; जैसे करोल उद्यान, शालीमार उद्यान इसमें फलों की दुर्लभ किस्मों के पेड़ थे।
उपनगरीय क्षेत्रों में शाही शिकारगाह के मैदान और स्थल फैले हुए थे।

शाहजहाँ की शिकारगाह नांगलोई जेल में थी, जिसमें एक शिकारगाह, एक हस्तसाल और एक पोलखाना था। कश्मीरी गेट के पास कुदसिया बेगम ने कुदसिया उद्यान, एक महल और एक मस्जिद बनवायी।

ये उपनगर शहर के मुख्य मार्ग थे और प्रमुख व्यापारिक केन्द्र और आपूर्ति के मुख्य केन्द्र थे। धार्मिक गतिविधियों के भी अनेक केन्द्र थे। शाहजहानाबाद के उत्तर में सब्जी मंडी और इसके पास घोड़ों का बाजार (नक्खास) था। दिल्ली में निर्यातक केन्द्र भी थे।

इस शहर में कई प्रकार के आध्यात्मिक स्थल थे; जैसे खानकाह, दरगाह और मजार आदि। शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह सूफी गतिविधि का मुख्य केन्द्र थी।

शाहजहानाबाद को केवल राजधानी का दर्जा हासिल नहीं था, बल्कि यह बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। सभी दरवाजों पर एक बाजार होता था। दूसरे देशों से भी लोग यहां पढ़ने आते थे। शहर की आबादी बहुत घनी था। सम्राट की उपस्थिति से आबादी अधिक बढ़ जाती थी।

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प्रश्न 7. 17-18वीं शताब्दियों में सूरत नगर के विकास का परीक्षण कीजिए। सूरत की नगरीय सामाजिक पृष्ठभूमि का पैटर्न क्या था?

उत्तर सूरत मध्यकाल में सूरत एक महत्त्वपूर्ण नगरीय केन्द्र था। मुगलों के समय इसके महत्त्वपूर्ण होने के अनेक कारण थे। सूरत की उत्पत्ति और विकास सूरत के विषय में सर्वप्रथम जानकारी 10वीं शताब्दी में चालुक्य साम्राज्य में मिलती है। MHI 10 Free Assignment In Hindi

यह ताप्ती नदी के किनारे स्थित उर्वर क्षेत्र था, जहां कृषि और वाणिज्यिक दोनों प्रकार की फसलें पैदा होती थीं। 10-12वीं शताब्दी में सूरत व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो गया।

उत्तरवर्ती सोलंकी के शासन काल में गुजरात साम्राज्य में दक्कन के संसाधनों को आकर्षित करने के लिए इसका विकास कैम्बे के सहायक के रूप में हुआ था। यद्यपि कैम्बे गुजरात का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पत्तन था तथापि सूरत ने गुजरात के अनुपूरक आर्थिक द्वार के रूप में अपनी स्थिति कायम रखी।

1538 में दीव पर पुर्तगालियों का नियंत्रण हो गया। इसके कारण गुजरात में पूर्तगालियों के पत्तन के रूप में सूरत का उत्थान हुआ। मुगलों के अधीन सूरत मुगलों के अधीन सूरत में समृद्धि आई।

1573 ई. में सूरत पर मुगलों की विजय के पश्चात् यह उत्तरी भारत तथा उत्तरी दक्कन के विशाल आंतरिक भूभाग के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण निर्गम द्वार था।

सूरत हज तीर्थ यात्रियों के लिए महत्त्वपूर्ण पत्तन बन गया। सूरत ने बंगाल और गुजरात के पत्तनों को जोड़ दिया, जिससे व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा मिला। मुगलों द्वारा 1601 में खानदेश की विजय के पश्चात इसका महत्त्व अधिक बढ़ गया।

मुगलों के अधीन सूरत का प्रशासन यहाँ का प्रशासनिक क्षेत्राधिकार एक मुत्सद्दी (सूबेदार) और किलेदार को सौंपा गया था। मुत्सद्दी राजस्व ने संग्रह और प्रशासन के लिए जिम्मेदार था,

जबकि किलेदार सैनिक कार्यकलापों को देखता था। वह नगर रक्षा के लिए उत्तरदायी था। हाकिम या स्थान, सूबेदार पत्तन नगर और अभिजात्यों पर नियंत्रण रखता था। सूरत पत्तन राजस्व में चार प्रतिशत का योगदान देता था। MHI 10 Free Assignment In Hindi

व्यापार और वाणिज्य मुगलों के काल में सूरत ने आयात और निर्यात के बंदरगाह के रूप में कार्य किया। लाल सागर का मार्ग गुजराती व्यापारियों विशेषकर, सूरत के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण था।

भारत, ईरान और तूरान के बीच सूरत से बड़ी मात्रा में व्यापार होता था। नगरीय समाज की संरचना सुरत के निवासी गुजरात के सबसे उद्यमी समदाय व बनिया थे।

पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों डच और अंग्रेजों ने बहधा बनियों से कडी प्रतिस्पर्धा के बीच प्रमुख दलाल के रूप में पारसियों को सेवा में रखा। सूरत के बोहरा सौदागरों में सर्वाधिक प्रसिद्ध अब्दुल गफूर बोहराओं के संगठन का प्रमुख था।

यूरोपीय और सूरत यूरोपियनों ने सूरत को एक व्यापारिक केन्द्र और नगर के रूप में बदल दिया। अंग्रेजों ने मालों और नकदी में लगभग 10 मिलियन पौंड का निवेश किया अंग्रेजी नौसैनिक बल भी सूरत के लिए आय का स्रोत था

1884 में डचों ने सूरत और बटाविया को छोड़कर अपनी सभी फैक्टरियों को बंद करने का निर्णय लिया। डचों का मुगलों और व्यापारियों से अच्छा तालमेल था।

सूरत का नगरीकरण MHI 10 Free Assignment In Hindi

सूरत की किलेबंदी सर्वप्रथम कच्ची दीवारों से की गई, परंतु मराठों के हमले के पश्चात् औरंगजेब ने मोटी ऊँची दीवार का निर्माण कराया, जिसमें लगभग 15 वर्ष लगे।

फिर भी यह कमजोर प्राचीर था। 1717 में मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने नगर के चारों ओर एक विशाल दीवार बनाने का आदेश दिया, जिसे आलमपनाह या बाहरी दीवार कहा गया और पहले की दीवार को आंतरिक दीवार कहा गया।

सूरत के अंदर नगर के मूल भाग में सीमा-शुल्क-गृह, टकसाल और दरबार थे। इसके चारों ओर बसावटों का विकास हुआ। प्रत्येक मुस्लिम अमीर एक छोटा आवासीय सेक्टर था, जिसे पुर कहा जाता था।

पुर के केन्द्र में अमीर का आवास होता था। दीवारों के बीच में सुंदर बगीचे लगाए गए थे, जिसकी हिन्दू- मुसलमान दोनों देखभाल करते थे। जाति और व्यवसाय के अनुसार आवास बने थे।

सूरत के लोक निर्माण का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण गोपी तालाब था, जिसका विवरण विदेशियों ने दिया है। पानी की अच्छी व्यवस्था थी और स्नान के लिए हमाम बनाए गए थे।

मुगल इमारतें प्रायः पत्थरों से बनी धनवान सौदागरों के घर ईंट के बने थे। आम लोगों के घर बांस से बने थे। 18वीं सदी तक नगर की जनसंख्या तेजी से बढ़ी। MHI 10 Free Assignment In Hindi

18वीं सदी के सूरत का पतन :

सूरत के पतन के कारण सूरत के पतन का महत्त्वपूर्ण कारण एशिया की तीन शक्तियों-सफाविदो, आटोमन और मुगलों का एक साथ कमजोर और । नष्ट होना था। यमन का गृहयुद्ध इस क्षेत्र में व्यापार और वाणिज्य में एक और बाधा था।

फारस की खाड़ी में व्यापार और लाल सागर में अर्थव्यवस्था के पतन का सूरत की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा। 1707 में मुगल साम्राज्य का पतन शुरू होने के साथ उत्तर मुगलों के काल में साम्राज्य अस्थिर हो गया।

सूरत के आंतरिक भूभागों में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गई। सूरत और इसके आंतरिक भूभागों का आगरा, लाहौर और बनारस के दूरवर्ती क्षेत्रों से संबंध समाप्त हो गया। इसने सूरत के राजस्व को बुरी तरह प्रभावित किया।

सूरत के पतन का एक अन्य मुख्य कारण मराठों का युद्ध था। शिवाजी ने 1644 में सूरत पर हमला किया, जिसे यह संभाल नहीं सका। मराठा नायक ने नगर को तबाह कर छोड़ दिया। शिवाजी के बाद 1670 में मराठों ने लूटपाट कर आधे कस्बे को जला दिया।

मराठों के आक्रमण से 1730 ई. में मुस्लिम प्रशासन वित्तीय संकट में आ गया। सूरत की अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान में बम्बई का विकास भी बाधक हुआ। MHI 10 Free Assignment In Hindi

1673 तक अधिकांश यूरोपीय जहाज सूरत में लंगर डालते, परंतु 1887 में बम्बई मुख्यालय हो गया। इसके साथ सूरत के पत्तन में तेजी से गाद भर रही थी।

नबाबों के नगर का उत्थान 18वीं शताब्दी नदी तक सूरत प्रभावशाली नगर था। नवाब बेग खान (1733-46) के शासन के दौरान राजनीतिक कठिनाइयां उत्पन्न हो गयीं, जिसमें मध्यपूर्व में बाजारों के साथ परम्परागत नेटवर्क भी प्रभावित हुए।

उसके बावजूद व्यापार के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में नगर अस्तित्व में बना रहा। बेग खान की मृत्यु के पश्चात उसके भाइयों में खींचतान चलती रही।

फलस्वरूप सैन्य टुकड़ी का प्रधान मेह अत्युचन्द ने नवम्बर 1747 में किले को अपने नियंत्रण में ले लिया और 12 वर्ष तक शासन करता रहा। मेह अत्युचन्द ने जिस गृहयुद्ध को शुरू किया, उसमें यूरोपीय शक्तियां यहां तक की मराठे भी शामिल हो गए। इसमें मराठों को कुछ सफलता हाथ लगी।

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प्रश्न 10. निम्न में से किन्हीं दो पर लगभग 250 शब्दों में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए

(ii) औपनिवेशिक काल में हिल स्टेशन

उत्तर हिल स्टेशन हिल स्टेशन गर्मियों में अंग्रेजों की जलवायु के अनुकूल होते थे, इसलिए उन्होंने यहां ग्रीष्मकालीन राजधानियां बनाईं। ब्रिटिश हिल स्टेशन की स्थापना 1819 में हुई और 1860 तक अनेक हिल स्टेशनों की स्थापना हो गयी थी।

1864 में शिमला वायसराय की आधिकारिक रूप से ग्रीष्मकालीन राजधानी बन गई और 1870 में मद्रास प्रेसीडेंसी की राजधानी ऊटी बनी।

हिल स्टेशनों में निवास के विरुद्ध अनेक याचिकाएं डाली गईं, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों के निवास की अवधि कम कर दी गई।

वस्तुतः ये हिल स्टेशन यूरोपीय अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए उपयुक्त रहन-सहन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए निर्मित किए गए थे।

यहां अंग्रेजी वास्तुकला को बढ़ावा दिया गया तथा ये अपने आकार और महत्त्व की दृष्टि से अलग-अलग प्रकार के थे। MHI 10 Free Assignment In Hindi

ऊटी में अधिक संख्या में यूरोपियन्स रहते थे, क्योंकि ऊटी 1884 में मद्रास सेना का स्थायी मुख्यालय बन गया। अंग्रेज यह नहीं चाहते थे कि ऊटी में भारतीय राजा भी अपना ग्रीष्मकालीन निवास बनाए थे।

उन्हें भय था, इससे रोग फैल सकता था। शिमला एक महत्त्वपूर्ण हिल स्टेशन बन गया, क्योंकि वायसराय की ग्रीष्मकालीन राजधानी और भारत में ब्रिटिश सेना का मुख्यालय था।

शिमला में कीमती संपत्ति मुट्ठी भर यूरोपीयों द्वारा नियंत्रित थी तथा उस पर उन्हीं का स्वामित्व था। 1886 में भारतीय राजाओं ने शिमला में उन घरों का लगभग सातवां भाग खरीद लिया था, जो यूरोपीय के अनुकूल थे।

1891 में जब कालका तक रेल पहुँची तो सरकार ने इस प्रकार की योजनाएं बनाईं कि शिमला में लोगों के आगमन को सीमित किया जा सके, परंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसका विरोध किया।

फलस्वरूप इस प्रकार के नियंत्रण पर रोक लग गई। वस्तुतः अंग्रेज भारत में स्थायी रूप से रहना नहीं चाहते थे। आगे चलकर भाप से तेजी से चलने वाले जहाजों ने ब्रिटेन की यात्रा को हिल स्टेशनों में ग्रीष्मावकाश की अपेक्षा अधिक आसान बना दिया गया, इसलिए भारत में हिल स्टेशनों के प्रति अंग्रेजों की रुचि कम हो गई।

(iv) आधुनिकता के स्थल में रूप में नगर

उत्तर आधुनिकता के प्रतीक 19वीं शताब्दी के मध्य तक शहर आधुनिकता के सामान्य रूप से जुड़ चुके थे और उनमें आधुनिकता के प्रतीक दिखाई देने लगे थे।

आधुनिक शहरों में औद्योगिक पूँजीवाद, नौकरशाही तार्किकता या सहकारिता विकसित हो चुकी थी। ये उन शहरों के प्राथमिक कार्य स्थल थे जिन पर ध्यान दिया गया।

आधुनिकता शब्द केवल भौतिक परिवर्तनों जैसें औद्योगिक या प्रिंट पूँजीवादी या मल-मल या सीवेज और स्वच्छता की व्यवस्था का ही सूचक नहीं है, MHI 10 Free Assignment In Hindi

बल्कि यह नए संस्थात्मक क्षेत्रों जैसे कि संग्रहालयों, सार्वजनिक पुस्तकालयों तथा स्वैच्छिक संस्थाओं तथा साथ ही व्यक्तिवाद तथा प्रशासनिक तार्किकता की नई समझ से भी जुड़ा है।

शहर इन आरंभिक सर्वाधिक रूप में प्रमुख रहे, जहाँ पर इन परिवर्तनों का प्रभाव सर्वाधिक दृष्टिगोचर होता है।

इन शहरों में सघन रूप से फैक्ट्रियों, व्यापारिक फर्मों, पश्चिमी शिक्षा प्राप्त स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग, नृजातीय रूप से विविधतापूर्ण प्रवासी समुदाय, विकसित छपाई एक सहयोगात्मक संस्कृति साथ ही साथ जन-उपभोग तथा मनोरंजन के नए स्वरूपों का विकास हुआ।

शहरी आधुनिकता के, जो अनुभव इन शहरों ने उत्पन्न किए तथा जिन तरीकों से भारतीय निवासियों ने इसके प्रतिक्रिया दी, वह न तो पश्चिमी प्रारूप की कांतिहीन नकल था और न ही अपरिवर्तनीय विभिन्नताओं का उग्र प्रत्यक्षीकरण पश्चिमी आधुनिकता तथा भारतीय परम्परा के विरोधाभास के संबंध में एक साथ समानता तथा विभिन्नता दोनों के संकेतों से युक्त था। ।

आधुनिकता की तकनीकें बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही आधुनिकता एवं शहरों के मध्य नए प्रकार के संबंधों का उदय हुआ।

पश्चिमी यूरोप शानदार पूँजीपति नगर लंदन, पेरिस, बर्लिन, वियना, स्टॉकहोम और संयुक्त राज्य अमेरिका में न्यूयार्क शहरी आधुनिकता के प्रतीक के रूप में आगे थे।

इनमें से कई शहरों का पुनर्निर्माण एक भव्य स्थल के रूप में स्मारकीय परिदृश्यों के आरंभ के साथ ही शहर को एक उपभोक्ता स्थल के रूप में प्रस्तुत करना, एक विहार स्थल तथा निगरानी स्थल के रूप में किया गया था। भारत में इन्हीं के चिह्नों तथा प्रतीकों को साकार रूप दिया गया।

शहरी आधुनिकता मात्र शहर के निर्मित प्रारूप अथवा शासन संचालन में ही प्रतिबिंबित नहीं होती, वरन् राज्य और समाज में भी दिखाई देती है।


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राज्य और समाज के बीच मध्यस्थता करने वाले एक नए क्षेत्र, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र का उदय हुआ, इसके कारण नगर, शहरी अंतर्किया एवं सामाजिकता के नए प्रारूपों के क्षेत्र बने।

इसके साथ ही लोगों की अभूतपूर्व भीड़, तकनीकों, उपयोगी वस्तुओं, संस्थाओं तथा नगरों में विद्यमान सूचनाओं से नए वैयक्तिक एवं सामूहिक दोनों प्रकार की आकस्मिकताओं एवं प्रयोगों का उदय हुआ, जो कि सुस्पष्ट रूप से आधुनिक थे।

साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के दौर में यूरोप संचालित शहरी आधुनिकता के ये प्रतिरूप आदर्श विश्व के अनेक भागों में अपनाए गए।

सर्वत्र औपनिवेशिक विश्व में नगरों ने अपनी स्थानिक तकनीकी तथा सामाजिक संकेत साम्राज्यवादी पश्चिम से ग्रहण किए। विद्वानों के शोधों से पता चलता है कि वे उन तरीकों से भी विकसित हुए, जिनकी महानगरीय संदर्भ के अनुभव द्वारा पूर्व कल्पना भी नहीं की गई थी।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अंत से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध के अंत तक के काल में नगरीय आधुनिकता के प्रमुख स्थल के रूप में औपनिवेशिक भारत के चार प्रमुख शहरों बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली तथा मद्रास पर ध्यान केन्द्रित किया गया।

 

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